सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६५- बालक श्रीकृष्णको गोपीका प्रसन्नतापूर्वक देखना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४५३

कर रही है। उसके प्रसन्न मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसे देखकर वसुदेवजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे तुरंत ही पुत्रको वहाँ सुलाकर कन्याको गोदमें ले डरते-डरते मथुराकी ओर गये

और अपनी पत्नीके सूतिकागारमें जा पहुँचे। वहीं उन्होंने उस महामायास्वरूपिणी बालिकाको सुला दिया। बालिका जोर-जोरसे रोने लगी। उसे देखकर देवकी थर्रा उठी। उस बालिकाने अपने रोनेकी आवाजसे ही रक्षकोंको जगा दिया। रक्षक शीघ्र उठकर खड़े हो गये और उस बालिकाको छीनकर कंसके निकट जा पहुँचे। देवकी और वसुदेव भी शोकसे विह्वल हो पीछे-पीछे गये। महामुने! बालिकाको देखकर कंसको अधिक प्रसन्नता नहीं हुई। उस रोती हुई बच्चीपर भी उसे दया नहीं आयी। वह क्रूरकर्मा असुर उस बालिकाको लेकर पत्थरपर दे मारनेके लिये आगे बढ़ा। उस समय वसुदेव और देवकीने बड़े आदरके साथ उससे कहा—'नृपश्रेष्ठ कंस! तुम नीतिशास्त्रमें निपुण विद्वान् हो; अतः हमारी सच्ची, नीतियुक्त तथा मनोहर बात सुनो। भैया! तुमने हमारे भाई-बन्धु होकर भी हम दोनोंके छः पुत्रोंका वध कर डाला, फिर भी तुम्हें दया नहीं आती! अब इस आठवें गर्भमें यह अबला बालिका प्राप्त हुई है। हमारी इस बच्चीको मारकर तुम्हें भूतलपर कौन-सा महान् ऐश्वर्य प्राप्त हो जायगा? क्या एक अबला युद्धके मुहानेपर तुम्हारी राज्यलक्ष्मीका हनन करनेमें समर्थ हो सकती है?' ऐसा कहकर वसुदेव और देवकी दोनों दुरात्मा कंसके सामने वहाँ फूट-फूटकर रोने लगे। कंस बड़ा ही निर्दय था। उसने उन दोनोंकी बातें सुनकर इस प्रकार उत्तर दिया।

कंस बोला—बहिन! मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें समझाता हूँ। विधाता दैववश एक तिनकेके द्वारा पर्वतको धराशायी करनेमें समर्थ हैं। एक कीड़ेके द्वारा सिंह और व्याघ्रको तथा एक मच्छरके द्वारा विशालकाय हाथीको नष्ट कर सकते हैं। शिशुके द्वारा महान् वीरका, क्षुद्र जन्तुओंन्द्वारा विशालकाय प्राणीका, चूहेके द्वारा बिल्लीका और मेढकके द्वारा सर्पका वध करा सकते हैं। इस प्रकार विधाता जन्यके द्वारा जनकका, भक्ष्यके द्वारा भक्षकका, अग्निके द्वारा जलका और सूखे तिनकेके द्वारा अग्निका नाश करनेमें समर्थ हैं। एकमात्र द्विज जह्नुने सात

४५४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

समुद्रोंको पी लिया था; अतः तीनों लोकोंमें विधाताकी विचित्र गतिको समझ पाना अत्यन्त कठिन है। दैवयोगसे यह बालिका ही मेरा नाश करनेमें समर्थ हो जायगी, अतः मैं बालिकाका भी वध कर डालूँगा। इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

ऐसा कहकर कंस उस बालिकाको मारना ही चाहता था कि वसुदेवजीने पुनः उससे कहा—'राजन्! तुमने अबतक व्यर्थ ही हिंसा की है। कृपानिधे! अब इस बालिकाको मुझे दे दो।' महामुने! उनकी बात सुनकर विचारज्ञ कंस संतुष्ट हो गया। इसी समय उसे बोध कराती हुई आकाशवाणी प्रकट हुई। 'ओ मूढ़ कंस! तू विधाताकी गतिको न जानकर किसे मारने जा रहा है? तेरा वध करनेवाला बालक कहीं उत्पन्न हो गया है। समय आनेपर प्रकट होगा।' यह दैववाणी सुनकर राजा कंसने बालिकाको त्याग दिया। वसुदेव और देवकी उसे पाकर बड़े प्रसन्न हुए। वे उस बालिकाको छातीसे लगाये घरको लौट आये। मरी हुई कन्या मानो पुनः जी गयी हो, इस प्रकार उसे पाकर वसुदेवजीने ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया। विप्रवर! वह कन्या परमात्मा श्रीकृष्णकी बड़ी बहिन हुई। पार्वतीके अंशसे उसका आविर्भाव हुआ था। लोकमें वह 'एकानंशा' नामसे विख्यात हुई। द्वारकामें रुक्मिणीके विवाहके अवसरपर वसुदेवजीने उस कन्याको भगवान् शंकरके अंशावतार महर्षि दुर्वासाके हाथमें भक्तिपूर्वक दे दिया था। मुने! इस प्रकार श्रीकृष्ण-जन्मके विषयमें सारी बातें बतायी गयीं। इसका बारंबार कीर्तन जन्म, मृत्यु और जराके कष्टको नष्ट करनेवाला, सुखदायक और पुण्यदायक है*।

(अध्याय ७)


जन्माष्टमी-व्रतके पूजन, उपवास तथा महत्त्व आदिका निरूपण

**नारदजी बोले—**भगवन्! जन्माष्टमी-व्रत समस्त व्रतोंमें उत्तम कहा गया है। अतः आप उसका वर्णन कीजिये। जिस जन्माष्टमी-व्रतमें जयन्ती नामक योग प्राप्त होता है, उसका फल क्या है? तथा सामान्यतः जन्माष्टमी-व्रतका अनुष्ठान करनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है? इस समय इन्हीं बातोंपर प्रकाश डालिये। महामुने! यदि व्रत न किया जाय अथवा व्रतके दिन भोजन कर लिया जाय तो क्या दोष होता है? जयन्ती अथवा सामान्य जन्माष्टमीमें उपवास करनेसे कौन-सा अभीष्ट फल प्राप्त होता है? प्रभो! उक्त व्रतमें पूजनका विधान क्या है? कैसे संयम करना चाहिये? उपवास अथवा पारणामें पूजन एवं संयमका नियम क्या है? इस विषयमें भलीभाँति विचार करके कहिये।

**भगवान् नारायणने कहा—**मुने! सप्तमी तिथिको तथा पारणाके दिन व्रती पुरुषको हविष्यान्न भोजन करके संयमपूर्वक रहना चाहिये। सप्तमीकी रात्रि व्यतीत होनेपर अरुणोदयकी वेलामें उठकर व्रती पुरुष प्रातःकालिक कृत्य पूर्ण करनेके अनन्तर स्नानपूर्वक संकल्प करे। ब्रह्मन्! उस संकल्पमें यह उद्देश्य रखना चाहिये कि आज मैं श्रीकृष्णप्रीतिके लिये व्रत एवं उपवास करूँगा। मन्वादि तिथि प्राप्त होनेपर स्नान और पूजन करनेसे जो फल मिलता


* श्रीमद्भागवतके वर्णनके साथ इसका मेल नहीं खाता। उसमें चतुर्भुजरूपसे भगवान् प्रकट होते हैं। कन्याको कंस पृथ्वीपर पटक देता है और वह आकाशमें जाकर कंसको सावधान करती है। कल्पभेदसे दोनों ही वर्णन सत्य हो सकते हैं।