देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
About this granth
The Shrimad Devi Bhagavata Mahapurana (श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण) is the central Purana of the Shakta tradition and is traditionally ascribed to Veda Vyasa. In eighteen thousand verses and twelve books it presents the primordial goddess as the supreme Brahman and the source of creation, preservation and dissolution; Shakta tradition counts it among the Mahapuranas.
This is the first volume of the Gita Press, Gorakhpur edition (book code 1897), giving books 1 to 6 in Sanskrit with a simple Hindi exposition and illustrations. It opens with the Mahatmya, the half-verse summary of the Purana, and instructions for ritual recitation. These books include the slaying of Madhu and Kaitabha, the birth of Shuka, the vision of the goddess in Manidvipa granted to Brahma, Vishnu and Shiva, the Navaratri vow, and the defeat of Mahishasura and of Shumbha and Nishumbha.
The imprint records this as the first edition of Samvat 2067 (2010), printed in 10,000 copies. Prepared with devotees and Navaratri recitation in mind, the volume has 889 pages.
| अ० २३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८३५ |
|---|
| इत्येतत्कथितं सर्वं कारणं मम दुःखजम्।<br><br>कस्त्वं कस्य सुतश्चेति वद वीर यथा तथा॥ ६५ | हे वीर ! इस प्रकार मैंने अपने दुःखी होनेका समस्त कारण आपको बता दिया। अब जिस प्रकार मैंने आपको अपने विषयमें बताया, उसी प्रकार आप भी बताइये कि आप कौन हैं तथा किसके पुत्र हैं ? ॥ ६५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैकवीराय यशोवत्यैकावलीमोचनाय देवीस्वप्नवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षित एकवीरद्वारा कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकी परम्परा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा रमापुत्रः प्रतापवान्।<br>प्रफुल्लवदनाम्भोजस्तामुवाच विशांपते॥ १ | व्यासजी बोले— हे राजन्! उस यशोवतीकी बात सुनकर लक्ष्मीपुत्र प्रतापी एकवीरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा और वे उससे कहने लगे— ॥ १ ॥ |
| राजोवाच<br>रम्भोरु यस्त्वया पृष्टो वृत्तान्तो विशदाक्षरः।<br>हैहयोऽहं चैकवीरनाम्ना सिन्धुसुतासुतः॥ २ | राजा बोले— हे रम्भोरु! जो तुमने सुन्दर वाणीमें मेरा वृत्तान्त पूछा है, वह सुनो। एकवीर नामसे प्रसिद्ध लक्ष्मीपुत्र हैहय मैं ही हूँ॥ २ ॥ |
| मनो मे यत्त्वया नूनं परतन्त्रं कृतं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि विरहेणातिपीडितः॥ ३ | [एकावलीके विषयमें वर्णन करके] तुमने मेरे मनको परतन्त्र बना दिया है। विरहसे अत्यन्त पीडित मैं अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? ॥ ३ ॥ |
| प्रथमं रूपमाख्यातं सर्वलोकातिगं त्वया।<br>तेन मे विह्वलं जातं कामबाणहतं मनः॥ ४ | तुमने सर्वप्रथम एकावलीके सम्पूर्ण लोकको तिरस्कृत कर देनेवाले रूपका जो वर्णन किया है, उससे मेरा मन कामबाणसे आहत होकर व्याकुल हो उठा है॥ ४॥ |
| ततस्तस्या गुणाः प्रोक्तास्तैस्तु चित्तं हृतं पुनः।<br>यत्त्वयोक्तं पुनर्वाक्यं तेन मे विस्मयोऽभवत्॥ ५ | तत्पश्चात् तुमने उसके जिन गुणोंका मुझसे वर्णन किया है, उनके द्वारा मेरा चित्त हर लिया गया है। पुनः तुमने जो बात कही, इससे मुझे बहुत विस्मय हो गया है। दानव कालकेतुके सामने एकावलीने यह बात कही थी कि मैं हैहयका वरण कर चुकी हूँ, उसके अतिरिक्त मैं किसी अन्यका वरण नहीं कर सकती; यह मेरा निश्चय है। हे तन्वंगि! एकावलीके इस कथनके द्वारा तुमने मुझे उसका दास बना दिया है। हे सुन्दर केशोंवाली! तुम्हीं बताओ, अब मैं तुम दोनोंके लिये क्या करूँ ? ॥ ५—७ ॥ |
| एकावल्या वचः प्रोक्तं दानवाग्रे मया वृतः।<br>हैहयस्तं विना नान्यं वृणोमीति विनिश्चयः॥ ६ | |
| तेन वाक्येन तन्वङ्गि भृत्योऽहमधुना कृतः।<br>त्वया तस्याः सुकेशान्ते ब्रूहि किं करवाणि वाम्॥ ७ |
| ८३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
|---|
| स्थानं तस्य न जानामि राक्षसस्य दुरात्मनः।<br>गतिर्मे नास्ति गमने पुरे तस्मिन्सुलोचने॥ ८<br><br>वद मां त्वं विशालाक्षि तत्र प्रापयितुं क्षमा।<br>प्रापयाशु सखी ते सा यत्र तिष्ठति सुन्दरी॥ ९ | हे सुलोचने! मैं उस दुष्टात्मा राक्षस कालकेतुके स्थानको नहीं जानता। और फिर उस नगरतक पहुँच सकनेकी मेरी सामर्थ्य भी नहीं है। हे विशाल नयनोंवाली! अब तुम्हीं उपाय बताओ। मुझे वहाँ पहुँचानेमें तुम्हीं समर्थ हो। अतएव जहाँ तुम्हारी सुन्दर सखी एकावली विराजमान है, वहाँ मुझे शीघ्र पहुँचाओ॥ ८-९॥ |
| हत्वा तं राक्षसं क्रूरं मोचयिष्यामि साम्प्रतम्।<br>विवशां शोकसन्तप्तां राजपुत्रीं तव प्रियाम्॥ १० | उस क्रूर राक्षसका वध करके मैं इसी समय विवश तथा शोक-सन्तप्त तुम्हारी प्रिय सखी राजकुमारी एकावलीको मुक्त करा लूँगा॥ १०॥ |
| विमुक्तदुःखां कृत्वाशु प्रापयिष्यामि ते पुरम्।<br>पित्रे चास्याः प्रदास्यामि कन्यामेकावलीमहम्॥ ११ | राजकुमारी एकावलीको संकटसे मुक्ति दिलाकर शीघ्र ही उसे तुम्हारे पुरमें पहुँचा दूँगा और उसके पिताको सौंप दूँगा॥ ११॥ |
| पश्चाद्विवाहं कर्तासौ राजा पुत्र्याः परन्तपः।<br>एवं ते मनसः कामो मम चापि प्रियंवदे॥ १२<br><br>भविष्यति स सम्पूर्णः साधनेन तवाधुना।<br>दर्शयाशु पुरं तस्य पश्य मे त्वं पराक्रमम्॥ १३<br><br>यथा हन्मि दुराचारं परदारापहारकम्।<br>तथा कुरु प्रियं कर्तुं शक्तासि वरवर्णिनि॥ १४<br><br>मार्गं दर्शय तस्याद्य पुरस्य दुर्गमस्य च। | तत्पश्चात् शत्रुतापक राजा रैभ्य अपनी पुत्रीका विवाह कर सकेंगे। हे प्रियंवदे! इस प्रकार तुम्हारे सहयोगसे मेरे तथा तुम्हारे मनकी कामना अब पूरी हो जायगी। तुम मुझे उस कालकेतुका नगर शीघ्र दिखा दो, फिर मेरा पराक्रम देखो। हे वरवर्णिनि! मैं जिस प्रकार उस दुराचारी तथा परस्त्रीका हरण करनेवाले कालकेतुका वध कर सकूँ, तुम वैसा ही उपाय करो; क्योंकि तुम हित-साधन करनेमें पूर्ण सक्षम हो। उस दानवके दुर्गम नगरका मार्ग तुम मुझे आज ही दिखाओ॥ १२-१४॥ |
| व्यास उवाच<br><br>तन्निशम्य प्रियं वाक्यं मुदिता च यशोवती॥ १५<br><br>तमुवाच रमापुत्रं गमनोपायमादरात्।<br>मन्त्रं गृहाण राजेन्द्र भगवत्यास्तु सिद्धिदम्॥ १६<br><br>दर्शयिष्यामि तस्याद्य पुरं राक्षसपालितम्।<br>सज्जो भव महाभाग गमनाय मया सह॥ १७<br><br>सैन्येन महता युक्तस्तत्र युद्धं भविष्यति।<br>कालकेतुर्महावीरो राक्षसैर्बलिभिर्वृतः॥ १८<br><br>तस्मान्मन्त्रं गृहीत्वा त्वं व्रज तत्र मया सह।<br>दर्शयिष्यामि ते मार्गं पुरस्यास्य दुरात्मनः॥ १९<br><br>हत्वा तं पापकर्माणं मोचयाशु च मे सखीम्। | **व्यासजी बोले—**एकवीरकी यह प्रिय वाणी सुनकर यशोवती प्रसन्न हो गयी और वह लक्ष्मीपुत्र एकवीरसे नगर पहुँचनेका उपाय आदरपूर्वक बताने लगी—हे राजेन्द्र! पहले आप भगवती जगदम्बाके सिद्धिप्रदायक मन्त्रको ग्रहण कीजिये। तत्पश्चात् मैं आपको अनेक राक्षसोंद्वारा रक्षित उस कालकेतुका नगर आज ही दिखाऊँगी। हे महाभाग! एक विशाल सेनासे युक्त होकर आप मेरे साथ वहाँ चलनेके लिये तैयार हो जाइये। वहाँ युद्ध होगा। कालकेतु स्वयं महापराक्रमी है तथा बलवान् राक्षसोंसे युक्त रहता है। अतएव भगवतीका मन्त्र ग्रहण करके ही आप मेरे साथ वहाँ चलिये। मैं उस दुष्टात्माके नगरका मार्ग आपको दिखाऊँगी। अब आप उस पापकर्मपरायण दानवको मारकर मेरी सखीको शीघ्र मुक्त कीजिये॥ १५-१९॥ |
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३७
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा तद्वचनं वीरो मन्त्रं जग्राह सत्वरः॥ २०<br>दत्तात्रेयाद्दैवयोगात्प्राप्ताज्ज्ञानिवराच्छुभात् ।<br>योगेश्वरीमहामन्त्रं त्रिलोकीतिलकाभिधम्॥ २१ | उसका यह वचन सुनकर एकवीरने वहाँपर दैवयोगसे पधारे हुए पुण्यात्मा तथा ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ दत्तात्रेयजीसे त्रिलोकीका तिलक कहे जानेवाले योगेश्वरीके महामन्त्रको उसी क्षण ग्रहण कर लिया॥ २०-२१॥ |
| तेन सर्वज्ञता जाता सर्वान्तश्चारिता तथा।<br>तया सह जगामाशु पुरं तस्य सुदुर्गमम्॥ २२ | उस मन्त्रके प्रभावसे एकवीरको सब कुछ जानने तथा सर्वत्र गमनकी क्षमता प्राप्त हो गयी। इसके बाद वे यशोवतीके साथ कालकेतुके दुर्गम नगरके लिये शीघ्र प्रस्थित हुए॥ २२॥ |
| रक्षितं राक्षसैर्घोरैः पातालमिव पन्नगैः।<br>यशोवत्या च सैन्येन महता संयुतो नृपः॥ २३ | वह नगर राक्षसोंद्वारा इस प्रकार सुरक्षित था, जैसे सर्पोंद्वारा पातालकी निरन्तर सुरक्षा होती रहती है। कालकेतुके ऐसे नगरमें अब यशोवती तथा विशाल सेनाके साथ राजा एकवीर आ गये॥ २३॥ |
| तमायान्तं समालोक्य दूतास्तस्य भयातुराः।<br>क्रोशन्तोऽभिययुः पार्श्वं कालकेतोस्तरस्विनः॥ २४ | एकवीरको आते देखकर कालकेतुके दूत भयसे व्यग्र हो गये और चीखते-चिल्लाते हुए बड़ी तेजीसे भागकर उसके पास पहुँचे॥ २४॥ |
| तमूचुः सहसा मत्वा राक्षसं काममोहितम्।<br>एकावलीसमीपस्थं कुर्वन्तं विनयान्बहून्॥ २५ | उस समय एकावलीके पास बैठकर अनेकविध विनती कर रहे कालकेतुको अत्यन्त काममोहित समझकर दूत एकाएक उससे कहने लगे॥ २५॥ |
| दूता ऊचुः<br>राजन् यशोवती नारी कामिन्याः सहचारिणी।<br>आयाति सह सैन्येन राजपुत्रेण संयुता॥ २६ | **दूतोंने कहा—**हे राजन्! इस कामिनीकी सहचारिणी जो यशोवती नामकी स्त्री है, वह एक राजकुमारके साथ विशाल सेना लेकर आ रही है॥ २६॥ |
| जयन्तो वा महाराज कार्तिकेयोऽथवा नु किम्।<br>आगच्छति बलोन्मत्तो वाहिनीसहितः किल॥ २७ | हे महाराज! पता नहीं, वह जयन्त है अथवा कार्तिकेय। बलके अभिमानसे मत्त वह राजकुमार सेनाके साथ चला आ रहा है॥ २७॥ |
| संयत्तो भव राजेन्द्र संग्रामः समुपस्थितः।<br>देवपुत्रेण युध्यस्व त्यज वा कमलेक्षणाम्॥ २८ | हे राजेन्द्र! अब आप सावधान हो जाइये; क्योंकि युद्धकी स्थिति सामने आ गयी है। अब आप या तो इस देवपुत्रके साथ युद्ध कीजिये अथवा इस कमलनयनीको मुक्त कर दीजिये॥ २८॥ |
| इतो दूरेऽस्ति सैन्यं तद्योजनत्रयमात्रतः।<br>सज्जो भव महीपाल दुन्दुभिं घोषयाशु वै॥ २९ | उसकी सेना यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर है। अतएव हे राजन्! अब आप तैयार हो जाइये और रण-दुंदुभी बजानेकी तुरंत आज्ञा दीजिये॥ २९॥ |
| व्यास उवाच<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसः क्रोधमूर्च्छितः।<br>राक्षसान्प्रेरयामास सायुधान्सबलान्बहून्॥ ३०<br>गच्छध्वं राक्षसाः सर्वे सम्मुखाः शस्त्रपाणयः। | **व्यासजी बोले—**दूतोंके मुखसे वैसी बात सुनकर कालकेतु क्रोधसे मूर्च्छित हो गया। उसने अपने सभी बलवान् तथा शस्त्रधारी राक्षसोंको उत्साहित करते हुए कहा—हे राक्षसो! तुम सब हाथोंमें शस्त्र लेकर शत्रुके सामने जाओ॥ ३० १/२॥ |
८३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तानाज्ञाप्य कालकेतुः पप्रच्छ प्रणयान्वितः ॥ ३१<br>एकावलीं समीपस्थां विवशां भृशदुःखिताम्।<br>कोऽयमायाति तन्वङ्गि पिता ते वापरो पुमान् ॥ ३२<br>त्वदर्थे सैन्यसंयुक्तो ब्रूहि सत्यं कृशोदरि।<br>पिता ते यदि सम्प्राप्तो नेतुं त्वां विरहातुरः ॥ ३३<br>ज्ञात्वा ते पितरं सम्यक् संग्रामं न करोम्यहम्।<br>आनयित्वा गृहे पूजां रत्नैर्वस्त्रैर्हयैः शुभैः ॥ ३४<br>करोमि तस्य चातिथ्यं गृहे प्राप्तस्य सर्वथा।<br>अन्यश्चेद्यदि सम्प्राप्तस्तं हन्मि निशितैः शरैः ॥ ३५<br>आनीतः किल कालेन मरणाय महात्मना।<br>तस्माद्वद विशालाक्षि कोऽयमायाति मन्दधीः ॥ ३६<br>अज्ञात्वा मां दुराधर्षं कालरूपं महाबलम्। | उन्हें आज्ञा देकर कालकेतुने अपने निकट बैठी हुई अत्यन्त विवश तथा दुःखित एकावलीसे विनयप्रता-पूर्वक पूछा—'हे तन्वंगि! तुम्हें लेनेके लिये सेनासहित यह कौन आ रहा है? ये तुम्हारे पिता हैं अथवा कोई अन्य पुरुष? हे कृशोदरि! सच-सच बताओ। यदि विरहसे व्यथित होकर तुम्हारे पिता तुम्हें लेनेके लिये आ रहे हों, तो यह जानकर कि ये तुम्हारे पिता हैं, मैं इनके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अपितु उन्हें घर लाकर उनकी पूजा करूँगा तथा बहुमूल्य रत्न, वस्त्र तथा अश्व भेंट करके घरमें आये हुए उनका विधिवत् आतिथ्य करूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति आया होगा तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसे मार डालूँगा। निश्चित ही महान् कालने उसे मरनेके लिये यहाँ ला दिया है। अतएव हे विशाल नयनोंवाली! मुझ अपराजेय, कालरूप तथा अपार बलसम्पन्नके विषयमें न जानकर यह कौन मन्दमति चला आ रहा है? यह तुम मुझे बताओ' ॥ ३१-३६ ½ ॥ |
| एकावल्युवाच<br>न जानेऽहं महाभाग कोऽयमायाति सत्वरः ॥ ३७<br>न मेऽस्ति विदितः कोऽपि स्थितायास्तव बन्धने।<br>नायं पिता मे न भ्राता कोऽप्यन्योऽस्ति महाबलः ॥ ३८<br>किमर्थमिह चायाति नाहं वेद विनिश्चयम्। | एकावली बोली—हे महाभाग! मैं यह नहीं जानती कि इतनी तेजीसे यह कौन आ रहा है? आपके बन्धनमें पड़ी हुई मैं नहीं जानती कि यह कौन है? ये न तो मेरे पिता हैं और न मेरे भाई ही। यह दूसरा ही कोई महान् पराक्रमी पुरुष है, यह किसलिये यहाँ आ रहा है, यह भी मैं निश्चितरूपसे नहीं जानती ॥ ३७-३८ ½ ॥ |
| दैत्य उवाच<br>एवं वदन्त्यमी दूता वयस्या ते यशोवती ॥ ३९<br>समानीय च तं वीरमागतेति कृतोद्यमा।<br>क्व गता सा सखी कान्ते विदग्धा कार्यनिश्चये ॥ ४०<br>नान्यः कोऽपि ममारातिर्यो मे प्रतिबलो भवेत्। | दैत्य बोला—ये दूत तो कह रहे हैं कि तुम्हारी सखी यशोवती ही प्रयत्नपूर्वक उस वीरको साथमें लेकर आयी है। हे कान्ते! कार्य सिद्ध करनेमें अत्यन्त चतुर तुम्हारी वह सखी कहाँ गयी? कोई अन्य मेरा शत्रु भी नहीं है, जो मेरा विरोधी हो ॥ ३९-४० ½ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे दूतास्तत्रान्ये वै समागताः ॥ ४१<br>ते होचुस्त्वरिता भीताः कालकेतुं गृहे स्थितम्।<br>किं स्वस्थोऽसि महाराज समीपे सैन्यमागतम् ॥ ४२<br>निर्गच्छ नगरात्तूर्णं सैन्येन महतावृत्तः।<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा कालकेतुर्महाबलः ॥ ४३<br>रथमारुह्य त्वरितो निर्ययौ स्वपुराद् बहिः। | व्यासजी बोले—इसी बीच दूसरे दूत वहाँ आ गये। भयभीत उन दूतोंने महलमें बैठे कालकेतुसे तुरंत कहा—हे महाराज! आप निश्चिन्त क्यों हैं? शत्रुसेना समीप आ पहुँची है। आप एक विशाल सेनाके साथ शीघ्र ही नगरसे बाहर निकलिये। उनकी यह बात सुनकर महान् बलशाली कालकेतु शीघ्र ही रथपर चढ़कर अपने नगरसे बाहर निकल गया ॥ ४१-४३ ½ ॥ |
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३९
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३९
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकवीरोऽपि सहसा हयारूढः प्रतापवान् ॥ ४४<br>आगतस्तत्र कामिन्या विरहेण समाकुलः।<br>युद्धं तयोरभूत्तत्र वृत्रवासवयोरिव ॥ ४५<br>शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । | कामिनी एकावलीके विरहसे व्याकुल प्रतापी एकवीर भी घोड़ेपर आरूढ़ होकर अचानक वहींपर आ गया। उन दोनोंका वृत्रासुर तथा इन्द्रकी भाँति युद्ध होने लगा। उस युद्धमें छोड़े गये विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं ॥ ४४-४५ १/२ ॥ |
| वर्तमाने तदा युद्धे कातराणां भयावहे ॥ ४६<br>गदया ताडयामास दैत्यं सिन्धुसुतासुतः।<br>स गतासुः पपातोर्व्यां वज्राहत इवाचलः ॥ ४७<br>पलायित्वा गताः सर्वे राक्षसा भयपीडिताः। | भीरुजनोंको भयभीत कर देनेवाले उस युद्धमें लक्ष्मीपुत्र एकवीरने दानव कालकेतुपर अपनी गदासे प्रहार किया। गदाप्रहारसे वह कालकेतु वज्रसे आहत पर्वतकी भाँति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब भयभीत होकर अन्य सभी राक्षस भाग गये ॥ ४६-४७ १/२ ॥ |
| यशोवती ततो गत्वा वेगादेकावलीं तदा ॥ ४८<br>उवाच मधुरां वाणीं विस्मितां मुदिता भृशम्।<br>एह्यालि नृपपुत्रेण दानवोऽसौ निपातितः ॥ ४९<br>एकवीरेण धीरेण युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ।<br>स्कन्धावारेऽप्यसौ राजा तिष्ठत्यद्य श्रमातुरः ॥ ५०<br>दर्शनं काङ्क्षमाणस्ते श्रुतरूपगुणस्तव ।<br>पश्य तं कुटिलापाङ्गि मनोभवसमं नृपम् ॥ ५१<br>कथिता त्वं मया पूर्वं तस्याग्रे जाह्नवीतटे ।<br>पूर्णानुरागः सञ्जातस्तेनासौ विरहातुरः ॥ ५२<br>वाञ्छति त्वां चारुरूपां द्रष्टुं नृपतिनन्दनः। | तत्पश्चात् यशोवतीने विस्मयमें पड़ी एकावलीके पास जाकर प्रसन्नतापूर्वक मधुर वाणीमें उससे कहा— हे सखि ! इधर आओ। कालकेतुके साथ भीषण युद्ध करके धीरतासम्पन्न राजकुमार एकवीरने उस राक्षसको मार गिराया है। इस समय वे राजकुमार एकवीर थक जानेके कारण अपने शिविरमें विद्यमान हैं। तुम्हारे रूप तथा गुणोंके विषयमें सुनकर वे तुम्हारा दर्शन करना चाहते हैं। हे कुटिलापांगि ! कामदेवसदृश उन राजकुमारको तुम देखो। मैं उनसे तुम्हारे विषयमें गंगातटपर पहले ही बता चुकी हूँ। इससे तुम्हारे प्रति उनका पूर्ण अनुराग हो जानेके कारण वे विरहातुर राजकुमार अब तुझ सुन्दर रूपवालीका दर्शन करना चाहते हैं ॥ ४८-५२ १/२ ॥ |
| सा तस्या वचनं श्रुत्वा गमनाय मनो दधे ॥ ५३<br>लज्जमाना भृशं भीत्या कौमारं प्राप्तया तया ।<br>कथं तस्य मुखं द्रक्ष्ये कुमारी ह्यवशा भृशम् ॥ ५४<br>स मां गृह्णाति कामार्त इति चिन्ताकुला सती ।<br>यशोवत्या युता तत्र नरयानस्थिता ययौ ॥ ५५<br>स्कन्धावारेऽतिमलिना मलिनाम्बरधारिणी । | यशोवतीकी बात सुनकर उसने वहाँ जानेका मन बना लिया। कुमारी अवस्थामें होनेके कारण वह भयवश लज्जित हो रही थी। [वह सोचने लगी] मैं एक अत्यन्त विवश कुमारी कन्या उनका मुख कैसे देखूँगी ? वह साध्वी एकावली इस बातसे चिन्तित हो उठी कि वे कामासक्त राजकुमार मुझे ग्रहण कर लेंगे। तब वह एकावली मलिन वस्त्र धारण करके अत्यन्त उदास होकर पालकीमें बैठकर यशोवतीके साथ उनके शिविरमें पहुँच गयी ॥ ५३-५५ १/२ ॥ |
| तामागतां विशालाक्षीं दृष्ट्वा राजसुतोऽब्रवीत् ॥ ५६<br>दर्शनं देहि तन्वङ्गि तृषिते नयने मम । | उस विशाल नयनोंवाली एकावलीको वहाँ आयी हुई देखकर राजकुमारने उससे कहा—हे तन्वंगि ! मुझे दर्शन दो। मेरे नेत्र तुम्हारे दर्शनके लिये तृष्णाकुल हैं ॥ ५६ १/२ ॥ |
८४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
| कामातुरं च तं वीक्ष्य तां च लज्जाभरावृताम् ॥ ५७ <br><br> नीतिज्ञा शिष्टमार्गज्ञा तमुवाच यशोवती ।<br>राजपुत्र पिताप्यस्यास्त्वामेनां दातुमिच्छति ॥ ५८ <br><br> एषापि त्वद्वशा नूनं भविता सङ्गमस्तव ।<br>कालं प्रतीक्ष्य राजेन्द्र नयैनां पितुरन्तिकम् ॥ ५९ <br><br> स विवाहविधिं कृत्वा दास्यतीति विनिश्चयः । | एकवीरको कामातुर तथा एकावलीको लज्जासे युक्त देखकर नीतिका ज्ञान रखनेवाली तथा श्रेष्ठजनोंके मार्गका अनुसरण करनेवाली यशोवतीने उस एकवीरसे कहा—हे राजकुमार! इसके पिता भी इसे आपको ही देना चाहते हैं। यह एकावली भी आपके वशीभूत है; इसलिये इसके साथ आपका मिलन अवश्य होगा, किंतु हे राजेन्द्र! कुछ समय प्रतीक्षा करके पहले इसे इसके पिताके पास पहुँचा दीजिये। वे विधिपूर्वक विवाह करके इसे आपको निश्चितरूपसे सौंप देंगे॥ ५७-५९ १/२॥ |
| स तस्या वचनं तथ्यं मत्वा सैन्यसमन्वितः ॥ ६० <br><br> समेतः कामिनीभ्यां तु ययौ तत्पितुराश्रमम् । | यशोवतीकी बातको उचित मानकर उन दोनों कन्याओं—एकावली तथा यशोवतीको साथमें लेकर सेनासहित वे राजकुमार एकवीर उसके पिताके स्थानपर पहुँचे॥ ६० १/२॥ |
| राजपुत्रीं तथायातां श्रुत्वा प्रेमसमन्वितः ॥ ६१ <br><br> प्रययौ सम्मुखस्तूर्णं सचिवैः परिवेष्टितः ।<br>बहुभिर्दिवसैर्दृष्टा पुत्री सा मलिनाम्बरा ॥ ६२ <br><br> यशोवत्या तु वृत्तान्तः कथितो विस्तरात्पुनः ।<br>एकवीरं मिलित्वासौ गृहानीय चादरात् ॥ ६३ <br><br> पुण्येऽह्नि कारयामास विवाहं विधिपूर्वकम् ।<br>पारिबर्हं ततो दत्त्वा सम्पूज्य विधिवत्तदा ॥ ६४ <br><br> पुत्रीं विसर्जयामास यशोवत्या समन्विताम् । | राजपुत्रीको आयी हुई सुनकर राजा रैभ्य प्रेमपूर्वक मन्त्रियोंके साथ उसके सम्मुख शीघ्रतासे पहुँच गये। मलिन वस्त्र धारण की हुई उस पुत्रीको राजाने बहुत दिनोंके बाद देखा, पुनः यशोवतीने रैभ्यको सारा वृत्तान्त विस्तारके साथ बताया। तत्पश्चात् एकवीरसे मिलकर राजा रैभ्य उन्हें आदरपूर्वक घर ले आये। पुनः उन्होंने शुभ दिनमें विधिविधानसे दोनोंका विवाह सम्पन्न कराया। तदुपरान्त राजाने पर्याप्त वैवाहिक उपहार देकर एकवीरको भलीभाँति सम्मानित करके पुत्रीको यशोवतीसहित विदा कर दिया॥ ६१-६४ १/२॥ |
| एवं विवाहे संवृत्ते रमापुत्रो मुदान्वितः ॥ ६५ <br><br> गृहं प्राप्य बहून्भोगान्बुभुजे प्रियया समम् ।<br>बभूव तस्यां पुत्रस्तु कृतवीर्याभिधः किल ।<br>तत्सूनुः कार्तवीर्यस्तु वंशोऽयं कथितो मया ॥ ६६ | इस प्रकार विवाह हो जानेपर लक्ष्मीपुत्र एकवीर हर्षित हो गये और घर पहुँचकर अपनी भार्या एकावलीके साथ नानाविध सुखोपभोग करने लगे। यथासमय उस एकावलीसे कृतवीर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्य हुए। इस प्रकार मैंने आपसे इस हैहयवंशका वर्णन कर दिया॥ ६५-६६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीरैकावल्योर्विवाहवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
अ० २४ ] षष्ठ स्कन्ध ८४१
अ० २४ ] षष्ठ स्कन्ध ८४१
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके जन्मकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजोवाच<br>भगवंस्त्वन्मुखाम्भोजाच्च्युतं दिव्यकथारसम्।<br>न तृप्तिमधिगच्छामि पिबंस्तु सुधया समम्॥ १ | राजा बोले— हे भगवन्! आपके मुखारविन्दसे निर्गत इस अमृततुल्य दिव्य कथारसका निरन्तर पान करते रहनेपर भी मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ १॥ |
| विचित्रमिदमाख्यानं कथितं भवता मम।<br>हैहयानां समुत्पत्तिर्विस्तराद्विस्मयप्रदा॥ २ | आपके द्वारा मुझसे यह विचित्र आख्यान विस्तारपूर्वक कहा गया; हैहयवंशी राजाओंकी उत्पत्ति तो अत्यन्त आश्चर्यजनक है॥ २॥ |
| परं कौतूहलं मेऽत्र यद्विष्णुः कमलापतिः।<br>देवदेवो जगन्नाथः सृष्टिस्थित्यन्तकारकः॥ ३<br><br>सोऽप्यश्वभावमापन्नो भगवान्हरिरच्युतः।<br>परतन्त्रः कथं जातः स्वतन्त्रः पुरुषोत्तमः॥ ४<br><br>एतन्मे संशयं ब्रह्मञ्छेत्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>सर्वज्ञस्त्वं मुनिश्रेष्ठ ब्रूहि वृत्तान्तमद्भुतम्॥ ५ | मुझे इस विषयमें महान् कौतूहल हो रहा है कि देवाधिदेव जगत्पति लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णु स्वयं जगत्के उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहर्ता हैं; उन्हें भी अश्वरूप धारण करना पड़ गया? सर्वथा स्वतन्त्र रहनेवाले वे अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् हरि परतन्त्र कैसे हो गये? हे ब्रह्मन्! इस समय मेरे इस सन्देहका निवारण करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं। हे मुनिवर! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव इस अद्भुत वृत्तान्तका वर्णन कीजिये॥ ३–५॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि सन्देहस्यास्य निर्णयम्।<br>यथा श्रुतं मया पूर्वं नारदान्मुनिसत्तमात्॥ ६ | व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, इस सन्देहका निर्णय पूर्व समयमें मैंने मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे जैसा सुना है, वैसा ही आपको बता रहा हूँ॥ ६॥ |
| ब्रह्मणो मानसः पुत्रो नारदो नाम तापसः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सर्वलोकप्रियः कविः॥ ७ | नारदजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। वे तपस्वी, सर्वज्ञानी, सर्वत्र गमन करनेवाले, शान्त, समस्त लोकोंके प्रिय एवं मनीषी हैं॥ ७॥ |
| स चैकदा मुनिश्रेष्ठो विचरन्पृथिवीमिमाम्।<br>वादयन्महतीं वीणां स्वरतानसमन्विताम्॥ ८<br><br>बृहद्रथन्तरादीनां साम्नां भेदाननेकशः।<br>गायन्गायत्रममृतं सम्प्राप्तोऽथ ममाश्रमम्॥ ९<br><br>शम्याप्रासं महातीर्थं सरस्वत्याः सुपावनम्।<br>निवासं मुनिमुख्यानां शर्मदं ज्ञानदं तथा॥ १० | एक बार वे मुनिवर नारद स्वर तथा तानसे युक्त अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए तथा सामगानके बृहद्रथन्तर आदि अनेक भेदों और अमृतमय गायत्र-सामका गान करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करते हुए मेरे आश्रमपर पहुँचे। वह शम्याप्रास महातीर्थ सरस्वतीके पावन तटपर विराजमान है। कल्याण और ज्ञान प्रदान करनेवाला वह तीर्थ प्रधान ऋषियोंका निवासस्थान है॥ ८–१०॥ |
| तमागतमहं प्रेक्ष्य ब्रह्मपुत्रं महाद्युतिम्।<br>अभ्युत्थानादिकं सर्वं कृतवानर्चनादिकम्॥ ११ | ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजस्वी नारदजीको अपने आश्रममें आया देखकर मैं उठकर खड़ा हो गया और मैंने भलीभाँति उनकी पूजा आदि की॥ ११॥ |
| ८४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अर्घ्यपाद्याविधिं कृत्वा तस्यासनस्थितस्य च।<br>उपविष्टः समीपेऽहं मुनेरमिततेजसः॥ १२॥ | अर्घ्य तथा पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक पूजन करके आदरपूर्वक आसनपर विराजमान उन अमित तेजस्वी नारदके समीप मैं बैठ गया॥ १२॥ |
| दृष्ट्वा विश्रमिणं शान्तं नारदं ज्ञानपारदम्।<br>तमपृच्छमहं राजन् यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना॥ १३॥ | हे राजन्! तत्पश्चात् ज्ञानके पार पहुँचानेमें समर्थ मुनि नारदको मार्गश्रमसे रहित तथा शान्तचित्त देखकर मैंने उनसे वही प्रश्न पूछा था, जो आपने इस समय मुझसे पूछा है॥ १३॥ |
| असारेऽस्मिंस्तु संसारे प्राणिनां किं सुखं मुने।<br>न पश्यामि विनिश्चित्य कदाचित्कुत्रचित्क्वचित्॥ १४॥ | [मैंने उनसे पूछा—] हे मुने! इस सारहीन जगत्में प्राणियोंको क्या सुख प्राप्त होता है ? विचार करनेपर मुझे तो कभी भी, कहीं भी तथा कुछ भी सुख नहीं दिखायी देता है॥ १४॥ |
| द्वीपे जातो जनन्याहं संत्यक्तस्तत्क्षणादपि।<br>अनाश्रयो वने वृद्धिं प्राप्तः कर्मानुसारतः॥ १५॥ | मुझे ही देखिये, एक द्वीपमें जन्म लेते ही मेरी माताने मेरा त्याग कर दिया। तभीसे आश्रयहीन रहता हुआ मैं वनमें अपने कर्मके अनुसार बढ़ने लगा॥ १५॥ |
| तपस्तप्तं मया चोग्रं पर्वते बहुवार्षिकम्।<br>पुत्रकामेन देवर्षे शङ्करः समुपासितः॥ १६॥ | हे देवर्षे! तत्पश्चात् मैंने पुत्रप्राप्तिकी कामनासे एक पर्वतपर बहुत वर्षोंतक शंकरजीकी उपासना करते हुए कठोर तपस्या की॥ १६॥ |
| ततो मया शुकः प्राप्तः पुत्रो ज्ञानवतां वरः।<br>पाठितस्तु मया सम्यग्वेदानां सार आदितः॥ १७॥ | तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ शुकदेव मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हुए। मैंने उन्हें आरम्भसे लेकर सम्यक् प्रकारसे वेदोंका सारभूत तत्त्व पढ़ा दिया॥ १७॥ |
| स त्यक्त्वा मां गतः क्वापि रुदन्तं विरहातुरम्।<br>लोकाल्लोकान्तरं साधो वचनात्तव बोधितः॥ १८॥ | हे साधो! आपके वचनोंसे ज्ञान प्राप्त करके मेरा वह पुत्र मुझ विरहातुरको रोता हुआ छोड़कर लोकलोकान्तरमें कहीं चला गया ?॥ १८॥ |
| ततोऽहं पुत्रसन्तप्तस्त्यक्त्वा मेरुं महागिरिम्।<br>मातरं मनसा कृत्वा सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलम्॥ १९॥ | तब पुत्रविरहसे सन्तप्त मैं महापर्वत सुमेरुको छोड़कर अपनी माताको मनमें याद करते हुए कुरुजांगल प्रदेशमें पहुँचा॥ १९॥ |
| पुत्रस्नेहादतितरां कृशाङ्गः शोकसंयुतः।<br>जानन्मिथ्येति संसारं मायापाशनियन्त्रितः॥ २०॥ | संसार मिथ्या है—ऐसा जानते हुए भी मायापाशमें बँधा हुआ मैं पुत्र-स्नेहके कारण शोकाकुल रहनेसे अत्यन्त दुर्बल शरीरवाला हो गया॥ २०॥ |
| ततो राज्ञा वृतां ज्ञात्वा मातरं वासवीं शुभाम्।<br>स्थितोऽत्रैवाश्रमं कृत्वा सरस्वत्यास्तटे शुभे॥ २१॥ | तत्पश्चात् जब मैंने यह जाना कि वासवराजसुता मेरी कल्याणमयी माताका राजा शन्तनुने वरण कर लिया है, तब मैं सरस्वतीके पवित्र तटपर आश्रम बनाकर रहने लगा॥ २१॥ |
| शन्तनुः स्वर्गतिं प्राप्तो विधुरा जननी स्थिता।<br>पुत्रद्वययुता साध्वी भीष्मेण प्रतिपालिता॥ २२॥ | इसके बाद महाराज शन्तनुके स्वर्ग प्राप्त कर लेनेपर मेरी माँ विधवा हो गयीं। तब भीष्मने दो पुत्रोंवाली मेरी माताका पालन किया॥ २२॥ |
| अ० २४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्राङ्गदः कृतो राजा गङ्गापुत्रेण धीमता।<br>कालेन सोऽपि मे भ्राता मृतः कामसमद्युतिः॥ २३ | बुद्धिमान् गङ्गापुत्र भीष्मने चित्रांगदको राजा बनाया। किंतु कुछ ही समयमें कामदेवके सदृश कान्तिमान् मेरे भाई चित्रांगद भी मृत्युको प्राप्त हो गये॥ २३॥ |
| ततः सत्यवती माता निमग्ना शोकसागरे।<br>चित्राङ्गदं मृतं पुत्रं रुरोद भृशमातुरा॥ २४ | पुत्र चित्रांगदके मर जानेपर मेरी माता सत्यवती अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगीं और नित्य शोकके समुद्रमें निमग्न रहने लगीं॥ २४॥ |
| सम्प्राप्तोऽहं महाभाग ज्ञात्वा तां दुःखितां सतीम्।<br>आश्वासिता मयात्यर्थं भीष्मेण च महात्मना॥ २५ | हे महाभाग! उन पतिव्रताको दुःखित जानकर मैं उनके पास गया। वहाँ मैंने तथा महात्मा भीष्मने उन्हें बहुत सान्त्वना दी॥ २५॥ |
| विचित्रवीर्यस्त्वपरो वीर्यवान्पृथिवीपतिः।<br>कृतो भीष्मेण भ्राता वै स्त्रीराज्यविमुखेन ह॥ २६ | तब स्त्री तथा राज्यसे विमुख भीष्मने अपने दूसरे भाई पराक्रमी विचित्रवीर्यको राजा बना दिया॥ २६॥ |
| काशिराजसुते रम्ये विजित्य पृथिवीपतीन्।<br>भीष्मेणानीय स्वबलात्कन्यके द्वे समर्पिते॥ २७<br><br>सत्यवत्यै शुभे काले विवाहः परिकल्पितः।<br>भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य तदाहं सुखितोऽभवम्॥ २८ | तत्पश्चात् भीष्मने अपने बलसे राजाओंको जीतकर काशिराजकी दो सुन्दर पुत्रियोंको लाकर माता सत्यवतीको समर्पित कर दिया। पुनः शुभ मुहूर्तमें जब भाई विचित्रवीर्यका विवाह सम्पन्न हो गया तब मैं बहुत प्रसन्न हुआ॥ २७-२८॥ |
| पुनः सोऽपि मृतो भ्राता यक्ष्मणा पीडितो भृशम्।<br>अनपत्यो युवा धन्वी माता मे दुःखिताभवत्॥ २९ | कुछ ही समयमें मेरे धनुर्धर भाई विचित्रवीर्य भी यक्ष्मा रोगसे ग्रस्त होकर युवावस्थामें ही निःसन्तान मर गये, जिससे मेरी माता दुःखित हुईं॥ २९॥ |
| काशिराजसुते द्वे तु मृतं दृष्ट्वा पतिं तदा।<br>पतिव्रताधर्मपरे भगिन्यौ सम्बभूवतुः॥ ३० | इधर जब काशिराजकी दोनों पुत्रियोंने अपने पतिको मृत देखा तब वे दोनों बहनें पातिव्रत्य धर्मके पालनके लिये तत्पर हुईं॥ ३०॥ |
| ते ऊचतुः सतीं श्वश्रूं रुदतीं भृशदुःखिताम्।<br>पतिना सहगामिन्यौ भविष्यावो हुताशने॥ ३१<br><br>पुत्रेण सह ते श्वश्रु स्वर्गे गत्वाथ नन्दने।<br>सुखेन विहरिष्यावः पतिना सह संयुते॥ ३२ | वे दारुण दुःखके कारण रोती हुई अपनी साध्वी साससे कहने लगीं—हे श्वश्रु! हम दोनों चिताग्निमें अपने पतिके साथ ही जायँगी। आपके पुत्रके साथ स्वर्गमें जाकर हम दोनों अपने पतिसे युक्त होकर नन्दनवनमें सुखपूर्वक विहार करेंगी॥ ३१-३२॥ |
| निवारिते तदा मात्रा वध्वौ तस्मान्महोद्यमात्।<br>स्नेहभावं समाश्रित्य भीष्मस्य वचनात्तदा॥ ३३ | तब स्नेहभावका आश्रय लेकर मेरी माताने भीष्मके परामर्शसे उन दोनों वधुओंको महान् चेष्टा करनेसे रोक दिया॥ ३३॥ |
| गाङ्गेयेन च मात्रा मे सम्मन्त्र्य च परस्परम्।<br>कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं संस्मृतोऽहं गजाव्हये॥ ३४ | विचित्रवीर्यकी सभी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करके गङ्गातनय भीष्म तथा मेरी माताने आपसमें मन्त्रणा करके मुझे हस्तिनापुर आनेके लिये मेरा स्मरण किया॥ ३४॥ |
८४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४
८४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्मृतमात्रस्तु मात्रा वै ज्ञात्वा भावं मनोगतम्।<br>तरसैवागतश्चाहं नगरं नागसाह्वयम्॥ ३५<br><br>प्रणम्य मातरं मूर्ध्ना संस्थितोऽथ कृताञ्जलिः।<br>तामब्रुवं सुतप्ताङ्गीं पुत्रशोकेन कर्शिताम्॥ ३६ | इस प्रकार माताके स्मरण करते ही उनके मनोगत भावको जानकर शीघ्र ही मैं हस्तिनापुरमें आ गया। सिर झुकाकर माताको प्रणाम करके मैं हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़ा हो गया और पुत्रशोकके कारण अत्यन्त दुर्बल तथा तप्त अंगोंवाली उन मातासे मैंने कहा—॥ ३५-३६॥ |
| मातस्त्वया किमाहूतो मनसाहं तपस्विनि।<br>आज्ञापय महत्कार्यं दासोऽस्मि करवाणि किम्॥ ३७ | हे माता! आपने अपने मनमें स्मरण करके यहाँ मुझे किसलिये बुलाया है? हे तपस्विनि! बड़े-से-बड़े कार्यके लिये मुझे आदेश दीजिये; मैं आपका दास हूँ, मैं क्या करूँ?॥ ३७॥ |
| त्वं मे तीर्थं परं मातर्देवश्च प्रथितः परः।<br>आगतश्चिन्तितश्चात्र ब्रूहि कृत्यं तव प्रियम्॥ ३८ | हे माता! मेरा परम तीर्थ तथा महान् परम देव आप ही हैं। आपके स्मरण करते ही मैं यहाँ उपस्थित हो गया हूँ। अब आप अपना प्रिय कार्य बताइये॥ ३८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वाहं स्थितस्तत्र मातुरग्रे यदा मुने।<br>तदा सा मामुवाचेदं पश्यन्ती भीष्ममन्तिके॥ ३९ | व्यासजी बोले—हे मुने! ऐसा कहकर जब मैं माताके आगे खड़ा हो गया तब पास ही बैठे हुए भीष्मको देखती हुई वे मुझसे यह कहने लगीं॥ ३९॥ |
| पुत्र तेऽद्य मृतो भ्राता पीडितो राजयक्ष्मणा।<br>तेनाहं दुःखिता जाता वंशच्छेदभयादिह॥ ४० | हे पुत्र! राजयक्ष्मा रोगसे ग्रस्त होकर तुम्हारे भाई विचित्रवीर्य मृत्युको प्राप्त हो गये हैं। अतएव वंशके नष्ट होनेके भयसे मैं दुःखी हूँ॥ ४०॥ |
| तस्मात्त्वमद्य मेधाविन् मयाहूतः समाधिना।<br>गाङ्गेयस्य मतेनात्र पाराशर्यार्थसिद्धये॥ ४१ | हे प्रतिभाशाली पराशरनन्दन! इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये मैंने भीष्मके परामर्शसे समाधिद्वारा तुम्हें यहाँ बुलाया है॥ ४१॥ |
| कुलं स्थापय नष्टं त्वं शन्तनोर्नामकारणात्।<br>रक्ष मां दुःखतः कृष्ण वंशच्छेदोद्भवाद् द्रुतम्॥ ४२ | इस नष्ट होते हुए वंशको तुम स्थापित करो, जिससे महाराज शन्तनुका नाम बना रहे। हे द्वैपायन कृष्ण! वंशच्छेदजन्य दुःखसे मेरी शीघ्र रक्षा करो॥ ४२॥ |
| काशिराजसुते भार्ये भ्रातुस्तव यवीयसः।<br>साधोर्विचित्रवीर्यस्य रूपयौवनभूषिते॥ ४३ | तुम्हारे सदाचारी लघुभ्राता विचित्रवीर्यकी रूप-यौवनसम्पन्न दो भार्याएँ हैं, जो काशिराजकी पुत्रियाँ हैं॥ ४३॥ |
| ताभ्यां सङ्गम्य मेधाविन् पुत्रोत्पादनकं कुरु।<br>रक्षस्व भारतं वंशं नात्र दोषोऽस्ति कर्हिचित्॥ ४४ | हे मेधाविन्! उन दोनोंके साथ संसर्ग करके तुम पुत्र उत्पन्न करो, भरतवंशकी रक्षा करो; इसमें कोई दोष नहीं है॥ ४४॥ |
| व्यास उवाच<br>इति मातुर्वचः श्रुत्वा जातंश्चिन्तातुरो ह्यहम्।<br>लज्जयाकुलचित्तस्तामब्रुवं विनयानतः॥ ४५ | व्यासजी बोले—[हे नारद!] माताका यह वचन सुनकर मैं चिन्तामें पड़ गया और लज्जासे व्याकुल मनवाला होकर मैंने उनसे विनयपूर्वक कहा—हे माता! |
| अ० २४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४५ |
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| मात: पापाधिकं कर्म परदाराभिमर्शनम्।<br>ज्ञात्वा धर्मपथं सम्यक्करोमि कथमादरात्॥ ४६<br>तथा यवीयसो भ्रातुर्वधूः कन्या प्रकीर्तिता।<br>व्यभिचारं कथं कुर्यामधीत्य निगमानहम्॥ ४७<br>अन्यायेन न कर्तव्यं सर्वथा कुलरक्षणम्।<br>न तरन्ति हि संसारात्पितरः पापकारिणः॥ ४८<br>लोकानामुपदेष्टा यः पुराणानां प्रवर्तकः।<br>स कथं कुत्सितं कर्म ज्ञात्वा कुर्यान्महाद्भुतम्॥ ४९ | परनारीसंगम महान् पापकर्म है। धर्ममार्गका सम्यक् ज्ञान रखते हुए भी मैं आसक्तिपूर्वक ऐसा कर्म कैसे कर सकता हूँ? और फिर छोटे भाईकी पत्नी कन्याके समान कही गयी है। ऐसी स्थितिमें सभी वेदोंका अध्ययन करके भी मैं ऐसा व्यभिचार कैसे करूँ? अन्यायसे कुलकी रक्षा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पाप करनेवालेके पितृगण संसार-सागरसे कभी नहीं पार हो सकते। जो समग्र पुराणोंका प्रवर्तक तथा लोगोंको उपदेश करनेवाला हो, वह जान-बूझकर ऐसा अद्भुत तथा निन्दनीय कार्य कैसे कर सकता है?॥ ४६-४९॥ |
| पुनरुक्तो ह्यहं मात्रा रुदत्या भृशमन्तिके।<br>पुत्रशोकातिसन्तप्ता या वंशरक्षणकाम्यया॥ ५० | तत्पश्चात् वंश-रक्षाकी कामनासे युक्त मेरी माता, जो पुत्रशोकसे अत्यधिक सन्तप्त थीं, विलाप करती हुई समीपमें आकर मुझसे पुनः कहने लगीं— ॥ ५०॥ |
| पाराशर्य न ते दोषो वचनान्मम पुत्रक।<br>गुरूणां वचनं तथ्यं सदोषमपि मानवैः॥ ५१<br>कर्तव्यमविचार्यैव शिष्टाचारप्रमाणतः।<br>वचनं कुरु मे पुत्र न ते दोषोऽस्ति मानद॥ ५२<br>पुत्रस्य जननं कृत्वा सुखिनीं कुरु मातरम्।<br>विशेषेण तु सन्तप्तां मग्नां शोकार्णवे सुत॥ ५३ | हे पराशरनन्दन! हे पुत्र! मेरे कहनेपर ऐसा करनेसे तुम दोषभागी नहीं होओगे। शिष्टजनोंका आचार ही प्रमाण है—ऐसा मानकर मनुष्योंको गुरुजनोंके दोषपूर्ण वचनोंको भी उचित समझकर बिना कुछ सोच-विचार किये कर डालना चाहिये। हे पुत्र! मेरी बात मान लो! हे मानद! इससे तुम्हें दोष नहीं लगेगा। हे सुत! पुत्र उत्पन्न करके अत्यधिक सन्तप्त तथा शोकसागरमें निमग्न अपनी माताको सुखी करो॥ ५१-५३॥ |
| इति तां ब्रुवतीं श्रुत्वा तदा सुरनदीसुतः।<br>मामुवाच विशेषज्ञः सूक्ष्मधर्मस्य निर्णये॥ ५४<br>द्वैपायन विचारोऽत्र न कर्तव्यस्त्वयानघ।<br>मातुर्वचनमादाय विहरस्व यथासुखम्॥ ५५ | माताकी यह बात सुनकर सूक्ष्मधर्मके निर्णयमें विशेष ज्ञान रखनेवाले गंगातनय भीष्मने मुझसे कहा— हे कृष्ण-द्वैपायन! तुम्हें इस विषयमें विचार नहीं करना चाहिये। हे पुण्यात्मन्! माताका वचन मानकर तुम सुखपूर्वक विहार करो॥ ५४-५५॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा मातुश्च प्रार्थनं तथा।<br>निःशङ्कोऽहं तदा जातः कार्ये तस्मिञ्जुगुप्सिते॥ ५६ | व्यासजी बोले—[हे नारद!] भीष्मका यह वचन सुनकर तथा माताकी प्रार्थनापर मैं निःशंक भावसे उस निन्द्य कर्ममें प्रवृत्त हो गया॥ ५६॥ |
| अम्बिकायां प्रवृत्तोऽहमृतुमत्यां मुदा निशि।<br>मयि विमनसायां तु तापसे कुत्सिते भृशम्॥ ५७<br>शप्ता मया सा सुश्रोणी प्रसङ्गे प्रथमे तदा।<br>अन्धस्ते भविता पुत्रो यतो नेत्रे निमीलिते॥ ५८ | रात्रिमें मैं प्रसन्नतापूर्वक ऋतुमती अम्बिकाके साथ प्रवृत्त हुआ, किंतु मुझ कुरूप तपस्वीके प्रति उसके अनुरागहीन होनेके कारण मैंने उस सुश्रोणीको शाप दे दिया कि प्रथम संसर्गके समय ही तुमने अपनी दोनों आँखें बन्द कर ली थीं, अतः तुम्हारा पुत्र अन्धा होगा॥ ५७-५८॥ |
८४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
८४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
| द्वितीयेऽह्नि मुनिश्रेष्ठ पृष्टो मात्रा रहः पुनः।<br>भविष्यति सुतः पुत्र काशिराजसुतोदरे ॥ ५९<br><br>मयोक्ता जननी तत्र व्रीडानम्रमुखेन ह।<br>विनेत्रो भविता पुत्रो मातः शापान्ममैव हि ॥ ६०<br><br>तया निर्भर्त्सितस्तत्र कठोरवचसा मुने।<br>कथं पुत्र त्वया शप्ता पुत्रस्तेऽन्धो भविष्यति ॥ ६१ | हे मुनिवर! दूसरे दिन माताने एकान्तमें मुझसे फिर पूछा—हे पुत्र! क्या काशिराजकी पुत्री अम्बिकाके गर्भसे पुत्र उत्पन्न होगा? तब लज्जाके कारण मुख नीचे किये हुए मैंने मातासे कहा—हे माता! मेरे शापके प्रभावसे नेत्रहीन पुत्र उत्पन्न होगा॥ ५९-६०॥<br><br>हे मुने! इसपर माताने कठोर वाणीमें मेरी भर्त्सना की—'हे पुत्र! तुमने शाप क्यों दिया कि तुम्हारा पुत्र अन्धा होगा'॥ ६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे अम्बिकायां नियोगोत्पुत्रोत्पादनाय गर्भधारणवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
पाण्डु और विदुरके जन्मकी कथा, पाण्डवोंका जन्म, पाण्डुकी मृत्यु, द्रौपदीस्वयंवर, राजसूययज्ञ, कपटद्यूत तथा वनवास और व्यासजीके मोहका वर्णन
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| वासवी चकिता जाता श्रुत्वा मे वाक्यमीदृशम्।<br>दाशेयी मामुवाचेदं पुत्रार्थे भृशमातुरा ॥ १<br><br>अम्बालिका वधूर्धन्या काशिराजसुता सुत।<br>भार्या विचित्रवीर्यस्य विधवा शोकसंयुता ॥ २<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्ना रूपयौवनशालिनी।<br>तस्यां जनय सङ्गं त्वं कृत्वा पुत्रं सुसम्मतम् ॥ ३ | मेरी वह बात सुनकर वासवराजकुमारी सत्यवती चकित हो गयीं और पुत्रके लिये अत्यन्त व्यग्र होकर मुझसे कहने लगीं—हे पुत्र! काशिराजकी श्रेष्ठ पुत्री वधू अम्बालिका विचित्रवीर्यकी भार्या है, जो विधवा तथा पतिशोकसे सन्तप्त है। वह सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और रूप तथा यौवनसे युक्त है। तुम उसके साथ संसर्ग करके प्रिय पुत्र उत्पन्न करो॥ १—३॥ |
| नान्धो राजाधिकारी स्यात्तस्मात्पुत्रं मनोहरम्।<br>उत्पादय राजपुत्र्यां वचनान्मम मानद ॥ ४ | नेत्रहीनको राजा बननेका अधिकार नहीं हो सकता। इसलिये हे मानद! मेरी बात मानकर तुम उस राजपुत्रीसे एक मनोहर पुत्र उत्पन्न करो॥ ४॥ |
| इत्युक्तोऽहं तदा मात्रा स्थितस्तत्र गजाह्वये।<br>यावदृतुमती जाता काशिराजसुता मुने ॥ ५<br><br>एकान्ते शयनागारे प्राप्ता सा मम सन्निधौ।<br>लज्जमाना सुकेशान्ता स्वश्वश्रूवचनात्तदा ॥ ६ | हे मुने! तब मैं माताजीके ऐसा कहनेपर वहीं हस्तिनापुरमें ठहर गया और जब सुन्दर केशपाशवाली काशिराजकी पुत्री अम्बालिका ऋतुमती हुई तो अपनी सासके कहनेपर वह एकान्त शयनकक्षमें लज्जित होती मेरे पास आयी॥ ५-६॥ |
| दृष्ट्वा मां जटिलं दान्तं तापसं रसवर्जितम्।<br>सा स्वेदवदना जाता पाण्डुरा विमना भृशम् ॥ ७ | वहाँ मुझ जटाधारी, इन्द्रियनिग्रही तथा शृङ्गाररससे अनभिज्ञ तपस्वीको देखकर उसके मुखपर पसीना आ गया, शरीर पीला पड़ गया और उसका मन बहुत खिन्न हो गया॥ ७॥ |
| अ० २५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुपितोऽहं तदा दृष्ट्वा कामिनीं निशि सङ्गताम्।<br>वेपमानां स्थितां पार्श्वे ह्यब्रुवं तामहं रुषा॥ ८<br><br>दृष्ट्वा मां यदि गर्वेण पाण्डुवर्णा समावृता।<br>अतस्ते तनयः पाण्डुर्भविष्यति सुमध्यमे॥ ९ | तत्पश्चात् रात्रिमें सम्पर्कके लिये आयी हुई उस सुन्दरीको अपने पासमें बैठी देखकर मैं कुपित हो गया और रोषपूर्वक बोला—सुमध्यमे! मुझे देखकर यदि तुम अभिमानसे पीली पड़ गयी हो तो तुम्हारा पुत्र भी पीतवर्णका होगा॥ ८-९॥ |
| इत्युक्त्वा निशि तत्रैव स्थितोऽम्बालिकया युतः।<br>भुक्त्वा तां निशि निर्यातः स्थानमापृच्छ्य मातरम्॥ १० | ऐसा कहकर मैं उस अम्बालिकाके साथ रातभर वहीं रहा और फिर मातासे आज्ञा लेकर अपने आश्रमके लिये प्रस्थित हो गया॥ १०॥ |
| ततस्ताभ्यां सुतौ काले प्रसूतावन्धपाण्डुरौ।<br>धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च प्रथितौ सम्बभूवतुः॥ ११ | तदनन्तर समय आनेपर उन दोनोंने अन्धे तथा पाण्डुवर्णके दो पुत्र उत्पन्न किये। वे दोनों धृतराष्ट्र तथा पाण्डु नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ११॥ |
| माता मे विमना जाता तादृशौ वीक्ष्य तौ सुतौ।<br>ततः संवत्सरस्यान्ते मामाहूय तदाब्रवीत्॥ १२<br><br>द्वैपायन सुतौ जातौ राज्ययोग्यौ न तादृशौ।<br>अन्यं मनोहरं पुत्रं समुत्पादय मे प्रियम्॥ १३ | उन दोनों राजकुमारोंको इस प्रकारका देखकर मेरी माता खिन्नमनस्क हो गयीं। तत्पश्चात् एक वर्षके अनन्तर मुझे बुलाकर उन्होंने कहा—हे द्वैपायन! इस प्रकारके दोनों पुत्र राज्य करनेके योग्य नहीं हैं, अतएव तुम एक अन्य मनोहर पुत्र उत्पन्न करो, जो मुझे अत्यन्त प्रिय हो॥ १२-१३॥ |
| तथेति सा मया प्रोक्ता मुदिता जननी तदा।<br>अम्बिकां प्रार्थयामास सुतार्थे काल आगते॥ १४<br><br>पुत्रि व्यासं समालिङ्ग्य पुत्रमुत्पादयाद्भुतम्।<br>कुरुवंशस्य कर्तारं राज्ययोग्यं वरानने॥ १५ | 'वैसा ही होगा'—मेरे इस प्रकार कहनेपर माता अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं। इसके बाद ऋतुकाल आनेपर माताने पुत्रहेतु अम्बिकासे प्रार्थना की—हे पुत्रि! हे सुमुखि! व्यासके साथ समागम करके तुम कुरुवंश चलानेवाला तथा राज्य करनेयोग्य एक अद्वितीय पुत्र उत्पन्न करो॥ १४-१५॥ |
| वधूर्लज्जान्विता किञ्चिन्नोवाच वचनं तदा।<br>गतोऽहं शयनागारे मातुस्तद्वचनान्निशि॥ १६ | उस समय लज्जासे युक्त वधू अम्बिकाने कुछ भी नहीं कहा और मैं माताकी वह बात मानकर रातमें शयनागारमें चला गया॥ १६॥ |
| दासी विचित्रवीर्यस्य रूपयौवनसंयुता।<br>प्रेषिताम्बिकया तत्र विचित्राभरणाम्बरा॥ १७ | तत्पश्चात् अम्बिकाने विचित्रवीर्यकी रूप-यौवनसम्पन्न दासीको सुन्दर आभूषण तथा वस्त्र पहनाकर मेरे पास भेज दिया॥ १७॥ |
| चन्दनारक्तदेहा सा पुष्पमालाविभूषिता।<br>आयाता हावसंयुक्ता सुकेशी हंसगामिनी॥ १८ | शरीरपर चन्दन लगाये, फूलकी मालाओंसे विभूषित तथा सुन्दर केशोंवाली वह सुन्दरी हंसकी भाँति मन्द-मन्द चलती हुई बड़े हाव-भावसे मेरे पास आयी॥ १८॥ |
| पर्यङ्के मां समावेश्य संस्थिता प्रेमसंयुता।<br>प्रसन्नोऽहं तदा तस्या विलासेनाभवं मुने॥ १९ | मुझे पलंगपर बैठाकर वह भी प्रेमपूर्वक मेरे पास बैठ गयी। हे मुने! उसके इस प्रेमपूर्ण हाव-भावसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥ १९॥ |
८४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
८४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रात्रौ संक्रीडितं प्रेम्णा तया सह मया भृशम्।<br>वरो दत्तः पुनस्तस्यै प्रसन्नेन तु नारद॥ २०<br><br>सुभगे भविता पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः।<br>सुरूपः सर्वधर्मज्ञः सत्यवादी शमे रतः॥ २१ | हे नारद! रात्रिमें मैंने उसके साथ प्रेमपूर्वक विहार किया और पुनः प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया—हे सुभगे! तुम्हें सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, रूपवान्, सभी धर्मोंका ज्ञाता, सत्यवादी तथा शान्त स्वभाववाला पुत्र उत्पन्न होगा॥ २०-२१॥ |
| स तदा विदुरो जातस्त्रयः पुत्रा मयाभवन्।<br>माया वृद्धिं गता साधो परक्षेत्रोद्भवे मम॥ २२ | समय आनेपर उसे विदुर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार मुझसे तीन पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। हे साधो! परक्षेत्रमें मेरेद्वारा उत्पन्न किये गये इन पुत्रोंके प्रति मेरी ममता बढ़ने लगी॥ २२॥ |
| विस्मृतः शुकसम्बन्धी विरहः शोककारणम्।<br>दृष्ट्वा त्रीन्स्वसुतान्कामं बलिनो वीर्यसम्मतान्॥ २३ | उन तीनों पुत्रोंको अत्यन्त बलवान् तथा वीर्यवान् देखकर मैं अपने शोकके एकमात्र कारण शुकसम्बन्धी वियोगको भूल गया॥ २३॥ |
| माया बलवती ब्रह्मन् दुस्त्यजा ह्यकृतात्मभिः।<br>अरूपा च निरालम्बा ज्ञानिनामपि मोहिनी॥ २४ | हे ब्रह्मन्! माया बलवती होती है, आत्मज्ञानसे रहित पुरुषोंके लिये यह अत्यन्त दुस्त्यज है। रूपहीन तथा आलम्बरहित यह माया ज्ञानियोंको भी मोहित कर देती है॥ २४॥ |
| मातरि स्नेहसम्बद्धं तथा पुत्रेषु संवृतम्।<br>न मे चित्तं वने शान्तिमगान्मुनिवरोत्तम॥ २५ | हे मुनिवर! मातामें तथा उन पुत्रोंमें स्नेहासक्तिसे आबद्ध मेरे मनको वनमें भी शान्ति नहीं मिल पाती थी॥ २५॥ |
| दोलारूढं मनो जातं कदाचिद्धस्तिनापुरे।<br>पुनः सरस्वतीतीरे न चैकत्र व्यवस्थितिः॥ २६ | मेरा मन दोलायमान हो गया। वह कभी हस्तिनापुरमें रहता था तो कभी सरस्वतीनदीके तटपर चला आता था; इस प्रकार मेरा मन किसी जगह स्थिर नहीं रहता था॥ २६॥ |
| कदाचिच्चिन्तयन् ज्ञानं मानसे प्रतिभाति वै।<br>केऽमी पुत्राः क्व मोहोऽयं न श्राद्धार्हा मृतस्य मे॥ २७ | कभी-कभी मनमें ज्ञानका उदय हो जानेपर मैं सोचने लगता था कि ये पुत्र कौन हैं, यह मोह कैसा? मेरे मर जानेपर ये मेरा श्राद्ध भी तो नहीं कर सकेंगे॥ २७॥ |
| व्यभिचारोद्भवाः किं मे सुखदाः स्युः सुताः किल।<br>माया बलवती मोहं वितनोति हि मानसे॥ २८ | दुराचारसे उत्पन्न ये पुत्र मुझे कौन-सा सुख देंगे। माया बड़ी प्रबल होती है; यह मनमें मोह पैदा कर देती है॥ २८॥ |
| जानन्मोहान्धकूपेऽस्मिन्पतितोऽहं मृषा मुने।<br>इत्यकुर्वं रहस्तापं कदाचित्सुसमाहितः॥ २९ | हे मुने! कभी-कभी शान्तचित्त होकर एकान्तमें मैं यह सन्ताप करने लगता था कि मैं जान-बूझकर इस मोहरूपी अन्धकूपमें व्यर्थ ही गिर गया हूँ॥ २९॥ |
| राज्यं प्राप ततः पाण्डुर्बलवान्भीष्मसम्मतः।<br>तदा मम मनो जातं प्रसन्नं सुतकारणात्॥ ३० | भीष्मकी सम्मतिसे जब बलवान् पाण्डुको राज्य प्राप्त हुआ, उस समय मेरा मन इस बातसे बहुत प्रसन्न हुआ कि मेरा पुत्र राजसिंहासनपर बैठा है॥ ३०॥ |
अ० २५] षष्ठ स्कन्ध ८४९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कुन्ती माद्री सुरूपे द्वे भार्ये तस्य बभूवतुः।<br>शूरसेनसुता कुन्ती मद्रराजसुतापरा ॥ ३१ | तत्पश्चात् सुन्दर रूपवाली कुन्ती तथा माद्री उनकी दो भार्याएँ हुईं। उनमें कुन्ती महाराज शूरसेनकी पुत्री थी तथा दूसरी रानी माद्री मद्रदेशके राजाकी कन्या थी ॥ ३१ ॥ |
| स शापं द्विजतः प्राप्य कामिनीद्वयसंयुतः।<br>पाण्डुर्निर्वेदमापन्नस्त्यक्त्वा राज्यं वनं गतः ॥ ३२ | ब्राह्मणसे शाप प्राप्त करके राजा पाण्डु अत्यन्त दुःखित हुए और वे राज्यका परित्याग करके अपनी दोनों रानियोंके साथ वन चले गये ॥ ३२ ॥ |
| तदा मामाविशच्छोकः श्रुत्वा पुत्रं वने स्थितम्।<br>गतोऽहं तत्र यत्रासौ भार्याभ्यां सह संस्थितः ॥ ३३ | अपने पुत्रको वनमें स्थित सुनकर मुझे महान् शोक हुआ। मैं वहाँ पहुँच गया, जहाँ वे अपनी दोनों पत्नियोंके साथ रह रहे थे ॥ ३३ ॥ |
| तमाश्वास्य वने पाण्डुं पुनः प्राप्तो गजाह्वये।<br>धृतराष्ट्रं समाभाष्य ह्यगमं ब्रह्मजातटे ॥ ३४ | वनमें उन पाण्डुको सान्त्वना देकर मैं पुनः हस्तिनापुर आ गया और वहाँ धृतराष्ट्रके साथ बातचीत करके सरस्वतीनदीके तटपर पुनः चला गया ॥ ३४ ॥ |
| क्षेत्रजान्यञ्चपुत्रान्स समुत्पाद्य वनाश्रमे।<br>धर्मतो वायुतः शक्रादश्विभ्यां पञ्च पाण्डवान् ॥ ३५<br><br>युधिष्ठिरो भीमसेनस्तथैवार्जुन इत्यपि।<br>कुन्तीपुत्राः समाख्याता धर्मानिलसुरेशजाः ॥ ३६<br><br>नकुलः सहदेवश्च मद्रराजसुतासुतौ। | वनमें अपने आश्रममें उन्होंने धर्म, वायु, इन्द्र तथा दोनों अश्विनीकुमारोंसे पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको पाँच पाण्डवोंके रूपमें उत्पन्न कराया। धर्म, वायु तथा इन्द्रसे उत्पन्न हुए युधिष्ठिर, भीमसेन तथा अर्जुन—ये कुन्तीपुत्र कहे गये हैं। इसी तरह नकुल तथा सहदेव—ये दोनों माद्रीके पुत्र हुए ॥ ३५-३६ १/२ ॥ |
| कदाचित्तु रहो माद्रीं समालिङ्ग्य महीपतिः ॥ ३७<br><br>मृतः शापात्तु मुनिभिः संस्कृतो हुतभुङ्मुखे।<br>माद्री तत्र सती भूत्वा प्रविष्टा पतिना सह ॥ ३८<br><br>स्थिता पुत्रयुता कुन्ती ज्वलिते जातवेदसि।<br>मुनयः सुतसंयुक्तां शूरसेनसुतां तदा ॥ ३९<br><br>दुःखितां पतिहीनां तामानिन्युर्गजसाह्वये।<br>समर्पिताथ भीष्माय विदुराय महात्मने ॥ ४०<br><br>श्रुत्वाहं सुखदुःखाभ्यां पीडितस्तु परात्मभिः। | एक दिन महाराज पाण्डु एकान्तमें माद्रीका आलिंगन करके पूर्वशापके कारण मृत्युको प्राप्त हो गये। तत्पश्चात् मुनियोंने उनका दाह-संस्कार किया और माद्री सती होकर पतिके साथ प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट हो गयी और पुत्रोंसे युक्त कुन्ती वहीं स्थित रह गयी। तत्पश्चात् मुनिलोग पतिविहीन उस दुःखित शूरसेन-पुत्री कुन्तीको उसके पुत्रोंसहित हस्तिनापुर ले आये और उसे भीष्म तथा महात्मा विदुरको सौंप दिया। यह सुनकर मैं उन पाण्डुपुत्रोंके कारण सुख-दुःखसे पीड़ित हो गया। |
| भीष्मेण पालिताः पुत्राः पाण्डोरिति विचिन्त्य ते ॥ ४१<br><br>विदुरेण तथा प्रीत्या धृतराष्ट्रेण धीमता।<br>दुर्योधनादयस्तस्य पुत्रा ये क्रूरमानसाः ॥ ४२<br><br>एकत्र स्थितिमापन्ना विरोधं चक्रुरद्भुतम्।<br>द्रोणाचार्यस्तु सम्प्राप्तस्तत्र भीष्मेण मानितः ॥ ४३<br>अध्यापनाय पुत्राणां पुरे तस्मिन्निवासितः। | पाण्डुके ये पुत्र हैं—ऐसा सोचकर भीष्म, मतिमान् विदुर तथा धृतराष्ट्र प्रेमपूर्वक उनका पालन-पोषण करने लगे ॥ ३७-४१ १/२ ॥<br><br>धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि जो क्रूर हृदयवाले पुत्र थे, वे एक समूह बनाकर उनका घोर विरोध करने लगे। तत्पश्चात् द्रोणाचार्य वहाँ आये और भीष्मने उनका सम्मान किया। उन्होंने पुत्रोंको धनुर्विद्याकी शिक्षा देनेके लिये उन्हें उसी पुरमें रख लिया ॥ ४२-४३ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—28 A
८५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५ ]
८५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कर्णः कुन्त्या परित्यक्तो जातमात्रः शिशुर्यदा ॥ ४४<br><br>सूतेन पालितो नद्यां प्राप्तश्चाधिरथेन ह।<br>दुर्योधनप्रियश्चाभूत्कर्णः शूरतमस्तथा ॥ ४५<br><br>परस्परं विरोधोऽभूद्भीमदुर्योधनादिषु।<br>धृतराष्ट्रस्तु सञ्चिन्त्य क्लेशं पुत्रेषु तेषु च ॥ ४६<br><br>निवासं कल्पयामास पाण्डवानां महात्मनाम्।<br>विरोधशमनायैव नगरे वारणावते ॥ ४७ | कुन्तीने उत्पन्न होते ही जब बालक कर्णका परित्याग कर दिया तब अधिरथ नामक सूतने नदीमें बहते हुए उस कर्णको पाया और उसका पालन-पोषण किया। सर्वश्रेष्ठ वीर होनेके कारण कर्ण दुर्योधनका प्रिय हो गया। बादमें भीम तथा दुर्योधन आदिमें परस्पर विरोध भाव उत्पन्न हो गया॥ ४४-४५ १/२ ॥<br><br>तब धृतराष्ट्रने अपने पुत्रों तथा उन पाण्डवोंके परस्पर संकटका विचार करके तथा उनके विरोध-भावको समाप्त करनेके उद्देश्यसे वारणावत नगरमें महात्मा पाण्डवोंको बसानेका निश्चय किया॥ ४६-४७॥ |
| दुर्योधनेन तत्रैव द्रोहाज्जतुगृहाणि वै।<br>कारितानि च दिव्यानि प्रेष्य मित्रं पुरोचनम् ॥ ४८ | द्रोहके कारण दुर्योधनने अपने मित्र पुरोचनको वहाँ भेजकर दिव्य लाक्षागृहका निर्माण करा दिया॥ ४८॥ |
| श्रुत्वा जतुगृहे दग्धान्पाण्डवान्पृथया युतान्।<br>पौत्रभावान्मुनिश्रेष्ठ मग्नोऽहं व्यसनार्णवे ॥ ४९<br><br>शोकातुरो भृशं शून्ये वने पश्यन्नहर्निशम्।<br>दृष्टा मयैकचक्रायां पाण्डवा दुःखकर्शिताः ॥ ५०<br><br>ततस्तुष्टमनाश्चाहं जातः पार्थान्विलोक्य च।<br>प्रेरितास्ते मया तूर्णं द्रुपदस्य पुरं प्रति ॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठ! तत्पश्चात् कुन्तीसहित उन पाण्डवोंके उस लाक्षागृहमें दग्ध हो जानेका समाचार सुनकर उनके प्रति पौत्र-भाव होनेके कारण मैं दुःखके सागरमें डूब गया और उस निर्जन वनमें उन्हें दिन-रात खोजता हुआ अति शोकसन्तप्त रहता था। तभी मैंने दुःखके कारण अत्यन्त दुर्बल उन पाण्डवोंको एकचक्रा नगरीमें देखा। उन पाण्डवोंको देखकर मेरे मनमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई और मैंने उन्हें तुरंत महाराज द्रुपदके नगरमें भेज दिया॥ ४९-५१॥ |
| ते गतास्तत्र दुःखार्ता विप्रवेषधराः कृशाः।<br>मृगचर्मपरीधानाः सभायां संस्थितास्तदा ॥ ५२<br><br>कृत्वा पराक्रमं जिष्णुः स जित्वा द्रुपदात्मजाम्।<br>चकुर्विवाहं मानिन्या पञ्चैव मातृवाक्यतः ॥ ५३ | कृश शरीरवाले वे दुःखित पाण्डव मृगचर्म पहनकर ब्राह्मणका वेश धारण करके वहाँ गये और द्रुपदकी स्वयंवर-सभामें जा पहुँचे। वहाँपर अर्जुन अपने पराक्रमका प्रदर्शन करके द्रुपद-पुत्री द्रौपदीको जीतकर ले आये। पुनः माता कुन्तीके आदेशसे पाँचों भाइयोंने मानिनी द्रौपदीके साथ विवाह किया॥ ५२-५३॥ |
| दृष्ट्वा विवाहं तेषां तु मुदितोऽहं भृशं तदा।<br>ततो नागाह्वये प्राप्ताः पाञ्चालीसहिता मुने ॥ ५४ | उनका विवाह देखकर मैं परम प्रसन्न हुआ। हे मुने! तत्पश्चात् वे सभी द्रौपदीसहित हस्तिनापुर चले आये॥ ५४॥ |
| निवासं खाण्डवप्रस्थं धृतराष्ट्रेण कल्पितम्।<br>पाण्डवानां द्विजश्रेष्ठ वसुदेवसुतेन वै ॥ ५५<br><br>तर्पितः पावकस्तत्र विष्णुना सह जिष्णुना।<br>राजसूयः कृतो यज्ञस्तदाहं मुदितोऽभवम् ॥ ५६ | धृतराष्ट्रने उन पाण्डवोंके रहनेके लिये खाण्डवप्रस्थ देनेका निश्चय किया। हे द्विजश्रेष्ठ नारद! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके साथ अग्निदेवको सन्तुष्ट किया। पाण्डवोंने जब राजसूय यज्ञ किया तब मैं बहुत प्रसन्न हुआ॥ ५५-५६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 28 B
| अ० २६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५१ |
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| दृष्ट्वाथ विभवं तेषां तथा मयकृतां सभाम्।<br>दुर्योधनोऽतिसन्तप्तो दुरोदरमथाकरोत्॥ ५७<br><br>दुर्धूतवेदी शकुनिरनक्षज्ञश्च धर्मजः।<br>हृतं राज्यं धनं सर्वं याज्ञसेनी च क्लेशिता॥ ५८<br><br>वने द्वादश वर्षाणि पाण्डवास्ते विवासिताः।<br>पाञ्चालीसहितास्तेन दुःखं मे जनितं भृशम्॥ ५९ | उन पाण्डवोंका वैभव तथा मय दानवद्वारा निर्मित की गयी सभाको देखकर दुर्योधन अत्यन्त दुःखित हुआ और उसने द्यूतक्रीडाकी योजना बनायी। शकुनि कपटपूर्ण द्यूतमें अति निपुण था तथा धर्मराज युधिष्ठिर पासेके खेलसे अनभिज्ञ थे। अतएव दुर्योधनने [द्यूतक्रीडाके माध्यमसे] पाण्डवोंका सम्पूर्ण राज्य तथा धन छीन लिया तथा द्रौपदीको भी अपमानित किया। दुर्योधनने द्रौपदीसहित पाँचों पाण्डवोंको बारह वर्षकी अवधितक वनमें निवास करनेके लिये निर्वासित कर दिया; इससे मुझे बहुत दुःख हुआ॥ ५७—५९॥ |
| एवं नारद संसारे सुखदुःखात्मके भृशम्।<br>निमग्नोऽहं भ्रमेणैव जानन् धर्मं सनातनम्॥ ६० | हे नारद! इस प्रकार सनातन धर्मको जानते हुए भी मैं सुख तथा दुःखसे पूर्ण इस संसारमें भ्रमसे ही बन्धनमें पड़ा हूँ। |
| कोऽहं कस्य सुतास्तेऽमी का माता किं सुखं पुनः।<br>येन मे हृदयं मोहाद् भ्रमतीति दिवानिशम्॥ ६१ | मैं कौन हूँ, ये किसके पुत्र हैं, यह किसकी माता है और सुख क्या है? जिससे मेरा मन मोहित होकर दिन-रात इन्हींमें भ्रमण करता रहता है॥ ६०-६१॥ |
| किं करोमि क्व गच्छामि सन्तोषो नाधिगच्छति।<br>दोलारूढं मनो मेऽत्र चञ्चलं न स्थिरं भवेत्॥ ६२ | मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? किसी प्रकारसे भी मुझे सन्तोष नहीं मिलता। दोलायमान मेरा चंचल मन स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ६२॥ |
| सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ सन्देहं मे निवर्तय।<br>तथा कुरु यथाऽहं स्यां सुखितो विगतज्वरः॥ ६३ | हे मुनिश्रेष्ठ! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव मेरे सन्देहका निवारण कीजिये। आप कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मैं सन्तापरहित होकर सुखी हो जाऊँ॥ ६३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे व्यासस्वकीयमोहवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः
देवर्षि नारद और पर्वतमुनिका एक-दूसरेको शाप देना, राजकुमारी दमयन्तीका नारदसे विवाह करनेका निश्चय
| व्यास उवाच<br>इति मे वचनं श्रुत्वा नारदः परमार्थवित्।<br>मामाह च स्मितं कृत्वा पृच्छन्तं मोहकारणम्॥ १ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] तब परमार्थवेत्ता नारदजी मेरी बात सुननेके पश्चात् मोहका कारण पूछनेवाले मुझसे मुसकराकर कहने लगे॥ १॥ |
|---|---|
| नारद उवाच<br>पाराशर्य पुराणज्ञ किं पृच्छसि सुनिश्चितम्।<br>संसारेऽस्मिन् विना मोहं कोऽपि नास्ति शरीरवान्॥ २ | नारदजी बोले— हे पुराणवेत्ता व्यासजी! आप क्या पूछ रहे हैं? यह पूर्णरूपसे निश्चित है कि इस संसारमें रहनेवाला कोई भी प्राणी मोहसे परे हो ही नहीं सकता॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—28 C
८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६
८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्माविष्णुस्तथा रुद्रः सनकः कपिलस्तथा।<br>मायया वेष्टिताः सर्वे भ्रमन्ति भववर्त्मनि ॥ ३ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सनक तथा कपिल—ये सभी मायाके वशवर्ती होकर संसार-मार्गमें निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं॥ ३॥ |
| ज्ञानिनं मां जनो वेत्ति भ्रान्तोऽहं सर्वलोकवत्।<br>शृणु मे पूर्ववृत्तान्तं प्रब्रवीमि सुनिश्चितम्॥ ४ | लोग मुझे ज्ञानी समझते हैं, किंतु मैं भी एक बार सभी लोगोंकी भाँति भ्रमित हो गया था। मैं अपना पूर्व वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये॥ ४॥ |
| दुःखं मया यथा पूर्वमनुभूतं महत्तरम्।<br>स्वकृतेन च मोहेन भार्यार्थे वासवीसुत॥ ५ | हे व्यासजी! स्त्री-प्राप्तिके लिये अपने द्वारा स्वयं उत्पन्न किये गये मोहके कारण मुझे पूर्वकालमें महान् कष्टका अनुभव करना पड़ा था॥ ५॥ |
| एकदा पर्वतश्चाहं देवलोकान्महीतलाम्।<br>प्राप्तौ विलोकनार्थाय भारतं खण्डमुत्तमम्॥ ६ | एक बार मैं तथा पर्वतमुनि उत्तम भारतवर्षको देखनेके लिये देवलोकसे पृथ्वीलोकपर आये थे॥ ६॥ |
| भ्रमन्तौ सहितावुर्व्यां पश्यन्तौ तीर्थमण्डलम्।<br>पावनानि च स्थानानि मुनीनामाश्रमाञ्छुभान् ॥ ७ | विभिन्न तीर्थों, पवित्र स्थानों तथा मुनियोंके पावन आश्रमोंको देखते हुए हम दोनों साथ-साथ पृथ्वीतलपर विचरण करने लगे॥ ७॥ |
| शपथं देवलोकात्तु कृत्वा पूर्वं परस्परम्।<br>चलितौ समयं चेमं सम्मन्त्र्य निश्चयेन वै॥ ८<br><br>चित्तवृत्तिस्तु वक्तव्या यादृशी यस्य जायते।<br>शुभा वाप्यशुभा वापि न गोप्तव्या कदाचन॥ ९ | देवलोकसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने आपसमें निश्चयपूर्वक सोच-विचारकर यह प्रतिज्ञा की थी कि जिसके मनमें जैसा भी पवित्र अथवा अपवित्र भाव उत्पन्न होगा, वह उसे कभी गोपनीय नहीं रखेगा॥ ८-९॥ |
| भोजनेच्छा धनेच्छापि रतीच्छा वा भवेदपि।<br>यादृशी यस्य चित्ते तु कथनीया परस्परम्॥ १० | भोजनकी इच्छा, धनकी इच्छा अथवा काम-विषयक इच्छा—इनमेंसे जिस तरहकी भी इच्छा जिसके मनमें होगी, एक-दूसरेको बता दी जानी चाहिये॥ १०॥ |
| इत्यावां समयं कृत्वा स्वर्गाद्भूलोकमागतौ।<br>एकचित्तौ मुनीभूतौ विचरन्तौ यथेच्छया॥ ११ | ऐसी प्रतिज्ञा करके हम दोनों स्वर्गलोकसे पृथ्वीतलपर आये और एकचित्त होकर मुनिरूपमें इच्छापूर्वक विचरण करने लगे॥ ११॥ |
| एवं भ्रमन्तौ लोकेऽस्मिन्ग्रीष्मान्ते समुपागते।<br>सञ्जयस्य पुरं रम्यं सम्प्राप्तौ नृपतेः पुनः॥ १२ | इस प्रकार इस लोकमें विचरण करते हुए हम दोनों ग्रीष्म ऋतुके समाप्त हो जानेपर राजा संजयके सुरम्य नगरमें पहुँचे॥ १२॥ |
| तेन सम्पूजितौ भक्त्या राज्ञा सम्मानितौ भृशम्।<br>स्थितौ तत्र गृहे तस्य चातुर्मास्यं महात्मनः॥ १३ | राजा संजयने हम दोनोंकी भक्तिपूर्वक पूजा की तथा अत्यधिक सम्मान दिया। महान् आत्मावाले उन्हीं संजयके भवनमें रहकर हम दोनों अपना चातुर्मास्य व्यतीत करने लगे॥ १३॥ |
| वार्षिकाश्चतुरो मासा दुर्गमाः पथि सर्वदा।<br>तस्मादेकत्र विबुधैः स्थातव्यमिति निश्चयः॥ १४ | वर्षाकालके चार महीने मार्गमें बहुत कष्टकारक होते हैं, अतएव विज्ञजनोंको उस अवधिमें एक ही स्थानपर रहना चाहिये—ऐसा सिद्धान्त है॥ १४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 28 D
अ० २६] षष्ठ स्कन्ध ८५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टौ मासांस्तु प्रवसेत्सदा कार्यवशाद् द्विजः।<br>वर्षाकाले न गन्तव्यं प्रवासे सुखमिच्छता॥ १५ | द्विजको चाहिये कि वह आठ महीनेतक अपने कार्यवश देशान्तरमें प्रवास करे, किंतु सुख चाहनेवाले पुरुषको वर्षाकालमें प्रवासके लिये नहीं जाना चाहिये॥ १५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा सञ्जयस्य गृहे तदा।<br>संस्थितौ मानितौ राज्ञा कृतातिथ्यौ महात्मना॥ १६ | ऐसा सोचकर हम दोनों राजा संजयके भवनमें ठहर गये और उन महात्मा नरेशने हमलोगोंका सम्मानपूर्वक आतिथ्य किया॥ १६॥ |
| दमयन्तीति विख्याता तस्य पुत्री महीपतेः।<br>आज्ञाप्ता परिचर्यार्थं सुदती सुन्दरी भृशम्॥ १७ | उन राजा संजयकी परम सुन्दरी तथा मनोहर दाँतोंवाली दमयन्ती नामसे विख्यात एक कन्या थी; उन्होंने उसे हमलोगोंकी सेवाके लिये आदेश दे दिया॥ १७॥ |
| विवेकज्ञा विशालाक्षी राजपुत्री कृतोद्यमा।<br>सेवनं सर्वकाले च व्यदधादुभयोरपि॥ १८ | विवेकका ज्ञान रखनेवाली तथा उद्यमी स्वभाववाली वह विशालनयना राजकुमारी सभी समय हम दोनोंकी सेवा करती रहती थी॥ १८॥ |
| स्नानार्थमुदकं काले भोजनं मृष्टमायतम्।<br>मुखवासं तथा चान्यं यदिष्टं तद्ददाति सा॥ १९ | वह हमारे स्नानके लिये जल, पर्याप्त मधुर भोजन, मुख-शुद्धिके लिये सुगन्धित गन्ध-द्रव्य तथा और भी जो हमारा अभीष्ट रहता, उसे समयसे हमलोगोंको दिया करती थी॥ १९॥ |
| मनोऽभिलषितान्कामानुभयोरपि कन्यका।<br>व्यजनासनशय्यादीन्वाञ्छितानप्यकल्पयत् ॥ २० | वह कन्या हम दोनोंकी मनोभिलषित वस्तुएँ उपस्थित किया करती थी। वह व्यजन (पंखा), आसन तथा शय्या आदि मनोवांछित सामग्रियोंको उपलब्ध कराती रहती थी॥ २०॥ |
| एवं संसेव्यमानौ तु स्थितौ राज्ञो गृहे किल।<br>वेदाध्ययनसंशीलावावां वेदव्रते रतौ॥ २१ | इस प्रकार उसके द्वारा सेवित होते हुए हम दोनों राजा संजयके भवनमें रहने लगे। वेदाध्ययनके स्वभाववाले हम दोनों मुनि सदा वेदव्रतमें संलग्न रहते थे॥ २१॥ |
| अहं वीणां करे कृत्वा साधयित्वा स्वरोत्तमम्।<br>गायत्रं साम सुस्वादमगां कर्णरसायनम्॥ २२ | मैं हाथमें वीणा धारणकर उत्तम स्वरकी साधना करके कानोंके लिये रसायनस्वरूप अत्यन्त मधुर गायत्र-सामका गान करता रहता था॥ २२॥ |
| राजपुत्री तु तच्छ्रुत्वा सामगानं मनोहरम्।<br>बभूव मयि रागाढ्या प्रीतियुक्ता विशारदा॥ २३ | मनोहर सामगान सुनकर वह विदुषी राजकुमारी मेरे प्रति अनुरागयुक्त तथा प्रीतिमय हो गयी॥ २३॥ |
| दिने दिनेऽनुरागोऽस्या मयि वृद्धिं गतः परः।<br>ममापि प्रीतियुक्तायां मनो जातं स्पृहापरम्॥ २४ | मेरे प्रति उस राजकुमारीका अनुराग दिनोदिन बढ़ता ही चला गया और मुझमें प्रेम-भाव रखनेवाली उस कन्याके प्रति मेरा भी मन अत्यन्त आसक्त हो उठा॥ २४॥ |
| मम तस्य च सा कन्या भोजनादिषु कर्हिचित्।<br>अकरोदन्तरं किञ्चित्सेवाभेदं रसान्विता॥ २५ | मुझपर विशेष अनुराग रखनेवाली वह राजकुमारी मेरे तथा उस पर्वतमुनिके लिये किये जानेवाले भोजनादिके प्रबन्धमें तथा सेवाकार्यमें कुछ भेदभाव करने लगी॥ २५॥ |
| ८५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ |
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| स्नानायोष्णजलं मह्यं पर्वताय च शीतलम्।<br>दधि मह्यं तथा तक्रं पर्वतायाप्यकल्पयत्॥ २६ | स्नानके लिये मुझे उष्ण जल तथा पर्वतमुनिके लिये शीतल जल और इसी प्रकार मेरे लिये दही तथा पर्वतमुनिके लिये मट्ठेकी व्यवस्था करती थी॥ २६॥ |
| शयनास्तरणं शुभ्रं मदर्थे पर्यकल्पयत्।<br>प्रीत्या परमया यद्वत्पर्वताय न तादृशम्॥ २७ | वह मेरे लिये अत्यन्त प्रेमपूर्वक जैसा धवल आस्तरण (बिछौना) बिछाती थी, वैसा पर्वतके लिये नहीं॥ २७॥ |
| विलोकयति मां प्रेम्णा सुन्दरी न च पर्वतम्।<br>ततोऽस्यास्तादृशं दृष्ट्वा पर्वतः प्रेमकारणम्॥ २८<br><br>मनसा चिन्तयामास किमेतदिति विस्मितः।<br>पप्रच्छ मां रहः सम्यग्ब्रूहि नारद सर्वथा॥ २९<br><br>राजपुत्री त्वयि प्रेम करोति मुदिता भृशम्।<br>ददाति भक्ष्यभोज्यानि स्नेहयुक्ता समन्ततः॥ ३०<br><br>न तथा मयि भेदोऽत्र सन्देहं जनयत्यसौ।<br>मन्यते त्वां पतिं कर्तुं सर्वथा सञ्जयात्मजा॥ ३१ | वह सुन्दरी मुझे अत्यन्त प्रेमपूर्ण भावसे देखती थी, किंतु पर्वतमुनिको नहीं। तब मुनि पर्वत उस प्रकारका प्रेम-भेद देखकर मन-ही-मन विस्मित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्यों हो रहा है? एकान्तमें उन्होंने मुझसे पूछा—हे नारद! मुझे भलीभाँति बताइये, यह राजकुमारी अत्यन्त प्रसन्न होकर आपसे अत्यधिक प्रेम करती है और स्नेहयुक्त होकर आपको नानाविध भोज्य-पदार्थ देती है, किंतु वैसा मेरे साथ नहीं करती है; यह भेद-भाव मेरे मनमें सन्देह उत्पन्न कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजा संजयकी पुत्री आपको निश्चय ही पति बनाना चाहती है॥ २८-३१॥ |
| तवापि तादृशं भावं जानामि लक्षणैरहम्।<br>नेत्रवक्त्रविकारैश्च ज्ञायते प्रीतिकारणम्॥ ३२ | आपकी चेष्टाओंसे आपका भी वैसा ही भाव मुझे परिलक्षित हो रहा है; क्योंकि नेत्र तथा मुखके विकारोंसे प्रेमके कारणका पता चल जाता है॥ ३२॥ |
| सत्यं वद न ते मिथ्या वक्तव्यं वचनं मुने।<br>स्वर्गतः समयं कृत्वा चलितौ संस्मराधुना॥ ३३ | हे मुने! सच-सच कहिये। मिथ्या वचन मत बोलिये। स्वर्गसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे इस समय याद कीजिये॥ ३३॥ |
| नारद उवाच<br>पृष्टोऽहं पर्वतेनेदं कारणं तु हठाद्यदा।<br>तदाहं ह्रीसमाक्रान्तः सञ्जातश्चाब्रुवं पुनः॥ ३४<br><br>पर्वतैषा विशालाक्षी पतिं मां कर्तुमुद्यता।<br>ममापि मानसो भावो वर्ततेऽस्यां विशेषतः॥ ३५ | **नारदजी बोले—**जब पर्वतमुनिने हठपूर्वक इसका कारण मुझसे पूछा तब मैं अत्यन्त लज्जित हो गया और पुनः बोला—हे पर्वत! विशाल नयनोंवाली यह राजकुमारी मुझे पति बनानेके लिये उद्यत है और उसके प्रति मेरे भी मनमें विशेष अनुराग भाव उत्पन्न हो गया है॥ ३४-३५॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं पर्वतः कोपसंयुतः।<br>मामुवाच मुनिर्वाक्यं धिग्धिगिति पुनः पुनः॥ ३६<br><br>प्रथमं शपथान्कृत्वा वञ्चितोऽहं त्वया यतः।<br>भव वानरवक्त्रस्त्वं शापाच्च मम मित्रध्रुक्॥ ३७ | मेरा यह सत्य वचन सुनकर पर्वतमुनि कुपित हो उठे और उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम्हें बार-बार धिक्कार है; क्योंकि प्रतिज्ञा करके पहले तुमने मुझे धोखा दिया है, अतएव हे मित्रद्रोही! मेरे शापसे तुम अभी बन्दरके मुखवाले हो जाओ’॥ ३६-३७॥ |
| इति शप्तस्तु तेनाहं कुपितेन महात्मना।<br>सहसा ह्यभवं क्रूरः शाखामृगमुखस्तदा॥ ३८ | उस कुपित महात्मा पर्वतके ऐसा शाप देते ही मैं तत्काल भयंकर बन्दरकी मुखाकृतिवाला हो गया॥ ३८॥ |