ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७७- व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंका कालियदहके जलसे ऊपर उछलते हुए श्रीकृष्णको देखना
| ५१४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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श्रीकृष्णका कालियदहमें प्रवेश, नागराजका उनपर आक्रमण, श्रीकृष्णद्वारा उसका दमन, नागपत्नी सुरसाद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णकी उसपर कृपा, सुरसाका गोलोक-गमन, छायामयी सुरसाकी सृष्टि, कालियको वरदान, कालियद्वारा भगवान्की स्तुति, उस स्तुतिकी महिमा, नागका रमणक द्वीपको प्रस्थान, कालियका यमुनाजलमें निवासका कारण, गरुडका भय, सौभरिके शापसे कालियदहतक जानेमें गरुड़की असमर्थता, श्रीकृष्णके कालियदहमें प्रवेश करनेसे ग्वालबालों तथा नन्द आदिकी व्याकुलता, बलरामका समझाना, श्रीकृष्णके निकल आनेसे सबको प्रसन्नता, दावानलसे व्रजवासियोंकी रक्षा तथा नन्दभवनमें उत्सव
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक दिन बलदेवको साथ लिये बिना ही श्रीकृष्ण अन्यान्य ग्वालबालोंके साथ यमुनाके उस तटपर चले गये, जहाँ कालियनागका निवासस्थान था। स्वेच्छामय शरीर धारण करनेवाले भगवान् नन्दनन्दन यमुना-तटवर्ती वनमें पके हुए फलोंको खाकर जब प्यास लगती, तब वहाँका निर्मल जल पी लेते थे। उन्होंने गोप-शिशुओंके साथ कुछ कालतक गौएँ चरायीं। तत्पश्चात् उन्हें तो एक जगह विश्रामके लिये खड़ी कर दिया और स्वयं साथियोंके साथ खेल-कूदमें लग गये; खेलमें इनका मन लग गया। ग्वालबाल भी बड़े हर्षके साथ उसमें भाग लेने लगे। उधर गौएँ नयी-नयी घास चरती हुई आगे बढ़ गयीं और यमुनाका विषमिश्रित जल पीने लगीं। मुने! दारुण कालकी चेष्टासे वह विषाक्त जल पीकर कालकूटकी ज्वालाओंसे संतप्त हो उन गौओंने तत्काल प्राण त्याग दिये। झुंड-की-झुंड गौओंको मरी हुई देख गोपबालक चिन्तासे व्याकुल और भयभीत हो उठे। उनके मुखपर विषाद छा गया और उन सबने आकर मधुसूदन श्रीकृष्णसे यह बात कही। सारा रहस्य जानकर जगन्नाथ श्रीहरिने उन सब गौओंको जीवित कर दिया। वे गौएँ तत्काल उठकर खड़ी हो गयीं और श्रीहरिका मुँह देखने लगीं। इधर श्रीकृष्ण यमुनातटवर्ती जलके निकट उत्पन्न हुए कदम्बपर चढ़कर उस सर्पके भवनमें बहुत-से नागोंके बीच कूद पड़े। उनके जलमें पड़ते ही उस कुण्डका पानी सौ हाथ ऊपर उठ गया। नारद! यह देख ग्वालबालोंको पहले तो हर्ष हुआ, फिर वे बड़े दुःखका अनुभव करने लगे। कालियसर्प मनुष्यकी आकृतिमें आये हुए श्रीहरिको देखकर क्रोधसे विह्वल हो उठा और तुरंत ही उन्हें निगल गया। जैसे किसी मनुष्यने जल्दबाजीमें तपे हुए लोहेको थाम लिया हो, वैसे ही ब्रह्मतेजसे उसका कण्ठ और पेट जलने लगा।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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वह नाग उद्विग्न हो गया और 'हाय! हाय! मेरे प्राण निकले जा रहे हैं'—यों कहकर उसने पुनः उन्हें उगल दिया। श्रीकृष्णके वज्रोपम अङ्गोंको चबानेसे उसके सारे दाँत टूट गये और मुँह लहूलुहान हो गया। भगवान् उस समय रक्तरंजित मुखवाले कालिय नागके मस्तकपर चढ़ गये। विश्वम्भरके भारसे आक्रान्त हो कालिय नाग प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गया। मुने! उसने रक्त वमन किया और मूर्च्छित होकर वह गिर पड़ा। उसे मूर्च्छित देख सब नाग प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। कोई भाग गये और कोई डरके मारे बिलमें घुस गये। अपने प्रियतमको मरणोन्मुख हुआ देख नागपत्नी सती सुरसा दूसरी नागिनियोंके साथ श्रीहरिके सामने आयी और पति-प्रेमसे रोने लगी। उसने दोनों हाथ जोड़कर शीघ्र ही भयसे श्रीहरिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणारविन्द पकड़कर व्याकुल हो उनसे कहा।
सुरसा बोली—हे जगदीश्वर! आप मुझे मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। दूसरोंको मान देनेवाले प्रभो! मुझे भी मान दीजिये। स्त्रियोंको पति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय होता है। उनके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है। नाथ! आप देवेश्वरोंके भी स्वामी, अनन्त प्रेमके सागर, उत्तम बन्धु, सम्पूर्ण भुवनोंके बान्धव तथा श्रीराधिकाजीके लिये प्रेमके समुद्र हैं। अतः मेरे प्राणनाथका वध न कीजिये। आप विधाताके भी विधाता हैं। इसलिये यहाँ मुझे पतिदान दीजिये। त्रिनेत्रधारी महादेवके पाँच मुख हैं; ब्रह्माजीके चार और शेषनागके सहस्र मुख हैं; कार्तिकेयके भी छः मुख हैं; परंतु ये लोग भी अपने मुख-समूहोंद्वारा आपकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं। साक्षात् सरस्वती भी आपका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं। सम्पूर्ण वेद, अन्यान्य देवता तथा संत-महात्मा भी आपकी स्तुतिके विषयमें शक्तिहीनताका ही परिचय देते हैं। कहाँ तो मैं कुबुद्धि, अज्ञ एवं नारियोंमें अधम सर्पिणी और कहाँ सम्पूर्ण भुवनोंके परम आश्रय तथा किसीके भी दृष्टिपथमें न आनेवाले आप परमेश्वर! जिनकी स्तुति ब्रह्मा, विष्णु और शेषनाग करते हैं, उन मानव-वेषधारी आप निराकार परमेश्वरकी स्तुति मैं करना चाहती हूँ, यह कैसी विडम्बना है? पार्वती, लक्ष्मी तथा वेदजननी सावित्री जिनके स्तवनसे डरती हैं और स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पातीं; उन्हीं आप परमेश्वरका स्तवन कलिकलुषमें निमग्न तथा वेद-वेदाङ्ग एवं शास्त्रोंके श्रवणमें मूढ़ स्त्री मैं क्यों करना चाहती हूँ, यह समझमें नहीं आता। आप रत्नमय पर्यङ्कपर रत्ननिर्मित भूषणोंसे भूषित हो शयन करते हैं। रत्नालंकारोंसे अलंकृत अङ्गवाली राधिकाके वक्षःस्थलपर विराजमान होते हैं। आपके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित रहते हैं, मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैली होती है। आप उमड़ते हुए प्रेमरसके महासागरमें सदा सुखसे निमग्न रहते हैं। आपका मस्तक मल्लिका और मालतीकी मालाओंसे सुशोभित होता है। आपका मानस नित्य निरन्तर पारिजात पुष्पोंकी सुगन्धसे आमोदित रहा करता है। कोकिलके कलरव तथा भ्रमरोंके गुञ्जारवसे उद्दीपित प्रेमके कारण आपके अङ्ग उठी हुई पुलकावलियोंसे अलंकृत रहते हैं। जो सदा प्रियतमाके दिये हुए ताम्बूलका सानन्द
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चर्वण करते हैं; वेद भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा बड़े-बड़े विद्वान् भी जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाते हैं; उन्हीं अनिर्वचनीय परमेश्वरका स्तवन मुझ-जैसी नागिन क्या कर सकती है? मैं तो आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना करती हूँ, जिनका सेवन ब्रह्मा, शिव और शेष करते हैं तथा जिनकी सेवा सदा लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा, वेदमाता सावित्री, सिद्धोंके समुदाय, मुनीन्द्र और मनु करते हैं। आप स्वयं कारणरहित हैं, किंतु सबके कारण आप ही हैं। सर्वेश्वर होते हुए भी परात्पर हैं स्वयंप्रकाश, कार्य-कारणस्वरूप तथा उन कार्य-कारणोंके भी अधिपति हैं। आपको मेरा नमस्कार है। हे श्रीकृष्ण ! हे सच्चिदानन्दघन ! हे सुरासुरेश्वर ! आप ब्रह्मा, शिव, शेषनाग, प्रजापति, मुनि, मनु, चराचर प्राणी, अणिमा आदि सिद्धि, सिद्ध तथा गुणोंके भी स्वामी हैं। मेरे पतिकी रक्षा कीजिये, आप धर्म और धर्मीके तथा शुभ और अशुभके भी स्वामी हैं। सम्पूर्ण वेदोंके स्वामी होते हुए भी उन वेदोंमें आपका अच्छी तरह निरूपण नहीं हो सका है। सर्वेश्वर ! आप सर्वस्वरूप तथा सबके बन्धु हैं। जीवधारियों तथा जीवोंके भी स्वामी हैं। अतः मेरे पतिकी रक्षा कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करके नागराजवल्लभा सुरसा भक्तिभावसे मस्तक झुका श्रीकृष्णके चरणकमलोंको पकड़कर बैठ गयी। नागपत्नीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो अन्ततोगत्वा श्रीहरिके धाममें चला जाता है। उसे इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त होती है और अन्तमें वह निश्चय ही श्रीकृष्णका दास्य-सुख पा जाता है। वह श्रीहरिका पार्षद हो सालोक्य आदि चतुर्विध मुक्तियोंको करतलगत कर लेता है।
**नारदजीने पूछा—**नागपत्नीकी बात सुनकर हर्षसे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले सर्वनन्दन भगवान् गोविन्दने स्वयं उससे क्या कहा? महाभाग ! यह अत्यन्त अद्भुत रहस्य मुझसे बताइये।
**भगवान् नारायणने कहा—**मुने! नागपत्नी भयसे व्याकुल हो हाथ जोड़कर भगवान्के चरणोंमें पड़ी थी। उसकी उपर्युक्त बातें सुनकर श्रीकृष्णने उससे इस प्रकार कहा—
**श्रीकृष्ण बोले—**नागेश्वरि ! उठो, उठो। भय छोड़ो और वर माँगो। मात:! मेरे वरके प्रभावसे अजर-अमर हुए अपने पतिको ग्रहण करो और यमुनाका हृद छोड़कर अपने घरको चली जाओ। वत्से ! अपने पति और परिवारके साथ अभीष्ट स्थानको पधारो। नागेशि ! आजसे तुम मेरी कन्या हुई और तुम्हारे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम यह नागराज मेरे जामाता हुए; इसमें संशय नहीं है। शुभे ! मेरे चरणकमलोंके चिह्नसे युक्त होनेके कारण तुम्हारे पतिको अब गरुड कष्ट नहीं देंगे, अपितु भक्तिभावसे स्तुति करके मेरे चरणचिह्नको प्रणाम करेंगे। अब तुम गरुडका भय छोड़ो और शीघ्र रमणक द्वीपको चली जाओ। बेटी ! इस हृदसे निकलो और इच्छानुसार वर माँगो।
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर सुरसाके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे। उसकी आँखोंमें आँसू भर आये तथा उसने भक्ति-भावसे मस्तक झुकाकर कहा।
**सुरसा बोली—**वरदाता परमेश्वर ! पिताजी ! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने चरणकमलोंकी सुदृढ़ एवं अविचल भक्ति प्रदान कीजिये। मेरा मन भ्रमरकी भाँति सदा आपके चरणारविन्दपर ही मँडराता रहे। मुझे आपके स्मरणकी कभी विस्मृति न हो, मेरा कान्तविषयक सौभाग्य सदा बना रहे और ये मेरे प्राणवल्लभ ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो जायँ। प्रभो ! यही मेरी प्रार्थना है; इसे पूर्ण कीजिये।