ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७२- विश्वकर्माद्वारा नन्दभवन और राजमार्ग आदिका निर्माण
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९५
और कार्तिकेय तथा गणेश क्या हैं? तुम्हारे बिना हम सब लोग असमर्थ हैं और तुम्हारा सहयोग पाकर हम सभी सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। जो पतिव्रताके योग्य है और जो प्राचीनकालसे श्रुतिमें सुनी गयी है, वह आज्ञा परमेश्वरकी आज्ञा है। पतिव्रते! उस ईश्वरीय आज्ञाको स्वीकार करके तुम व्रतका पालन करो। अबतक जिन स्त्रियोंने इस व्रतका पालन किया है, उन सबकी अपेक्षा विलक्षण ढंगसे तुम इस त्रैमासिक व्रतका अनुष्ठान करो। इस व्रतमें भगवान् सनत्कुमार तुम्हारे पुरोहित हों। सुन्दरि! इसमें जितने कमलों, ब्राह्मणों और द्रव्योंकी आवश्यकता हो, उन सबको देनेके लिये मैं उद्यत हूँ। तुम कुबेरको द्रव्यकोशका संरक्षक नियत करो। इस व्रतमें दानाध्यक्ष मैं रहूँगा और स्वयं भगवती लक्ष्मी धन देनेवाली होंगी। अग्निदेव वेदका पाठ करेंगे, वरुण-देवता जल देंगे, यक्षलोग वस्तुओंको ढोकर लानेका काम करेंगे और स्कन्द उनके अध्यक्ष रहेंगे। इस व्रतमें स्थानको झाड़-बुहारकर शुद्ध करनेका काम स्वयं वायुदेव करेंगे। इन्द्र रसोई परोसेंगे। चन्द्रमा व्रतके अधिष्ठापक होंगे। प्रिये! सूर्यदेव दानका निर्वचन करेंगे; योग्यायोग्यकी यथोचित व्याख्या करेंगे। सुन्दरि! व्रतके लिये जो उपयोगी और नियमित द्रव्य हो, उसे देकर उससे भी अधिक फल-फूल तुम श्रीहरिकी सेवामें समर्पित करो। व्रतमें जितने ब्राह्मणोंको भोजन करानेका नियम है, उतनोंको भोजन कराकर तुम उससे भी अधिक असंख्य ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे भोजनके लिये निमन्त्रित करो। समाप्तिके दिन सुवर्ण, रत्न, मोती और मूँगा आदि व्रतोक्त दक्षिणा देकर सारा धन ब्राह्मणोंको बाँट दो।
ऐसा कहकर भगवान् शंकरने पार्वतीसे उस व्रतका अनुष्ठान करवाया। पार्वतीने सब स्त्रियोंकी अपेक्षा विलक्षण रूपसे उस व्रतका सम्पादन किया। नारद! इस प्रकार पार्वतीजीने जो व्रत किया था, वह सब मैंने कह सुनाया। पार्वतीके व्रतमें ब्राह्मणलोग रत्न ढोकर ले जानेमें असमर्थ हो गये। नारद! यह सारा इतिहास तो तुमने सुन लिया, अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह श्रीकृष्णका बालचरित्र सुनो।
यह श्रीकृष्णकी बाललीला पद-पदमें नयी-नयी प्रतीत होगी। पूर्वोक्त दानवेन्द्रोंका वध करके श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ गोकुलमें अपने घरको गये, जो कुबेरभवनके समान समृद्धिशाली था। वहाँ बालकोंने प्रसन्नतापूर्वक सब लोगोंसे वनमें घटित घटनाओंकी बातें बतायीं। यह सुनकर सब लोग चकित रह गये, किंतु नन्दजीको बड़ा भय हुआ। उन्होंने वृद्ध गोपों तथा बड़ी-बूढ़ी गोपियोंको घरपर बुलवाया और उन सबके साथ समयोचित कर्तव्यका विचार करके उक्त संकटसे बचनेके लिये युक्ति ढूँढ़ निकाली। युक्ति निश्चित करके गोपराज उस स्थानका त्याग कर देनेको उद्यत हो गये। मुने! उन्होंने उसी क्षण सबको वृन्दावनमें चलनेकी आज्ञा दी। नन्दजीकी आज्ञा सुनकर सब लोग वहाँ जानेको उद्यत हो गये। गोप, गोपियाँ, बालक, बालिकाएँ—सब इस नयी यात्राके लिये तैयार हो गये। समस्त ग्वाल-बाल श्रीकृष्ण और हलधरके साथ प्रसन्नतापूर्वक चल दिये। अनेक प्रकारकी वेश-भूषावाले वे बालक गीत गाते हुए जा रहे थे। कोई वंशीकी तान छेड़ते थे तो कोई सींग बजाते थे। किन्हींके हाथोंमें करताल थे। कुछ लोगोंने अपने हाथोंमें वीणा ले रखी थी। किन्हींके हाथोंमें शरयन्त्र थे तो किन्हींके सिंगे। कुछ गोपबालकोंने अपने कानोंमें नये पल्लव पहन रखे थे। कितनोंने अधखिले कमल और दूसरे-दूसरे फूल धारण कर रखे थे। किन्हींके हाथोंमें फूलोंके नये-नये गजरे थे। कुछ लोगोंने आजानुलम्बिनी वनमाला गलेमें डाल रखी थी। कुछ बालकोंने पल्लवों तथा फूलोंसे अपनी
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चोटियाँ सजा रखी थीं। विप्रवर! सब ग्वाल-बाल, तरुण अवस्थावाली गोपियोंके यूथ और बड़ी-बूढ़ी गोपियोंकी अपार संख्या थी।
मुने! श्रीराधाकी जो सुशीला आदि सहेली गोपियाँ थीं, वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित हो बड़ी भव्य दिखायी देती थीं। दिव्य वस्त्र धारण कर हर्षसे मुस्कराती हुई वे सब-की-सब वृन्दावनकी ओर चलीं। कोई शिबिकापर सवार थीं तो कोई रथपर। राधिकादेवी रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हो सुवर्णमय उपकरणोंसे युक्त रथपर बैठकर उन सब सहेलियोंके साथ यात्रा कर रही थीं। यशोदा और रोहिणीजी भी रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत हो सुवर्णमय उपकरणोंसे सुसज्जित रथपर चढ़कर जा रही थीं। नन्द, सुनन्द, श्रीदामा, गिरिभानु, विभाकर, वीरभानु और चन्द्रभानु—ये प्रमुख गोपगण हाथीपर बैठकर सानन्द यात्रा कर रहे थे। श्रीकृष्ण और बलदेव दोनों भाई रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित हो सुवर्णमय रथपर बैठकर बड़े हर्षके साथ वृन्दावनकी ओर जा रहे थे। कोटि-कोटि बूढ़े और जवान गोप उस यात्रामें सम्मिलित थे। कोई घोड़ेपर सवार थे, कोई हाथियोंपर बैठे थे और कितने ही रथपर चढ़कर यात्रा करते थे।
नन्दके सेवक उद्धत गोपगण बड़े हर्षके साथ चल रहे थे। उनमेंसे कुछ लोग बैलोंपर सवार थे। वे सब-के-सब संगीतकी तानमें तत्पर थे। राधिकाकी दूसरी-दूसरी दासियाँ बहुत बड़ी संख्यामें यात्रा कर रही थीं, उनके मनमें बड़ा उल्लास था। मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी और वे सब-की-सब सोनेके गहनोंसे सजी थीं। उनमेंसे कितनोंके हाथमें सिन्दूर थे, कितनी ही काजल लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें कन्दुक थे तो किन्हींके पुतलियाँ। कुछ सुन्दरी दासियाँ अपने हाथोंमें भोग-द्रव्य और क्रीड़ा-द्रव्य लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें वेशरचनाकी सामग्री थी तो किन्हींके हाथोंमें फूलोंकी मालाएँ। कुछ गोपियाँ हाथोंमें वीणा आदि वाद्य लिये सानन्द यात्रा कर रही थीं। कुछ अपने साथ अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रोंका भार लिये चल रही थीं। कितनी ही चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरका द्रव ले जा रही थीं। कोई संगीतमें मग्न थीं तो कोई विचित्र कथाएँ कह रही थीं। उस समय कोटि-कोटि शिबिकाएँ, रथ, घोड़े, गाड़ियाँ, बैल और लाखों हाथी आदि चल रहे थे। मुने! वृन्दावनमें पहुँचकर सबने उसे गृहशून्य देखा। तब वे सभी लोग वृक्षोंके नीचे यथास्थान ठहर गये। उस समय श्रीकृष्णने गोपोंको अभीष्ट गृह और गौओंके ठहरनेके स्थान बताते हुए कहा—'आज इसी तरह ठहरो। कल सब व्यवस्था हो जायगी।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने पूछा—'कन्हैया! यहाँ कहाँ घर हैं।' उनका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण बोले—'इस स्थानपर बहुत-से स्वच्छ गृह हैं, जिन्हें देवताओंने बनाया है; परंतु उन देवताओंको प्रसन्न किये बिना कोई भी गृह हमारी दृष्टिमें नहीं आ सकते। अतः गोपगण! आज वनदेवताओंकी पूजा करके बाहर ही ठहरो। प्रातःकाल तुम्हें यहाँ निश्चय ही बहुत-से रमणीय गृह दिखायी देंगे। धूप, दीप, नैवेद्य, भेंट, पुष्प और चन्दन आदिके
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९७
द्वारा वटके मूलभागमें स्थित चण्डिकादेवीकी पूजा करो।'
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने दिनमें देवताओंकी पूजा करके भोजन आदि किये और रातमें वहीं प्रसन्नतापूर्वक शयन किया।
(अध्याय १६)
विश्वकर्माका आगमन, उनके द्वारा पाँच योजन विस्तृत नूतन नगरका निर्माण, वृषभानु गोपके लिये पृथक् भवन, कलावती और वृषभानुके पूर्वजन्मका चरित्र, राजा सुचन्द्रकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा वरदान, भनन्दनके यहाँ कलावतीका जन्म और वृषभानुके साथ उसका विवाह, विश्वकर्माद्वारा नन्द-भवनका, वृन्दावनके भीतर रासमण्डलका तथा मधुवनके पास रत्नमण्डपका निर्माण, 'वृन्दावन' नामका कारण, राजा केदारका इतिहास, तुलसीसे वृन्दावन नामका सम्बन्ध तथा राधाके सोलह नामोंमें 'वृन्दा' नाम, राधा नामकी व्याख्या, नींद टूटनेपर नूतन नगर देख ब्रजवासियोंका आश्चर्य तथा उन सबका उन भवनोंमें प्रवेश
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! रातमें वृन्दावनके भीतर सब व्रजवासी और नन्दरायजी सो गये। निद्राके स्वामी श्रीकृष्ण भी माता यशोदाके वक्षःस्थलपर प्रगाढ़ निद्राके वशीभूत हो गये। रमणीय शय्याओंपर सोयी हुई गोपियाँ भी निद्रित हो गयीं। कोई शिशुओंको गोदमें लेकर, कोई सखियोंके साथ सटकर, कोई छकड़ोंपर और कोई रथोंपर ही स्थित होकर निद्रासे अचेत हो गयीं। पूर्णचन्द्रमाकी चाँदनी फैल जानेसे जब वृन्दावन स्वर्गसे भी अधिक मनोहर प्रतीत होने लगा, नाना प्रकारके कुसुमोंका स्पर्श करके बहनेवाली मन्द-मन्द वायुसे सारा वन-प्रान्त सुवासित हो उठा तथा समस्त प्राणी निश्चेष्ट होकर सो गये, तब रात्रिकालिक पञ्चम मुहूर्तके बीत जानेपर शिल्पियोंके गुरुके भी गुरु भगवान् विश्वकर्मा वहाँ आये। उन्होंने दिव्य एवं महीन वस्त्र पहन रखा था। उनके गलेमें मनोहर रत्नमाला शोभा दे रही थी। वे अनुपम रत्ननिर्मित अलंकारोंसे अलंकृत थे। उनके कानोंमें कान्तिमान् मकराकृत कुण्डल झलमला रहे थे। वे ज्ञान और अवस्थामें वृद्ध होनेपर भी किशोरकी भाँति दर्शनीय थे। अत्यन्त सुन्दर, तेजस्वी तथा कामदेवके समान कान्तिमान् थे।
उनके साथ विशिष्ट शिल्पकलामें निपुण तीन करोड़ शिल्पी थे। उन सबके हाथोंमें मणिरत्न, हेमरत्न तथा लोहनिर्मित अस्त्र थे। कुबेर-वनके किङ्कर यक्षसमुदाय भी वहाँ आ पहुँचे। वे स्फटिकमणि तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थे। किन्हीं-किन्हींके कंधे बहुत बड़े थे। किन्हींके हाथोंमें पद्मरागमणिके ढेर थे तो किन्हींके हाथोंमें इन्द्रनीलमणिके। कुछ यक्षोंने अपने हाथोंमें स्यमन्तकमणि ले रखी थी और कुछ यक्षोंने चन्द्रकान्तमणि। अन्य बहुत-से यक्षोंके हाथोंमें सूर्यकान्तमणि और प्रभाकरमणिके ढेर प्रकाशित
४९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हो रहे थे। किन्हींके हाथोंमें फरसे थे तो किन्हींके लोहसार। कोई-कोई गन्धसार तथा श्रेष्ठ मणि लेकर आये थे। किन्हींके हाथमें चँवर थे और कुछ लोग दर्पण, स्वर्णपात्र और स्वर्ण-कलश आदिके बोझ लेकर आये थे।
विश्वकर्माने वह अत्यन्त मनोहर सामग्री देखकर सुन्दर नेत्रोंवाले श्रीकृष्णका ध्यान करके वहाँ नगर-निर्माणका कार्य आरम्भ किया। भारतवर्षका वह श्रेष्ठ और सुन्दर नगर पाँच योजन विस्तृत था। तीर्थोंका सारभूत वह पुण्यक्षेत्र श्रीहरिको अत्यन्त प्रिय है। जो वहाँ मुमुक्षु होकर निवास करते हैं, उन्हें वह परम निर्वाणकी प्राप्ति करानेवाला है। गोलोकमें पहुँचनेके लिये तो वह सोपानरूप है। सबको मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करनेवाला है। वहाँ चार-चार कमरेवाले चार करोड़ भवन बनाये गये थे, जिससे वह नगर अत्यन्त मनोरम प्रतीत होता था। श्रेष्ठ प्रस्तरोंसे निर्मित वह विशाल नगर किवाड़ों, खम्भों और सोपानोंसे सुशोभित था। चित्रमयी पुत्तलिकाओं, पुष्पों और कलशोंसे वहाँके भवनोंके शिखरभाग अत्यन्त प्रकाशमान जान पड़ते थे। पर्वतीय प्रस्तर-खण्डोंसे निर्मित वेदिकाएँ और प्राङ्गण उस नगरके भवनोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। प्रस्तर-खण्डोंके परकोटोंसे सारा नगर घिरा हुआ था। विश्वकर्माने खेल-खेलमें ही सारे नगरकी रचना कर डाली। प्रत्येक गृहमें यथायोग्य बड़े-छोटे दो दरवाजे थे। हर्ष और उत्साहसे भरे हुए देवशिल्पीने स्फटिक-जैसी मणियोंसे उस नगरके भवनोंका निर्माण किया था। गन्धसार-निर्मित सोपानों, शंकु-रचित खम्भों, लोहसारकी बनी हुई किवाड़ों, चाँदीके समुज्ज्वल कलशों तथा वज्रसारनिर्मित प्राकारोंसे उस नगरकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसमें गोपोंके लिये यथास्थान और यथायोग्य निवासस्थान बनाकर विश्वकर्माने वृषभानु गोपके लिये पुनः रमणीय भवनका निर्माण आरम्भ किया। उसके चारों ओर परकोटे और खाइयाँ बनी थीं। चारों दिशाओंमें चार दरवाजे थे। चार-चार कमरोंसे युक्त बीस भव्य भवन बनाये गये थे। उस सम्पूर्ण भवनका निर्माण महामूल्य मणियोंसे किया गया था। रत्नसार-रचित सुरम्य तूलिकाओं, सुवर्णाकार मणियोंद्वारा निर्मित अत्यन्त सुन्दर सोपानों, लोहसारकी बनी हुई किवाड़ों तथा कृत्रिम चित्रोंसे वृषभानु-भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँका प्रत्येक सुरम्य मन्दिर सोनेके कलशोंसे देदीप्यमान था। उस आश्रमके एक अत्यन्त मनोहर निर्जन प्रदेशमें, जो मनोहर चम्पा-वृक्षोंके उद्यानके भीतर था, पतिसहित कलावतीके उपभोगके लिये विश्वकर्माने कौतूहलवश एक ऐसी अट्टालिका बनायी थी, जिसका निर्माण विशिष्ट श्रेणीकी श्रेष्ठ मणियोंद्वारा हुआ था। उसमें इन्द्रनीलमणिके बने हुए नौ सोपान थे। गन्धसारनिर्मित खम्भों और कपाटोंसे वह अत्यन्त ऊँचा मनोरम भवन सब ओरसे विलक्षण था।
नारदजीने पूछा— भगवन् ! मनोहर रूपवाली कलावती कौन थी और किसकी पत्नी थी, जिसके लिये देवशिल्पीने यत्नपूर्वक सुरम्य गृहका निर्माण किया ?
भगवान् नारायणने कहा— सुन्दरी कलावती कमलाके अंशसे प्रकट हुई पितरोंकी मानसी कन्या है और वृषभानुकी पतिव्रता पत्नी है। उसीकी पुत्री राधा हुईं जो श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। वे श्रीकृष्णके आधे अंशसे प्रकट हुई हैं; इसलिये उन्हींके समान तेजस्विनी हैं। उनके चरणकमलोंकी रजके स्पर्शसे वसुन्धरा पवित्र हो गयी है। सभी संत-महात्मा सदा ही श्रीराधाके प्रति अविचल भक्तिकी कामना करते हैं।
नारदजीने पूछा— मुने ! व्रजमें रहनेवाले एक मानवने कैसे, किस पुण्यसे और किस प्रकार
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९९
पितरोंकी परम दुर्लभ मानसी कन्याको पत्नीरूपमें
प्राप्त किया ? व्रजके महान् अधिपति वृषभानु
पूर्वजन्ममें कौन थे, किसके पुत्र थे और किस
तपस्यासे राधा उनकी कन्या हुईं ?
सूतजी कहते हैं- नारदजीकी यह बात
सुनकर ज्ञानिशिरोमणि महर्षि नारायण हँसे और
प्रसन्नतापूर्वक उस प्राचीन इतिहासको बताने लगे।
भगवान् नारायण बोले- नारद ! पूर्वकालमें
पितरोंके मानससे तीन कन्याएँ प्रकट हुईं-
कलावती, रत्नमाला और मेनका। ये तीनों ही
अत्यन्त दुर्लभ थीं। इनमेंसे रत्नमालाने कामनापूर्वक
राजा जनकको पतिरूपमें वरण किया और मेनकाने
श्रीहरिके अंशभूत गिरिराज हिमालयको अपना
पति बनाया। रत्नमालाकी पुत्री अयोनिजा सती
सत्यपरायणा सीता हुईं, जो साक्षात् लक्ष्मी तथा
श्रीरामकी पत्नी थीं। मेनकाकी पुत्री पार्वती हुईं,
जो पूर्वजन्ममें सती नामसे प्रसिद्ध थीं। वे भी
अयोनिजा ही कही गयी हैं। पार्वती श्रीहरिकी
सनातनी माया हैं। उन्होंने तपस्यासे नारायणस्वरूप
महादेवजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है। कलावतीने
मनुवंशी राजा सुचन्द्रका वरण किया। वे राजा
साक्षात् श्रीहरिके अंश थे। उन्होंने कलावतीको
पाकर अपनेको गुणवानोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त
सुन्दर माना। वे उसके सौन्दर्यकी प्रशंसा करते
हुए मन-ही-मन कहते थे- 'इसका रूप अद्भुत
है। वेष भी आश्चर्यजनक है और इसकी नयी
अवस्था कैसी विलक्षण है। सुकोमल अङ्ग,
शरत्कालके चन्द्रमासे भी बढ़कर परम सुन्दर मुख
तथा गज और खंजनके भी गर्वका गंजन करनेवाली
दुर्लभ गति-सभी अद्भुत हैं।' इस अपनी परम
सुन्दरी पत्नी कलावतीके साथ विभिन्न रमणीय
स्थानोंमें रहकर सुदीर्घकालतक विहार करनेके
पश्चात् राजा भोगोंसे विरक्त हो गये और कलावतीको
साथ लेकर विन्ध्यपर्वतकी तीर्थभूमिमें तपस्याके
लिये चले गये। भारतमें अत्यन्त प्रशंसाके योग्य
वह उत्तम स्थान पुलहाश्रमके नामसे प्रसिद्ध है।
वहाँ राजाने मोक्षकी इच्छा मनमें लेकर सहस्र
दिव्य वर्षोंतक तप किया। उनके मनमें कोई
लौकिक कामना नहीं थी। वे आहार छोड़ देनेके
कारण कृशोदर हो गये। श्रीकृष्णके चरणकमलोंका
ध्यान करते-करते मुनिश्रेष्ठ सुचन्द्रको मूर्च्छा आ
गयी। उनके शरीरपर जो बाँबी छा गयी थी, उसे
उनकी साध्वी पत्नीने दूर किया। पतिको निश्चेष्ट,
प्राणशून्य, मांस और रक्तसे रहित तथा अस्थि-
चर्मावशिष्टमात्र देख उस निर्जन वनमें कलावती
शोकातुर हो उच्च स्वरसे रोने लगी। मूर्च्छित
पतिको वक्षःस्थलसे लगाकर वह महादीना पतिव्रता
'हे नाथ! हा नाथ!' का उच्चारण करती हुई
विलाप करने लगी। राजा आहार छोड़ देनेके
कारण सूख गये हैं; उनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ
दिखायी देती हैं- यह देख और कलावतीका
विलाप सुनकर कृपानिधान कमलजन्मा जगत्स्रष्टा
ब्रह्माजी कृपापूर्वक वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने
तुरंत ही राजाके शरीरको अपनी गोदमें लेकर
कमण्डलुके जलसे सींचा। फिर ब्रह्मज्ञ ब्रह्माने
ब्रह्मज्ञानके द्वारा उसमें जीवका संचार किया।
इससे चेतनाको प्राप्त हो नृपवर सुचन्द्रने अपने
सामने प्रजापतिको देखकर प्रणाम किया। प्रजापतिने
कामके समान कान्तिमान् नरेशसे संतुष्ट होकर
कहा- 'राजन् ! तुम इच्छानुसार वर माँगो।'
विधाताकी यह बात सुनकर श्रीमान् सुचन्द्रके
मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल गयी।
वे प्रसन्नवदन हो बोले- 'दयानिधे ! यदि आप
वर देनेको उद्यत हैं तो कृपापूर्वक मुझे मनोवाञ्छित
निर्वाण प्रदान करें।' इस वरदानके मिल जानेपर
मेरी क्या दशा होगी, इसका मन-ही-मन अनुमान
करके कलावतीके कण्ठ, ओठ और तालु सूख
गये। वह सती संत्रस्त हो वर देनेको उद्यत हुए
विधातासे बोली।
कलावतीने कहा- कमलोद्भव ब्रह्मन् ! यदि
५०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
आप महाराजको मुक्ति दे रहे हैं तो मुझ अबलाकी क्या गति होगी, यह आप ही बताइये ? चतुरानन ! कान्तके बिना कान्ताकी क्या शोभा है? श्रुतिमें सुना गया है कि पतिव्रता नारीके लिये पति ही व्रत है, पति ही गुरु, इष्टदेव, तपस्या और धर्म है। ब्रह्मन् ! सभी स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर परम प्रिय बन्धु कोई नहीं है। पतिसेवा परम दुर्लभ है। वह सब धर्मोंसे बढ़कर है। पतिसेवासे दूर रहनेवाली स्त्रीका सारा शुभ कर्म निष्फल होता है*। व्रत, दान, तप, पूजन, जप, होम, सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, पृथ्वीकी परिक्रमा, समस्त यज्ञोंकी दीक्षा, बड़े-बड़े दान, सब वेदोंका पाठ, सब प्रकारकी तपस्या, वेदज्ञ ब्राह्मणोंको भोजन-दान तथा देवाराधन—ये सब मिलकर पति-सेवाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। जो स्त्रियाँ पतिकी सेवा नहीं करतीं और पतिसे कटुवचन बोलती हैं, वे चन्द्रमा और सूर्यकी सत्तापर्यन्त कालसूत्र नरकमें गिरकर यातना भोगती हैं। वहाँ सर्पोंके बराबर बड़े-बड़े कीड़े दिन-रात उन्हें डँसते रहते हैं और सदा विपरीत एवं भयंकर शब्द किया करते हैं। उस नरकमें स्त्रियोंको मल, मूत्र तथा कफका भोजन करना पड़ता है। यमराजके दूत उनके मुखमें जलती लुआठी डालते हैं। नरकका भोग पूरा करके वे नारियाँ कृमियोनिमें जन्म लेती हैं और सौ जन्मोंतक रक्त, मांस तथा विष्ठा खाती हैं। वेदवाक्योंमें यह निश्चित सिद्धान्त बताया गया है। मैं अबला हूँ। विद्वानोंके मुखसे सुनकर उपर्युक्त बातोंको कुछ-कुछ जानती हूँ। आप तो वेदोंका भी प्राकट्य करनेवाले हैं। प्रभु हैं। विद्वानों, योगियों, ज्ञानियों तथा गुरुके भी गुरु हैं। अच्युत !
आप सर्वज्ञ हैं। मैं आपको क्या समझा सकूँगी ? ये मेरे पति मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। यदि इन्हें मुक्ति प्राप्त हो गयी तो मेरा रक्षक कौन होगा ? मेरे धन और यौवनकी रक्षा कौन करेगा ? कुमारावस्थामें नारीकी रक्षा पिता करता है। फिर वह कन्याका सुपात्रको दान देकर कृतकृत्य हो जाता है। तबसे पति ही नारीकी रक्षा करता है। पतिके अभावमें उसका पुत्र रक्षक होता है। इस प्रकार तीन अवस्थाओंमें नारीके तीन रक्षक माने गये हैं। जो स्त्रियाँ स्वतन्त्र हैं, वे नष्ट मानी गयी हैं। उनका सभी धर्मोंसे बहिष्कार किया गया है। वे नीच कुलमें उत्पन्न, कुलटा और दुष्टहृदया कही गयी हैं। ब्रह्मन् ! उनके सौ जन्मोंका पुण्य नष्ट हो जाता है। पतिव्रताका अपने पतिके प्रति सर्वदा समान स्नेह होता है। दूध पीते बच्चेपर माताओंका अधिक स्नेह देखा जाता है, परंतु वह पतिव्रताके पतिविषयक स्नेहकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। पतिसे बढ़कर कोई बन्धु, प्रिय देवता तथा गुरु नहीं है। स्त्रीके लिये पतिसे बढ़कर धर्म, धन, प्राण तथा दूसरा कोई पुरुष नहीं है। जैसे वैष्णवोंका मन श्रीकृष्णचरणारविन्दमें ही निमग्न रहता है, उसी प्रकार साध्वी स्त्रियोंका चित्त अपने प्रियतम पतिमें ही संलग्न रहता है। ब्रह्मन् ! पतिके बिना पतिव्रता स्त्री एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती। पतिके बिना साध्वी स्त्रियोंके लिये मरण ही जीवन है और जीवन मृत्युसे भी अधिक कष्ट देनेवाला है। ब्रह्मन् ! यदि मेरे बिना ही आप इन्हें मुक्त कर देंगे तो प्रभो ! मैं आपको शाप देकर स्त्री-हत्याका दारुण पाप प्रदान करूँगी।
* व्रतं पतिव्रतायाश्च पतिरेव श्रुतौ श्रुतम्। गुरुश्चाभीष्टदेवश्च तपोधर्ममयः पतिः॥
सर्वेषां च प्रियतमो न बन्धुः स्वामिनः परः। सर्वधर्मोत्परा ब्रह्मन् पतिसेवा सुदुर्लभा॥
स्वामिसेवाविहीनायाः सर्वं तन्निष्फलं भवेत्। (१७। ६७—६९)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०१
कलावतीकी बात सुनकर विधाता विस्मित हो मन-ही-मन भय मानते हुए अमृतके समान मधुर एवं हितकर वचन बोले।
ब्रह्माजीने कहा— बेटी! मैं तुम्हारे स्वामीको तुम्हारे बिना ही मुक्ति नहीं दूँगा। पतिव्रते! तुम अपने पतिके साथ कुछ वर्षोंतक स्वर्गमें रहकर सुख भोगो। फिर तुम दोनोंका भारतवर्षमें जन्म होगा। वहाँ जब साक्षात् सती राधिका तुम्हारी पुत्री होंगी तब तुम दोनों जीवन्मुक्त हो जाओगे और श्रीराधाके साथ ही गोलोकमें पधारोगे। नृपश्रेष्ठ! तुम कुछ कालतक अपनी स्त्रीके साथ स्वर्गीय सुखका उपभोग करो। यह स्त्री साध्वी एवं सत्त्वगुणसे युक्त है। तुम मुझे शाप न देना; क्योंकि श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें चित्त लगाये रखनेवाले जीवन्मुक्त संत समदर्शी होते हैं। उनके मनमें श्रीहरिके दुर्लभ दास्यभावको पानेकी इच्छा रहती है। वे निर्वाण नहीं चाहते।
ऐसा कहकर उन दोनोंको वर दे विधाता उनके सामने खड़े रहे। वे दोनों उन्हें प्रणाम करके स्वर्गकी ओर चल दिये। फिर ब्रह्माजी भी अपने धामको चले गये। तदनन्तर वे दोनों दम्पति समयानुसार स्वर्गीय भोगोंका उपभोग करके भारतवर्षमें आये, जो परम पुण्यदायक तथा दिव्य स्थान है। ब्रह्मा आदि देवता भी वहाँ जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं। सुचन्द्रने गोकुलमें जन्म लिया और वहाँ उनका नाम वृषभानु हुआ। वे सुरभानुके वीर्य और पद्मावतीके गर्भसे उत्पन्न हुए। उन्हें पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वे श्रीहरिके अंश थे और जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार व्रजधाममें प्रतिदिन बढ़ने लगे। धीरे-धीरे वे व्रजके अधिपति हुए। उन्हें सर्वज्ञ और महायोगी माना गया है। उनका चित्त सदा श्रीहरिके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही लगा रहता था। वे उदार, रूपवान्, गुणवान् और श्रेष्ठ बुद्धिवाले थे।
कलावती कान्यकुब्ज देशमें उत्पन्न हुई। वह भी अयोनिजा, पूर्व-जन्मकी बातोंको याद रखनेवाली महासाध्वी, सुन्दरी एवं कमलाकी कला थी। कान्यकुब्ज देशमें महापराक्रमी नृपश्रेष्ठ भनन्दन राज्य करते थे। उन्होंने यज्ञके अन्तमें यज्ञकुण्डसे प्रकट हुई दूध पीती नंगी बालिकाके रूपमें उसे पाया था। वह सुन्दरी बालिका उस कुण्डसे हँसती हुई निकली थी। उसकी अङ्ग-कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी। वह तेजसे उद्भासित हो रही थी। राजेन्द्र भनन्दने उसे गोदमें लेकर अपनी प्यारी रानी मालावतीको प्रसन्नतापूर्वक दे दिया। मालावतीके हर्षकी सीमा न रही। वह उस बालिकाको अपना स्तन पिलाकर पालने लगी। उसके अन्नप्राशन और नामकरणके दिन शुभ बेलामें जब राजा सत्पुरुषोंके बीच बैठे हुए थे, आकाशवाणी हुई—'नरेश्वर! इस कन्याका नाम कलावती रखो।' यह सुनकर राजाने वही नाम रख दिया। उन्होंने ब्राह्मणों, याचकों और वन्दीजनोंको प्रचुर धन दान किया। सबको भोजन कराया और बड़ा भारी उत्सव मनाया। समयानुसार उस रूपवती कन्याने युवावस्थामें प्रवेश किया। सोलह वर्षकी अवस्थामें वह अत्यन्त सुन्दरी दिखायी देने लगी। वह राजकन्या मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थी। मनोहर चम्पाके समान उसकी अङ्गकान्ति थी तथा मुख शरत्कालके पूर्णचन्द्रकी भाँति परम मनोहर था। एक दिन गजराजकी-सी मन्दगतिसे चलनेवाली राजकुमारी राजमार्गसे कहीं जा रही थी। नन्दजीने उसे मार्गमें देखा। देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उस मार्गसे आने-जानेवाले लोगोंसे आदरपूर्वक पूछा—'यह किसकी कन्या जा रही थी।' लोगोंने बताया—'यह महाराज भनन्दनकी कन्या है। इसका नाम कलावती है। यह धन्या बाला लक्ष्मीजीके अंशसे राजमन्दिरमें प्रकट हुई है और कौतुकवश खेलनेके लिये अपनी सहेलीके घर जा रही है।