सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

८७- रासमण्डलमें मधुसूदनद्वारा मुरलीवादन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५५९
प्रेमके आँसू उमड़ आये और वे भावातिरेकसे उन
गुणातीत प्राणेश्वरकी स्तुति करने लगीं।
राधिका बोलीं- गोलोकनाथ ! गोपीश्वर !
मेरे स्वामिन् ! प्राणवल्लभ ! दीनबन्धो ! दीनेश्वर !
सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। गोपेश्वर ! गोसमुदायके
ईश्वर ! यशोदानन्दवर्धन ! नन्दात्मज ! सदानन्द !
नित्यानन्द ! आपको नमस्कार है। इन्द्रके क्रोधको
भङ्ग (व्यर्थ) करनेवाले गोविन्द ! आपने ब्रह्माजीके
दर्पका भी दलन किया है। कालियदमन !
प्राणनाथ ! श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। शिव
और अनन्तके भी ईश्वर ! ब्रह्मा और ब्राह्मणोंके
ईश्वर ! परात्पर ! ब्रह्मस्वरूप ! ब्रह्मज्ञ ! ब्रह्मबीज !
आपको नमस्कार है। चराचर जगत्रूपी वृक्षके
बीज ! गुणातीत ! गुणस्वरूप ! गुणबीज ! गुणाधार !
गुणेश्वर ! आपको नमस्कार है। प्रभो ! आप
अणिमा आदि सिद्धियोंके स्वामी हैं। सिद्धिकी
भी सिद्धिरूप हैं। तपस्विन् ! आप ही तप हैं
और आप ही तपस्याके बीज; आपको नमस्कार
है। जो अनिर्वचनीय अथवा निर्वचनीय वस्तु है,
वह सब आपका ही स्वरूप है। आप ही उन
दोनोंके बीज हैं। सर्वबीजरूप प्रभो ! आपको
नमस्कार है। मैं, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, गङ्गा
और वेदमाता सावित्री-ये सब देवियाँ जिनके
चरणारविन्दोंकी अर्चनासे नित्य पूजनीया हुई हैं;
उन आप परमेश्वरको बारंबार नमस्कार है।
जिनके सेवकोंके स्पर्श और निरन्तर ध्यानसे तीर्थ
पवित्र होते हैं; उन भगवान्को मेरा नमस्कार है।
यों कहकर सती देवी राधिका अपने
शरीरको जलमें और मन-प्राणोंको श्रीकृष्णमें
स्थापित करके ठूँठे काठके समान अविचल-
भावसे स्थित हो गयीं। श्रीराधाद्वारा किये गये
श्रीहरिके इस स्तोत्रका जो मनुष्य तीनों संध्याओंके
समय पाठ करता है, वह श्रीहरिकी भक्ति और
दास्यभाव प्राप्त कर लेता है तथा उसे निश्चय ही
श्रीराधाकी गति सुलभ होती है। * जो विपत्तिमें
भक्तिभावसे इसका पाठ करता है, उसे शीघ्र ही
सम्पत्ति प्राप्त होती है और चिरकालका खोया
हुआ नष्ट द्रव्य भी उपलब्ध हो जाता है। यदि
कुमारी कन्या भक्तिभावसे एक वर्षतक
प्रतिदिन इस स्तोत्रको सुने तो निश्चय ही उसे
श्रीकृष्णके समान कमनीय कान्तिवाला गुणवान्
पति प्राप्त होता है।
जलमें स्थित हुई राधिकाने श्रीकृष्णके
चरणारविन्दोंका ध्यान एवं स्तुति करनेके पश्चात्
जब आँखें खोलकर देखा तो उन्हें सारा जगत्
श्रीकृष्णमय दिखायी दिया। मुने ! तदनन्तर उन्होंने
यमुना तटको वस्त्रों और द्रव्योंसे सम्पन्न देखा।
देखकर राधाने इसे तन्द्रा अथवा स्वप्नका विकार

  • गोलोकनाथ गोपीश मदीश प्राणवल्लभ। हे दीनबन्धो दीनेश सर्वेश्वर नमोऽस्तु ते॥
    गोपेश गोसमूहेश यशोदानन्दवर्धन। नन्दात्मज सदानन्द नित्यानन्द नमोऽस्तु ते॥
    शतमन्योर्मन्युभङ्ग ब्रह्मदर्पविनाशक। कालीयदमन प्राणनाथ कृष्ण नमोऽस्तु ते॥
    शिवानन्तेश ब्रह्मेश ब्राह्मणेश परात्पर। ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मज्ञ ब्रह्मबीज नमोऽस्तु ते॥
    चराचरतरोर्बीज गुणातीत गुणात्मक। गुणबीज गुणाधार गुणेश्वर नमोऽस्तु ते॥
    अणिमादिकसिद्धीश सिद्धेः सिद्धिस্বরূপक। तपस्तपस्विंस्तपसां बीजरूप नमोऽस्तु ते॥
    यदनिर्वचनीयं च वस्तु निर्वचनीयकम्। तत्स्वरूप तयोर्बीज सर्वबीज नमोऽस्तु ते॥
    अहं सरस्वती लक्ष्मीर्दुर्गा गङ्गा श्रुतिप्रसूः। यस्य पादार्चनान्नित्यं पूज्या तस्मै नमो नमः॥
    स्पर्शने यस्य भृत्यानां ध्यानेन च दिवानिशम्। पवित्राणि च तीर्थानि तस्मै भगवते नमः॥
    इत्येवमुक्त्वा सा देवी जले संन्यस्य विग्रहम्। मनः प्राणांश्च श्रीकृष्णे तस्थौ स्थाणुसमा सती॥
    राधाकृतं हरेः स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। हरिभक्तिं च दास्यं च लभेद्राधागतिं ध्रुवम्॥
    (२७।१००-११०)

५६०
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
माना। जिस स्थानपर और जिस आधारमें जो
द्रव्य पहले रखा गया था, वस्त्रोंसहित वह सब
द्रव्य गोपकन्याओंको उसी रूपमें प्राप्त हुआ। फिर
तो वे सब-की-सब देवियाँ जलसे निकलकर
व्रत पूर्ण करके मनोवाञ्छित वर पाकर अपने-
अपने घरको चली गयीं।
नारदजीने पूछा—प्रभो! उस व्रतका क्या
विधान है? क्या नाम है और क्या फल है?
उसमें कौन-कौन-सी वस्तुएँ और कितनी दक्षिणा
देनी चाहिये। व्रतके अन्तमें कौन-सा मनोहर
रहस्य प्रकट हुआ? महाभाग! इस नारायण-
कथाको विस्तारपूर्वक कहिये।
भगवान् नारायण बोले—वत्स ! उस व्रतका
सारा विधान मुझसे सुनो। उसका नाम गौरी-व्रत
है। मार्गशीर्ष मासमें सबसे पहले स्त्रियोंने इसे
किया था। यह पुरुषोंको भी धर्म, अर्थ, काम
और मोक्ष देनेवाला तथा श्रीकृष्णकी भक्ति प्रदान
करनेवाला है। भिन्न-भिन्न देशोंमें इसकी प्रसिद्धि
है। यह व्रत पूर्वपरम्परासे पालित होनेवाला माना
गया है। पतिकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको
उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाला है। इससे
प्रियतम पति-निमित्तक फलकी प्राप्ति होती है।
कुमारी कन्याको चाहिये कि वह पहले दिन
उपवास करके अपने वस्त्रको धो डाले और
संयमपूर्वक रहे। फिर मार्गशीर्ष मासकी संक्रान्तिके
दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक नदीके तटपर जाकर
स्नान करके वह दो धुले हुए वस्त्र (साड़ी और
चोली) धारण करे। तत्पश्चात् कलशमें गणेश,
सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा (पार्वती) —
इन छः देवताओंका आवाहन करके नाना द्रव्योंद्वारा
उनका पूजन करे। इन सबका पञ्चोपचार पूजन
करके वह व्रत आरम्भ करे। कलशके सामने
नीचे भूमिपर एक सुविस्तृत वेदी बनावे। वह
वेदी चौकोर होनी चाहिये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी
और कुंकुमसे उस वेदीका संस्कार करे (इन
द्रव्योंसे चौक पूरकर उसे सजा दे)। इसके बाद
बालूकी दशभुजा दुर्गामूर्ति बनावे। देवीके ललाटमें
सिन्दूर लगावे और नीचेके अङ्गोंमें चन्दन एवं
कपूर अर्पित करे। तदनन्तर ध्यानपूर्वक देवीका
आवाहन करे। उस समय हाथ जोड़कर निम्नाङ्कित
मन्त्रका पाठ करे। उसके बाद पूजा आरम्भ
करनी चाहिये।
हे गौरि शङ्करार्धाङ्गि यथा त्वं शङ्करप्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥
'भगवान् शंकरकी अर्धाङ्गिनी कल्याणमयी
गौरीदेवि ! जैसे तुम शंकरजीको बहुत ही प्रिय
हो, उसी प्रकार मुझे भी अपने प्रियतम पतिकी
परम दुर्लभा प्राणवल्लभा बना दो।'
इस मन्त्रको पढ़कर देवी जगदम्बाका ध्यान
करे। उनका गूढ़ ध्यान सामवेदमें वर्णित है, जो
सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। नारद! वह
ध्यान मुनीन्द्रोंके लिये भी दुर्लभ है, तथापि मैं
तुम्हें बता रहा हूँ। इसके अनुसार सिद्ध पुरुष
दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका ध्यान करते हैं।
दुर्गाका ध्यान
भगवती दुर्गा शिवा (कल्याणस्वरूपा),
शिवप्रिया, शैवी (शिवसे प्रगाढ़ सम्बन्ध रखनेवाली)
तथा शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान होनेवाली
हैं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा
फैली रहती है। उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है। उनके
नेत्र मनोहर हैं। वे नित्य नूतन यौवनसे सम्पन्न हैं
और रत्नमय आभूषण धारण करती हैं। उनकी
भुजाएँ रत्नमय केयूर तथा कङ्कणोंसे और दोनों
चरण रत्ननिर्मित नूपुरोंसे विभूषित हैं। रत्नोंके बने
हुए दो कुण्डल उनके दोनों कपोलोंकी शोभा
बढ़ाते हैं। उनकी वेणीमें मालतीकी माला लगी
हुई है, जिसपर भ्रमर मँडराते रहते हैं। भालदेशमें
कस्तूरीकी बेंदीके साथ सिन्दूरका सुन्दर तिलक
शोभा पाता है। उनके दिव्य वस्त्र अग्निकी
ज्वालासे शुद्ध किये गये हैं। वे मस्तकपर रत्नमय