ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९१- ब्राह्मणबालकका रूप धारणकर शंकरजीका तपस्या करती हुई पार्वतीके पास आना और उनसे बातचीत
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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प्रेम-विह्वल हो महाभक्त शिव रोने लगे। उन्होंने
सोचा, सहस्रमुख शेषनाग तथा चतुर्मुख ब्रह्मा बड़े
भाग्यवान् हैं, जिन्होंने बहुसंख्यक नेत्रोंसे भगवान्के
मनोहर रूपका दर्शन करके अनेक मुखोंसे उनकी
स्तुति की है। मैं ऐसे स्वामीको पाकर दो ही
नेत्रोंसे इनके रूपको क्या देखूँ और एक ही मुखसे
इनकी क्या स्तुति करूँ? इस बातको उन्होंने चार
बार दोहराया। तपस्वी शंकरके मन-ही-मन इस
प्रकार संकल्प करनेपर उनके चार मुख और
प्रकट हो गये तथा पहलेके मुखको लेकर पञ्चम
संख्याकी ही पूर्ति हो गयी। उनका एक-एक
मुख तीन-तीन नेत्रोंसे सुशोभित होने लगा;
इसलिये वे पञ्चमुख और त्रिलोचन नामसे प्रसिद्ध
हुए। शिवकी स्तुतिकी अपेक्षा मेरे रूपके दर्शनमें
ही अधिक प्रेम है; इसलिये उनके नेत्र ही अधिक
प्रकट हुए। उन ब्रह्मस्वरूप शिवके वे तीन नेत्र
सत्त्व, रज तथा तम नामक तीन गुणरूप हैं;
इसका कारण सुनो। भगवान् शिव सात्त्विक
अंशवाली दृष्टिसे देखते हुए सात्त्विक जनोंकी,
राजस दृष्टिसे राजसिक लोगोंकी तथा तामस
दृष्टिसे तमोगुणी लोगोंकी रक्षा करते हैं। संहारकर्ता
हरके ललाटवर्ती तामस नेत्रसे पीछे चलकर
संहारकालमें क्रोधपूर्वक संवर्तक अग्निका आविर्भाव
होता है। वे अग्निदेव करोड़ों ताड़ोंके बराबर ऊँचे,
करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा विशाल
लपटोंसे युक्त हो अपनी जीभ लपलपाते हुए
तीनों लोकोंको दग्ध कर देनेमें समर्थ हैं।
भगवान् शंकर सतीके दाह-संस्कारजनित
भस्मको लेकर अपने अङ्गोंमें मलते हैं। इसलिये
'विभूतिधारी' कहे जाते हैं। सतीके प्रति प्रेमभावके
कारण ही वे उनकी हड्डियोंकी माला और भस्म
धारण करते हैं। यद्यपि शिव स्वात्माराम हैं,
तथापि उन्होंने पूरे एक सालतक सतीके शवको
लेकर चारों ओर घूमते हुए रोदन किया था।
सतीका एक-एक अङ्ग जहाँ-जहाँ गिरा, वहाँ-
वहाँ सिद्धपीठ हो गया, जो मन्त्रोंकी सिद्धि प्रदान
करनेवाला है। राधिके! तदनन्तर अवशिष्ट शवको
छातीसे लगाकर वे मूर्च्छित हो सिद्धक्षेत्रमें गिर
पड़े। तब मैंने महेश्वरके पास जा उन्हें गोदमें
ले सचेत किया और शोकको हर लेनेवाले परम
उत्तम दिव्य तत्त्वका उपदेश दिया। उस समय
शिव संतुष्ट हो अपने लोकको पधारे और अपनी
ही दूसरी मूर्ति कालके द्वारा उन्होंने अपनी प्रिया
सतीको प्राप्त कर लिया। वे योगस्थ होनेके कारण
दिगम्बर हैं। उन नित्य परमेश्वरमें इच्छाका सर्वथा
अभाव है। उनके सिरपर जो जटाएँ हैं, वे
तपस्या-कालकी हैं, जिन्हें वे आज भी विवेकपूर्वक
धारण करते हैं। योगीको केशोंका संस्कार करने
(बालोंको सँवारने) तथा शरीरको वेश-भूषासे
विभूषित करनेकी इच्छा नहीं होती। उसका
चन्दन और कीचड़में तथा मिट्टीके ढेले और श्रेष्ठ
मणिरत्नमें भी समभाव होता है। गरुड़से द्वेष
रखनेवाले सर्प भगवान् शंकरकी शरणमें गये।
उन्हीं शरणागतोंको वे कृपापूर्वक अपने शरीरमें
धारण करते हैं। उनका वृषभरूप वाहन तो मैं
स्वयं हूँ। दूसरा कोई भी उनका भार वहन
करनेमें समर्थ नहीं है। पूर्वकालमें त्रिपुरके वधके
समय मेरे कलांशसे उस वृषभकी उत्पत्ति हुई।
पारिजात आदि पुष्प तथा चन्दन आदि सुगन्धित
पदार्थ वे शिव मुझको अर्पित कर चुके हैं;
इसलिये उनमें उनकी कभी प्रीति नहीं होती।
धतूर, बिल्वपत्र, बिल्व-काष्ठका अनुलेपन, गन्धहीन
पुष्प तथा व्याघ्रचर्म योगियोंको अभीष्ट हैं। इसलिये
उनमें उनकी सदा प्रीति रहती है। दिव्य लोकमें,
दिव्य शय्यामें और जनसमुदायमें उनका मन नहीं
लगता है; इसलिये वे अत्यन्त एकान्त श्मशानमें
रहकर दिन-रात मेरा ध्यान किया करते हैं।
ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त प्रत्येक प्राणीको
भगवान् शिव समान समझते हैं। केवल मेरे इस
अनिर्वचनीय रूपमें ही उनका मन निरन्तर लगा
५८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
रहता है। ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भी
शूलपाणि शंकरका क्षय नहीं होता। उनकी
आयुका प्रमाण मैं भी नहीं जानता, फिर श्रुति
क्या जानेगी ? मृत्युञ्जय शिव ज्ञानस्वरूप हैं। वे
मेरे तेजके समान शूल धारण करते हैं। मेरे बिना
कोई भी शंकरको जीत नहीं सकता। शंकर मेरे
परम आत्मा हैं। शिव मेरे लिये प्राणोंसे भी
बढ़कर हैं। उन त्रिलोचनमें मेरा मन सदा लगा
रहता है। भगवान् भवसे बढ़कर मेरा प्रिय और
कोई नहीं है। राधे ! मैं गोलोक और वैकुण्ठमें
नहीं रहता। तुम्हारे वक्षमें भी वास नहीं करता।
मैं तो सदाशिवके प्रेमपाशमें बँधकर उन्हींके
हृदयमें निरन्तर निवास करता हूँ*।
शंकर अपने पाँच मुखोंद्वारा मीठी तानके
साथ सदा मेरी गाथाका स्वरसिद्ध गान किया
करते हैं। इसलिये मैं उनके समीप रहता हूँ। वे
योगद्वारा भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्माण्ड-समुदायकी
सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। शंकरसे
बढ़कर दूसरा कोई योगी नहीं है। जो अपने दिव्य
ज्ञानसे भ्रूभङ्ग-लीलाद्वारा नष्ट हुए मृत्यु और काल
आदिकी पुनः सृष्टि करनेमें समर्थ हैं; उन शंकरसे
बढ़कर कोई ज्ञानी नहीं है। वे मेरी भक्ति,
दास्यभाव, मुक्ति, समस्त सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण
सिद्धिको भी देनेमें समर्थ हैं; अतः शंकरसे
बढ़कर कोई दाता नहीं है। वे पाँच मुखोंसे दिन-
रात मेरे नाम और यशका गान करते हैं और
निरन्तर मेरे स्वरूपका ध्यान करते रहते हैं; अतः
शंकरसे बढ़कर कोई भक्त नहीं है। मैं, सुदर्शनचक्र
तथा शिव-ये तीनों समान तेजस्वी हैं। सृष्टिकर्ता
ब्रह्मा भी योग और तेजमें हम लोगोंकी समानता
नहीं करते हैं। प्रिये ! इस प्रकार मैंने शंकरके
निर्मल यशका पूर्णतः वर्णन किया, तथापि उनका
भी दर्प दलित हुआ। अब तुम और क्या सुनना
चाहती हो ?
(अध्याय ३५-३६)
देवी सती और पार्वतीके गर्व-मोचनकी कथा, सतीका देहत्याग, पार्वतीका जन्म,
गर्ववश उनके द्वारा आकाशवाणीकी अवहेलना, शंकरजीका आगमन,
शैलराजद्वारा उनकी स्तुति तथा उस स्तुतिकी महिमा
तदनन्तर शिव-निर्माल्यका प्रसङ्ग सुनाकर
श्रीकृष्णने कहा-देवि ! जगद्गुरु शंकरके दर्प-
भङ्गका वृत्तान्त तो तुमने सुन लिया। अब मुझसे
दुर्गाके दर्पविमोचनकी कथा सुनो। सम्पूर्ण देवताओंके
तेजसे प्रकट हो जगदम्बाने कामिनीका कमनीय
एवं मनोहर रूप धारण किया तथा दानवेन्द्रोंका
वध करके देवकुलकी रक्षा की। इसके बाद
देवीने दक्षपत्नीके उदरसे जन्म लिया। दक्षकन्या
सतीदेवीने पिनाकपाणि शिवको पतिरूपमें ग्रहण
किया और बड़ी भक्तिके साथ वे निरन्तर
स्वामीकी सेवामें लगी रहीं। दैवयोगसे देवताओंकी
सभामें दक्षके साथ शिवकी अकारण शत्रुता हो
गयी। दक्षने घर आकर एक यज्ञका आयोजन
किया। उसमें उन्होंने समस्त देवताओंको आमन्त्रित
किया; किंतु क्रोधके कारण शंकरको नहीं
बुलाया। सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ दक्षके
घर आये; परंतु स्वाभिमानवश शंकर अपने
गणोंके साथ वहाँ नहीं गये। उनके मनमें भी
- शंकरः परमात्मा मे प्राणेभ्योऽपि परः शिवः। त्र्यम्बके मन्मनः शश्वन्न प्रियो मे भवात्परः ॥
न संवसामि गोलोके वैकुण्ठे तव वक्षसि । सदाशिवस्य हृदये निबद्धः प्रेमपाशतः ॥
(३६।१०८, ११०)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८५
दक्षके प्रति बड़ा रोष था। सतीके मनमें पिता
आदिके प्रति मोह था; इसलिये उन्होंने यत्नपूर्वक
पतिदेवको उस यज्ञमें चलनेके लिये समझाया।
जब किसी तरह उन्हें वहाँ ले जानेमें वे समर्थ
न हो सकीं, तब स्वयं चञ्चल हो उठीं और
पतिकी आज्ञा प्राप्त किये बिना ही दर्पवश पिताके
घर चली आयीं। पतिके शापसे वहाँ उनका दर्प-
भङ्ग हुआ। पिताने उनसे बाततक नहीं की।
वाणीमात्रसे भी पुत्रीका सत्कार नहीं किया।
इतना ही नहीं, उन्हें वहाँ पतिकी निन्दा भी
सुननी पड़ी। उसे सुनकर स्वाभिमानवश सतीने
अपने शरीरको त्याग दिया।
प्रिये ! इस प्रकार सतीके दर्प-भङ्गका वृत्तान्त
कहा गया। अब तुम उनके जन्मान्तर तथा दर्प-
दलनकी कथा सुनो। सतीने शीघ्र ही गिरिराज
हिमालयकी पत्नी मेनाके गर्भसे जन्म ग्रहण
किया। शिवने प्रेमवश सतीकी चिताका भस्म
और उनकी अस्थियाँ ग्रहण कीं। अस्थियोंकी तो
माला बनायी और भस्मसे अङ्गरागका काम
लिया। वे प्रेमवश बार-बार सतीको याद करते
और उनके विरहमें इधर-उधर घूमते रहते थे।
उधर मेनाने देवीको जन्म दिया। उनकी आकृति
बड़ी ही मनोहर थी। विधाताकी सृष्टिमें
गिरिराजनन्दिनीके लिये कहीं कोई उपमा
नहीं थी। गुणोंकी तो वे जननी ही हैं; अतः सभी
और सब प्रकारके सद्गुणोंको धारण करती हैं।
समस्त देवपत्नियों उनकी सोलहवीं कलाके बराबर
भी नहीं हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला
बढ़ती है, उसी तरह हिमालयके घरमें वे देवी
दिनोंदिन बढ़ने लगीं। जब उन्होंने युवावस्थामें
प्रवेश किया, तब उन जगदम्बाको सम्बोधित
करके आकाशवाणीने कहा—'शिवे ! तुम
कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शिवको पति-रूपमें
प्राप्त करो; क्योंकि तपस्याके बिना ईश्वरको
पाना अथवा उनके अंशसे गर्भ धारण करना
असम्भव है।' यह आकाशवाणी सुनकर यौवनके
गर्वसे भरी हुई पार्वती हँसकर चुप हो रहीं। वह
मन-ही-मन सोचने लगीं कि 'जो मेरे दूसरे
जन्मकी अस्थि और भस्मको धारण करते हैं; वे
इस जन्ममें मुझे सयानी हुई देख कैसे नहीं ग्रहण
करेंगे। जो चतुर होकर भी मेरे शोकसे समूचे
ब्रह्माण्डमें भटकते फिरे; वे ही मुझ परम
सुन्दरीको अपनी आँखोंसे देख लेनेपर क्यों नहीं
ग्रहण करेंगे ? जिन कृपानिधानने मेरे लिये
दक्षयज्ञका विध्वंस कर डाला था; वे अपनी
जन्म-जन्मकी पत्नी मुझ पार्वतीको क्यों नहीं
ग्रहण करेंगे ? पूर्वजन्मसे ही जो जिसकी पत्नी है
और जिसका जो पति है, उन दोनोंमें यहाँ भेद
कैसे हो सकता है ? क्योंकि प्रारब्धको कोई पलट
नहीं सकता।'
अत्यन्त अभिमानके कारण अपनेको समस्त
रूप और गुणोंका आधार मानकर साध्वी शिवाने
तप नहीं किया। उन्होंने शिवको ईश्वर नहीं
समझा। 'समस्त सुन्दरियोंमें मुझसे बढ़कर सुन्दरी
दूसरी कोई नहीं है'—यह धारणा हृदयमें लेकर
शिवादेवी गर्ववश तपस्यामें नहीं प्रवृत्त हुईं। वे
यही सोचती थीं कि पुरुष अपनी स्त्रियोंके रूप,
यौवन तथा वेश-भूषाका ग्राहक है। शिव मेरा नाम
सुनते ही बिना तपस्याके मुझे ग्रहण कर लेंगे।
मनमें यह विश्वास लेकर गिरिजा हिमवान्के
घरमें रहती थीं और दिन-रात सखी-सहेलियोंके
बीच खेल-कूदमें मतवाली रहा करती थीं। इसी
समय शीघ्रतापूर्वक दूतने गिरिराजके भवनमें
आकर दोनों हाथ जोड़ उनके सामने मधुर
वाणीमें कहा।
दूत बोला-शैलराज ! उठिये, उठिये।
अक्षयवटके पास जाइये। वहाँ वृषभवाहन महादेवजी
अपने गणोंके साथ पधारे हैं। महाराज ! आप
भक्तिभावसे मस्तक झुका उन्हें मधुपर्क आदि
देकर उन इन्द्रियातीत देवेश्वरका पूजन कीजिये।
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महादेवजी सिद्धस्वरूप, सिद्धोंके स्वामी, योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु, मृत्युञ्जय, कालके भी काल तथा सनातन ब्रह्मज्योति हैं। वे प्रभु परमात्मस्वरूप, सगुण तथा निर्गुण हैं। उन्होंने भक्तोंके ध्यानके लिये निर्मल महेश्वररूप धारण किया है।
दूतकी यह बात सुनकर हिमवान् प्रसन्नतापूर्वक उठे और मधुपर्क आदि साथ ले भगवान् शंकरके समीप गये। दूतकी पूर्वोक्त बात सुनकर देवी शिवाके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन्होंने अपने मनमें यही माना कि महेश्वर मेरे ही लिये आये हैं। यही जानकर उन्होंने विविध दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य रत्नालंकारों एवं मालाओंके द्वारा अपने सम्पूर्ण अङ्गोंको सुसज्जित किया। तत्पश्चात् अपने अनुपम रूपको देखकर पार्वती ने मन-ही-मन शंकरजीका ध्यान किया। विशेषतः स्वामीके चरणकमलोंका वे चिन्तन करने लगीं। उस समय शिवको छोड़कर पिता, माता, बन्धु-बान्धव, साध्वी वर्ग तथा सहोदर भाई किसीको भी उन्होंने अपने मनमें स्थान नहीं दिया।
इधर गिरिराज हिमालयने वहाँ जाकर भगवान् चन्द्रशेखरके दर्शन किये। वे गङ्गाजीके रमणीय तटसे ऊपरको आ रहे थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे संस्कारयुक्त माला धारण किये मेरे नामका जप कर रहे थे। उनके सिरपर सुनहरी प्रभासे युक्त जटाराशि विराजमान थी। वे वृषभकी पीठपर बैठकर हाथमें त्रिशूल लिये सब प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित थे। सर्पका ही यज्ञोपवीत पहने सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल थी, वे वस्त्रके स्थानमें व्याघ्रचर्म धारण किये, हड्डियोंकी माला पहने तथा अङ्गोंमें विभूति रमाये बड़ी शोभा पाते थे। दिगम्बर वेष, पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। उनके श्रीअङ्गोंसे करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था। हिमवान्ने उनके चारों ओर एकादश रुद्रोंको देखा, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। शिवके वामभागमें महाकाल और दाहिने भागमें नन्दिकेश्वर खड़े थे। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, बेताल, क्षेत्रपाल, भयानक पराक्रमी भैरव, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन, जैगीषव्य, कात्यायन, दुर्वासा और अष्टावक्र आदि ऋषि—सब उनके सामने खड़े थे। हिमालयने इन सबको मस्तक झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया और पृथ्वीपर माथा टेक दण्डकी भाँति पड़कर दोनों हाथ जोड़ लिये। इसके बाद बड़ी भक्ति-भावनासे शिवके चरणकमल पकड़कर पर्वतराजने नमस्कार किया और नेत्रोंसे आँसू बहाते पुलकित-शरीर हो धर्मके दिये हुए स्तोत्रसे परमेश्वर शिवकी स्तुति आरम्भ की।
**हिमालय बोले—**भगवन्! आप ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। आप ही जगत्पालक विष्णु हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले अनन्त हैं और आप ही कल्याणदाता शिव हैं। आप गुणातीत ईश्वर, सनातन ज्योतिःस्वरूप हैं। प्रकृति और उसके ईश्वर हैं। प्राकृत पदार्थरूप होते हुए भी प्रकृतिसे परे हैं। भक्तोंके ध्यान करनेके लिये आप अनेक रूप धारण करते हैं। जिन रूपोंमें जिसकी प्रीति है, उसके लिये आप वे ही रूप धारण करते हैं। आप ही सृष्टिके जन्मदाता सूर्य हैं। समस्त तेजोंके आधार हैं। आप ही शीतल किरणोंसे सदा शस्योंका पालन करनेवाले सोम हैं। आप ही वायु, वरुण और सर्वदाहक अग्नि हैं। आप ही देवराज इन्द्र, काल, मृत्यु तथा यम हैं। मृत्युञ्जय होनेके कारण मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा यमके भी यम हैं। वेद, वेदकर्ता तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी आप ही
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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हैं। आप ही विद्वानोंके जनक, विद्वान् तथा विद्वानोंके गुरु हैं। आप ही मन्त्र, जप, तप और उनके फलदाता हैं। आप ही वाक् और आप ही वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। आप ही उसके स्रष्टा और गुरु हैं। अहो! सरस्वतीका बीज अद्भुत है। यहाँ कौन आपकी स्तुति कर सकता है?
ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय उनके चरणकमलोंको धारण करके खड़े रहे। भगवान् शिव वृषभपर बैठे हुए शैलराजको प्रबोध देते रहे। जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवसागरमें रहकर भी समस्त पापों तथा भयोंसे मुक्त हो जाता है। पुत्रहीन मनुष्य यदि एक मासतक इसका पाठ करे तो पुत्र पाता है। भार्याहीनको सुशीला तथा परम मनोहारिणी भार्या प्राप्त होती है। वह चिरकालसे खोयी हुई वस्तुको सहसा तथा अवश्य पा लेता है। राज्यभ्रष्ट पुरुष भगवान् शंकरके प्रसादसे पुनः राज्यको प्राप्त कर लेता है। कारागार, श्मशान और शत्रु-संकटमें पड़नेपर तथा अत्यन्त जलसे भरे गम्भीर जलाशयमें नाव टूट जानेपर, विष खा लेनेपर, महाभयंकर संग्रामके बीच फँस जानेपर तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर इस स्तुतिका पाठ करके मनुष्य भगवान् शंकरकी कृपासे समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है।
(अध्याय ३७-३८)
गिरिराज हिमवान्द्वारा गणोंसहित शिवका सत्कार, मेनाको शिवके अलौकिक सौन्दर्यके दर्शन, पार्वतीद्वारा शिवकी परिक्रमा, शिवका उन्हें आशीर्वाद, शिवाद्बारा शिवका षोडशोपचार-पूजन, शंकरद्वारा कामदेवका दहन तथा पार्वतीको तपस्याद्वारा शिवकी प्राप्ति
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! इस प्रकार स्तुति करके गिरिराज हिमवान् नगरसे दूर निवास करनेवाले भगवान् शंकरसे कुछ ही दूरीपर उनकी आज्ञा ले स्वयं भी ठहर गये। उन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान्को मधुपर्क आदि दिया और मुनियों तथा शिवके पार्षदोंका पूजन किया। उस समय मेना स्त्रियोंके साथ वहाँ आयी। उसने वटके नीचे आसन लगाये चन्द्रशेखर शिवको देखा। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे व्याघ्रचर्म धारण किये मुनि-मण्डलीके मध्य भागमें ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो आकाशमें तारिकाओंके बीच द्विजराज चन्द्रमा शोभा पा रहे हों। करोड़ों कन्दर्पोंके समान उनका मनोहर रूप अत्यन्त आह्लाद प्रदान करनेवाला था। वे वृद्धावस्था छोड़कर नूतन यौवन धारण करते थे और अत्यन्त सुन्दर रमणीय रूप हो युवतियोंके चित्त चुरा रहे थे। वे कामातुरा कामिनियोंको कामदेवके समान जान पड़ते थे। सतियोंको औरस पुत्रके समान प्रतीत होते थे। वैष्णवोंको महाविष्णु तथा शैवोंको सदाशिवके रूपमें दृष्टिगोचर होते थे। शक्तिके उपासकोंको शक्तिस्वरूप, सूर्यभक्तोंको सूर्यरूप, दुष्टोंको कालरूप तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको परिपालकके रूपमें दिखायी देते थे। कालको कालके समान, मृत्युको मृत्यु एवं अत्यन्त भयानक जान पड़ते थे। स्त्रियोंके लिये उनका व्याघ्रचर्म मनोहर वस्त्र बन गया। भस्म चन्दन हो गया। सर्प सुन्दर मालाओंके रूपमें परिणत हो गये। कण्ठमें कालकूटकी प्रभा कस्तूरीके समान प्रतीत हुई। जटा सुन्दर सँवारी हुई चूड़ा