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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1319 of 1855

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Page 1319

हे इंद्र! सोमरस निचुड़ जाने पर हम तुम्हें रात एवं दिन में बुलाते हैं. तुम हमारी
अभिलाषा पूरी करो. (६)
क्व१ स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः. ब्रह्मा कस्तं सपर्यति.. (७)
वर्षा करने वाले, नित्य युवक, विशाल गरदन वाले और न झुकने वाले इंद्र कहां हैं?
कौन स्तोता उनकी पूजा करता है? (७)
कस्य स्वित्सवनं वृषा जुजुष्वाँ अव गच्छति. इन्द्रं क उ स्विदा चके.. (८)
वर्षा करने वाले इंद्र प्रसन्न होकर आते हैं. कौन यजमान इंद्र की स्तुति करना जानता है.
(८)
कं ते दाना असक्षत वृत्रहन्कं सुवीर्या. उक्थे क उ स्विदन्तमः.. (९)
हे वृत्रहंता इंद्र! यजमानों द्वारा दिए हुए दान क्या तुम्हारी सेवा करते हैं? मंत्र पढ़ते समय
क्या शोभन-स्तोत्र तुम्हारी सेवा करते हैं? युद्ध में कौन तुम्हारे अधिक समीप रहता है? (९)
अयं ते मानुषे जने सोमः पुरुषु सूयते. तस्येहि प्र द्रवा पिब.. (१०)
हे इंद्र! मैं मानवों के बीच में तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ता हूं. तुम सोमरस के पास
आओ एवं उसे पिओ. (१०)
अयं ते शर्यणावति सुषोमायामधि प्रियः. आर्जीकीये मदिन्तमः.. (११)
हे इंद्र! यह सोमरस तुम्हें कुरुक्षेत्र के तृणों वाले तालाब में अधिक प्रसन्न करता है. वह
तालाब आर्जीक देश की सुषोमा नदी के तट पर है. (११)
तमद्य राधसे महे चारुं मदाय घृष्वये. एहीमिन्द्र द्रवा पिब.. (१२)
हे इंद्र! हमारा धन बढ़ाने एवं शत्रुनाशक मद के लिए उसी सुंदर सोमरस को पिओ एवं
सोमरस की ओर जल्दी जाओ. (१२)
सूक्त—५४ देवता—इंद्र
यदिन्द्र प्रागपागुदङन्यग्वा हूयसे नृभिः. आ याहि तूयमाशुभिः.. (१)
हे इंद्र! तुम हमारे अध्वर्युजनों द्वारा पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं नीचे की दिशा में बुलाए जाते
हो. तुम अपने घोड़ों की सहायता से जल्दी आओ. (१)
यद्वा प्रस्रवणे दिवो मादयासे स्वणरि. यद्वा समुद्रे अन्धसः.. (२)
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