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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1306 of 1855

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Page 1306

हे सोम! तुम हृदय के भीतर गमन करने वाले, दीनतारहित एवं देवों का क्रोध दूर करने
वाले हो. हे सोम! तुम इंद्र की मित्रता प्राप्त करके शीघ्र आकर उसी प्रकार हमारा धन वहन
करो, जिस प्रकार घोड़ा बोझा ढोता है. (२)
अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्.
किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृत मर्त्यस्य.. (३)
हे मरणरहित सोम! हम तुम्हें पीकर अमर बनेंगे, स्वर्ग में जाएंगे एवं देवों को प्राप्त
करेंगे. शत्रु हमारा क्या कर लेगा? मुझ मनुष्य का हिंसक शत्रु क्या बिगाड़ लेगा. (३)
शं नो भव हृद आ पीत इन्दो पितेव सोम सूनवे सुशेवः.
सखेव सख्य उरुशंस धीरः प्र ण आयुर्जीवसे सोम तारीः.. (४)
हे सोम! पीने के पश्चात् तुम हृदय के उसी प्रकार सुखदाता बनो, जिस प्रकार पिता पुत्र
को सुख पहुंचाता है. तुम इस प्रकार सुखदाता बनो, जिस प्रकार मित्र मित्र को सुख देता है.
हे अनेक जनों द्वारा प्रशंसित धीर सोम! जीवन के लिए हमारी आयु बढ़ाओ. (४)
इमे मा पीता यशस उरुष्यवो रथं न गावः समनाह पर्वसु.
ते मा रक्षन्तु विस्रसश्चरित्रादुत मा सामाद्यवयन्तिन्वन्दवः.. (५)
यह पिए हुए, यशकारक एवं रक्षण के इच्छुक सोम मुझे इस प्रकार यज्ञकर्मों से बांध दें,
जिस प्रकार बधिया बैल रस्सी की गांठों द्वारा रथ से बंधा रहता है. सोम मुझे भ्रष्ट चरित्र से
बचावें एवं व्यभिचार से दूर करें. (५)
अग्निं न मा मथितं सं दीदीपः प्र चक्षय कृणुहि वस्यसो नः.
अथा हि ते मद आ सोम मन्ये रेवाँ इव प्र चरा पुष्टिमच्छ.. (६)
हे सोम! पीने के बाद तुम मुझे मथित अग्नि के समान भली प्रकार दीप्त करो, भली
प्रकार देखो एवं अतिशय धनशाली बनाओ. मैं तुम्हारे मद के लिए स्तुति करता हूं. तुम
धनवान् बनकर पुष्ट बनो. (६)
इषिरेण ते मनसा सुतस्य भक्षीमहि पित्र्यस्येव रायः.
सोम राजन् प्र ण आयूंषि तारीरहानीव सूर्यो वासराणि.. (७)
हम अभिलाषापूर्ण मन से निचोड़े हुए सोमरस को पैतृक धन के समान प्रयोग में लाएंगे.
हे राजा सोम! हमारी आयु इस प्रकार बढ़ाओ, जिस प्रकार सूर्य दिनों को बढ़ाते हैं. (७)
सोम राजन् मृळया नः स्वस्ति तव स्मसि व्रत्या३ स्तस्य विद्धि.
अलर्ति दक्ष उत मन्युरिन्दो मा नो अर्यो अनुकामं परा दाः.. (८)
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