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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 616 में से

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पृष्ठ 88

अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७३
मतिविपुलशाखास्तरवोऽभिभूय पुरुषमवतत्यैवोत्तिष्ठन्ते, यैरभिभूतो न
सत्तामतिवर्तते ।
भगवान् आत्रेय बोले—मोह (मिथ्याज्ञान), इच्छा, द्वेष और कर्म (धर्मा-
धर्म) इनके कारण से प्रवृत्ति होती है। जैसे—एक छोटे वृक्ष को इसी वृक्ष से
उत्पन्न बहुत बड़ी बड़ी शाखाये और अन्य अनेक वृक्ष घेर लेते है, उसी प्रकार
इन मोह आदि से उत्पन्न अहंकार (मैं हू ऐसा भाव), अच्छा बुरा सग,
सशय, अभिसप्लव (अपने को सब कुछ मानना), अभ्यवपात (बाह्य सम्बन्धों
की ममता में फसना), विप्रत्यय (विपरीत प्रतीति करना), अविशेष (धर्म
अधर्म आदि मे समान प्रतीति) और अनुपाय (स्नान, मार्जन, होम, जप,
अग्नि मे प्रवेश आदि अवास्तविक उपायो का अवलम्बन) पुरुष को घेर कर
स्वय प्रबल हो जाते हैं। इनसे दब कर पुरुष अपनी वास्तविक सत्ता वा प्रवृत्ति
के कारण को नहीं जान सकता ।
तत्रैवजाति-रूप-वित्त-वृत्त-बुद्धि-शील-विद्याभिजन-वयो-वीर्य-
प्रभाव-सपन्नोऽहमित्यहङ्कारः, यद्यन्मनोवाक्कायकर्म नापवर्गाय स सङ्गः।
कर्मफल-मोक्ष-पुरुष-प्रेत्यभावादयः सन्ति वा नेति सशयः, सर्वास्ववस्थास्व-
नन्योऽहमहं स्रष्टा स्वभावसंसिद्धोऽहमहं शरीरेन्द्रिय-बुद्धि-स्मृति-विशेष-
राशिरिति ग्रहणमभिसप्लवः, मम मातृ पितृ-भ्रातृ-दारापत्य-बन्धु-मित्र-
भृत्य-गणो गणस्य चाहमित्यभ्यवपातः, कार्याकार्य-हिताहित-शुभाशुभेषु
विपरीताभिनिवेशो विप्रत्ययः, ज्ञाज्ञयोः प्रकृतिविकारयोः प्रवृत्तिनिवृ-
त्त्योश्च सामान्यदर्शनमविशेषः, प्रोक्षणानशनाग्निहोत्र-त्रिःसवनाभ्युक्ष-
णावाहन-यजन-याजन याचना-सलिल-हुताशन-प्रवेशादयः समारम्भाः
प्रोच्यन्ते ह्यनुपायाः ।
इस अवस्था मे वह जाति, रूप, वित्त, आचार, बुद्धि, शील, विद्या, कुटुम्ब,
वय, वीर्य, प्रभाव से मैं ऐश्वर्य्यशाली हूँ ऐसा भाव होना 'अहकार' है । मन,
वाणी, शरीर के जो कार्य मोक्ष के लिये न हों वह 'सग' है । कर्मों के फल, मोक्ष,
पुरुष (आत्मा) प्रेत्यभाव अर्थात् पुनर्जन्म आदि है या नहीं इसका नाम
'सशय' है। सब अवस्थाओं में मैं ही एक मात्र हूँ, मैं ही स्रष्टा हूँ, मै स्वभाव
से सिद्ध हूँ, मै ही शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, स्मृति विशेष का समूह हूँ-ऐसा सम-
झना अभिसप्लव है । मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भाई, मेरी स्त्री, मेरे पुत्र, मेरे
बन्धु, मेरे मित्र, मेरे भृत्य आदि और मै इनका हूँ, इसी का नाम ममता 'अभ्य
वपात' है । कार्य-अकार्य, हित-अहित, शुभ-अशुभ में विपरीत (कार्य में अकार्य
और अकार्य में कार्य आदि का) ज्ञान होना 'विप्रत्यय' है । ज्ञानी-अज्ञानी