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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 762 of 1098

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Page 762
७५२* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
एवमुक्तस्ततो देवः सह देव्या जगत्पतिः।<br>जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशो धमनिसंततः॥ ८८<br><br>तं दृष्ट्वा प्रणतं भक्त्या हरिकेशं वृषध्वजः।<br>दिव्यं चक्षुरदात् तस्मै येनापश्यत् स शङ्करम्॥ ८९<br><br>अथ यक्षस्तदादेशाच्छनैरुन्मील्य चक्षुषी।<br>अपश्यत् सगणं देवं वृषध्वजमुपस्थितम्॥ ९०ऐसा कहे जानेपर जगदीश्वर महादेव पार्वतीके साथ उस स्थानके निकट गये जहाँ धमनियोंसे व्याप्त कृशकाय यक्ष स्थित था। (उनकी आहट पाकर यक्ष उनके चरणोंपर गिर पड़ा।) इस प्रकार उस हरिकेशको भक्तिपूर्वक चरणोंमें पड़ा हुआ देखकर शिवजीने उसे दिव्य चक्षु प्रदान किया जिससे वह शंकरका दर्शन कर सके। तदनन्तर यक्षने महादेवजीके आदेशसे धीरेसे अपने दोनों नेत्रोंको खोलकर गणसहित वृषभध्वज महादेवजीको सामने उपस्थित देखा॥८८-९०॥
देवदेव उवाच<br>वरं ददामि ते पूर्वं त्रैलोक्ये दर्शनं तथा।<br>सावर्ण्यं च शरीरस्य पश्य मां विगतज्वरः॥ ९१देवाधिदेव शंकरने कहा— यक्ष! अब तुम कष्टरहित होकर मेरी ओर देखो। मैं तुम्हें पहले वह वर देता हूँ जिससे तुम्हारे शरीरका वर्ण सुन्दर हो जाय तथा तुम त्रिलोकीमें देखनेयोग्य हो जाओ॥ ९१॥
सूत उवाच<br>ततः स लब्ध्वा तु वरं शरीरेणाक्षतेन च।<br>पादयोः प्रणतस्तस्थौ कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ ९२<br>उवाचाथ तदा तेन वरदोऽस्मीति चोदितः।<br>भगवन् भक्तिमव्यग्रां त्वय्यननन्यां विधत्स्व मे॥ ९३<br>अन्नदत्वं च लोकानां गाणपत्यं तथाक्षयम्।<br>अविमुक्तं च ते स्थानं पश्येयं सर्वदा यथा॥ ९४<br>एतदिच्छामि देवेश त्वत्तो वरमनुत्तमम्॥ ९५सूतजी कहते हैं— ऋषियो! तत्पश्चात् वरदान पाकर वह अक्षत शरीरसे युक्त हो चरणोंपर गिर पड़ा, फिर मस्तकपर हाथ जोड़कर सम्मुख खड़ा हो गया और बोला—'भगवन्! आपने मुझसे कहा है कि 'मैं वरदाता हूँ' तो मुझे ऐसा वरदान दीजिये कि आपमें मेरी अनन्य एवं अटल भक्ति हो जाय। मैं अक्षय अन्नका दाता तथा लोकोंके गणोंका अधीश्वर हो जाऊँ, जिससे आपके अविमुक्त स्थानका सर्वदा दर्शन करता रहूँ। देवेश! मैं आपसे यही उत्तम वर प्राप्त करना चाहता हूँ॥ ९२-९५॥
देवदेव उवाच<br>जरामरणसंत्यक्तः सर्वरोगविवर्जितः।<br>भविष्यसि गणाध्यक्षो धनदः सर्वपूजितः॥ ९६<br>अजेयश्चापि सर्वेषां योगैश्वर्यं समाश्रितः।<br>अन्नदश्चापि लोकेभ्यः क्षेत्रपालो भविष्यसि॥ ९७<br>महाबलो महासत्त्वो ब्रह्मण्यो मम च प्रियः।<br>त्र्यक्षश्च दण्डपाणिश्च महायोगी तथैव च॥ ९८<br>उद्भ्रमः सम्भ्रमश्चैव गणौ ते परिचारकौ।<br>तवाज्ञया करिष्येते लोकस्योद्भ्रमसम्भ्रमौ॥ ९९देवदेवने कहा— यक्ष! तुम जरा-मरणसे विमुक्त, सम्पूर्ण रोगोंसे रहित, सबके द्वारा सम्मानित धनदाता गणाध्यक्ष होओगे। तुम सभीके लिये अजेय, योगैश्वर्यसे युक्त, लोकोंके लिये अन्नदाता, क्षेत्रपाल, महाबली, महान् पराक्रमी, ब्राह्मणभक्त, मेरा प्रिय, त्रिनेत्रधारी, दण्डपाणि तथा महायोगी होओगे। उद्भ्रम और सम्भ्रम—ये दोनों गण तुम्हारे सेवक होंगे। ये उद्भ्रम और सम्भ्रम तुम्हारी आज्ञासे लोकका कार्य करेंगे॥ ९६-९९॥
सूत उवाच<br>एवं स भगवांस्तत्र यक्षं कृत्वा गणेश्वरम्।<br>जगाम वासं देवेशः सह तेन महेश्वरः॥ १००सूतजी कहते हैं— ऋषियो! इस प्रकार देवेश भगवान् महेश्वर वहाँ उस यक्षको गणेश्वर बनाकर उसके साथ अपने निवासस्थानको लौट गये॥ १००॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये दण्डपाणिवरप्रदानं नामाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके वाराणसी-माहात्म्यमें दण्डपाणि-वरप्रदान नामक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८०॥