मत्स्य महापुराण

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| * अध्याय १७९ * | ७४३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अजिता सूक्ष्महृदया वृद्धा वेशाश्मदर्शना।<br>नृसिंहभैरवा बिल्वा गरुत्मद्धृदया जया॥ ७१<br>भवमालिन्यनुचरा इत्यष्टौ नृप मातरः।<br>आकर्णनी सम्भटा च तथैवोत्तरमालिका॥ ७२<br>ज्वालामुखी भीषणिका कामधेनुश्च बालिका।<br>तथा पद्मकरा राजन् रेवत्यनुचराः स्मृताः॥ ७३<br>अष्टौ महाबलाः सर्वा देवगात्रसमुद्भवाः।<br>त्रैलोक्यसृष्टिसंहारसमर्थाः सर्वदेवताः॥ ७४ | नरेश! अजिता, सूक्ष्महृदया, वृद्धा, वेशाश्मदर्शना, नृसिंहभैरवा, बिल्वा, गरुत्मद्धृदया और जया—ये आठों मातृकाएँ भवमालिनीकी अनुचरी हैं। राजन्! आकर्णनी, सम्भटा, उत्तरमालिका, ज्वालामुखी, भीषणिका, कामधेनु, बालिका तथा पद्मकरा—ये शुष्करेवतीकी अनुचरी कही जाती हैं। आठ-आठके विभागसे भगवान्के शरीरसे उद्भूत हुई ये सभी देवियाँ महान् बलवती तथा त्रिलोकीके सृजन और संहारमें समर्थ थीं॥ ६३—७४॥ |
| ताः सृष्टमात्रा देवेन क्रुद्धा मातृगणस्य तु।<br>प्रधाविता महाराज क्रोधविस्फारितेक्षणाः॥ ७५<br>अविसह्यतमं तासां दृष्टितेजः सुदारुणम्।<br>तमेव शरणं प्राप्ता नृसिंहो वाक्यमब्रवीत्॥ ७६ | महाराज! भगवान् विष्णुद्वारा प्रकट किये जाते ही वे देवियाँ कुपित हो मातृकाओंकी ओर क्रोधवश आँखें फाड़कर देखती हुई उनपर टूट पड़ीं। उन देवियोंके नेत्रोंका तेज अत्यन्त भीषण और सर्वथा असह्य था, इसलिये वे मातृकाएँ भगवान् नृसिंहकी शरणमें आ पड़ीं। तब भगवान् नरसिंहने उनसे इस प्रकार कहा— |
| यथा मनुष्याः पशवः पालयन्ति चिरात् सुतान्।<br>जयन्ति ते तथैवाशु यथा वै देवतागणाः॥ ७७<br>भवत्यस्तु तथा लोकान् पालयन्तु मयेरिताः।<br>मनुजैश्च तथा देव्यैर्यजध्वं त्रिपुरान्तकम्॥ ७८<br>न च बाधा प्रकर्तव्या ये भक्तास्त्रिपुरान्तके।<br>ये च मां संस्मरन्तीह ते च रक्ष्याः सदा नराः॥ ७९<br>बलिकर्म करिष्यन्ति युष्माकं ये सदा नराः।<br>सर्वकामप्रदास्तेषां भविष्यध्वं तथैव च॥ ८० | ‘जिस प्रकार मनुष्य और पशु चिरकालसे अपनी संतानका पालन-पोषण करते आ रहे हैं और जिस प्रकार शीघ्र दोनों देवताओंको वशमें कर लेते हैं, उसी तरह तुमलोग मेरे आदेशानुसार समस्त लोकोंकी रक्षा करो। मनुष्य तथा देवता सभी त्रिपुरहन्ता शिवजीका यजन करें। जो लोग शंकरजीके भक्त हैं, उनके प्रति तुमलोगोंको कोई बाधा नहीं करनी चाहिये। इस लोकमें जो मनुष्य मेरा स्मरण करते हैं, वे तुमलोगोंद्वारा सदा रक्षणीय हैं। जो मनुष्य सदा तुमलोगोंके निमित्त बलिकर्म करेंगे, तुमलोग उनके सभी मनोरथ पूर्ण करो। |
| उच्छासनादिकं ये च कथयन्ति मयेरितम्।<br>ते च रक्ष्याः सदा लोका रक्षितव्यं च शासनम्॥ ८१<br>रौद्रीं चैव परां मूर्तिं महादेवः प्रदास्यति।<br>युष्मन्मुख्या महादेव्यस्तदुक्तं परिरक्ष्यथ॥ ८२ | जो लोग मेरे इस चरित्रका कथन करेंगे, उन लोगोंकी सदा रक्षा तथा मेरे आदेशका भी पालन करना चाहिये। तुमलोगोंमें जो मुख्य महादेवियाँ हैं, उन्हें महादेवजी अपनी परमोत्कृष्ट रौद्री मूर्ति प्रदान करेंगे। तुमलोगोंको उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। |
| मया मातृगणः सृष्टो योऽयं विगतसाध्वसः।<br>एष नित्यं विशालाक्षो मयैव सह रंस्यते॥ ८३<br>मया सार्धं तथा पूजां नरेभ्यश्चैव लप्स्यथ।<br>पृथक् सुपूजिता लोके सर्वान् कामान् प्रदास्यथ॥ ८४ | लज्जा और भयसे रहित हो मैंने जो इस मातृगणकी सृष्टि की है, यह विशाल नेत्रोंवाला दल नित्य मेरे साथ ही निवास करेगा तथा मेरे साथ इसे मनुष्योंद्वारा प्रदान की गयी पूजा भी प्राप्त होती रहेगी। लोगोंद्वारा पृथक्-रूपसे सुपूजित होनेपर ये देवियाँ सभी कामनाएँ प्रदान करेंगी। |