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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 754 of 1098

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Page 754

७४४ * मत्स्यपुराण *

शुष्कां सम्पूजयिष्यन्ति ये च पुत्रार्थिनो जनाः।<br>तेषां पुत्रप्रदा देवी भविष्यति न संशयः॥ ८५<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सह मातृगणेन तु।<br>ज्वालामालाकुलवपुस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८६<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं कृतशौचेति यज्जगुः।<br>तत्रापि पूर्वजो देवो जगदार्तिहरो हरः॥ ८७<br>रौद्रस्य मातृवर्गस्य दत्त्वा रुद्रस्तु पार्थिव।<br>रौद्रां दिव्यां तनुं तत्र मातृमध्ये व्यवस्थितः॥ ८८<br>सप्त ता मातरो देव्यः सार्धनारीनरः शिवः।<br>निवेश्य रौद्रं तत्स्थानं तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>समातृवर्गस्य हरस्य मूर्ति-<br>र्यदा यदा याति च तत्समीपे।<br>देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्तेः<br>पूजां विधत्ते त्रिपुरान्धकारिः॥ ९०जो पुत्राभिलाषी लोग शुष्करेवतीकी पूजा करेंगे, उनके लिये वह देवी पुत्र प्रदान करनेवाली होगी—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है'॥ ७५-८५॥<br>राजन्! ऐसा कहकर ज्वालासमूहोंसे व्याप्त शरीरवाले भगवान् नरसिंह उस मातृगणके साथ वहीं अन्तर्हित हो गये। वहीं एक तीर्थ उत्पन्न हो गया, जिसे लोग 'कृतशौच' नामसे पुकारते हैं। वहीं सबके पूर्वज तथा जगत्का कष्ट दूर करनेवाले भगवान् रुद्र उस भयंकर मातृवर्गको अपनी रौद्री दिव्य मूर्ति प्रदान कर उन्हीं मातृकाओंके मध्यस्थित हो गये। इस प्रकार अर्धनारी-नरस्वरूप शिव उन सातों मातृ-देवियोंको उस रौद्रस्थानपर स्थापित कर स्वयं वहीं अन्तर्हित हो गये। मातृवर्गसहित शिवजीकी मूर्ति जब-जब देवेश्वर भगवान् नरसिंहकी मूर्तिके निकट जाती है, तब-तब त्रिपुर एवं अन्धकके शत्रु शंकरजी उस नृसिंहमूर्तिकी पूजा करते हैं॥ ८६-९०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽन्धकवधो नामैकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अन्धकवध नामक एक सौ उन्नासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७९॥


एक सौ असीवाँ अध्याय

वाराणसी-माहात्म्यके प्रसङ्गमें हरिकेश यक्षकी तपस्या, अविमुक्तकी शोभा और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति

ऋषय ऊचुः<br><br>श्रुतोऽन्धकवधः सूत यथावत् त्वदुदीरितः।<br>वाराणस्यास्तु माहात्म्यं श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम्॥ १<br>भगवान् पिङ्गलः केन गणत्वं समुपागतः।<br>अन्नदत्वं च सम्प्राप्तो वाराणस्यां महाद्युतिः॥ २<br>क्षेत्रपालः कथं जातः प्रियत्वं च कथं गतः।<br>एतदिच्छाम कथितं श्रोतुं ब्रह्मसुत त्वया॥ ३ऋषियोंने पूछा—सूतजी! आपद्वारा कहा गया अन्धक-वधका प्रसङ्ग तो हमलोगोंने यथार्थरूपसे सुन लिया, अब हमलोग वाराणसीका माहात्म्य सुनना चाहते हैं। ब्रह्मपुत्र सूतजी! वाराणसीमें परम कान्तिमान् भगवान् पिङ्गलको गणेश्वरत्वकी प्राप्ति कैसे हुई? वे अन्नदाता कैसे बने और क्षेत्रपाल कैसे हो गये? तथा वे शंकरजीके प्रेमपात्र कैसे बने? आपके द्वारा कहे गये इस सारे प्रसङ्गको सुननेके लिये हमलोगोंकी उत्कट अभिलाषा है॥ १-३॥