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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

७०- श्रीकृष्णके तेजसे दग्ध होकर दैत्यराज केशीका प्राण-परित्याग करना

४८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जालसे विभूषित था। टेढ़ी भौंहें कामदेवके अस्त्रोंकी सारभूता जान पड़ती थीं, जिनसे वे योगिराजोंके चित्तको भी मोह लेनेमें समर्थ थीं। वे स्थलकमलोंकी कान्तिको चुरानेवाले दो सुन्दर चरण धारण करती थीं। वे चरण रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनमें महावर लगा हुआ था। श्रेष्ठ मणियोंकी शोभा छीन लेनेवाले लाक्षारागरञ्जित नखोंसे उन चरणोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उत्तम रत्नोंके सारभागसे रचित मञ्जीरकी झनकारसे वे अनुरञ्जित जान पड़ते थे। उनकी भुजाएँ रत्नमय कङ्कण, केयूर और शङ्खकी मनोहर चूड़ियोंसे विभूषित थीं। रत्नमयी मुद्रिकाओंसे अंगुलियोंकी शोभा बढ़ी हुई थी। वे अग्निशुद्ध दिव्य एवं कोमल वस्त्र धारण किये हुए थीं। उनकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके फूलोंकी प्रभाको चुराये लेती थी। उनके एक हाथमें सहस्र दलोंसे युक्त उज्ज्वल क्रीड़ाकमल सुशोभित था और वे अपने श्रीमुखकी शोभा देखनेके लिये हाथमें रत्नमय दर्पण लिये हुए थीं।

उस निर्जन वनमें उन्हें देखकर नन्दजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे करोड़ों चन्द्रमालाओंकी प्रभासे सम्पन्न हो दसों दिशाओंको उद्भासित कर रही थीं। नन्दरायजीने उन्हें प्रणाम किया। उनके नेत्रोंसे अश्रु झरने लगे और मस्तक भक्तिभावसे झुक गया। वे बोले—‘देवि! गर्गजीके मुखसे तुम्हारे विषयमें सुनकर मैं यह जानता हूँ कि तुम श्रीहरिकी लक्ष्मीसे भी बढ़कर प्रेयसी हो। साथ ही यह भी जान चुका हूँ कि ये श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण महाविष्णुसे भी श्रेष्ठ, निर्गुण एवं अच्युत हैं; तथापि मानव होनेके कारण मैं भगवान् विष्णुकी मायासे मोहित हूँ। भद्रे! अपने इन प्राणनाथको ग्रहण करो और जहाँ तुम्हारी मौज हो, चली जाओ। अपना मनोरथ पूर्ण कर लेनेके पश्चात् मेरा यह पुत्र मुझे लौटा देना।'

यों कहकर नन्दने भयसे रोते हुए बालकको राधाके हाथमें दे दिया। राधाने बालकको ले लिया और मुखसे मधुर हास प्रकट किया। वे नन्दसे बोलीं—बाबा! यह रहस्य दूसरे किसीपर प्रकट न हो, इसके लिये यत्नशील रहना। नन्द! अनेक जन्मोंके पुण्यफलका उदय होनेसे तुमने आज मेरा दर्शन प्राप्त किया है। गर्गजीके वचनसे तुम इस विषयके ज्ञाता हो गये हो। हमारे अवतारका सारा कारण जानते हो। हम दोनोंके गोपनीय चरित्रको कहीं कहना नहीं चाहिये। अब तुम गोकुलमें जाओ। ब्रजेश्वर! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह मुझसे माँग लो। उस देवदुर्लभ वरको भी मैं तुम्हें अनायास ही दे सकती हूँ।'

श्रीराधिकाका यह वचन सुनकर ब्रजेश्वरने उनसे कहा—देवि! तुम प्रियतमसहित अपने चरणोंकी भक्ति मुझे प्रदान करो। दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा मेरे मनमें नहीं है। जगदम्बिके! परमेश्वरि! तुम दोनोंके संनिधानमें रहनेका सौभाग्य हम दोनों पति-पत्नीको कृपापूर्वक दो। नन्दजीका यह वचन सुनकर परमेश्वरी श्रीराधा बोलीं—‘ब्रजेश्वर! मैं भविष्यमें तुम्हें अनुपम दास्यभाव प्रदान करूँगी। इस समय हमारी भक्ति तुम्हें प्राप्त हो। हम दोनों (प्रिया-प्रियतम)-के चरणकमलोंमें तुम दोनोंकी दिन-रात भक्ति बनी रहे। तुम दोनोंके प्रसन्नहृदयमें हमारी परम दुर्लभ स्मृति निरन्तर होती रहे। मेरे वरके प्रभावसे माया तुम दोनोंपर अपना आवरण नहीं डाल सकेगी। अन्तमें मानवशरीरका त्याग करके तुम दोनों ही गोलोकमें पधारोगे।'

ऐसा कह श्रीकृष्णको दोनों बाँहोंसे सानन्द गोदमें लेकर श्रीराधा अपनी रुचिके अनुसार वहाँसे दूर ले गयीं। उन्हें प्रेमातिरेकसे वक्षः-स्थलपर रखकर वे बार-बार उनका आलिङ्गन और चुम्बन करने लगीं। उस समय उनका सर्वाङ्ग पुलकित हो उठा और उन्होंने रासमण्डलका स्मरण किया। इसी बीचमें राधाने मायाद्वारा निर्मित उत्तम रत्नमय मण्डप देखा, जो सैकड़ों

· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ४८३

रत्नमय कलशोंसे सुशोभित था। भाँति-भाँतिके विचित्र चित्र उस मण्डपकी शोभा बढ़ा रहे थे। विचित्र काननोंसे वह सुशोभित था। सिन्दूरकी-सी कान्तिवाली मणियोंद्वारा निर्मित सहस्रों खम्भे उस मण्डपकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। उसके भीतर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरके द्रवसे युक्त मालती-मालाओंके समूहसे पुष्पशय्या तैयार की गयी थी। वहाँ नाना प्रकारकी भोगसामग्री संचित थी। दीवारोंमें दिव्य दर्पण लगे हुए थे। श्रेष्ठ मणियों, मुक्ताओं और माणिक्योंकी मालाओंके जालसे उस मण्डपको सजाया गया था। उसमें मणीन्द्रसाररचित किवाड़ लगे हुए थे। वह भवन बेल-बूटोंसे विभूषित वस्त्रों और श्रेष्ठ पताका-समूहोंसे सुसज्जित था। कुंकुमके समान रंगवाली मणियोंद्वारा उसमें सात सीढ़ियाँ बनायी गयी थीं। उस भवनके सामने एक पुष्पोद्यान था, जो भ्रमरोंके गुञ्जारवसे युक्त पुष्पसमूहोंद्वारा शोभा पा रहा था। देवी राधा उस मण्डपको देखकर प्रसन्नतापूर्वक उसके भीतर चली गयीं। वहाँ उन्होंने कर्पूर आदिसे युक्त ताम्बूल तथा रत्नमय कलशमें रखा हुआ स्वच्छ, शीतल एवं मनोहर जल देखा। नारद! वहाँ सुधा और मधुसे भरे हुए अनेक रत्नमय कलश शोभा पा रहे थे। उस भवनके भीतर पुष्पमयी शय्यापर एक किशोर अवस्थावाले श्यामसुन्दर कमनीय पुरुष सो रहे थे, जो अत्यन्त मनोहर थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे चन्दनसे चर्चित तथा करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलासे अलंकृत थे। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था। उनके मुख और नेत्रोंमें प्रसन्नता छा रही थी। उनके दोनों चरण मणीन्द्रसारनिर्मित मञ्जीरकी झनकारसे अनुरञ्जित थे। हाथोंमें उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए केयूर और कंगन शोभा दे रहे थे। उत्तम मणियोंद्वारा रचित कान्तिमान् कुण्डलोंसे उनके गण्डस्थलकी अपूर्व शोभा हो रही थी। मणिराज कौस्तुभ उनके वक्षःस्थलमें अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहा था। दोनों नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। मालतीकी मालाओंसे संयुक्त मोरपंखका मुकुट उनके मस्तकको सुशोभित कर रहा था। त्रिभङ्ग चूड़ा (चोटी) धारण किये वे उस रत्नमण्डपको निहार रहे थे। राधाने देखा मेरी गोदमें बालक नहीं है और उधर वे नूतन यौवनशाली पुरुष दृष्टिगोचर हो रहे हैं। यह देखकर सर्वस्मृतिस्वरूपा होनेपर भी राधाको बड़ा विस्मय हुआ। रासेश्वरी उस परम मनोहर रूपको देखकर मोहित हो गयीं। वे प्रेम और प्रसन्नताके साथ अपने लोचन-चकोरोंके द्वारा उनके मुखचन्द्रकी सुधाका पान करने लगीं। उनकी पलकें नहीं गिरती थीं। मनमें प्रेमविहारकी लालसा जाग उठी। उस समय राधाका सर्वाङ्ग पुलकित हो उठा। वे मन्द-मन्द मुस्कराती हुई प्रेम-वेदनासे व्यथित हो उठीं। तब तिरछी चितवनसे अपनी ओर देखती हुई, मुस्कराते मुखारविन्दवाली श्रीराधासे वहाँ श्रीहरिने इस प्रकार कहा।

**श्रीकृष्ण बोले—**राधे! गोलोकमें देवमण्डलीके भीतर जो वृत्तान्त घटित हुआ था, उसका तुम्हें स्मरण तो है न? प्रिये! पूर्वकालमें मैंने जो कुछ स्वीकार किया है, उसे आज पूर्ण करूँगा। सुमुखि राधे! तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा हो। जैसी तुम हो, वैसा मैं हूँ; निश्चय ही हम दोनोंमें भेद नहीं है। जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति और पृथ्वीमें गन्ध होती है; इसी प्रकार तुममें मैं व्याप्त हूँ। जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा नहीं बना सकता तथा जैसे स्वर्णकार सुवर्णके बिना कदापि कुण्डल नहीं तैयार कर सकता; उसी प्रकार मैं तुम्हारे बिना सृष्टि करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। तुम सृष्टिकी आधारभूता हो और मैं अच्युत बीजरूप हूँ। साध्वि! जैसे आभूषण शरीरकी शोभाका हेतु है, उसी प्रकार तुम मेरी शोभा हो। जब मैं तुमसे अलग रहता

४८४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हूँ, तब लोग मुझे कृष्ण (काला-कलूटा) कहते हैं और जब तुम साथ हो जाती हो तो वे ही लोग मुझे श्रीकृष्ण (शोभाशाली श्रीकृष्ण)-की संज्ञा देते हैं। तुम्हीं श्री हो, तुम्हीं सम्पत्ति हो और तुम्हीं आधारस्वरूपिणी हो। तुम सर्वशक्तिस्वरूपा हो और मैं अविनाशी सर्वरूप हूँ। जब मैं तेजःस्वरूप होता हूँ, तब तुम तेजोरूपिणी होती हो। जब मैं शरीररहित होता हूँ, तब तुम भी अशरीरिणी हो जाती हो। सुन्दरि! मैं तुम्हारे संयोगसे ही सदा सर्व-बीजस्वरूप होता हूँ। तुम शक्तिस्वरूपा तथा सम्पूर्ण स्त्रियोंका स्वरूप धारण करनेवाली हो। मेरा अङ्ग और अंश ही तुम्हारा स्वरूप है। तुम मूलप्रकृति ईश्वरी हो। वरानने! शक्ति, बुद्धि और ज्ञानमें तुम मेरे ही तुल्य हो। जो नराधम हम दोनोंमें भेदबुद्धि करता है, उसका कालसूत्र नामक नरकमें तबतक निवास होता है, जबतक जगत्में चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं। वह अपने पहले और बादकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिरा देता है। उसका करोड़ों जन्मोंका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। जो नराधम अज्ञानवश हम दोनोंकी निन्दा करते हैं, वे जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतक घोर नरकमें पकाये जाते हैं।

'रा' शब्दका उच्चारण करनेवाले मनुष्यको मैं भयभीत-सा होकर उत्तम भक्ति प्रदान करता हूँ और 'धा' शब्दका उच्चारण करनेवालेके पीछे-पीछे इस लोभसे डोलता फिरता हूँ कि पुनः 'राधा' शब्दका श्रवण हो जाय। जो जीवनपर्यन्त सोलह उपचार अर्पण करके मेरी सेवा करते हैं, उनपर मेरी जो प्रीति होती है, वही प्रीति 'राधा' शब्दके उच्चारणसे होती है। बल्कि उससे भी अधिक प्रीति 'राधा' नामके उच्चारणसे होती है। राधे! मुझे तुम उतनी प्रिया नहीं हो, जितना तुम्हारा नाम लेनेवाला प्रिय है। 'राधा' नामका उच्चारण करनेवाला पुरुष मुझे 'राधा' से भी अधिक प्रिय है। ब्रह्मा, अनन्त, शिव, धर्म, नर-नारायण ऋषि, कपिल, गणेश और कार्तिकेय भी मेरे प्रिय हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, प्रकृति—ये देवियाँ तथा देवता भी मुझे प्रिय हैं; तथापि वे राधा नामका उच्चारण करनेवाले प्राणियोंके समान प्रिय नहीं हैं। उपर्युक्त सब देवता मेरे लिये प्राणके समान हैं; परंतु सती राधे! तुम तो मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो। वे सब लोग भिन्न-भिन्न स्थानोंमें स्थित हैं; किंतु तुम तो मेरे वक्षःस्थलमें विराजमान हो। जो मेरी चतुर्भुज मूर्ति अपनी प्रियाको वक्षःस्थलमें धारण करती है, वही मैं श्रीकृष्णस्वरूप होकर सदा स्वयं तुम्हारा भार वहन करता हूँ।

यों कहकर श्रीकृष्ण उस मनोरम शय्यापर विराजमान हुए, तब राधिका भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर अपने प्राणनाथसे बोलीं।

राधिकाने कहा—'प्रभो! मुझे गोलोककी सारी बातें याद हैं। मैं सब जानती हूँ। मैं उन बातोंको भूल कैसे सकती हूँ? तुम जो मुझे सर्वरूपिणी बता रहे हो, वह सब तुम्हारे चरण-कमलोंकी कृपासे ही सम्भव है। ईश्वरको कुछ लोग अप्रिय होते हैं और कहीं कुछ लोग प्रिय भी होते हैं। जैसे जो मेरा स्मरण नहीं करते हैं, उसी तरह उनपर तुम्हारी कृपा भी नहीं होती है। तुम तृणको पर्वत और पर्वतको तृण बनानेमें समर्थ हो; तथापि योग्य-अयोग्यमें तथा सम्पत्ति और विपत्तिमें भी तुम्हारी समान कृपा होती है। मैं खड़ी हूँ और तुम सोये हो। इस समय बातचीतमें जो समय निकल गया, वह एक-एक क्षण मेरे लिये एक-एक युगके समान है। मैं उसकी गणना करनेमें असमर्थ हूँ। तुम मेरे वक्षःस्थल और मस्तकपर अपना चरण-कमल रख दो। तुम्हारे विरहकी आगसे मेरा हृदय शीघ्र ही दग्ध होना चाहता है। सामने तुम्हारे चरण-कमलपर जब मेरी दृष्टि पड़ी तो वह वहीं रम

•• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८५

गयी। फिर मैं क्लेश उठाकर भी उसे दूसरे अङ्गोंको देखनेके लिये वहाँसे अन्यत्र न ले जा सकी; तथापि धीरे-धीरे प्रत्येक अङ्गका दर्शन करके ही मैंने तुम्हारे शान्त मुखारविन्दपर दृष्टि डाली है। इस मुखारविन्दको देखकर अब मेरी दृष्टि अन्यत्र जानेमें असमर्थ है।

राधिकाका यह वचन सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण हँसने लगे। फिर वे श्रुतियों और स्मृतियोंके मतानुसार तथ्य एवं हितकर वचन बोले।

श्रीकृष्णने कहा— भद्रे! मैंने पूर्वकालमें वहाँ गोलोकमें जो निश्चय किया था, उसका खण्डन नहीं होना चाहिये। प्रिये! तुम क्षणभर ठहरो। मैं तुम्हारा मङ्गल करूँगा। तुम्हारे मनोरथकी पूर्तिका समय स्वयं आ पहुँचा है। राधे! पहले मैंने जिसके लिये जो कुछ लिख दिया है और जिस समय उस मनोरथकी प्राप्तिका निश्चय कर दिया है; उस पूर्व-निश्चयका खण्डन मैं स्वयं ही नहीं कर सकता। फिर विधाताकी क्या विसात है, जो उसे मिटा सके? मैं विधाताका भी विधाता हूँ। मैंने जिनके लिये जो कुछ विधान कर दिया है, उसका ब्रह्मा आदि देवता भी कदापि खण्डन नहीं कर सकते।

इसी बीचमें ब्रह्मा श्रीहरिके सामने आये। उनके हाथोंमें माला और कमण्डलु शोभा पा रहे थे। चारों मुखोंपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। निकट जाकर उन्होंने श्रीकृष्णको नमस्कार किया और आगमके अनुसार उनकी स्तुति की। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे। सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था और भक्तिभावसे उनका मस्तक झुका हुआ था। स्तुति और नमस्कार करके जगद्धाता ब्रह्मा श्रीहरिके और निकट गये। उन्होंने अपने प्रभुको भक्तिभावसे पुनः प्रणाम किया। फिर वे श्रीराधिकाके समीप गये और माताके चरण-कमलमें मस्तक रखकर उन्होंने भक्तिभावसे नमस्कार किया। शीघ्रतापूर्वक माता राधिकाके चरणारविन्दोंको अपने जटाजालसे वेष्टित करके ब्रह्माजीने कमण्डलुके जलसे प्रसन्नतापूर्वक उनका प्रक्षालन किया। फिर दोनों हाथ जोड़कर वे आगमके अनुसार श्रीराधाकी स्तुति करने लगे।

ब्रह्माजी बोले— हे माता! भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे मुझे तुम्हारे चरणकमलोंके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ये चरण सर्वत्र और विशेषतः भारतवर्षमें सभीके लिये परम दुर्लभ हैं। मैंने पूर्वकालमें पुष्करतीर्थमें सूर्यके प्रकाशमें बैठकर परमात्मा श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की। तब वरदाता श्रीहरि मुझे वर देनेके लिये स्वयं पधारे। उनके 'वर माँगो' ऐसा कहनेपर मैंने प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर माँगते हुए कहा—'हे गुणातीत परमेश्वर! जो सबके लिये परम दुर्लभ है, उन राधिकाके चरण-कमलका मुझे इसी समय शीघ्र दर्शन कराइये।' मेरी यह बात सुनकर ये श्रीहरि मुझ तपस्वीसे बोले—'वत्स! इस समय क्षमा करो। उपयुक्त समय आनेपर मैं तुम्हें श्रीराधाके चरणारविन्दोंके दर्शन कराऊँगा।' ईश्वरकी आज्ञा निष्फल नहीं होती; इसीलिये मुझे तुम्हारे चरणकमलोंके दर्शन प्राप्त हुए हैं। माता! तुम्हारे ये चरण गोलोकमें तथा इस समय भारतमें भी सबकी मनोवाञ्छाके विषय हैं। सब देवियाँ प्रकृतिकी अंशभूता हैं; अतः वे निश्चय ही जन्य और प्राकृतिक हैं। तुम श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई हो; अतः सभी दृष्टियोंसे श्रीकृष्णके समान हो। तुम स्वयं श्रीकृष्ण हो और ये श्रीकृष्ण राधा हैं अथवा तुम राधा हो और ये स्वयं श्रीकृष्ण हैं। इस बातका किसीने निरूपण किया हो, ऐसा मैंने वेदोंमें नहीं देखा है। अम्बिके! जैसे गोलोक ब्रह्माण्डसे बाहर और ऊपर है, उसी तरह वैकुण्ठ भी है। माँ! जैसे वैकुण्ठ और गोलोक अजन्य हैं; उसी प्रकार तुम भी अजन्मा हो। जैसे समस्त ब्रह्माण्डमें सभी

४८६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जीवधारी श्रीकृष्णके ही अंशांश हैं; उसी प्रकार उन सबमें तुम्हीं शक्तिरूपिणी होकर विराजमान हो। समस्त पुरुष श्रीकृष्णके अंश हैं और सारी स्त्रियाँ तुम्हारी अंशभूता हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी तुम देहरूपा हो; अतः तुम्हीं इनकी आधारभूता हो। माँ! इनके प्राणोंसे तुम प्राणवती हो और तुम्हारे प्राणोंसे ये परमेश्वर श्रीहरि प्राणवान् हैं। अहो! क्या किसी शिल्पीने किसी हेतुसे इनका निर्माण किया है? कदापि नहीं। अम्बिके! ये श्रीकृष्ण नित्य हैं और तुम भी नित्या हो। तुम इनकी अंशस्वरूपा हो या ये ही तुम्हारे अंश हैं; इसका निरूपण किसने किया है? मैं जगत्स्रष्टा ब्रह्मा स्वयं वेदोंका प्राकट्य करनेवाला हूँ। उस वेदको गुरुके मुखसे पढ़कर लोग विद्वान् हो जाते हैं; परंतु वेद अथवा पण्डित तुम्हारे गुणों या स्तोत्रोंका शतांश भी वर्णन करनेमें असमर्थ हैं। फिर दूसरा कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है? स्तोत्रोंका जनक है ज्ञान और सदा ज्ञानकी जननी है बुद्धि। माँ राधे! उस बुद्धिकी भी जननी तुम हो। फिर कौन तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ होगा? जिस वस्तुका सबको प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है; उसका वर्णन करनेमें तो कोई भी विद्वान् समर्थ हो सकता है। परंतु जो वस्तु कभी देखने और सुननेमें भी नहीं आयी, उसका निर्वचन (निरूपण) कौन कर सकता है? मैं, महेश्वर और अनन्त कोई भी तुम्हारी स्तुति करनेकी क्षमता नहीं रखते। सरस्वती और वेद भी अपनेको असमर्थ पाते हैं। परमेश्वरि! फिर कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है? मैंने आगमोंका अनुसरण करके तुम्हारे विषयमें जैसा कुछ कहा है, उसके लिये तुम मेरी निन्दा न करना। जो ईश्वरोंके भी ईश्वर परमात्मा हैं, उनकी योग्य और अयोग्यपर भी समान कृपा होती है। जो पालनके योग्य संतान है, उसका क्षण-क्षणमें गुण-दोष प्रकट होता रहता है; परंतु माता और पिता उसके सारे दोषोंको स्नेहपूर्वक क्षमा करते हैं।

यों कहकर जगत्स्रष्टा ब्रह्मा उन दोनोंके सर्ववन्द्य एवं सर्ववाञ्छित चरणकमलोंको प्रणाम करके उनके सामने खड़े हो गये। जो मनुष्य ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह निश्चय ही राधा-माधवके चरणोंकी भक्ति एवं दास्य प्राप्त कर लेता है। अपने कर्मोंका मूलोच्छेद करके सुदुर्जय मृत्युको भी जीतकर समस्त लोकोंको लाँघता हुआ वह उत्तम गोलोकधाममें चला जाता है।

**भगवान् नारायण कहते हैं—**ब्रह्माजीकी स्तुति सुनकर श्रीराधाने उनसे कहा—‘विधातः! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लो।’ राधिकाकी बात सुनकर जगत्स्रष्टा ब्रह्माने उनसे कहा—‘माँ! तुम दोनोंके चरणकमलोंकी भक्ति ही मेरा अभीष्ट वर है, उसे ही मुझे दे दो।’ विधाताके इतना कहते ही श्रीराधाने तत्काल ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब लोकनाथ ब्रह्माने पुनः भक्ति-भावसे श्रीराधाको प्रणाम किया। उस समय उन्होंने श्रीराधा और श्रीकृष्णके बीचमें अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया। फिर श्रीहरिके स्मरणपूर्वक विधाताने विधिसे उस अग्निमें आहुति डाली। इसके बाद श्रीकृष्ण पुष्पशय्यासे उठकर अग्निके समीप बैठे। फिर ब्रह्माजीकी बतायी हुई विधिसे उन्होंने स्वयं हवन किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण और राधाको प्रणाम करके ब्रह्माजीने स्वयं पिताके कर्तव्यका पालन करते हुए उन दोनोंसे कौतुक (वैवाहिक मङ्गल-कृत्य) कराये और सात बार अग्निदेवकी परिक्रमा करवायी। इसके बाद राधासे अग्निकी परिक्रमा करवाकर श्रीकृष्णको प्रणाम कराके राधाको उनके पास बैठाया। फिर श्रीकृष्णसे राधाका हाथ ग्रहण कराया और माधवसे सात वैदिक मन्त्र पढ़वाये। तत्पश्चात् वेदज्ञ विधाताने श्रीहरिके वक्षःस्थलपर

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८७
राधिकाका हाथ रखवाकर राधाके पृष्ठदेशमें श्रीकृष्णका
हाथ रखवाया और राधासे तीन वैदिक मन्त्रोंका
पाठ करवाया। तदनन्तर ब्रह्माने पारिजातके पुष्पोंकी
आजानुलम्बिनी माला श्रीराधाके हाथसे श्रीकृष्णके
गलेमें डलवायी। तत्पश्चात् कमलजन्मा विधाताने
पुनः श्रीराधा और श्रीकृष्णको प्रणाम करके
श्रीहरिके हाथसे श्रीराधाके कण्ठमें मनोहर माला
डलवायी। फिर श्रीकृष्णको बैठाया और उनके
वामपार्श्वमें मन्द-मन्द मुस्कराती हुई श्रीकृष्णहृदया
राधाको भी बैठाया। इसके बाद उन दोनोंसे हाथ
जुड़वाकर पाँच वैदिक मन्त्र पढ़वाये। तत्पश्चात्
विधाताने पुनः श्रीकृष्णको प्रणाम करके, जैसे
पिता अपनी पुत्रीका दान करता है, उसी प्रकार
राधिकाको उनके हाथमें सौंप दिया और भक्ति-
भावसे वे श्रीकृष्णके सामने खड़े हो गये।
इसी बीचमें आनन्दित और पुलकित हुए
देवगण दुन्दुभि, आनक और मुरज आदि बाजे
बजाने लगे। विवाहमण्डपके पास पारिजातके
फूलोंकी वर्षा होने लगी। श्रेष्ठ गन्धर्वोंने गीत गाये
और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
ब्रह्माजीने श्रीहरिकी स्तुति की और मुस्कराते हुए
उनसे कहा—'आप दोनोंके चरणकमलोंमें मेरी
भक्ति बढ़े, यही मुझे दक्षिणा दीजिये।' ब्रह्माजीकी
बात सुनकर स्वयं श्रीहरिने उनसे कहा—ब्रह्मन् !
मेरे चरणकमलोंमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति हो। अब
तुम अपने स्थानको जाओ। तुम्हारा कल्याण
होगा, इसमें संशय नहीं है। वत्स! मैंने जो कार्य
तुम्हारे जिम्मे लगाया है, उसका मेरी आज्ञाके
अनुसार पालन करो।
मुने! श्रीकृष्णका यह आदेश सुनकर जगत्-
विधाता ब्रह्मा श्रीराधा-कृष्णको प्रणाम करके
प्रसन्नतापूर्वक अपने लोकको चले गये। ब्रह्माजीके
चले जानेपर मुस्कराती हुई देवी राधिकाने बाँकी
चितवनसे श्रीहरिके मुँहकी ओर देखा और
लज्जासे अपना मुँह ढँक लिया। उस समय उनका
सर्वाङ्ग पुलकित हो उठा था। वे प्रेमवेदनाका
अनुभव कर रही थीं। श्रीहरिको भक्तिभावसे
प्रणाम करके श्रीराधा उनकी शय्यापर गयीं। वहाँ
चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरका अङ्गराग
रखा हुआ था। श्रीराधाने श्रीकृष्णके ललाटमें
तिलक करके उनके वक्षःस्थलमें चन्दन लगाया।
फिर सुधा और मधुसे भरा हुआ मनोहर रत्नपात्र
भक्तिपूर्वक श्रीहरिके हाथमें दिया। जगदीश्वर
श्रीकृष्णने उस सुधाका पान किया। इसके बाद
श्रीराधाने कर्पूर आदिसे सुवासित सुरम्य ताम्बूल
श्रीकृष्णको दिया। श्रीहरिने उसे सादर भोग
लगाया। फिर श्रीहरिके दिये हुए सुधारसका
मुस्कराती हुई श्रीराधाने आस्वादन किया। साथ
ही उनके दिये हुए ताम्बूलको भी श्रीहरिके
सामने ही खाया। श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक अपना
चबाया हुआ पान श्रीराधाको दिया। राधाने बड़ी
भक्तिसे उसे खाया और उनके मुखारविन्दमकरन्दका
पान किया। इसके बाद मधुसूदनने भी श्रीराधासे
उनका चबाया हुआ पान माँगा, परंतु राधाने
नहीं दिया। वे हँसने लगीं और बोलीं- 'क्षमा
कीजिये।' माधवने राधाके हाथसे रत्नमय दर्पण
ले लिया और राधिकाने भी माधवके हाथसे
बलपूर्वक उनकी मुरली छीन ली। राधाने माधवका
और माधवने राधाका मन मोह लिया। प्रेम-
मिलनके पश्चात् राधाने प्रसन्नतापूर्वक परमात्मा
श्रीकृष्णको उनकी मुरली लौटा दी। श्रीकृष्णने
भी राधाको उनका दर्पण और उज्ज्वल क्रीड़ा-
कमल दे दिया। उनके केशोंकी सुन्दर वेणी बाँध
दी और भालदेशमें सिन्दूरका तिलक लगाया। विचित्र
पत्र-रचनासे युक्त सुन्दर वेष सँवारा। उन्होंने
जैसी वेष-रचना की, उसे विश्वकर्मा भी नहीं
जानते हैं; फिर सखियोंकी तो बात ही क्या है?
जब राधा श्रीकृष्णकी वेष-रचना करनेको
उद्यत हुईं, तब वे किशोरावस्थाका रूप त्यागकर
पुनः शिशुरूप हो गये। राधाने देखा, बालरूप