Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

About this granth

The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.

This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.

The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.

Page 752Permalink

७४२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः सकलसंलग्न हेमपिङ्गलविग्रह।<br>नतोऽस्मि पद्मनाभ त्वां सुरशक्रजगद्गुरो॥ ५६<br>कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ।<br>सहस्रयमसङ्क्रोध सहस्रेन्द्रपराक्रम॥ ५७<br>सहस्रधनदस्फीत सहस्रवरुणात्मक।<br>सहस्रकालरचित सहस्रनियतेन्द्रिय॥ ५८<br>सहस्रभूमहाधैर्य सहस्रानन्तमूर्तिमन्।<br>सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्रग्रहविक्रम॥ ५९<br>सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत।<br>सहस्रबाहुवेगो ग्र सहस्त्रास्यनिरीक्षण।<br>सहस्रयन्त्रमथन सहस्रवधमोचन॥ ६०<br>अन्धकस्य विनाशाय याः सृष्टा मातरो मया।<br>अनादृत्य तु मद्वाक्यं भक्षयन्त्यद्य ताः प्रजाः॥ ६१<br>कृत्वा ताश्च न शक्तोऽहं संहर्तुमपराजित।<br>स्वयं कृत्वा कथं तासां विनाशमभिकारये॥ ६२है। पद्मनाभ! आप सर्वव्यापी हैं, आपका शरीर स्वर्णके समान पीला है और आप देवता, इन्द्र तथा जगत्‌के गुरु हैं, आपको प्रणाम है। आपका सिंहनाद प्रलयकालीन मेघोंके समान है, आपकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके सदृश है, आपका क्रोध हजारों यमराजके तथा पराक्रम सहस्रों इन्द्रके समान है, आप हजारों कुबेरोंसे भी बढ़कर समृद्ध, हजारों वरुणोंके समान, हजारों कालोंद्वारा रचित और हजारों इन्द्रियनिग्रहियोंसे बढ़कर हैं, आपका धैर्य सहस्रों पृथ्वियोंसे भी उत्तम है, आप सहस्रों अनन्तोंकी मूर्ति धारण करनेवाले, सहस्रों चन्द्रमा-सरीखे सौन्दर्यशाली और सहस्रों ग्रहों-सदृश पराक्रमी हैं, आपका तेज हजारों रुद्रोंके समान है, हजारों ब्रह्मा आपकी स्तुति करते हैं, आप हजारों बाहु, मुख और नेत्रवाले हैं, आपका वेग अत्यन्त उग्र है, आप सहस्रों यन्त्रोंको एक साथ तोड़ डालनेवाले तथा सहस्रोंका वध और सहस्रोंको बन्धनमुक्त करनेवाले हैं। भगवन्! अन्धकका विनाश करनेके लिये मैंने जिन मातृकाओंकी सृष्टि की थी, वे सभी आज मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर प्रजाओंको खा जानेके लिये उतारू हैं। अपराजित! उन्हें उत्पन्न कर मैं पुन: उन्हींका संहार नहीं कर सकता। स्वयं उत्पन्न करके भला मैं उनका विनाश कैसे करूँ॥ ५५—६२॥
एवमुक्तः स रुद्रेण नरसिंहवपुर्धरः।<br>ससर्ज देवो जिह्वायास्तदा वागीश्वरीं हरिः॥ ६३<br>हृदयाच्च तथा माया गुह्याच्च भवमालिनी।<br>अस्थिभ्यश्च तथा काली सृष्टा पूर्वं महात्मना॥ ६४<br>यया तद्रुधिरं पीतमन्धकानां महात्मनाम्।<br>या चास्मिन् कथिता लोके नामतः शुष्करेवती॥ ६५रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर नरसिंह-विग्रहधारी भगवान् श्रीहरिने अपनी जीभसे वागीश्वरीको, हृदयसे मायाको, गुह्यप्रदेशसे भवमालिनीको और हड्डियोंसे कालीको प्रकट किया। उन महात्माने इस कालीकी सृष्टि पहले भी की थी, जिसने महान् आत्मबलसे सम्पन्न अन्धकोंके रुधिरका पान किया था और जो इस लोकमें शुष्करेवती नामसे प्रसिद्ध है।
द्वात्रिंशन्मातरः सृष्टा गात्रेभ्यश्चक्रिणा ततः।<br>तासां नामानि वक्ष्यामि तानि मे गदतः शृणु॥ ६६<br>सर्वास्तास्तु महाभागा घण्टाकर्णी तथैव च।<br>त्रैलोक्यमोहिनी पुण्या सर्वसत्त्ववशङ्करी॥ ६७<br>तथा च चक्रहृदया पञ्चमी व्योमचारिणी।<br>शङ्खिनी लेखिनी चैव कालसंकर्षणी तथा॥ ६८<br>इत्येताः पृष्ठगा राजन् वागीशानुचराः स्मृताः।<br>संकर्षणी तथाश्वत्था बीजभावापराजिता॥ ६९<br>कल्याणी मधुदंष्ट्री च कमलोत्पलहस्तिका।<br>इति देव्यष्टकं राजन् मायानुचरमुच्यते॥ ७०इसी प्रकार सुदर्शन चक्रधारी भगवान्‌ने अपने अङ्गोंसे बत्तीस अन्य मातृकाओंकी सृष्टि की, वे सभी महान् भाग्यशालिनी थीं। मैं उनके नामोंका वर्णन कर रहा हूँ, तुम उन्हें मुझसे श्रवण करो। उनके नाम हैं—घण्टाकर्णी, त्रैलोक्यमोहिनी, पुण्यमयी सर्वसत्त्ववशंकरी, चक्रहृदया, पाँचवीं व्योमचारिणी, शङ्खिनी, लेखिनी और काल-संकर्षणी। राजन्! ये वागीश्वरीके पीछे चलनेवाली उनकी अनुचरी कही गयी हैं। राजन्! संकर्षणी, अश्वत्था, बीजभावा, अपराजिता, कल्याणी, मधुदंष्ट्री, कमला और उत्पलहस्तिका—ये आठों देवियाँ मायाकी अनुचरी कहलाती हैं।
Page 753Permalink
* अध्याय १७९ *७४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अजिता सूक्ष्महृदया वृद्धा वेशाश्मदर्शना।<br>नृसिंहभैरवा बिल्वा गरुत्मद्धृदया जया॥ ७१<br>भवमालिन्यनुचरा इत्यष्टौ नृप मातरः।<br>आकर्णनी सम्भटा च तथैवोत्तरमालिका॥ ७२<br>ज्वालामुखी भीषणिका कामधेनुश्च बालिका।<br>तथा पद्मकरा राजन् रेवत्यनुचराः स्मृताः॥ ७३<br>अष्टौ महाबलाः सर्वा देवगात्रसमुद्भवाः।<br>त्रैलोक्यसृष्टिसंहारसमर्थाः सर्वदेवताः॥ ७४नरेश! अजिता, सूक्ष्महृदया, वृद्धा, वेशाश्मदर्शना, नृसिंहभैरवा, बिल्वा, गरुत्मद्धृदया और जया—ये आठों मातृकाएँ भवमालिनीकी अनुचरी हैं। राजन्! आकर्णनी, सम्भटा, उत्तरमालिका, ज्वालामुखी, भीषणिका, कामधेनु, बालिका तथा पद्मकरा—ये शुष्करेवतीकी अनुचरी कही जाती हैं। आठ-आठके विभागसे भगवान्‌के शरीरसे उद्भूत हुई ये सभी देवियाँ महान् बलवती तथा त्रिलोकीके सृजन और संहारमें समर्थ थीं॥ ६३—७४॥
ताः सृष्टमात्रा देवेन क्रुद्धा मातृगणस्य तु।<br>प्रधाविता महाराज क्रोधविस्फारितेक्षणाः॥ ७५<br>अविसह्यतमं तासां दृष्टितेजः सुदारुणम्।<br>तमेव शरणं प्राप्ता नृसिंहो वाक्यमब्रवीत्॥ ७६महाराज! भगवान् विष्णुद्वारा प्रकट किये जाते ही वे देवियाँ कुपित हो मातृकाओंकी ओर क्रोधवश आँखें फाड़कर देखती हुई उनपर टूट पड़ीं। उन देवियोंके नेत्रोंका तेज अत्यन्त भीषण और सर्वथा असह्य था, इसलिये वे मातृकाएँ भगवान् नृसिंहकी शरणमें आ पड़ीं। तब भगवान् नरसिंहने उनसे इस प्रकार कहा—
यथा मनुष्याः पशवः पालयन्ति चिरात् सुतान्।<br>जयन्ति ते तथैवाशु यथा वै देवतागणाः॥ ७७<br>भवत्यस्तु तथा लोकान् पालयन्तु मयेरिताः।<br>मनुजैश्च तथा देव्यैर्यजध्वं त्रिपुरान्तकम्॥ ७८<br>न च बाधा प्रकर्तव्या ये भक्तास्त्रिपुरान्तके।<br>ये च मां संस्मरन्तीह ते च रक्ष्याः सदा नराः॥ ७९<br>बलिकर्म करिष्यन्ति युष्माकं ये सदा नराः।<br>सर्वकामप्रदास्तेषां भविष्यध्वं तथैव च॥ ८०‘जिस प्रकार मनुष्य और पशु चिरकालसे अपनी संतानका पालन-पोषण करते आ रहे हैं और जिस प्रकार शीघ्र दोनों देवताओंको वशमें कर लेते हैं, उसी तरह तुमलोग मेरे आदेशानुसार समस्त लोकोंकी रक्षा करो। मनुष्य तथा देवता सभी त्रिपुरहन्ता शिवजीका यजन करें। जो लोग शंकरजीके भक्त हैं, उनके प्रति तुमलोगोंको कोई बाधा नहीं करनी चाहिये। इस लोकमें जो मनुष्य मेरा स्मरण करते हैं, वे तुमलोगोंद्वारा सदा रक्षणीय हैं। जो मनुष्य सदा तुमलोगोंके निमित्त बलिकर्म करेंगे, तुमलोग उनके सभी मनोरथ पूर्ण करो।
उच्छासनादिकं ये च कथयन्ति मयेरितम्।<br>ते च रक्ष्याः सदा लोका रक्षितव्यं च शासनम्॥ ८१<br>रौद्रीं चैव परां मूर्तिं महादेवः प्रदास्यति।<br>युष्मन्मुख्या महादेव्यस्तदुक्तं परिरक्ष्यथ॥ ८२जो लोग मेरे इस चरित्रका कथन करेंगे, उन लोगोंकी सदा रक्षा तथा मेरे आदेशका भी पालन करना चाहिये। तुमलोगोंमें जो मुख्य महादेवियाँ हैं, उन्हें महादेवजी अपनी परमोत्कृष्ट रौद्री मूर्ति प्रदान करेंगे। तुमलोगोंको उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये।
मया मातृगणः सृष्टो योऽयं विगतसाध्वसः।<br>एष नित्यं विशालाक्षो मयैव सह रंस्यते॥ ८३<br>मया सार्धं तथा पूजां नरेभ्यश्चैव लप्स्यथ।<br>पृथक् सुपूजिता लोके सर्वान् कामान् प्रदास्यथ॥ ८४लज्जा और भयसे रहित हो मैंने जो इस मातृगणकी सृष्टि की है, यह विशाल नेत्रोंवाला दल नित्य मेरे साथ ही निवास करेगा तथा मेरे साथ इसे मनुष्योंद्वारा प्रदान की गयी पूजा भी प्राप्त होती रहेगी। लोगोंद्वारा पृथक्-रूपसे सुपूजित होनेपर ये देवियाँ सभी कामनाएँ प्रदान करेंगी।
Page 754Permalink

७४४ * मत्स्यपुराण *

शुष्कां सम्पूजयिष्यन्ति ये च पुत्रार्थिनो जनाः।<br>तेषां पुत्रप्रदा देवी भविष्यति न संशयः॥ ८५<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सह मातृगणेन तु।<br>ज्वालामालाकुलवपुस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८६<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं कृतशौचेति यज्जगुः।<br>तत्रापि पूर्वजो देवो जगदार्तिहरो हरः॥ ८७<br>रौद्रस्य मातृवर्गस्य दत्त्वा रुद्रस्तु पार्थिव।<br>रौद्रां दिव्यां तनुं तत्र मातृमध्ये व्यवस्थितः॥ ८८<br>सप्त ता मातरो देव्यः सार्धनारीनरः शिवः।<br>निवेश्य रौद्रं तत्स्थानं तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>समातृवर्गस्य हरस्य मूर्ति-<br>र्यदा यदा याति च तत्समीपे।<br>देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्तेः<br>पूजां विधत्ते त्रिपुरान्धकारिः॥ ९०जो पुत्राभिलाषी लोग शुष्करेवतीकी पूजा करेंगे, उनके लिये वह देवी पुत्र प्रदान करनेवाली होगी—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है'॥ ७५-८५॥<br>राजन्! ऐसा कहकर ज्वालासमूहोंसे व्याप्त शरीरवाले भगवान् नरसिंह उस मातृगणके साथ वहीं अन्तर्हित हो गये। वहीं एक तीर्थ उत्पन्न हो गया, जिसे लोग 'कृतशौच' नामसे पुकारते हैं। वहीं सबके पूर्वज तथा जगत्का कष्ट दूर करनेवाले भगवान् रुद्र उस भयंकर मातृवर्गको अपनी रौद्री दिव्य मूर्ति प्रदान कर उन्हीं मातृकाओंके मध्यस्थित हो गये। इस प्रकार अर्धनारी-नरस्वरूप शिव उन सातों मातृ-देवियोंको उस रौद्रस्थानपर स्थापित कर स्वयं वहीं अन्तर्हित हो गये। मातृवर्गसहित शिवजीकी मूर्ति जब-जब देवेश्वर भगवान् नरसिंहकी मूर्तिके निकट जाती है, तब-तब त्रिपुर एवं अन्धकके शत्रु शंकरजी उस नृसिंहमूर्तिकी पूजा करते हैं॥ ८६-९०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽन्धकवधो नामैकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अन्धकवध नामक एक सौ उन्नासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७९॥


एक सौ असीवाँ अध्याय

वाराणसी-माहात्म्यके प्रसङ्गमें हरिकेश यक्षकी तपस्या, अविमुक्तकी शोभा और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति

ऋषय ऊचुः<br><br>श्रुतोऽन्धकवधः सूत यथावत् त्वदुदीरितः।<br>वाराणस्यास्तु माहात्म्यं श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम्॥ १<br>भगवान् पिङ्गलः केन गणत्वं समुपागतः।<br>अन्नदत्वं च सम्प्राप्तो वाराणस्यां महाद्युतिः॥ २<br>क्षेत्रपालः कथं जातः प्रियत्वं च कथं गतः।<br>एतदिच्छाम कथितं श्रोतुं ब्रह्मसुत त्वया॥ ३ऋषियोंने पूछा—सूतजी! आपद्वारा कहा गया अन्धक-वधका प्रसङ्ग तो हमलोगोंने यथार्थरूपसे सुन लिया, अब हमलोग वाराणसीका माहात्म्य सुनना चाहते हैं। ब्रह्मपुत्र सूतजी! वाराणसीमें परम कान्तिमान् भगवान् पिङ्गलको गणेश्वरत्वकी प्राप्ति कैसे हुई? वे अन्नदाता कैसे बने और क्षेत्रपाल कैसे हो गये? तथा वे शंकरजीके प्रेमपात्र कैसे बने? आपके द्वारा कहे गये इस सारे प्रसङ्गको सुननेके लिये हमलोगोंकी उत्कट अभिलाषा है॥ १-३॥

१८१- अविमुक्तक्षेत्र-(वाराणसी) का माहात्म्य

Page 755Permalink
* अध्याय १८० *७४५

| सूत उवाच<br><br>शृणुध्वं वै यथा लेभे गणेशत्वं स पिङ्गलः।<br>अन्नदत्वं च लोकानां स्थानं वाराणसीं त्विह॥ ४<br>पूर्णभद्रसुतः श्रीमानासीद्यक्षः प्रतापवान्।<br>हरिकेश इति ख्यातो ब्रह्मण्यो धार्मिकश्च ह॥ ५<br>तस्य जन्मप्रभृत्येव शर्वे भक्तिरनुत्तमा।<br>तदासीत्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ॥ ६<br>आसीनश्च शयानश्च गच्छंस्तिष्ठन्ननुव्रजन्।<br>भुञ्जानोऽथ पिबन् वापि रुद्रमेवान्वचिन्तयत्॥ ७<br>तमेवं युक्तमनसं पूर्णभद्रः पिताब्रवीत्।<br>न त्वां पुत्रमहं मन्ये दुर्जातो यस्त्वमन्यथा॥ ८<br>न हि यक्षकुलीनानामेतद् वृत्तं भवत्युत।<br>गुह्यका बत यूयं वै स्वभावात् क्रूरचेतसः॥ ९<br>क्रव्यादाम्रैव किम्भक्षा हिंसाशीलाश्च पुत्रक।<br>मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना॥ १०<br>स्वयम्भुवा यथाऽऽदिष्टा त्यक्तव्या यदि नो भवेत्।<br>आश्रमान्तरजं कर्म न कुर्युर्गृहिणस्तु तत्॥ ११<br>हित्वा मनुष्यभावं च कर्मभिर्विविधैश्चर।<br>यत्त्वमेवं विमार्गस्थो मनुष्याजात एव च॥ १२<br>यथावद् विविधं तेषां कर्म तज्जातिसंश्रयम्।<br>मयापि विहितं पश्य कर्मैतन्नात्र संशयः॥ १३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पिंगलको जिस प्रकार गणेशत्व, लोकोंके लिये अन्नदत्व और वाराणसी-जैसा स्थान प्राप्त हुआ था वह प्रसङ्ग बतला रहा हूँ, सुनिये। प्राचीनकालमें हरिकेश नामसे विख्यात एक सौन्दर्यशाली यक्ष हो गया है, जो पूर्णभद्रका पुत्र था। वह महाप्रतापी, ब्राह्मणभक्त और धर्मात्मा था। जन्मसे ही उसकी शंकरजीमें प्रगाढ़ भक्ति थी। वह तन्मय होकर उन्हींको नमस्कार करनेमें, उन्हींकी भक्ति करनेमें और उन्हींके ध्यानमें तत्पर रहता था। वह बैठते, सोते, चलते, खड़े होते, घूमते तथा खाते-पीते समय सदा शिवजीके ध्यानमें ही मग्न रहता था। इस प्रकार शंकरजीमें लीन मनवाले उससे उसके पिता पूर्णभद्रने कहा—'पुत्र! मैं तुम्हें अपना पुत्र नहीं मानता। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अन्यथा ही उत्पन्न हुए हो; क्योंकि यक्षकुलमें उत्पन्न होनेवालोंका ऐसा आचरण नहीं होता। तुम गुह्यक* हो। राक्षस ही स्वभावसे क्रूर चित्तवाले, मांसभक्षी, सर्वभक्षी और हिंसापरायण होते हैं। महात्मा ब्रह्माद्वारा ऐसा ही निर्देश दिया गया है। तुम ऐसा मत करो; क्योंकि तुम्हारे लिये ऐसी वृत्ति नहीं बतलायी गयी है। गृहस्थ भी अन्य आश्रमोंका कर्म नहीं करते। इसलिये तुम मनुष्यभावका परित्याग करके यक्षोंके अनुकूल विविध कर्मोंका आचरण करो। यदि तुम इस प्रकार विमार्गपर ही स्थित रहोगे तो मनुष्यसे उत्पन्न हुआ ही समझे जाओगे। अतः तुम यक्षजातिके अनुकूल विविध कर्मोंका ठीक-ठीक आचरण करो। देखो, मैं भी निःसंदेह वैसा ही आचरण कर रहा हूँ॥ ४-१३॥ |
| सूत उवाच<br><br>एवमुक्त्वा स तं पुत्रं पूर्णभद्रः प्रतापवान्।<br>उवाच निष्क्रम क्षिप्रं गच्छ पुत्र यथेच्छसि॥ १४<br>ततः स निर्गतस्त्यक्त्वा गृहं सम्बन्धिनस्तथा।<br>वाराणसीं समासाद्य तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १५<br>स्थाणुभूतो ह्यनिमिषः शुष्ककाष्ठोपलोपमः।<br>संनियम्येन्द्रियग्राममवातिष्ठत निश्चलः॥ १६<br>अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य तदाशिषः।<br>सहस्त्रमेकं वर्षाणां दिव्यमप्यभ्यवर्तत॥ १७<br>वल्मीकेन समाक्रान्तो भक्ष्यमाणः पिपीलिकैः।<br>वज्रसूचीमुखैस्तीक्ष्णैर्विध्यमानस्तथैव च॥ १८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्रतापी पूर्णभद्रने अपने उस पुत्रसे इस प्रकार (कहा; किंतु जब उसपर कोई प्रभाव पड़ते नहीं देखा, तब वह पुनः कुपित होकर) बोला—'पुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे घरसे निकल जाओ और जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाओ।' तब वह हरिकेश गृह तथा सम्बन्धियोंका त्याग कर निकल पड़ा और वाराणसीमें आकर अत्यन्त दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गया। वहाँ वह इन्द्रियसमुदायको संयमित कर सूखे काष्ठ और पत्थरकी भाँति निश्चल हो एकटक स्थाणु (ठूँठ)-की तरह स्थित हो गया। इस प्रकार निरन्तर तपस्यामें लगे रहनेवाले हरिकेशके एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये। उसके शरीरपर बामवट जम गयी। वज्रके समान कठोर और सूई-जैसे पतले एवं तीखे मुखवाली चींटियोंने उसमें छेद कर उसे खा डाला। |


* अमर, व्याडि, हलायुध आदि कोशों एवं भारतादि प्रायः सभी ग्रन्थोंमें यक्षोंकी निधिरक्षक श्रेणीको ही गुह्यक कहा गया है—'निधिं गृह्णन्ति ये यक्षास्ते स्युर्गुह्यकसंज्ञकाः।'

Page 756Permalink
७४६* मत्स्यपुराण *

| निर्मांसरुधिरत्वक् च कुन्दशङ्खेन्दुसप्रभः।<br>अस्थिशेषोऽभवच्छर्वं देवं वै चिन्तयन्नपि॥ १९<br><br>एतस्मिन्नन्तरे देवी व्यज्ञापयत शङ्करम्॥ २० | इस प्रकार वह मांस, रुधिर और चमड़ेसे रहित हो अस्थिमात्र अवशेष रह गया, जो कुन्द, शङ्ख और चन्द्रमाके समान चमक रहा था। इतनेपर भी वह भगवान् शंकरका ध्यान कर ही रहा था। इसी बीच पार्वती देवीने भगवान् शंकरसे निवेदन किया॥ १४—२०॥ |
| देव्युवाच<br>उद्यानं पुनरेवेदं द्रष्टुमिच्छामि सर्वदा।<br>क्षेत्रस्य देव माहात्म्यं श्रोतुं कौतूहलं हि मे।<br>यतश्च प्रियमेतत् ते तथास्य फलमुत्तमम्॥ २१<br>इति विज्ञापितो देवः शर्वाण्या परमेश्वरः।<br>सर्वं पृष्टं ते यथातथ्यमाख्यातुमुपचक्रमे॥ २२<br>निर्जगाम च देवेशः पार्वत्या सह शङ्करः।<br>उद्यानं दर्शयामास देव्या देवः पिनाकधृक्॥ २३ | देवीने कहा— देव! मैं इस उद्यानको पुनः देखना चाहती हूँ। साथ ही इस क्षेत्रका माहात्म्य सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; क्योंकि यह आपको परम प्रिय है और इसके श्रवणका फल भी उत्तम है। इस प्रकार भवानीद्वारा निवेदन किये जानेपर परमेश्वर शंकर प्रश्नानुसार सारा प्रसंग यथार्थरूपसे कहनेके लिये उद्यत हुए। तदनन्तर पिनाकधारी देवेश्वर भगवान् शंकर पार्वतीके साथ वहाँसे चल पड़े और देवीको उस उद्यानका दर्शन कराते हुए बोले॥ २१—२३॥ |
| देवदेव उवाच<br>प्रोत्फुल्लनानाविधगुल्मशोभितं<br>लताप्रतानावनतं मनोहरम्।<br>विरूढपुष्पैः परितः प्रियङ्गुभिः<br>सुपुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः॥ २४<br>तमालगुल्मैर्निचितं सुगन्धिभिः<br>सकर्णिकारैर्बकुलैश्च सर्वशः।<br>अशोकपुन्नागवरैः सुपुष्पितै-<br>र्द्विरेफमालाकुलपुष्पसञ्चयैः ॥ २५<br>क्वचित् प्रफुल्लाम्बुजरेणूरूषितै-<br>र्विहङ्गमैश्चारुकलप्रणादिभिः ।<br>विनादितं सारसमण्डनादिभिः<br>प्रमत्तदात्यूहरुतैश्च वल्गुभिः॥ २६<br>क्वचिच्च चक्राह्वरवोपनादितं<br>क्वचिच्च कादम्बकदम्बकैर्युतम्।<br>क्वचिच्च कारण्डवनादनादितं<br>क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतम्॥ २७<br>मदाकुलाभिस्त्वमराङ्गनाभि-<br>र्निषेवितं चारुसुगन्धिपुष्पम् ।<br>क्वचित् सुपुष्पैः सहकारवृक्षै-<br>र्लतोपगूढैस्तिलकद्रुमैश्च ॥ २८ | देवाधिदेव शंकरने कहा— प्रिये! यह उद्यान खिले हुए नाना प्रकारके गुल्मोंसे सुशोभित है। यह लताओंके विस्तारसे अवनत होनेके कारण मनोहर लग रहा है। इसमें चारों ओर पुष्पोंसे लदे हुए प्रियङ्गुके तथा भली-भाँति खिली हुई कँटीली केतकीके वृक्ष दीख रहे हैं। यह सब ओर तमालके गुल्मों, सुगन्धित कनेर और मौलसिरी तथा फूलोंसे लदे हुए अशोक और पुंनागके उत्तम वृक्षोंसे, जिसके पुष्पोंपर भ्रमरसमूह गुञ्जार कर रहे हैं, व्याप्त है। कहीं पूर्णरूपसे खिले हुए कमलके परागसे धूसरित अङ्गवाले पक्षी सुन्दर कलनाद कर रहे हैं, कहीं सारसोंका दल बोल रहा है। कहीं मतवाले चातकोंकी मधुर बोली सुनायी पड़ रही है। कहीं चक्रवाकोंका शब्द गूँज रहा है। कहीं यूथ-के-यूथ कलहंस विचर रहे हैं। कहीं बतखोंके नादसे निनादित हो रहा है। कहीं झुंड-के-झुंड मतवाले भौंरे गुनगुना रहे हैं। कहीं मदसे मतवाली हुई देवाङ्गनाएँ सुन्दर एवं सुगन्धित पुष्पोंका सेवन कर रही हैं। कहीं सुन्दर पुष्पोंसे आच्छादित आमके वृक्ष और लताओंसे आच्छादित तिलकके वृक्ष शोभा पा रहे हैं। |

१८२- अविमुक्त-माहात्म्य

Page 757Permalink
* अध्याय १८० *७४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रगीतविद्याधरसिद्धचारणं<br>प्रमत्तनृत्याप्सरसां गणाकुलम् ।<br>प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितं<br>प्रमत्तहारीतकुलोपनादितम् ॥ २९<br>मृगेन्द्रनादाकुलसत्त्वमानसैः<br>क्वचित्क्वचिद्द्वन्द्वकदम्बकैर्मृगैः ।<br>प्रफुल्लनानाविधचारुपङ्कजैः<br>सरस्तटाकैरुपशोभितं क्वचित् ॥ ३०कहीं विद्याधर, सिद्ध और चारण राग अलाप रहे हैं तो कहीं अप्सराओंका दल उन्मत्त होकर नाच रहा है। इसमें नाना प्रकारके पक्षी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं। यह मतवाले हारीतसमूहसे निनादित है। कहीं-कहीं झुंड-के-झुंड मृगके जोड़े सिंहकी दहाड़से व्याकुल मनवाले होकर इधर-उधर भाग रहे हैं। कहीं ऐसे तालाब शोभा पा रहे हैं, जिनके तटपर नाना प्रकारके सुन्दर कमल खिले हुए हैं॥ २४—३०॥
निबिडनिचुलनीलं नीलकण्ठाभिरामं<br>मदमुदितविहङ्गव्रातनादाभिरामम् ।<br>कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफं<br>नवकिसलयशोभाशोभितप्रान्तशाखम् ॥ ३१यह घने बेंतकी लताओं एवं नीलमयूरोंसे सुशोभित और मदसे उन्मत्त हुए पक्षिसमूहोंके नादसे मनोरम लग रहा है। इसके खिले हुए वृक्षोंकी शाखाओंमें मतवाले भौंरे छिपे हुए हैं और उन शाखाओंके प्रान्तभाग नये किसलयोंकी शोभासे सुशोभित हैं।
क्वचिच्च दन्तिक्षतचारुवीरुधं<br>क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् ।<br>क्वचिद्विलासालसगामिबर्हिणं<br>निषेवितं किम्पुरुषव्रजैः क्वचित् ॥ ३२कहीं सुन्दर वृक्ष हाथियोंके दाँतोंसे क्षत-विक्षत हो गये हैं। कहीं लताएँ मनोहर वृक्षोंका आलिङ्गन कर रही हैं। कहीं भोगसे अलसाये हुए मयूरगण मन्दगतिसे विचरण कर रहे हैं। कहीं किम्पुरुषगण निवास कर रहे हैं।
पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गै-<br>रभ्रंकषैः सितमनोहरचारुरूपैः ।<br>आकीर्णपुष्यनिकुरम्बविमुक्तहासै-<br>र्विभ्राजितं त्रिदशदेवकुलैरनेकैः ॥ ३३जो कबूतरोंकी ध्वनिसे निनादित हो रहे थे, जिनका उज्ज्वल मनोहर रूप है, जिनपर बिखरे हुए पुष्पसमूह हासकी छटा दिखा रहे हैं और जिनपर अनेकों देवकुल निवास कर रहे हैं, उन गगनचुम्बी मनोहर शिखरोंसे सुशोभित हो रहा है।
फुल्लोत्पलागुरुसहस्रवितानयुक्तै-<br>स्तोयाशयैः समनुशोभितदेवमार्गम् ।<br>मार्गान्तरागलितपुष्यविचित्रभक्ति-<br>सम्बद्धगुल्मविटपैर्विहगैरुपेतम् ॥ ३४खिले हुए कमल और अगुरुके सहस्रों वितानोंसे युक्त जलाशयोंसे जिसका देवमार्ग सुशोभित हो रहा है। उन मार्गोंपर पुष्प बिखरे हुए हैं और वह विचित्र भक्तिसे युक्त पक्षियोंसे सेवित गुल्मों और वृक्षोंसे युक्त है।
तुङ्गाग्रैर्नीलपुष्यस्तबकभरनतप्रान्तशाखैरशोकै-<br>र्मत्तालिवातगीतश्रुतिसुखजननैर्भासितान्तर्मनोज्ञैः ।<br>रात्रौ चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयातं<br>छायासुमप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुमद्भाङ्कुराग्रम् ॥ ३५जिनके अग्रभाग ऊँचे हैं, जिनकी शाखाओंका प्रान्तभाग नीले पुष्पोंके गुच्छोंके भारसे झुके हुए हैं तथा जिनकी शाखाओंके अन्तर्भागमें लीन मतवाले भ्रमरसमूहोंकी श्रवण-सुखदायिनी मनोहर गीत हो रही है, ऐसे अशोकवृक्षोंसे युक्त है। रात्रिमें यह अपने खिले हुए तिलक-वृक्षोंसे चन्द्रमाकी चाँदनीके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है। कहीं वृक्षोंकी छायामें सोये हुए, सोकर जगे हुए तथा बैठे हुए हरिणसमूहोंद्वारा काटे गये दूर्वाङ्कुरोंके अग्रभागसे युक्त
Page 758Permalink

७४८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अर्थ
हंसानां पक्षपातप्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयं<br>तोयानां तीरजातप्रविकचकदलीवाटनृत्यन्मयूरम्।<br>मायूरैः पक्षचन्द्रैः क्वचिदपि पतितै रञ्जितक्ष्माप्रदेशं<br>देशे देशे विकीर्णप्रमुदितविलसन्मत्तहारीतवृक्षम्॥ ३६<br>सारङ्गैः क्वचिदपि सेवितप्रदेशं<br>संछन्नं कुसुमचयैः क्वचिद्विचित्रैः।<br>हृष्टाभिः क्वचिदपि किंनराङ्गनाभिः<br>क्षीबाभिः सुमधुरगीतवृक्षखण्डम्॥ ३७है। कहीं हंसोंके पंख हिलानेसे चञ्चल हुए कमलोंसे युक्त, निर्मल एवं विस्तीर्ण जलराशि शोभा पा रही है। कहीं जलाशयोंके तटपर उगे हुए फूलोंसे सम्पन्न कदलीके लतामण्डपोंमें मयूर नृत्य कर रहे हैं। कहीं झड़कर गिरे हुए चन्द्रकयुक्त मयूरोंके पंखोंसे भूतल अनुरञ्जित हो रहा है। जगह-जगह पृथक्-पृथक् यूथ बनाकर हर्षपूर्वक विलास करते हुए मतवाले हारीत पक्षियोंसे युक्त वृक्ष शोभा पा रहे हैं। किसी प्रदेशमें सारङ्ग जातिके मृग बैठे हुए हैं। कुछ भाग विचित्र पुष्पसमूहोंसे आच्छादित है। कहीं उन्मत्त हुई किंनराङ्गनाएँ हर्षपूर्वक सुमधुर गीत आलाप रही हैं, जिनसे वृक्षखण्ड मुखरित हो रहा है॥ ३१—३७॥
संसृष्टैः क्वचिदुपलिसकीर्णपुष्पै-<br>रावासैः परिवृतपादपं मुनीनाम्।<br>आमूलात् फलनिचितैः क्वचिद्विशालै-<br>रुत्तुङ्गैः पनसमहीरुहैरुपेतम्॥ ३८कहीं वृक्षोंके नीचे मुनियोंके आवासस्थल बने हैं, जिनकी भूमि लिपी-पुती हुई है और उनपर पुष्प बिखेरा हुआ है। कहीं जिनमें जड़से लेकर अन्ततक फल लदे हुए हैं, ऐसे विशाल एवं ऊँचे कटहलके वृक्षोंसे युक्त है।
फुल्लातिमुक्तकलतागृहसिद्धलीलं<br>सिद्धाङ्गनाकनकनूपुरनादरम्यम् ।<br>रम्यप्रियङ्गुतरुमञ्जरिसक्तभृङ्गं<br>भृङ्गावलीषु स्खलिताम्बुकदम्बपुष्पम्॥ ३९कहीं खिली हुई अतिमुक्तक लताके बने हुए सिद्धोंके गृह शोभा पा रहे हैं, जिनमें सिद्धाङ्गनाओंके स्वर्णमय नूपुरोंका सुरम्य नाद हो रहा है। कहीं मनोहर प्रियंगु वृक्षोंकी मंजरियोंपर भँवरे मँडरा रहे हैं। कहीं भ्रमर-समूहोंके पंखोंके आघातसे कदम्बके पुष्प नीचे गिर रहे हैं।
पुष्पोत्करानिलविधूर्णितपादपाग्र-<br>मग्रेसरो भुवि निपातितवंशगुल्मम्।<br>गुल्मान्तरप्रभृतिलीनमृगीसमूहं<br>सम्मुह्यतां तनुभृतामपवर्गदात् ॥ ४०कहीं पुष्पसमूहका स्पर्श करके बहती हुई वायु बड़े-बड़े वृक्षोंके ऊपरकी शाखाओंको झुका दे रही है, जिनके आघातसे बाँसोंके झुरमुट भूतलपर गिर जा रहे हैं। उन गुल्मोंके अन्तर्गत हरिणियोंका समूह छिपा हुआ है। इस प्रकार यह उपवन मोहग्रस्त प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है।
चन्द्रांशुजालधवलैस्तिलकैर्मनोज्ञैः<br>सिन्दूरकुङ्कुमकुसुम्भनिभैरशोकैः ।<br>चामीकराभनिचयैरथ कर्णिकारैः<br>फुल्लारविन्दरचितं सुविशालशाखैः ॥ ४१यहाँ कहीं चन्द्रमाकी किरणों-सरीखे उज्ज्वल मनोहर तिलकके वृक्ष, कहीं सिंदूर, कुंकुम और कुसुम्भ-जैसे लाल रंगवाले अशोकके वृक्ष, कहीं स्वर्णके समान पीले एवं लम्बी शाखाओंवाले कनेरके वृक्ष और कहीं खिले हुए कमलके पुष्प शोभा पा रहे हैं।
क्वचिद्रजतपर्णाभैः क्वचिद्विद्रुमसन्निभैः।<br>क्वचित्काञ्चनसंकाशैः पुष्पैराचितभूतलम्॥ ४२इस उपवनकी भूमि कहीं चाँदीके पत्र-जैसे श्वेत, कहीं मूँगे-सरीखे लाल और कहीं स्वर्ण-सदृश पीले पुष्पोंसे आच्छादित है।
पुंनागेषु द्विजगणविरुतं<br>रक्ताशोकस्तबकभरनमितम् ।<br>रम्योपान्तश्रमहरपवनं<br>फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम्॥ ४३कहीं पुंनागके वृक्षोंपर पक्षिगण चहचहा रहे हैं। कहीं लाल अशोककी डालियाँ पुष्प-गुच्छोंके भारसे झुक गयी हैं। रमणीय एवं श्रमहारी पवन शरीरका स्पर्श करके बह रहा है। उत्फुल्ल कमलपुष्पोंपर भौंरें गुञ्जार कर रहे हैं।

१८३- अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर

Page 759Permalink
* अध्याय १८० *७४९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं<br>तुहिनशिखरिपुत्र्याः सार्द्धमिष्टैर्गणेशैः ।<br>विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्यपुष्ट-<br>मुपवनतरुरम्यं दर्शयामास देव्याः ॥ ४४इस प्रकार समस्त भुवनोंके पालक जगदीश्वर शंकरने अपने प्रिय गणेश्वरोंको साथ लेकर उस विविध प्रकारके विशाल वृक्षोंसे युक्त तथा उन्मत्त और हर्ष प्रदान करनेवाले उपवनको हिमालयकी पुत्री पार्वतीदेवीको दिखाया ॥ ३८—४४ ॥
देव्युवाच<br>उद्यानं दर्शितं देव शोभया परया युतम् ।<br>क्षेत्रस्य तु गुणान् सर्वान् पुनर्वक्तुमिहार्हसि ॥ ४५<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य तत्त्वतः ।<br>श्रुत्वापि हि न मे तृप्तिरतो भूयो वदस्व मे ॥ ४६देवीने पूछा— देव! अनुपम शोभासे युक्त इस उद्यानको तो आपने दिखला दिया। अब आप पुनः इस क्षेत्रके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कीजिये। इस क्षेत्रका तथा अविमुक्तका माहात्म्य सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ४५-४६ ॥
देवदेव उवाच<br>इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम ।<br>सर्वेषामेव भूतानां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा ॥ ४७<br>अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः ।<br>नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ ४८<br>अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः ।<br>नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगकूजिते ॥ ४९<br>कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते ।<br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे ॥ ५०<br>रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु ।<br>मन्मना मम भक्तश्च मयि सर्वार्पितक्रियः ॥ ५१<br>यथा मोक्षमिहाप्नोति ह्यान्यत्र न तथा क्वचित् ।<br>एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत् ॥ ५२<br>ब्रह्मादयस्तु जानन्ति येऽपि सिद्धा मुमुक्षवः ।<br>अतः प्रियतमं क्षेत्रं तस्माच्चेह रतिर्मम ॥ ५३<br>विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन ।<br>महत् क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिदं स्मृतम् ॥ ५४<br>नैमिषेऽथ कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे ।<br>स्नानात् संसेविताद् वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः ॥ ५५<br>इह सम्प्राप्यते येन तत एतद् विशिष्यते ।<br>प्रयागे च भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात् ॥ ५६देवाधिदेव शंकर बोले— देवि! मेरा यह वाराणसी क्षेत्र परम गुह्य है। यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका कारण है। देवि! इस क्षेत्रमें नाना प्रकारका स्वरूप धारण करनेवाले नित्य मेरे लोकके अभिलाषी मुक्तात्मा जितेन्द्रिय सिद्धगण मेरा व्रत धारण कर परम योगका अभ्यास करते हैं। अब इस नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त, अनेकविध पक्षियोंद्वारा निनादित, कमल और उत्पलके पुष्पोंसे भरे हुए सरोवरोंसे सुशोभित और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सदा संसेवित इस शुभमय उपवनमें जिस हेतुसे मुझे सदा निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मेरा भक्त मुझमें मन लगाकर और सारी क्रियाएँ मुझमें समर्पित कर इस क्षेत्रमें जैसी सुगमतासे मोक्ष प्राप्त कर सकता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं प्राप्त कर सकता। यह मेरी महान् दिव्य नगरी गुह्यसे भी गुह्यतर है। ब्रह्मा आदि जो सिद्ध मुमुक्षु हैं, वे इसके विषयमें पूर्णरूपसे जानते हैं। अतः यह क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और इसी कारण इसके प्रति मेरी विशेष रति है। चूँकि मैं कभी भी इस विमुक्त क्षेत्रका त्याग नहीं करता, इसलिये यह महान् क्षेत्र अविमुक्त नामसे कहा जाता है। नैमिष, कुरुक्षेत्र, गङ्गाद्वार और पुष्करमें निवास करने तथा स्नान करनेसे यदि मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती तो इस क्षेत्रमें वह प्राप्त हो जाता है, इसीलिये यह उनसे विशिष्ट है। प्रयागमें अथवा मेरा आश्रय ग्रहण करनेसे काशीमें मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ४७—५६ ॥
Page 760Permalink
७५०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादिदमेव महत् स्मृतम्।<br>जैगीषव्यः परां सिद्धिं योगतः स महातपाः॥ ५७<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् भक्त्या च मम भावनात्।<br>जैगीषव्यो मुनिश्रेष्ठो योगिनां स्थानमिष्यते॥ ५८<br>ध्यायत्तस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्द्रीप्यते भृशम्।<br>कैवल्यं परमं याति देवानाम्पि दुर्लभम्॥ ५९<br>अव्यक्तलिङ्गैर्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः।<br>इह सम्प्राप्यते मोक्षो दुर्लभो देवदानवैः॥ ६०<br>तेभ्यश्चाहं प्रयच्छामि भोगैश्वर्यमनुत्तमम्।<br>आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च॥ ६१<br>कुबेरस्तु महायक्षस्तथा सर्वार्पितक्रियः।<br>क्षेत्रसंवसनादेव गणेशत्वमवाप ह॥ ६२<br>संवर्तो भविता यश्च सोऽपि भक्त्या ममैव तु।<br>इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम्॥ ६३<br>पाराशरसुतो योगी ऋषिर्व्यासो महातपाः।<br>धर्मकर्ता भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः॥ ६४<br>रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः।<br>ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वायुर्दिवाकरः॥ ६५<br>देवराजस्तथा शक्रो येऽपि चान्ये दिवौकसः।<br>उपासन्ते महात्मानः सर्वे मामेव सुव्रते॥ ६६<br>अन्येऽपि योगिनः सिद्धाश्छन्नरूपा महाव्रताः।<br>अनन्यमनसो भूत्वा मामिहोपासते सदा॥ ६७यह तीर्थश्रेष्ठ प्रयागसे भी महान् कहा जाता है। महातपस्वी जैगीषव्य मुनि यहाँ परा सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। मुनिश्रेष्ठ जैगीषव्य इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा भक्तिपूर्वक मेरी भावना करनेसे योगियोंके स्थानको प्राप्त कर लिये हैं। वहाँ नित्य मेरा ध्यान करनेसे योगाग्नि अत्यन्त उदीप्त हो जाती है, जिससे देवताओंके लिये भी परम दुर्लभ कैवल्य पद प्राप्त हो जाता है। यहाँ सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता एवं अव्यक्त चिह्नवाले मुनियोंद्वारा देवों और दानवोंके लिये दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लिया जाता है। मैं ऐसे मुनियोंको सर्वोत्तम भोग, ऐश्वर्य, अपना सायुज्य और मनोवाञ्छित स्थान प्रदान करता हूँ। महायक्ष कुबेर, जिन्होंने अपनी सारी क्रियाएँ मुझे अर्पित कर दी थीं, इस क्षेत्रमें निवास करनेके कारण ही गणाधिपत्यको प्राप्त हुए हैं। देवि! जो संवर्तनामक ऋषि होंगे, वे भी मेरे ही भक्त हैं। वे यहीं मेरी आराधना करके सर्वश्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करेंगे। पद्माक्षि! जो योगसम्पन्न, धर्मके नियामक और वैदिक कर्मकाण्डके प्रवर्तक होंगे, महातपस्वी मुनिश्रेष्ठ पराशरनन्दन महर्षि व्यास भी इसी क्षेत्रमें निवास करेंगे। सुव्रते! देवर्षियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, वायु, सूर्य, देवराज इन्द्र तथा जो अन्यान्य देवता हैं, सभी महात्मा मेरी ही उपासना करते हैं। दूसरे भी योगी, सिद्ध, गुप्त रूपधारी एवं महाव्रती अनन्यचित्त होकर यहाँ सदा मेरी उपासना करते हैं॥ ५७—६७॥
अलर्कश्च पुरीमेतां मत्प्रसादादवाप्स्यति।<br>स चैनां पूर्ववत्कृत्वा चातुर्वर्ण्याश्रमाकुलाम्॥ ६८<br>स्फीतां जनसमाकीर्णां भक्त्या च सुचिरं नृपः।<br>मयि सर्वार्पितप्राणो मामेव प्रतिपत्स्यते॥ ६९<br>ततः प्रभृति चार्वङ्गि येऽपि क्षेत्रनिवासिनः।<br>गृहिणो लिङ्गिनो वापि मद्भक्ता मत्परायणाः॥ ७०<br>मत्प्रसादाद् भजिष्यन्ति मोक्षं परमदुर्लभम्।<br>विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः॥ ७१<br>इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारं न पुनविशेत्।<br>ये पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था विजितेन्द्रियाः॥ ७२अलर्क भी मेरी कृपासे इस पुरीको प्राप्त करेंगे। वे नरेश इसे पहलेकी तरह चारों वर्णों और आश्रमोंसे युक्त, समृद्धिशालिनी और मनुष्योंसे परिपूर्ण कर देंगे। तत्पश्चात् चिरकालतक भक्तिपूर्वक मुझमें प्राणोंसहित अपना सर्वस्व समर्पित करके मुझे ही प्राप्त कर लेंगे। सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तभीसे इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले जो भी मत्परायण मेरे भक्त, चाहे वे गृहस्थ हों अथवा संन्यासी, मेरी कृपासे परम दुर्लभ मोक्षको प्राप्त कर लेंगे। जो मनुष्य धर्मत्यागका प्रेमी और विषयोंमें आसक्त चित्तवाला भी हो, वह भी यदि इस क्षेत्रमें प्राणत्याग करता है तो उसे पुनः संसारमें नहीं आना पड़ता। सुव्रते! फिर जो ममतारहित, धैर्यशाली, पराक्रमी, जितेन्द्रिय,
Page 761Permalink
* अध्याय १८० *७५१
व्रतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः।<br>देहभङ्गं समासाद्य धीमन्तः सङ्गवर्जिताः।<br>गता एव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते॥ ७३<br>जन्मान्तरसहस्रेषु युञ्जन् योगमवाप्नुयात्।<br>तमिहैव परं मोक्षं मरणादधिगच्छति॥ ७४<br>एतत् संक्षेपतो देवि क्षेत्रस्यास्य महत्फलम्।<br>अविमुक्तस्य कथितं मया ते गुह्यमुत्तमम्॥ ७५<br>अतः परतरं नास्ति सिद्धिगुह्यं महेश्वरि।<br>एतद् बुध्यन्ति योगज्ञा ये च योगेश्वरा भुवि॥ ७६<br>एतदेव परं स्थानमेतदेव परं शिवम्।<br>एतदेव परं ब्रह्म एतदेव परं पदम्॥ ७७<br>वाराणसी तु भुवनत्रयसारभूता<br>रम्या सदा मम पुरी गिरिराजपुत्रि।<br>अत्रागता विविधदुष्कृतकारिणोऽपि<br>पापक्षयाद् विरजसः प्रतिभान्ति मर्त्याः॥ ७८<br>एतत्स्मृतं प्रियतमं मम देवि नित्यं<br>क्षेत्रं विचित्रतरुगुल्मलतासुपुष्पम्।<br>अस्मिन् मृतास्तनुभृतः पदमाप्नुवन्ति<br>मूर्खागमेन रहितापि न संशयोऽत्र॥ ७९व्रतधारी, आरम्भरहित, बुद्धिमान् और आसक्तिहीन हैं, वे सभी मुझमें मन लगाकर यहाँ शरीरका त्याग करके मेरी कृपासे परम मोक्षको ही प्राप्त हुए हैं। हजारों जन्मोंमें योगका अभ्यास करनेसे जो मोक्ष प्राप्त होता है, वह परम मोक्ष यहाँ मरनेसे ही प्राप्त हो जाता है। देवि! मैंने तुमसे इस अविमुक्त क्षेत्रके इस उत्तम, गुह्य एवं महान् फलको संक्षेपरूपसे वर्णन किया है। महेश्वरि! भूतलपर इससे बढ़कर सिद्धिदाता दूसरा कोई गुह्य स्थान नहीं है। इसे जो योगेश्वर एवं योगके ज्ञाता हैं, वे ही जानते हैं। यही परमोत्कृष्ट स्थान है, यही परम कल्याणकारक है, यही परब्रह्म है और यही परमपद है। गिरिराजपुत्रि! मेरी रमणीय वाराणसीपुरी तो सदा त्रिभुवनकी सारभूता है। अनेकों प्रकारके पाप करनेवाले मानव भी यहाँ आकर पापोंके नष्ट हो जानेसे पापमुक्त हो सुशोभित होने लगते हैं। देवि! विचित्र वृक्षों, गुल्मों, लताओं और सुगन्धित पुष्पोंसे युक्त यह क्षेत्र मेरे लिये सदा प्रियतम कहा जाता है। वेदाध्ययनसे रहित मूर्ख प्राणी भी यदि यहाँ मरते हैं तो परम पदको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ६८—७९॥
सूत उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे देवो देवीं प्राह गिरीन्द्रजाम्।<br>दातुं प्रसादाद् यक्षाय वरं भक्ताय भामिनि॥ ८०<br>भक्तो मम वरारोहे तपसा हतकिल्बिषः।<br>अहो वरमसौ लब्धुमस्मत्तो भुवनेश्वरि॥ ८१<br>एवमुक्त्वा ततो देवः सह देव्या जगत्पतिः।<br>जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशो धमनिसन्ततः॥ ८२<br>ततस्तं गुह्यकं देवी दृष्टिपातैर्निरीक्षती।<br>श्वेतवर्णं विचर्माणं स्नायुबद्धास्थिपञ्जरम्॥ ८३<br>देवी प्राह तदा देवं दर्शयन्ती च गुह्यकम्।<br>सत्यं नाम भवानुग्रो देवैरुक्तस्तु शङ्कर॥ ८४<br>ईदृशे चास्य तपसि न प्रयच्छसि यद्वरम्।<br>अतः क्षेत्रे महादेव पुण्ये सम्यगुपासिते॥ ८५<br>कथमेवं परिक्लेशं प्राप्तो यक्षकुमारकः।<br>शीघ्रमस्य वरं यच्छ प्रसादात् परमेश्वर॥ ८६<br>एवं मन्वादयो देव वदन्ति परमर्षयः।<br>रुष्टाद् वा चाथ तुष्टाद् वा सिद्धिस्तुभयतो भवेत्।<br>भोगप्राप्तिस्तथा राज्यमन्ते मोक्षः सदाशिवात्॥ ८७**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसी बीच महादेवजीने गिरिराजकुमारी पार्वतीदेवीसे भक्तराज यक्षको कृपारूप वर प्रदान करनेके लिये यों कहा—'भामिनि! वह मेरा भक्त है। वरारोहे! तपस्यासे उसके पाप नष्ट हो चुके हैं, अतः भुवनेश्वरि! वह अब हमलोगोंसे वर प्राप्त करनेका अधिकारी हो गया है।' तदनन्तर ऐसा कहकर जगदीश्वर महादेव पार्वतीदेवीके साथ उस स्थानके लिये चल पड़े, जहाँ धमनियोंसे व्याप्त दुर्बल यक्ष वर्तमान था। वहाँ पहुँचकर पार्वती देवी दृष्टि घुमाकर उस गुह्यककी ओर देखने लगीं, जिसका शरीर श्वेत रङ्गका हो गया था, चमड़ा गल गया था और अस्थिपंजर नसोंसे आबद्ध था। तब उस गुह्यकको दिखलाती हुई देवीने महादेवजीसे कहा—'शंकर! इस प्रकारकी घोर तपस्यामें निरत इसे आप जो वर नहीं प्रदान कर रहे हैं, इस कारण देवतालोग आपको जो अत्यन्त निष्ठुर बतलाते हैं, वह सत्य ही है। महादेव! इस पुण्यक्षेत्रमें भलीभाँति उपासना करनेपर भी इस यक्षकुमारको इस प्रकारका महान् कष्ट कैसे प्राप्त हुआ? अतः परमेश्वर! कृपा करके इसे शीघ्र ही वरदान दीजिये। देव! मनु आदि परमर्षि ऐसा कहते हैं कि सदाशिव चाहे रुष्ट हों अथवा तुष्ट—दोनों प्रकारसे उनसे सिद्धि, भोगकी प्राप्ति, राज्य तथा अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति होती ही है।'
Page 762Permalink
७५२* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
एवमुक्तस्ततो देवः सह देव्या जगत्पतिः।<br>जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशो धमनिसंततः॥ ८८<br><br>तं दृष्ट्वा प्रणतं भक्त्या हरिकेशं वृषध्वजः।<br>दिव्यं चक्षुरदात् तस्मै येनापश्यत् स शङ्करम्॥ ८९<br><br>अथ यक्षस्तदादेशाच्छनैरुन्मील्य चक्षुषी।<br>अपश्यत् सगणं देवं वृषध्वजमुपस्थितम्॥ ९०ऐसा कहे जानेपर जगदीश्वर महादेव पार्वतीके साथ उस स्थानके निकट गये जहाँ धमनियोंसे व्याप्त कृशकाय यक्ष स्थित था। (उनकी आहट पाकर यक्ष उनके चरणोंपर गिर पड़ा।) इस प्रकार उस हरिकेशको भक्तिपूर्वक चरणोंमें पड़ा हुआ देखकर शिवजीने उसे दिव्य चक्षु प्रदान किया जिससे वह शंकरका दर्शन कर सके। तदनन्तर यक्षने महादेवजीके आदेशसे धीरेसे अपने दोनों नेत्रोंको खोलकर गणसहित वृषभध्वज महादेवजीको सामने उपस्थित देखा॥८८-९०॥
देवदेव उवाच<br>वरं ददामि ते पूर्वं त्रैलोक्ये दर्शनं तथा।<br>सावर्ण्यं च शरीरस्य पश्य मां विगतज्वरः॥ ९१देवाधिदेव शंकरने कहा— यक्ष! अब तुम कष्टरहित होकर मेरी ओर देखो। मैं तुम्हें पहले वह वर देता हूँ जिससे तुम्हारे शरीरका वर्ण सुन्दर हो जाय तथा तुम त्रिलोकीमें देखनेयोग्य हो जाओ॥ ९१॥
सूत उवाच<br>ततः स लब्ध्वा तु वरं शरीरेणाक्षतेन च।<br>पादयोः प्रणतस्तस्थौ कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ ९२<br>उवाचाथ तदा तेन वरदोऽस्मीति चोदितः।<br>भगवन् भक्तिमव्यग्रां त्वय्यननन्यां विधत्स्व मे॥ ९३<br>अन्नदत्वं च लोकानां गाणपत्यं तथाक्षयम्।<br>अविमुक्तं च ते स्थानं पश्येयं सर्वदा यथा॥ ९४<br>एतदिच्छामि देवेश त्वत्तो वरमनुत्तमम्॥ ९५सूतजी कहते हैं— ऋषियो! तत्पश्चात् वरदान पाकर वह अक्षत शरीरसे युक्त हो चरणोंपर गिर पड़ा, फिर मस्तकपर हाथ जोड़कर सम्मुख खड़ा हो गया और बोला—'भगवन्! आपने मुझसे कहा है कि 'मैं वरदाता हूँ' तो मुझे ऐसा वरदान दीजिये कि आपमें मेरी अनन्य एवं अटल भक्ति हो जाय। मैं अक्षय अन्नका दाता तथा लोकोंके गणोंका अधीश्वर हो जाऊँ, जिससे आपके अविमुक्त स्थानका सर्वदा दर्शन करता रहूँ। देवेश! मैं आपसे यही उत्तम वर प्राप्त करना चाहता हूँ॥ ९२-९५॥
देवदेव उवाच<br>जरामरणसंत्यक्तः सर्वरोगविवर्जितः।<br>भविष्यसि गणाध्यक्षो धनदः सर्वपूजितः॥ ९६<br>अजेयश्चापि सर्वेषां योगैश्वर्यं समाश्रितः।<br>अन्नदश्चापि लोकेभ्यः क्षेत्रपालो भविष्यसि॥ ९७<br>महाबलो महासत्त्वो ब्रह्मण्यो मम च प्रियः।<br>त्र्यक्षश्च दण्डपाणिश्च महायोगी तथैव च॥ ९८<br>उद्भ्रमः सम्भ्रमश्चैव गणौ ते परिचारकौ।<br>तवाज्ञया करिष्येते लोकस्योद्भ्रमसम्भ्रमौ॥ ९९देवदेवने कहा— यक्ष! तुम जरा-मरणसे विमुक्त, सम्पूर्ण रोगोंसे रहित, सबके द्वारा सम्मानित धनदाता गणाध्यक्ष होओगे। तुम सभीके लिये अजेय, योगैश्वर्यसे युक्त, लोकोंके लिये अन्नदाता, क्षेत्रपाल, महाबली, महान् पराक्रमी, ब्राह्मणभक्त, मेरा प्रिय, त्रिनेत्रधारी, दण्डपाणि तथा महायोगी होओगे। उद्भ्रम और सम्भ्रम—ये दोनों गण तुम्हारे सेवक होंगे। ये उद्भ्रम और सम्भ्रम तुम्हारी आज्ञासे लोकका कार्य करेंगे॥ ९६-९९॥
सूत उवाच<br>एवं स भगवांस्तत्र यक्षं कृत्वा गणेश्वरम्।<br>जगाम वासं देवेशः सह तेन महेश्वरः॥ १००सूतजी कहते हैं— ऋषियो! इस प्रकार देवेश भगवान् महेश्वर वहाँ उस यक्षको गणेश्वर बनाकर उसके साथ अपने निवासस्थानको लौट गये॥ १००॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये दण्डपाणिवरप्रदानं नामाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके वाराणसी-माहात्म्यमें दण्डपाणि-वरप्रदान नामक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८०॥

Page 763Permalink
* अध्याय १८१ *७५३

एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय

अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी)-का माहात्म्य

सूत उवाच<br>इमां पुण्योद्भवां स्निग्धां कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे सुविशुद्धास्तपोधनाः॥ १<br>गणेश्वरपतिं दिव्यं रुद्रतुल्यपराक्रमम्।<br>सनत्कुमारो भगवानपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्॥ २<br>ब्रूहि गुह्यं यथातत्त्वं यत्र नित्यं भवः स्थितः।<br>माहात्म्यं सर्वभूतानां परमात्मा महेश्वरः॥ ३<br>घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः।<br>आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुभूतो महेश्वरः॥ ४सूतजी कहते हैं— परम विशुद्ध हृदयवाले तपस्वी ऋषियो! आप सब लोग इस उत्तम कथाको जो पापकी विनाशिनी और पुण्यको उत्पन्न करनेवाली है, सुनिये! एक बार भगवान् सनत्कुमारने रुद्रके ही समान पराक्रमी तथा गणेश्वरोंके स्वामी दिव्य नन्दिकेश्वरसे पूछा—'जो सभी जीवोंके परमात्मा महेश्वर तथा देवताओं एवं दानवोंद्वारा दुष्प्राप्य हैं, वे महात्मा शंकर घोर स्वरूपको धारण कर सृष्टिसे प्रलयपर्यन्त स्थाणुरूपमें जहाँ नित्य अवस्थित रहते हैं, उस गोपनीय (स्थान)-को आप रहस्यपूर्वक हमलोगोंको बतलाइये'॥ १—४॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>पुरा देवेन यत् प्रोक्तं पुराणं पुण्यमुत्तमम्।<br>तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम्॥ ५<br>ततो देवेन तुष्टेन उमायाः प्रियकाम्यया।<br>कथितं भुवि विख्यातं यत्र नित्यं स्वयं स्थितः॥ ६<br>रुद्रस्यार्धासनगता मेरुशृङ्गे यशस्विनी।<br>महादेवं ततो देवी प्रणता परिपृच्छति॥ ७नन्दिकेश्वरने कहा— पूर्वकालमें महादेवने पुण्य प्रदान करनेवाले जिस श्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था, वह सब मैं महेश्वरको नमस्कार कर वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय उमाको प्रसन्न करनेकी इच्छासे प्रसन्नमना महादेवने जिस स्थानपर वे सदा स्वयं विराजमान रहते हैं, उस विश्वविख्यात स्थानका वर्णन किया था। एक बार सुमेरुके शिखरपर रुद्रके आधे आसनपर विराजमान यशस्विनी देवी उमाने विनयभावसे महादेवजीसे प्रश्न किया॥ ५—७॥
देव्युवाच<br>भगवन् देवदेवेश चन्द्रार्धकृतशेखर।<br>धर्मं प्रब्रूहि मर्त्यानां भुवि चैवोध्वैरेतसाम्॥ ८<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत्।<br>ध्यानाध्ययनसम्पन्नं कथं भवति चाक्षयम्॥ ९<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम्।<br>कथं तत् क्षयमायाति तन्ममाचक्ष्व शङ्कर॥ १०<br>यस्मिन् व्यवस्थितो भक्त्या तुष्यसि त्वं महेश्वर।<br>व्रतानि नियमाश्चैव आचारो धर्म एव च॥ ११<br>सर्वसिद्धिकरं यत्र ह्यक्षयगतिदायकम्।<br>वक्तुमर्हसि तत् सर्वं परं कौतूहलं हि मे॥ १२देवीने पूछा— अर्धचन्द्रसे सुशोभित मस्तकवाले देवदेवेश्वर भगवन्! भूतलपर वर्तमान ऊर्ध्वरेता प्राणियोंके धर्मको विस्तारसे बतलाइये। साथ ही यह भी बतलाइये कि जप, दान, हवन, यज्ञ, तपस्या, शुभ कर्म, ध्यान और अध्ययन आदि किस प्रकार अक्षयभावको प्राप्त होते हैं? शंकर! हजारों पूर्वजन्मोंमें जो पाप सञ्चित हुए हैं, वे किस प्रकार नष्ट होते हैं? यह आप मुझे स्पष्ट बतलाइये। महेश्वर! जिस स्थानपर स्थित होकर आप भक्तिसे प्रसन्न होते हैं तथा व्रत, नियम, आचार और धर्म जहाँ सभी सिद्धियोंके प्रदाता बन जाते हैं एवं अनश्वर गति प्रदान करते हैं, ये सभी बातें आप बतलाइये; क्योंकि इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी ही उत्कण्ठा है॥८—१२॥
Page 764Permalink

७५४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महेश्वर उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्।<br>सर्वक्षेत्रेषु विख्यातमविमुक्तं प्रियं मम ॥ १३<br>अष्टषष्टिः पुरा प्रोक्ता स्थानानां स्थानमुत्तमम्।<br>यत्र साक्षात् स्वयं रुद्रः कृत्तिवासाः स्वयं स्थितः ॥ १४<br>यत्र संनिहितो नित्यमविमुक्ते निरन्तरम्।<br>तत्क्षेत्रं न मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम् ॥ १५<br>अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परा गतिः।<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥ १६<br>ध्यानमध्ययनं दानं सर्वं भवति चाक्षयम्।<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम् ॥ १७<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत् सर्वं व्रजति क्षयम्।<br>अविमुक्ताग्निना दग्धमग्नौ तूलमिवाहितम् ॥ १८<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वै वर्णसंकराः।<br>कृमिम्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः ॥ १९<br>कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते शृणु प्रिये ॥ २०<br>चन्द्रार्धमौलिनः सर्वे ललाटाक्षा वृषध्वजाः।<br>शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः ॥ २१<br>अकामो वा सकामो वा ह्यपि तिर्यग्गतोऽपि वा।<br>अविमुक्ते त्यजन् प्राणान् मम लोके महीयते ॥ २२<br>अविमुक्तं यदा गच्छेत् कदाचित् कालपर्ययात्।<br>अश्मना चरणौ भित्त्वा तत्रैव निधनं व्रजेत् ॥ २३<br>अविमुक्तं गतो देवि न निर्गच्छेत् ततः पुनः।<br>सोऽपि मत्पदमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २४महेश्वरने कहा— देवि! सुनो, मैं तुम्हें गुप्तसे भी गुप्त उत्तम विषय बतला रहा हूँ। सभी क्षेत्रोंमें प्रसिद्ध अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी) मुझे परम प्रिय है। पहले मैं अड़सठ श्रेष्ठ स्थानोंका वर्णन कर चुका हूँ, जहाँ गजचर्म धारण कर मैं साक्षात् रुद्रस्वरूपसे विराजमान रहता हूँ; परंतु अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में मैं नित्य-निरन्तर निवास करता हूँ। उस क्षेत्रको मैं कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये इसे अविमुक्त कहा जाता है। उस अविमुक्त क्षेत्रमें परा सिद्धि और परमगति प्राप्त होती है। वहाँ किया गया जप, दान, हवन, यज्ञ, तप, शुभ कर्म, ध्यान, अध्ययन, दान आदि सभी अक्षय हो जाते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रवेश करनेवाले व्यक्तिके हजारों पूर्व जन्मोंमें जो पाप संचित होते हैं वे सभी नष्ट हो जाते हैं। वे अविमुक्तारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल जाते हैं जैसे अग्निमें समर्पित की हुई रूई। प्रिये! यदि अविमुक्त क्षेत्रमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, कृमि, म्लेच्छ एवं अन्य निम्नस्तरके पापयोनिवाले कीट, चींटें, पशु, पक्षी आदि कालके वशीभूत हो मृत्युको प्राप्त होते हैं, (तो उनकी क्या गति होती है, उसे) सुनो। देवि! वे सभी मानव-शरीर धारणकर मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, ललाटमें तृतीय नेत्रसे युक्त शिवस्वरूप होकर मेरे शिवपुरमें जन्म लेते हैं। चाहे सकाम हो या निष्काम अथवा तिर्यग्योनिगत ही क्यों न हो, यदि वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्राणोंका त्याग करता है तो मेरे लोकमें पूजित होता है। देवि! यदि मनुष्य कालक्रमानुसार कभी अविमुक्त क्षेत्रमें पहुँच जाय तो वहाँ पत्थरसे अपने चरणोंको तोड़कर स्थित रहे और पुनः अविमुक्त क्षेत्रसे बाहर न जाय, वहीं मृत्युको प्राप्त हो जाय तो वह भी मेरे पदको प्राप्त होता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ १३—२४॥
वस्त्रापथं रुद्रकोटिं सिद्धेश्वरमहालयम्।<br>गोकर्णं रुद्रकर्णं च सुवर्णाक्षं तथैव च ॥ २५<br>अमरं च महाकालं तथा कायावरोहणम्।<br>एतानि हि पवित्राणि सांनिध्यात् संध्ययोर्द्वयोः ॥ २६<br>कालिञ्जरवनं चैव शंकुकर्णं स्थलेश्वरम्।<br>एतानि च पवित्राणि सांनिध्याद्धि मम प्रिये।<br>अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशयः ॥ २७<br>हरिश्चन्द्रं परं गुह्यं गुह्यमाप्रातकेश्वरम्।<br>जालेश्वरं परं गुह्यं गुह्यं श्रीपर्वतं तथा ॥ २८प्रिये! वस्त्रापथ (जूनागढ़, गिरिनार), रुद्रकोटि, सिद्धेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण तथा सुवर्णाक्ष, अमरकण्टक, महाकाल (उज्जैनी) और कायावरोहण (कारावार, गुजरात)—ये सभी स्थान प्रातः और संध्याकालमें मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। इसी प्रकार कालिंजरवन, शङ्कुकर्ण और स्थलेश्वर (थानेश्वर)—ये भी मेरी संनिधिके कारण ही पवित्र हैं। वरारोहे! अविमुक्त क्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें स्थित रहता हूँ—इसमें संदेह नहीं है। प्रिये! हरिश्चन्द्र, आप्रातकेश्वर, जालेश्वर, श्रीपर्वत,
Page 765Permalink

* अध्याय १८२ * | ७५५

| महालयं तथा गुह्यं कृमिचण्डेश्वरं शुभम्।<br>गुह्यातिगुह्यं केदारं महाभैरवमेव च॥ २९<br>अष्टावेतानि स्थानानि सांनिध्याद्विद्धि मम प्रिये।<br>अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशयः॥ ३०<br>यानि स्थानानि श्रूयन्ते त्रिषु लोकेषु सुव्रते।<br>अविमुक्तस्य पादेषु नित्यं संनिहितानि वै॥ ३१<br>अथोत्तरां कथां दिव्यमविमुक्तस्य शोभने।<br>स्कन्दो वक्ष्यति माहात्म्यमृषीणां भावितात्मनाम्॥ ३२ | महालय तथा शुभदायक कृमिचण्डेश्वर, केदार और महाभैरव—ये आठ स्थान परम गुह्य हैं और मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। किंतु सुन्दरि! अविमुक्तक्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें निवास करता हूँ—इसमें संदेह नहीं है। सुव्रते! तीनों लोकोंमें जो भी पवित्र स्थान सुने जाते हैं, वे सभी अविमुक्त क्षेत्रके चरणोंमें सदा उपस्थित रहते हैं। शोभने! अविमुक्त क्षेत्रकी इसके बादकी दिव्य कथा और माहात्म्य स्कन्द आत्मद्रष्टा ऋषियोंसे कहेंगे॥ २५—३२॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्त-माहात्म्य नामक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८१॥


एक सौ बयासीवाँ अध्याय

अविमुक्त-माहात्म्य

| सूत उवाच<br>कैलासपृष्ठमासीनं स्कन्दं ब्रह्मविदां वरम्।<br>पप्रच्छुरृषयः सर्वे सनकाद्यास्तपोधनाः॥ १<br>तथा राजर्षयः सर्वे ये भक्तास्तु महेश्वरे।<br>ब्रूहि त्वं स्कन्द भूर्लोके यत्र नित्यं भवः स्थितः॥ २<br><br>स्कन्द उवाच<br>महात्मा सर्वभूतात्मा देवदेवः सनातनः।<br>घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः॥ ३<br>आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुभूतः स्थितः प्रभुः।<br>गुह्यानां परमं गुह्यमविमुक्तमिति स्मृतम्॥ ४<br>अविमुक्ते सदा सिद्धिर्यत्र नित्यं भवः स्थितः।<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यं यदुक्तं त्वीश्वरेण तु॥ ५<br>स्थानान्तरं पवित्रं च तीर्थमायतनं तथा।<br>श्मशानसंस्थितं वेश्म दिव्यमन्तर्हितं च यत्॥ ६<br>भूर्लोके नैव संयुक्तमन्तरिक्षे शिवालयम्।<br>अयुक्तास्तु न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्ति चेतसा॥ ७<br>ब्रह्मचर्यव्रतोपेताः सिद्धा वेदान्तकोविदाः।<br>आदेहपतनाद् यावत् तत् क्षेत्रं यो न मुञ्चति॥ ८ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! एक समय सनक आदि तपस्वी ब्रह्मर्षिगण, सकल राजर्षिवृन्द एवं महेश्वरके भक्तगणोंने कैलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ स्कन्दसे पूछा—'स्कन्द! मृत्युलोकमें जहाँ भगवान् शंकर सदैव विराजमान रहते हैं, वह स्थान आप (हमें) बतलाइये॥ १-२॥<br><br>स्कन्दने कहा—सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप, महात्मा, सनातन, देवाधिदेव, सामर्थ्यशाली, महादेव देवता एवं दानवोंसे दुष्प्राप्य, घोररूप धारणकर प्रलयपर्यन्त जहाँ स्थिररूपसे निवास करते हैं, उसे अत्यन्त गुप्त अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। जहाँ शिव सदा स्थित रहते हैं, उस अविमुक्तक्षेत्रमें सिद्धि सदा सुलभ है। इस स्थानका जो माहात्म्य भगवान् शङ्करने स्वयं कहा है, उसे सुनिये। यह स्थान परम पवित्र तीर्थ और देवालय है। महाश्मशानपर स्थित जो दिव्य एवं सुगुप्त मन्दिर है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध नहीं है। वह शिवका मन्दिर अन्तरिक्षमें है। योगी व्यक्ति ही ज्ञानद्वारा उसका साक्षात्कार कर पाते हैं, किंतु जो योगसे रहित हैं वे उसे नहीं देख पाते। जो ब्रह्मचारी, सिद्ध और वेदान्तको जाननेवाले मृत्युपर्यन्त उस स्थानका परित्याग नहीं करते, |

Page 766Permalink

७५६ * मत्स्यपुराण *


| ब्रह्मचर्यव्रतैः सम्यक् सम्यगिष्टं मखैर्भवेत्।<br>अपापात्मा गतिः सर्वा या तूक्ता च क्रियावताम्॥ ९<br>यस्तत्र निवसेद् विप्रोऽसंयुक्तात्मासमाहितः।<br>त्रिकालमपि भुञ्जानो वायुभक्षसमो भवेत्॥ १०<br>निमेषमात्रमपि यो ह्यविमुक्ते तु भक्तिमान्।<br>ब्रह्मचर्यसमायुक्तः परमं प्राप्नुयात् तपः॥ ११<br>योऽत्र मासं वसेद् धीरो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।<br>सम्यक् तेन व्रतं चीर्णं दिव्यं पाशुपतं महत्॥ १२<br>जन्ममृत्युभयं तीर्त्वा स याति परमां गतिम्।<br>नैःश्रेयसीं गतिं पुण्यां तथा योगगतिं व्रजेत्॥ १३<br>न हि योगगतिर्दिव्या जन्मान्तरशतैरपि।<br>प्राप्यते क्षेत्रमाहात्म्यात् प्रभावाच्छंकरस्य तु॥ १४ | उन्हें वह पवित्र गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मचर्यपूर्वक यज्ञोंद्वारा भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर क्रियासम्पन्न व्यक्तियोंके लिये कही गयी है। जो विप्र समाधिसे रहित, योगसे शून्य एवं तीनों समय भोजन करते हुए भी वहाँ निवास करता है वह वायुभक्षीके समान माना जाता है। इस अविमुक्त क्षेत्रमें क्षणभर भी ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करनेवाला भक्तिमान् व्यक्ति परम तपको प्राप्त करता है। जो धीर पुरुष अल्प भोजन करते हुए इन्द्रियोंको वशमें कर एक मासतक यहाँ निवास करता है, वह (मानो) महान् दिव्य पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान कर लेता है। वह पुरुष जन्म और मृत्युके भयको पारकर परमगतिको प्राप्त करता है तथा पुण्यदायक मोक्ष एवं योगगतिका अधिकारी हो जाता है। जिस दिव्य योगगतिको सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं प्राप्त किया जा सकता, वह स्थानके माहात्म्य और शंकरके प्रभावसे यहाँ प्राप्त हो जाती है॥ ३—१४॥ |
| ब्रह्महा योऽभिगच्छेत्तु अविमुक्तं कदाचन।<br>तस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् ब्रह्महत्या निवर्तते॥ १५<br>आदेहपतनाद् यावत् क्षेत्रं यो न विमुञ्चति।<br>न केवलं ब्रह्महत्या प्राक्कृतं च निवर्तते॥ १६<br>प्राप्य विश्वेश्वरं देवं न स भूयोऽभिजायते।<br>अनन्यमानसो भूत्वा योऽविमुक्तं न मुञ्चति॥ १७<br>तस्य देवः सदा तुष्टः सर्वान् कामान् प्रयच्छति।<br>द्वारं यत् सांख्ययोगानां स तत्र वसति प्रभुः॥ १८<br>सगणो हि भवो देवो भक्तानामनुकम्पया।<br>अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः॥ १९<br>अविमुक्ते परा सिद्धिर्विमुक्ते परं पदम्।<br>अविमुक्तं निषेवेत देवर्षिगणसेवितम्॥ २०<br>यदीच्छेन्मानवो धीमान् न पुनर्जायते क्वचित्।<br>मेरोः शक्तो गुणान् वक्तुं द्वीपानां च तथैव च॥ २१<br>समुद्राणां च सर्वेषां नाविमुक्तस्य शक्यते।<br>अन्तकाले मनुष्याणां छिद्यमानेषु मर्मसु॥ २२<br>वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृतिर्नैवोपजायते।<br>अविमुक्ते ह्यन्तकाले भक्तानामीश्वरः स्वयम्॥ २३<br>कर्मभिः प्रेर्यमाणानां कर्णजापं प्रयच्छति।<br>मणिकर्ण्यां त्यजन् देहं गतिमिष्टां व्रजेन्नरः॥ २४ | ब्रह्महत्या करनेवाला व्यक्ति भी यदि किसी समय इस अविमुक्तक्षेत्रमें चला जाता है तो इस क्षेत्रके प्रभावसे उसकी ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है। जो मृत्युपर्यन्त इस क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं, अपितु पहलेके किये हुए पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वह भगवान् विश्वेश्वरको प्राप्तकर पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करता। जो अनन्यचित्त हो अविमुक्त क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसपर भगवान् शङ्कर सदा प्रसन्न रहते हैं और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। जो सांख्य और योगका द्वारस्वरूप है उस स्थानपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेके लिये सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् शङ्कर गणोंके साथ निवास करते हैं। अविमुक्त क्षेत्र श्रेष्ठ स्थान है। अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है। अविमुक्तमें रहनेसे परम सिद्धि प्राप्त होती है और अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है। यदि बुद्धिमान् मनुष्य यह चाहता हो कि मेरा पुनर्जन्म न हो तो उसे देवर्षिगणोंसे सेवित अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करना चाहिये। मेरु पर्वत, सभी द्वीपों तथा समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है, किंतु अविमुक्त क्षेत्रके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। मृत्युके समय वायुसे प्रेरित मनुष्योंके मर्मस्थानोंके छिन्न हो जानेपर स्मृति नहीं उत्पन्न होती, किंतु अविमुक्तमें अन्तसमय कर्मोंसे प्रेरित भक्तोंके कानमें स्वयं ईश्वर मन्त्रका जाप करते हैं। मनुष्य मणिकर्णिकामें शरीरका |

१८४- काशीकी महिमाका वर्णन

Page 767Permalink
* अध्याय १८३ *७५७
ईश्वरप्रेरितो याति दुष्प्रापामकृतात्मभिः।<br>अशाश्वतमिदं ज्ञात्वा मानुष्यं बहुकिल्बिषम्॥ २५<br><br>अविमुक्तं निषेवेत संसारभयमोचनम्।<br>योगक्षेमप्रदं दिव्यं बहुविघ्नविनाशनम्॥ २६<br><br>विघ्नैश्चालोड्यमानोऽपि योऽविमुक्तं न मुञ्चति।<br><br>स मुञ्चति जरां मृत्युं जन्म चैतदशाश्वतम्।<br>अविमुक्तप्रसादात् तु शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ २७त्याग करनेपर इष्टगतिको प्राप्त करता है। जो गति अविशुद्ध आत्माओंद्वारा दुष्प्राप्य है, उसे भी वह ईश्वरकी प्रेरणाद्वारा यहाँ प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य अनेक पापोंसे परिपूर्ण इस मानवयोनिको नश्वर समझकर संसार-भयसे छुटकारा देनेवाले, योगक्षेमके प्रदाता, अनेक विघ्नोंके विनाशक, दिव्य अविमुक्त (काशी)-में निवास करता है तथा अनेक विघ्नोंसे आलोड़ित होनेपर भी अविमुक्तको नहीं छोड़ता, वह वृद्धावस्था, मृत्यु और इस नश्वर जन्मसे छुटकारा पा लेता है तथा अविमुक्तके माहात्म्यसे शिवसायुज्यको प्राप्त करता है॥ १५—२७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८२॥


एक सौ तिरासीवाँ अध्याय

अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर

देव्युवाच<br>हिमवन्तं गिरिं त्यक्त्वा मन्दरं गन्धमादनम्।<br>कैलासं निषधं चैव मेरुपृष्ठं महाद्युति॥ १<br>रम्यं त्रिशिखरं चैव मानसं सुमहागिरिम्।<br>देवोद्यानानि रम्याणि नन्दनं वनमेव च॥ २<br>सुरस्थानानि मुख्यानि तीर्थान्यायतननि च।<br>तानि सर्वाणि संत्यज्य अविमुक्ते रतिः कथम्॥ ३<br>किमत्र सुमहत् पुण्यं परं गुह्यं वदस्व मे।<br>येन त्वं रमसे नित्यं भूतसम्पद्गणैर्वृतः॥ ४<br>क्षेत्रस्य प्रवरत्वं च ये च तत्र निवासिनः।<br>तेषामनुग्रहः कश्चित् तत्सर्वं ब्रूहि शङ्कर॥ ५<br><br>शंकर उवाच<br>अत्यद्भुतमिमं प्रश्नं यत्त्वं पृच्छसि भामिनि।<br>तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ ६<br>वाराणस्यां नदी पुण्या सिद्धगन्धर्वसेविता।<br>प्रविष्टा त्रिपथा गङ्गा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये॥ ७<br>ममैव प्रीतिरतुला कृत्तिवासे च सुन्दरि।<br>सर्वेषां चैव स्थानानां स्थानं तत्तु यथाधिकम्॥ ८**देवी पार्वतीने पूछा—**कल्याणकारी पतिदेव! हिमालयपर्वत, मन्दर, गन्धमादन, कैलास, निषध, देदीप्यमान सुमेरुपीठ, मनोहर त्रिशिखर पर्वत एवं अतिशय विशाल मानस पर्वत, रमणीय देव-उद्यान, नन्दनवन, देवस्थानों, मुख्य तीर्थों और मन्दिरों—इन सभी स्थानोंको छोड़कर आपका अविमुक्तक्षेत्रमें इतना अधिक प्रेम क्यों है? यहाँ अतिशय गोपनीय कौन-सा बहुत बड़ा पुण्य है, जिससे आप प्रमथोंके साथ यहाँ नित्य रमण करते हैं। उस क्षेत्रकी तथा वहाँके निवासियोंकी जो श्रेष्ठता है और उन लोगोंपर आपका जो अपूर्व अनुग्रह है—वे सभी बातें मुझे बतलाइये॥ १—५॥<br><br>**शिवजी बोले—**भामिनि! तुम जो प्रश्न कर रही हो यह अतिशय अद्भुत है। मैं वह सब स्पष्टरूपसे कह रहा हूँ, सुनो। प्रिये! सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित त्रिपथगामिनी पुण्यशीला नदी श्रीगङ्गाजी मेरे उस क्षेत्र वाराणसीमें प्रविष्ट होती हैं। सुन्दरि! कृत्तिवासलिङ्गपर मेरा अपार प्रेम है, इसीलिये वह स्थान सभी स्थानोंसे
Page 768Permalink
७५८* मत्स्यपुराण *

| तेन कार्येण सुश्रोणि तस्मिन् स्थाने रतिर्मम।<br>तस्मिँल्लिङ्गे च सांनिध्यं मम देवि सुरेश्वरि॥ ९<br>क्षेत्रस्य च प्रवक्ष्यामि गुणान् गुणवतां वरे।<br>याञ्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १०<br>यदि पापो यदि शठो यदि वाधार्मिको नरः।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो ह्यविमुक्तं व्रजेद् यदि॥ ११<br>प्रलये सर्वभूतानां लोके स्थावरजङ्गमे।<br>न हि त्यक्ष्यामि तत्स्थानं महागणशतैर्वृतः॥ १२<br>यत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>वक्त्रं मम महाभागे प्रविशन्ति युगक्षये॥ १३<br>तेषां साक्षादहं पूजां प्रतिगृह्णामि पार्वति।<br>सर्वगुह्योत्तमं स्थानं मम प्रियतमं शुभम्॥ १४<br>धन्याः प्रविष्टाः सुश्रोणि मम भक्ता द्विजातयः।<br>मद्भक्तिपरमा नित्यं ये मद्भक्तास्तु ते नराः॥ १५<br>तस्मिन् प्राणान् परित्यज्य गच्छन्ति परमां गतिम्।<br>सदा यजति रुद्रेण सदा दानं प्रयच्छति॥ १६<br>सदा तपस्वी भवति अविमुक्तस्थितो नरः।<br>यो मां पूजयते नित्यं तस्य तुष्याम्यहं प्रिये॥ १७<br>सर्वदानानि यो दद्यात् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।<br>सर्वतीर्थाभिषिक्तश्च स प्रपद्येत मामिह॥ १८<br>अविमुक्तं सदा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चितम्।<br>ते तिष्ठन्तीह सुश्रोणि मद्भक्ताश्च त्रिविष्टपे॥ १९<br>मत्प्रसादात् तु ते देवि दीव्यन्ति शुभलोचने।<br>दुर्धराश्चैव दुर्धर्षा भवन्ति विगतज्वराः॥ २०<br>अविमुक्तं शुभं प्राप्य मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।<br>विधूतपापा विमला भवन्ति विगतज्वराः॥ २१ | श्रेष्ठ है। सुश्रोणि! इसी कारण मेरा उस स्थानपर अधिक राग है तथा सुरेश्वरि! उस लिङ्गमें मेरा सदा निवास रहता है। सभी गुणवानोंमें श्रेष्ठ देवि! अब मैं क्षेत्रके गुणोंका वर्णन करता हूँ जिन्हें सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पापी, दुष्ट अथवा अधार्मिक मनुष्य भी यदि अविमुक्त (काशी)-में चला जाय तो वह सभी पापोंसे छूट जाता है। सभी प्राणियोंके स्थावर एवं जंगमसे व्याप्त लोकके प्रलयकालमें भी मैं सैकड़ों विशिष्ट गणोंके साथ रहकर उस स्थानको नहीं छोड़ता। महाभागे! जहाँ देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस—सभी युगके नाशके समय मेरे मुखमें प्रवेश कर जाते हैं। पार्वति! उनकी पूजाको मैं साक्षात्-रूपसे ग्रहण करता हूँ। यह शुभदायक अतिशय रहस्यमय स्थान मुझे परम प्रिय है। सुश्रोणि! वहाँ निवास करनेवाले मेरे भक्त द्विजातिगण धन्य हैं। सदा मेरी भक्तिमें तत्पर जो मेरे भक्त हैं वे वहाँ अपने शरीरका त्याग कर परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य अविमुक्त क्षेत्र (काशी)-में निवास करता है, वह सदा रुद्रसूक्तसे पूजा करता है, सदा दान देता है और सदा तपस्यामें रत रहता है। प्रिये! जो मेरी नित्य पूजा करता है उससे मैं प्रसन्न रहता हूँ। जो सभी प्रकारका दान करता है, सभी तरहके यज्ञोंमें दीक्षित होता है और सभी तीर्थोंके जलोंके अभिषेकसे सम्पन्न है वही यहाँ मुझे प्राप्त करता है। देवि! जो सदा सुनिश्चित रूपसे अविमुक्त क्षेत्रमें जाते रहते हैं तथा यहाँ निवास करते हैं वे स्वर्गमें भी मेरे भक्त बने रहते हैं। शुभलोचने देवि! मेरी कृपासे वे देदीप्यमान रहते हैं तथा किसीसे पराजित न होनेवाले, पराक्रमशाली और संतापरहित होते हैं। स्थिर निश्चयवाले मेरे भक्त शुभप्रद अविमुक्तको प्राप्तकर पापरहित, निर्मल और उद्वेगशून्य हो जाते हैं॥ ६—२१॥ |
| <center>पार्वत्युवाच</center><br>दक्षयज्ञस्त्वया देव मत्प्रियार्थे निषूदितः।<br>अविमुक्तगुणानां तु न तृप्तिरिह जायते॥ २२ | पार्वतीने कहा—देव! आपने मेरा प्रिय करनेके लिये दक्ष-यज्ञको विनष्ट किया था, किंतु अविमुक्तके गुणोंको सुननेसे मुझे यहाँ संतोष नहीं हो रहा है॥ २२॥ |
| <center>ईश्वर उवाच</center><br>क्रोधेन दक्षयज्ञस्तु त्वत्प्रियार्थे विनाशितः।<br>महाप्रिये महाभागे नाशितोऽयं वरानने॥ २३<br>अविमुक्ते यजन्ते तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ २४ | ईश्वर बोले—महाभागे! तुम्हें प्रसन्न करनेके लिये मैंने क्रोधवश दक्ष-यज्ञका विनाश किया था; क्योंकि वरानने! तुम तो मेरी अतिशय प्रियतमा हो, इसीलिये उस यज्ञको नष्ट किया था। जो मेरे भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक यज्ञ करते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता॥ २३-२४॥ |

Page 769Permalink
* अध्याय १८३ *७५९
देव्युवाच<br>दुर्लभास्तु गुणा देव अविमुक्ते तु कीर्तिताः।<br>सर्वांस्तान् मम तत्त्वेन कथयस्व महेश्वर॥ २५<br>कौतूहलं महादेव हृदिस्थं मम वर्तते।<br>तत्सर्वं मम तत्त्वेन आख्याहि परमेश्वर॥ २६**देवीने पूछा—**देव! आपने अविमुक्तक्षेत्रके जिन दुर्लभ गुणोंका वर्णन किया है, महेश्वर! आप उन सभी गुणोंका रहस्यपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। महादेव! मेरे हृदयमें परम आश्चर्य हो रहा है, अतः परमेश्वर! उन सभी विषयोंको मुझे रहस्यपूर्वक बतलाइये॥ २५-२६॥
ईश्वर उवाच<br>अक्षया ह्यामराश्चैव ह्यदेहाश्च भवन्ति ते।<br>मत्प्रसादाद् वरारोहे मामेव प्रविशन्ति वै॥ २७<br>ब्रूहि ब्रूहि विशालाक्षि किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ २८**ईश्वर बोले—**सुन्दरि! जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करते हैं वे मेरी कृपासे विदेह, अक्षय और अमर हो जाते हैं तथा अन्तमें निश्चय ही मुझमें लीन हो जाते हैं। विशालनेत्रे! कहो, कहो, तुम और क्या सुनना चाहती हो?॥ २७-२८॥
देव्युवाच<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे अहो पुण्यमहो गुणाः।<br>न तृप्तिमधिगच्छामि ब्रूहि देव पुनर्गुणान्॥ २९**देवीने पूछा—**देव! अविमुक्त नामक विशाल क्षेत्रका आश्चर्यजनक पुण्य है एवं आश्चर्यजनक गुण हैं, इनके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः पुनः उन गुणोंका वर्णन कीजिये॥ २९॥
ईश्वर उवाच<br>महेश्वरि वरारोहे शृणु तांस्तु मम प्रिये।<br>अविमुक्ते गुणा ये तु तथान्यानपि तच्छृणु॥ ३०<br>शाकपर्णाशिनो दान्ताः सम्प्रक्षाल्या मरीचिपाः।<br>दन्तोलूखलिनश्चान्ये अश्मकुट्टास्तथा परे॥ ३१<br>मासि मासि कुशाग्रेण जलमास्वादयन्ति वै।<br>वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे॥ ३२<br>आदित्यवपुषः सर्वे जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।<br>एवं बहुविधैर्धर्मैरन्यत्र चरितव्रताः॥ ३३<br>त्रिकालमपि भुञ्जाना येऽविमुक्तनिवासिनः।<br>तपश्वरन्ति वान्यत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम्।<br>येऽविमुक्ते वसन्तीह स्वर्गे प्रतिवसन्ति ते॥ ३४**ईश्वरने कहा—**महेश्वरि! तुम तो परम सुन्दरी एवं मेरी प्रिया हो, अतः अविमुक्तक्षेत्रमें जो गुण हैं, उन्हें तथा उनके अतिरिक्त अन्यान्य गुणोंको भी सुनो। जो शाक एवं पत्तोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले, संयमी, भलीभाँति स्नानसे निर्मल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले, दाँतरूपी ओखलीसे निर्वाह करनेवाले, पत्थरपर कूटकर भोजन करनेवाले, प्रतिमास कुशके अग्रभागसे जलका आस्वादन करनेवाले, वृक्षकी जड़में निवास करनेवाले, पत्थरपर शयन करनेवाले, आदित्यके समान तेजस्वी शरीरधारी, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय हैं, तथा इसी तरह अनेक प्रकारके धर्मोंसे अन्य स्थानोंमें व्रतका आचरण करनेवाले हैं अथवा तपस्यामें संलग्न हैं, वे सभी तीनों कालोंमें भोजन करनेवाले अविमुक्तनिवासी व्यक्तिकी सोलहवीं कलाकी बराबरी नहीं कर सकते। जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास कर रहे हैं, वे मानो स्वर्गमें ही निवास कर रहे हैं॥ ३०-३४॥
मत्समः पुरुषो नास्ति त्वत्समा नास्ति योषिताम्।<br>अविमुक्तसमं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति॥ ३५<br>अविमुक्ते परो योगो ह्यविमुक्ते परा गतिः।<br>अविमुक्ते परो मोक्षः क्षेत्रं नैवास्ति तादृशम्॥ ३६<br>परं गुह्यं प्रवक्ष्यामि तत्त्वेन वरवर्णिनि।<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे यदुक्तं हि मया पुरा॥ ३७विश्वमें मेरे समान न कोई दूसरा पुरुष है, न तुम्हारे समान कोई स्त्री है और न अविमुक्तके समान कोई अन्य तीर्थस्थान हुआ है, न होगा। अविमुक्तमें परम योग, अविमुक्तमें श्रेष्ठ गति, अविमुक्तमें परम मोक्ष प्राप्त होता है, इसके समान अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है। शोभने! महाक्षेत्र अविमुक्तके विषयमें मैंने जो पूर्वमें कहा है, उस परम रहस्यको मैं यथार्थरूपसे कह रहा हूँ।
Page 770Permalink

७६० * मत्स्यपुराण *

जन्मान्तरशतैर्देवि योगोऽयं यदि लभ्यते।<br>मोक्षः शतसहस्रेण जन्मना लभ्यते न वा॥ ३८<br>अविमुक्ते न संदेहो मद्भक्तः कृतनिश्चयः।<br>एकेन जन्मना सोऽपि योगं मोक्षं च विन्दति॥ ३९<br>अविमुक्ते नरा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चिताः।<br>ते विशन्ति परं स्थानं मोक्षं परमदुर्लभम्॥ ४०<br>पृथिव्यामीदृशं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति।<br>चतुर्मूर्तिः सदा धर्मस्तस्मिन् संनिहितः प्रिये।<br>चतुर्णामपि वर्णानां गतिस्तु परमा स्मृता॥ ४१देवि! करोड़ों जन्मोंके पश्चात् मोक्षकी प्राप्ति होती है या नहीं, इसमें भी संदेह है, परंतु यदि कहीं सैकड़ों जन्मोंके बाद ऐसा योग उपलब्ध हो जाय तो दृढ़ निश्चयवाला मेरा भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें एक ही जन्ममें योग और मोक्षको प्राप्त कर लेता है। देवि! जो दृढ़ निश्चयसे सम्पन्न पुरुष अविमुक्तक्षेत्रमें जाते हैं वे परम दुर्लभ श्रेष्ठ मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। प्रिये! पृथ्वीमें ऐसा क्षेत्र न हुआ है और न होगा। चार मूर्तिवालाधर्म इस क्षेत्रमें सदा निवास करता है। यहाँ चारों वर्णोंकी परम गति कही गयी है॥ ३५–४१॥
देव्युवाच<br>श्रुता गुणास्ते क्षेत्रस्य इह चान्यत्र ये प्रभो।<br>वदस्व भुवि विप्रेन्द्राः कं वा यज्ञैर्यजन्ति ते॥ ४२देवीने पूछा—प्रभो! आपके क्षेत्रके लौकिक और पारलौकिक गुणोंको मैंने सुन लिया। अब यह बतलाइये कि पृथ्वीपर जो श्रेष्ठ विप्रवृन्द हैं वे यज्ञोंद्वारा किसका यजन करते हैं?॥ ४२॥
ईश्वर उवाच<br>इज्यया चैव मन्त्रेण मामेव हि यजन्ति ये।<br>न तेषां भयमस्तीति भवं रुद्रं यजन्ति यत्॥ ४३<br>अमन्त्रो मन्त्रको देवि द्विविधो विधिरुच्यते।<br>सांख्यं चैवाथ योगश्च द्विविधो योग उच्यते॥ ४४<br>सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।<br>सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ ४५<br>आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।<br>तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ ४६<br>निर्गुणः सगुणो वापि योगश्च कथितो भुवि।<br>सगुणश्चैव विज्ञेयो निर्गुणो मनसः परः॥ ४७<br>एतत् ते कथितं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ४८ईश्वरने कहा—जो यज्ञ और मन्त्रद्वारा मेरा ही यजन करते हैं उन लोगोंको कोई भय नहीं रह जाता; क्योंकि वे भव और रुद्रकी आराधना करनेवाले हैं। देवि! मन्त्ररहित और मन्त्रसहित—दोनों प्रकारकी विधियाँ कही गयी हैं। इसी प्रकार सांख्य और योगके भेदसे योग भी दो प्रकारका कहा गया है। जो सजातीय, विजातीय एवं स्वगत भेदोंसे शून्य हो सबको एक मानकर सभी प्राणियोंमें स्थित मेरी आराधना करता है वह योगी सदा अपने स्वरूपमें रहता हुआ भी मुझमें ही स्थित रहता है। जो सर्वत्र सबको आत्मसदृश मुझमें अवस्थित देखता है, उससे न तो मैं वियुक्त होता हूँ और न वह मुझसे अलग होता है। भूतलपर निर्गुण और सगुण—दो प्रकारके योग कहे गये हैं। उनमें सगुण योग ही ज्ञानके द्वारा जाना जा सकता है, निर्गुण योग मनसे परे है। देवि! जो तुमने मुझसे पूछा है, वह मैंने तुम्हें बतला दिया॥ ४३–४८॥
देव्युवाच<br>या भक्तिस्त्रिविधा प्रोक्ता भक्तानां बहुधा त्वया।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः कथयस्व मे॥ ४९देवीने पूछा—आपने भक्तोंकी जो तीन प्रकारकी भक्ति अनेक बार कही है उसे मैं सुनना चाहती हूँ। आप उसका यथार्थरूपमें मुझसे वर्णन कीजिये॥ ४९॥
ईश्वर उवाच<br>शृणु पार्वति देवेशि भक्तानां भक्तवत्सले।<br>प्राप्य सांख्यं च योगं च दुःखान्तं च नियच्छति॥ ५०ईश्वर (शिव)-ने कहा—भक्तोंके प्रति वात्सल्य भाव रखनेवाली देवेश्वरी पार्वती! सुनो। जो सांख्य और योगको प्राप्तकर दुःखका सर्वथा विनाश कर लेता है,
Page 771Permalink
* अध्याय १८३ *७६१
सदा यः सेवते भिक्षां ततो भवति रञ्जितः।<br>रञ्जनात् तन्मयो भूत्वा लीयते स तु भक्तिमान्॥ ५१<br>शास्त्राणां तु वरारोहे बहुकारणदर्शिनः।<br>न मां पश्यन्ति ते देवि ज्ञानवाक्यविवादिनः॥ ५२<br>परमार्थज्ञानतृप्ता युक्ता जानन्ति योगिनः।<br>विद्यया विदितात्मानो योगस्य च द्विजातयः॥ ५३<br>प्रत्याहारेण शुद्धात्मा नान्यथा चिन्तयेच्च तत्।<br>तुष्टिं च परमां प्राप्य योगं मोक्षं परं तथा।<br>त्रिभिर्गुणैः समायुक्तो ज्ञानवान् पश्यतीह माम्॥ ५४<br>एतत् ते कथितं देवि किमन्यच्छ्रोतुर्महसि।<br>भूय एव वरारोहे कथयिष्यामि सुव्रते॥ ५५<br>गुह्यं पवित्रमथवा यच्चापि हृदि वर्त्तते।<br>तत् सर्वं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः प्रिये॥ ५६सदा भिक्षासे जीवन-यापन करता है और उसीसे प्रसन्न रहता है तथा इस प्रकार प्रसन्नताके कारण उसीमें तन्मय होकर लीन हो जाता है, वह भक्तिमान् कहलाता है। वरारोहे! जो शास्त्रोंके अनेकों कारणोंपर विचार करनेवाले हैं, वे ज्ञानवाक्योंमें विवाद करनेवाले लोग मेरा दर्शन नहीं कर पाते। देवि! जो परमार्थ-ज्ञानसम्पन्न योगी हैं तथा जो द्विजातिवृन्द योगके ज्ञानसे आत्मज्ञानको प्राप्त कर चुके हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। जिसका आत्मा प्रत्याहारके द्वारा विशुद्ध हो गया है, जो परम संतोष, उत्कृष्ट योग और मोक्षको पाकर अन्यथा विचार नहीं करते और तीनों गुणोंसे सम्पन्न हैं, ऐसे ज्ञानी इस अविमुक्तक्षेत्रमें मेरा साक्षात्कार कर पाते हैं। देवि! यह तो मैंने तुमसे कह दिया, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? उत्तम पातिव्रत धारण करनेवाली सुन्दरि! मैं पुनः उसका वर्णन करूँगा। प्रिये! जो गोपनीय, पावन अथवा हृदयमें वर्तमान है, वह सब मैं कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ५०-५६॥
देव्युवाच<br>त्वद्रूपं कीदृशं देव युक्ताः पश्यन्ति योगिनः।<br>एतं मे संशयं ब्रूहि नमस्ते सुरसत्तम॥ ५७देवीने पूछा— देव! योगसिद्धिसम्पन्न योगिगण आपके कैसे स्वरूपका दर्शन करते हैं? देवश्रेष्ठ! मैं आपको नमस्कार करती हूँ, आप मेरे इस संदेहपर प्रकाश डालिये॥ ५७॥
श्रीभगवानुवाच<br>अमूर्तं चैव मूर्तं च ज्योतीरूपं हि तत् स्मृतम्।<br>तस्योपलब्धिमन्विच्छन् यत्नः कार्यो विजानता॥ ५८<br>गुणैर्वियुक्तो भूतात्मा एवं वक्तुं न शक्यते।<br>शक्यते यदि वक्तुं वै दिव्यैर्वर्षशतैर्न वा॥ ५९श्रीभगवान्‌ने कहा— मेरा वह ज्योतिःस्वरूप अमूर्त और मूर्त—दो प्रकारका कहा गया है। विद्वान् पुरुषको उसे प्राप्त करनेकी अभिलाषासे प्रयत्न करना चाहिये। जो प्राणी गुणोंसे रहित है, वह इस प्रकार इसका वर्णन नहीं कर सकता। यदि करना चाहे तो सैकड़ों दिव्य वर्षोंमें कर सकता है या नहीं—इसमें भी संदेह है॥ ५८-५९॥
देव्युवाच<br>किं प्रमाणं तु तत्क्षेत्रं समन्तात् सर्वतो दिशम्।<br>यत्र नित्यं स्थितो देवो महादेवो गणैर्युतः॥ ६०देवीने पूछा— जहाँ देवाधिदेव महादेव अपने गणोंके साथ नित्य स्थित रहते हैं, वह क्षेत्र चारों ओर सभी दिशाओंमें कितनी दूरतक विस्तृत है?॥ ६०॥
ईश्वर उवाच<br>द्वियोजनं तु तत् क्षेत्रं पूर्वपश्चिमतः स्मृतम्।<br>अर्धयोजनविस्तीर्णं तत् क्षेत्रं दक्षिणोत्तरम्॥ ६१<br>वरणाऽसी नदी यावत् तावच्छुक्लनदी तु वै।<br>भीष्मचण्डिकमारभ्य पर्वतेश्वरमन्तिके॥ ६२भगवान् शङ्करने कहा— वह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक दो योजन और दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। जहाँतक वरुणा और असी नदियाँ हैं, वहाँतक भीष्मचण्डिकसे लेकर पर्वतेश्वरके समीपतक शुक्लनदी है।