चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] शरीरस्थानम् ७१
यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, यथा द्वापरस्तथा
स्थाविर्यं, यथा कलिरैवमातुर्यं, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति । एव-
मनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश ! सामा-
न्य विद्यात् ॥ ४ ॥
इस पुरुष में पृथिवी कठिन भाग है, क्लेद अर्थात् जलवाला अंश आप (जल)
है, तेज उष्णिमा है, वायु प्राण है, आकाश छिद्ररूप है, ब्रह्म आत्मा है।
जिस प्रकार लोक में ब्रह्म की विभूति है उसी प्रकार पुरुष में अन्तरात्मा की
विभूति (ऐश्वर्य) है। लोक में ब्रह्म की विभूति प्रजापति है, पुरुष में अन्त-
रात्मा की विभूति 'सत्त्व' है। लोक में जो इन्द्र है, पुरुष में वही अहंकार है।
लोक में जो आदित्य है, पुरुष में वही आदान है। लोक में जो रुद्र है पुरुष में
वही रोष (क्रोध) है। लोक का सोम पुरुष में प्रसाद है। लोक में जो वसु हैं,
वे पुरुष में सुख हैं। लोक के दो अश्विनी हैं, पुरुष में वे ही कान्तिरूप हैं।
लोक में जो मरुत हैं पुरुष में वह उत्साह है। लोक में जो विश्वेदेव हैं, पुरुष
में वे इन्द्रियां और इन्द्रियों के विषय हैं। लोक का तम पुरुष में मोह है।
लोक की ज्योति पुरुष में ज्ञान है। जिस प्रकार लोक में सर्ग अर्थात् सृष्टि का
प्रारम्भ है उसी प्रकार पुरुष में गर्भाधान क्रिया है। जिस प्रकार लोक में
सत्युग है उसी प्रकार पुरुष में बाल्य-अवस्था है। जिस प्रकार लोक में
त्रेतायुग है उसी प्रकार पुरुष में यौवन है। जिस प्रकार लोक में द्वापर है उसी
प्रकार पुरुष में बुढ़ापा है। जिस प्रकार लोक में कलियुग है उसी प्रकार पुरुष
में रोग है। जिस प्रकार लोक में युग का समाप्ति है उसी प्रकार पुरुष में मृत्यु
है। इस प्रकार से हे अग्निवेश ! लोक और पुरुष इन दोनों के उन २ विशेष
अवयवों को समानता को अनुमान के द्वारा जान लेना चाहिये जिनका यहां
वर्णन नहीं किया है ॥ ४ ॥
इत्येववादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-एवमेतत्सर्वमनप-
वादं यथोक्तं भगवता लोकपुरुषयोः सामान्यम् । किन्वस्य सामान्यो-
पदेशस्य प्रयोजनमिति ॥ ५ ॥
इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा-हे
भगवन् ! आपने जो लोक और पुरुष की समानता कही है वह बिना किसी
अपवाद के निर्विवाद ठीक है। परन्तु इस समानता के उपदेश का
प्रयोजन क्या है ? ॥ ५ ॥
भगवानुवाच-कथमग्निवेश ! सर्वलोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके
समनुपश्यतः सत्या बुद्धिः समुत्पत्स्यते इति, सर्वलोकं ह्यात्मनि पश्यतो