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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

९२- शृगालोपाख्यान

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७६९

किंतु आठों भैरव, एकादश रुद्र, आठ वसु, इन्द्र आदि ये देवगण, द्वादश आदित्य, सभी दैत्यराज, देवताओंके अग्रणी स्कन्द तथा गणसहित बाण—ये सभी संग्राममें अनिरुद्धको पराजित नहीं कर सकते। अनिरुद्ध स्वयं ब्रह्मा, प्रद्युम्न कामदेव, बलदेव स्वयं शेषनाग और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे

हैं। गणेश्वर ! इस प्रकार यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। तुम तो स्वयं ही शुभस्वरूप और विघ्नोंका विनाश करनेवाले हो; अतः बाणकी रक्षा करो। श्रीहरि अस्त्रश्रेष्ठ सुदर्शनको, जो अमोघ और करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् है, लेकर शीघ्र ही आयेंगे।

(अध्याय ११७)


मणिभद्रका शिवजीको सेनासहित श्रीकृष्णके पधारनेकी सूचना देना, शिवजीका बाणकी रक्षाके लिये दुर्गासे कहना, दुर्गाका बाणको युद्धसे विरत होनेकी सलाह देना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार गणेशको समझाकर शिवजी महलके भीतर गये। वहाँ दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, भैरवी, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी रमणीय सिंहासनोंपर विराजमान थीं। उन सबने सहसा उठकर जगदीश्वर शिवको नमस्कार किया। तत्पश्चात् गणेश, पराक्रमी कार्तिकेय, बाण, वीरभद्र, स्वयं नन्दी, सुनन्दक, महामन्त्री महाकाल, आठों भैरव, सिद्धेन्द्र, योगीन्द्र और एकादश रुद्र—ये सभी वहाँ आ गये। इसी बीच सिंहद्वारपर पहरा देनेवाला स्वयं मणिभद्र वहाँ आया और उन परमेश्वर शिवसे बोला।

मणिभद्रने कहा—महेश्वर ! बलदेव, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, महाराज उग्रसेन, स्वयं भीम, अर्जुन, अक्रूर, उद्धव और शक्रनन्दन जयन्त तथा जो विधिके भी विधाता हैं, जिनकी कान्ति करोड़ों कामदेवोंकी शोभाको छीने लेती है, वनमाला जिनकी शोभा बढ़ा रही है, सात गोप-पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा जिनकी सेवा कर रहे हैं, जो करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् अनुपम चक्र धारण करते हैं; वे परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे निर्मित परम रमणीय उत्तम रथमें कौमोदकी गदा, अमोघ शूल और विश्वसंहारकारी महाशङ्ख पाञ्चजन्य रखकर यादवोंकी असंख्य

सेनाओंके साथ पधार गये हैं। प्रभो! बलदेवने हलके द्वारा लाखों मल्लोंका कचूमर निकाल दिया है और उद्यानोंकी चहारदीवारीको तोड़-फोड़ डाला है। वे द्वारपालोंका वध करके महाद्वारमें घुस आये हैं। ऐसा सुनकर महादेवजी उस सुर-समाजमें पार्वती, भद्रकाली, स्कन्द, गणपति, आठों भैरवों, एकादश रुद्रों, वीरभद्र, महाकाल, नन्दी तथा सभी नवों सेनापतियोंसे बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—सेनाध्यक्षो ! गोलोक-नाथ भगवान् चक्रपाणि आ गये हैं। वे क्षणभरमें विश्व-समूहका विनाश कर सकते हैं; फिर इस नगरकी तो बात ही क्या है। अतः तुम सब लोग सभी उपायोंद्वारा यलपूर्वक बाणकी रक्षा करो। अब बाण लम्बोदर गणेशका स्मरण करके संग्रामभूमिको जाय। उसके दक्षिणभागमें स्कन्द, आगे-आगे गणेश्वर और वामभागमें आठों भैरव, एकादश रुद्र, स्वयं महारथी नन्दी, महाकाल, वीरभद्र तथा अन्यान्य सैनिक उसकी रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें दुर्गा, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरीको रहना चाहिये। दुर्गतिनाशिनी दुर्गे! बाणकी रक्षा करो। महाभागे! तुम्हीं श्रीकृष्णकी शक्ति हो; इसीलिये 'नारायणी' कही जाती हो। विष्णुमाये! तुम जगज्जननी तथा सम्पूर्ण मङ्गलोंकी भी मङ्गलस्वरूपा हो; अतः चक्रोंके साररूप

७७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अमोघ सुदर्शनचक्रसे बाणको बचाओ; क्योंकि बाण मुझे गणेश, कार्तिकेय आदि सभीसे भी बढ़कर प्रिय है। अतः बाणके मस्तकपर तुम अपने चरणकमलकी रजके साथ-साथ अपना वरद हस्त स्थापित करो। शिवजीका कथन सुनकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गा मुस्करायीं और समयोचित यथार्थ मधुर वचन बोलीं।

पार्वतीजीने कहा—बाण! तुम्हारे पास जो-जो उत्तम मणि, रत्न, मोती, माणिक्य और हीरे आदि हैं, उस सारे धनको तथा रत्नाभरणोंसे विभूषित अपनी कन्या उषाको रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित परम श्रेष्ठ अनिरुद्धको आगे करके परमात्मा श्रीकृष्णको सौंप दो और इस प्रकार अपने राज्यको निष्कण्टक बना लो। भला, जिसके निकल जानेपर इन्द्रियोंसहित सभी प्राण विलीन हो जाते हैं, उस जीवका आत्माके साथ युद्ध कैसा? मैं ही शक्ति हूँ, ब्रह्मा मन हैं और स्वयं शिव ज्ञानस्वरूप हैं। शिवका त्याग करके देह तुरंत ही गिर जाता है और शवरूप हो जाता है। शिवजी! भला, संग्राममें सुदर्शनचक्रके तेजके सामने कौन ठहर सकता है? श्रीकृष्ण सबके परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, नित्य, सत्य, परिपूर्णतम प्रभु हैं। गणेश और कार्तिकेय तथा उन दोनोंसे भी परे आप मेरे लिये प्रिय हैं और किंकरोंमें बाण प्रिय है; किंतु श्रीकृष्णसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। मैं ही वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, गोलोकमें स्वयं राधिका, शिवलोकमें शिवा और ब्रह्मलोकमें सरस्वती हूँ। पूर्वकालमें मैं ही दैत्योंका संहार करके दक्षकन्या सती हुई, फिर वही मैं आपकी निन्दाके कारण शरीरका त्याग करके शैलकन्या पार्वती बनी। रक्तबीजके युद्धमें मैंने ही मूर्तिभेदसे कालीका रूप धारण किया था। मैं ही वेदमाता सावित्री, जनकनन्दिनी सीता और भारतभूमिपर द्वारकामें भीष्मक-पुत्री रुक्मिणी हूँ। इस समय दैववश सुदामाके शापसे मैं वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई हूँ और पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी धर्मपत्नी हूँ। आप तो स्वयं सर्वज्ञ सनातन भगवान् शिव हैं। भला, मैं आपको क्या समयोचित कर्तव्य बतला सकती हूँ।

(अध्याय ११८)


शिवजीका कन्या देनेके लिये बाणको समझाना, बाणका उसे अस्वीकार करना, बलिका आगमन और सत्कार, बलिका महादेवजीका चरणवन्दन करके श्रीभगवान्‌का स्तवन करना, श्रीभगवान्‌द्वारा बलिको बाणके न मारनेका आश्वासन

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! पार्वतीकी बात सुनकर गणेश, कार्तिकेय, काली तथा स्वयं शिव उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर जो परात्परा, ज्योतिःस्वरूपा, परमा, मूलप्रकृति और ईश्वरी हैं; उन जगज्जननी पार्वतीसे भगवान् शम्भु बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—देवेशि! तुमने जो यह कहा है कि परमात्माके साथ युद्ध करना अयुक्त तथा उपहासास्पद है; अतः बाण अपनी कन्या उषाको स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित करके श्रीकृष्णको दे दे। यही समस्त कर्मोंमें सामञ्जस्य, यशस्कर और शुभदायक है। तुम्हारा यह सारा कथन वेदसम्मत है; परंतु बाण हिरण्यकशिपुका वंशज है; अतः यदि वह कन्या दे देता है और भयभीत होकर युद्धसे पराङ्मुख हो जाता है तो यह तुम्हारे लिये ही अकीर्तिकर है। इसलिये शिवे! रणशास्त्रविशारद बाण कवच धारण करके आगे चले; तत्पश्चात् हमलोग भी कवचसे सुसज्जित हो उसका अनुगमन करेंगे। पार्वतीसे यों कहकर शंकरजीने बाणसे कन्या