ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७१- राधाका उद्धवको बिदा करना, बिदा होते समय उद्धवद्वारा राधा-महत्त्व-वर्णन तथा उद्धवके यशोदाके पास चले जानेपर राधाका मूर्च्छित होना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२१
राधा-उद्धव-संवाद
श्रीनारायण कहते हैं- नारद! उद्धवद्वारा | यमुनाटट वही है, सुगन्धित मलय-पवन भी वही
किये गये स्तवनको सुनकर राधिकाकी चेतना | है, उनके केलि-कदम्बोंका मूल भी वही है,
लौट आयी। तब वे विषादग्रस्त हो उद्धवको | उनका अभीष्ट पुण्यमय रमणीय वृन्दावन भी
श्रीकृष्णके सदृश आकारवाला देखकर बोलीं। | विद्यमान है। वही पुंस्कोकिलोंकी बोली, चन्दनचर्चित
श्रीराधिकाने कहा - वत्स ! तुम्हारा क्या | शय्या, चारों प्रकारके भोज्य पदार्थ, सुन्दर मधुपान
नाम है ? किसने तुम्हें भेजा है ? तुम कहाँसे आये | तथा दुरन्त एवं दुःखद पापात्मा मन्मथ भी वही
हो ? तुम्हारे यहाँ आनेका क्या कारण है ? यह | मौजूद है। रासमण्डलमें वे रत्नप्रदीप अभी भी
सब मुझे बतलाओ। तुम्हारा सर्वाङ्ग श्रीकृष्णकी | जलते हैं, उत्तम मणियोंका बना हुआ रतिमन्दिर
आकृतिसे मिलता-जुलता है; अतः मैं समझती हूँ | भी है ही, गोपाङ्गनाओंका समूह भी विद्यमान है,
कि तुम श्रीकृष्णके पार्षद हो। अब तुम बलदेव | पूर्णिमाका चन्द्रमा भी सुशोभित हो रहा है और
और श्रीकृष्णका कुशल-समाचार वर्णन करो। | सुगन्धित पुष्पोंद्वारा रचित चन्दनचर्चित शय्या भी
साथ ही यह भी बतलाओ कि नन्दजी किस | है। रति-भोगके योग्य कर्पूर आदिसे सुवासित
कारणसे वहीं ठहरे हुए हैं ? क्या श्रीकृष्ण इस | पानका बीड़ा, सुगन्धित मालतीकी मालाएँ, श्वेत
रमणीय वृन्दावनमें फिर आयेंगे ? क्या मैं उनके | चँवर, दर्पण, जिसमें मोती और मणि जड़े हुए हैं
पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखका पुनः | ऐसे हीरेके मनोहर हार, अनेकों रमणीय उपकानन,
दर्शन करूँगी तथा रासमण्डलमें उनके साथ पुनः | सुन्दर क्रीड़ा-सरोवर, सुगन्धित पुष्पोंकी वाटिका,
क्रीड़ा करूँगी ? क्या सखियोंके साथ पुनः जल- | कमलोंकी मनोहर पंक्ति आदि सभी वैभव
विहार हो सकेगा ? और क्या श्रीनन्दनन्दनके | विद्यमान हैं (यह सब है); परंतु मेरे प्राणनाथ
शरीरमें पुनः चन्दन लगा पाऊँगी ? | कहाँ हैं ? हा कृष्ण ! हा रमानाथ ! हा मेरे
उद्धव बोले- सुमुखि ! मैं क्षत्रिय हूँ। मेरा | प्राणवल्लभ ! तुम कहाँ हो ? मुझ दासीसे कौन-
नाम उद्धव है। तुम्हारा शुभ समाचार जाननेके | सा अपराध हो गया है ? हुआ ही होगा; क्योंकि
लिये परमात्मा श्रीकृष्णने मुझे भेजा है; इसीलिये | यह दासी तो पग-पगपर अपराध करनेवाली है।
मैं तुम्हारे पास आया हूँ। मैं श्रीहरिका पार्षद भी | इतना कहकर राधिका देवी पुनः मूर्च्छित
हूँ। इस समय श्रीकृष्ण, बलदेव और नन्दजी | हो गयीं। तब उद्धवने पुनः उन्हें चैतन्य कराया।
कुशलसे हैं। | उनकी उस दशाको देखकर क्षत्रियश्रेष्ठ उद्धवको
श्रीराधिकाने कहा - उद्धव ! इस समय भी | परम आश्चर्य हुआ। उस समय सात सखियाँ
अग्नौ दाहस्वरूपायै भद्रायै च नमो नमः। शोभायै पूर्णचन्द्रे च शरत्पद्मे नमो नमः ॥
नास्ति भेदो यथा देवि दुग्धधावल्ययोः सदा। यथैव गन्धभूम्योश्च यथैव जलशैत्ययोः ॥
यथैव शब्दनभसोर्ज्योतिः सूर्यकयोर्यथा। लोके वेदे पुराणे च राधामाधवयोस्तथा ॥
चेतनं कुरु कल्याणि देहि मामुत्तरं सति । इत्युक्त्वा चोद्धवस्तत्र प्रणनाम पुनः पुनः ॥
इत्युद्धवकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिपूर्वकम् । इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते हरिमन्दिरम् ॥
न भवेद् बन्धुविच्छेदो रोगः शोकः सुदारुणः । प्रोषिता स्त्री लभेत् कान्तं भार्याभेदी लभेत् प्रियाम् ॥
अपुत्रो लभते पुत्रान् निर्धनो लभते धनम् । निर्भूमिर्लभते भूमिं प्रजाहीनो लभेत् प्रजाम् ॥
रोगाद् विमुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥
अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः ॥ (१२।६३-९३)
७२२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
लगातार श्रीराधापर श्वेत चँवर डुला रही थीं और असंख्य गोपियाँ विविध भाँतिसे उनकी सेवामें व्यस्त थीं। उनको इस अवस्थामें पहुँची हुई देखकर उद्धव डरे हुएकी भाँति पुनः विनयपूर्वक कानोंको अमृतके समान लगनेवाले परम प्रिय वचन बोले।
उद्धवने कहा— देवि! मैं समझ गया। तुम देवाङ्गनाओंकी अधीश्वरी, परम कोमल, सिद्धयोगिनी, सर्वशक्तिस्वरूपा, मूलप्रकृति, ईश्वरी और गोलोककी सुन्दरी हो; श्रीदामके शापसे तुम भूतलपर अवतीर्ण हुई हो। देवि! तुम श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया तथा उनके वक्षःस्थलपर निवास करनेवाली हो। देवि! मैं हृदयको स्निग्ध करनेवाली अभीष्ट शुभवार्ताका वर्णन करता हूँ; तुम उसे सखियोंके साथ सुस्थिर चित्तसे श्रवण करो। वह वार्ता दुःखरूपी दावाग्निमें झुलसी हुईके लिये अमृतकी वर्षाके समान तथा विरहव्याधि-ग्रस्ताके लिये उत्तम रसायनके सदृश है। नन्दजी सदा प्रसन्न हैं। उन्हें वसुदेवने निमन्त्रित कर रखा है; अतः वे वहाँ आनन्दपूर्वक श्रीकृष्णके उपनयन-संस्कारतक ठहरेंगे। उस मङ्गल-कार्यके साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न हो जानेपर परमानन्द-स्वरूप नन्दजी बलराम और श्रीकृष्णको साथ लेकर हर्षपूर्वक गोकुलको लौटेंगे। उस समय श्रीकृष्ण आकर प्रसन्नताके साथ पुनः माताको प्रणाम करेंगे और रातमें हर्षपूर्वक इस पुण्यमय वृन्दावनमें पधारेंगे। सती राधिके! तुम शीघ्र ही श्रीकृष्णके मुखकमलका दर्शन करोगी। उस समय तुम्हारा सारा विरह-दुःख दूर हो जायगा। अतः मातः! तुम अपने चित्तको स्थिर करो और इस अत्यन्त दारुण शोकको त्याग दो। पुनः प्रसन्नतापूर्वक अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए रमणीय वस्त्र पहनकर अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषणोंको धारण कर लो। कस्तूरी और कुंकुमसे युक्त चिकने चन्दनको शरीरपर लगा लो और मालतीकी मालाओंसे विभूषित करके केशोंका श्रृङ्गार करो। कल्याणि! इस प्रकार सुन्दर वेष बनाकर कपोलोंपर पत्र-भंगी (सौन्दर्यवर्धक विचित्र पत्रावली) कर लो। माँगमें कस्तूरी-चन्दनयुक्त सिन्दूर भर लो और बेंदी लगा लो। पैरोंमें मेंहदी लगाकर उसे महावरसे रँग लो। सति! शोकके साथ-साथ इस कीचड़युक्त कमल-पुष्पोंकी शय्याको त्याग दो और उठो। इस उत्तम रत्नसिंहासनपर बैठो। मन-ही-मन श्रीकृष्णके साथ विशुद्ध एवं मधुर मधुमय पदार्थ खाओ, संस्कारयुक्त स्वच्छ जल पीओ और सुवासित पानका बीड़ा चबाओ। देवेशि! तत्पश्चात् जिसपर अग्नि-शुद्ध वस्त्र बिछा है; जो मालतीकी मालाओंसे सुशोभित, कस्तूरी, जाती, चम्पा और चन्दनकी सुगन्धसे सुवासित, चारों ओरसे मालतीकी मालाओं और हीरोंके हारोंसे विभूषित एवं सुन्दर-सुन्दर मणियों, मोतियों और माणिक्योंसे परिष्कृत है; जिसके उपधान (तकिया)-में पुष्पोंकी मालाएँ लटक रही हैं और जो सब तरहसे मङ्गलके योग्य है; उस अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित परम मनोहर पलंगपर सदा गोपियोंद्वारा सेवित होती हुई हर्षपूर्वक शयन करो। मनोहरे! तुम्हारी प्रिय सखी एवं भक्त गोपी निरन्तर तुमपर श्वेत चँवर डुलाती रहती है और तुम्हारे चरणकमलोंकी सेवा करती है।
मुने! इतना कहकर तथा ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा वन्दित उनके चरणकमलोंको प्रणाम करके उद्धव चुप हो गये। उद्धवके मधुर वचनोंको सुनते ही सती राधिकाके मुखपर मुस्कराहट छा गयी और उन्होंने उद्धवको अमूल्य दिव्य वस्त्राभूषण, रत्न, हार, भोजन, जल, ताम्बूल आदि देकर आशीर्वाद दिया। फिर, श्रीकृष्णवर्णित ज्ञानका उपदेश किया तथा लक्ष्मी, विद्या, कीर्ति, सिद्धिके साथ ही श्रीहरिके दास्य, श्रीहरिके चरणोंमें निश्चला भक्ति और श्रेष्ठतम पार्षद-पदकी प्राप्तिका वरदान दिया। इस प्रकार