ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५५- परशुरामका शिवजीसे अपना अभिप्राय प्रकट करना और शिवजीका उन्हें गुह्यमन्त्र और 'त्रैलोक्यविजय' कवच प्रदान करना
गणपतिखण्ड ३६५
कवच धारण करके उससे युद्ध करनेके लिये उद्यत हो गये। क्रोधके कारण राजाकी बुद्धि मारी गयी थी; अतः वह मुनिके साथ जूझने लगा। मुनिने कपिलाद्वारा दी गयी शक्ति और शस्त्रके बलसे राजाको शस्त्रहीन करके मूर्च्छित कर दिया। तब कमललोचन राजा कार्तवीर्य पुनः होशमें आकर क्रोधपूर्वक मुनिके साथ लोहा लेने लगा। उस नृपश्रेष्ठने समरभूमिमें आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, तब मुनिने वारुणास्त्रद्वारा उसे हँसते-हँसते शान्त कर दिया। फिर राजाने रणभूमिमें मुनिके ऊपर वारुणास्त्र फेंका, तब मुनिने लीलापूर्वक वायव्यास्त्रद्वारा उसे शान्त कर दिया। तब राजाने युद्धस्थलमें वायव्यास्त्र चलाया; मुनिने उसे उसी क्षण गान्धर्वास्त्रद्वारा निवारण कर दिया। फिर नरेशने रणके मुहानेपर नागास्त्र छोड़ा, मुनिवरने उसे हर्षपूर्वक तत्काल ही गारुडास्त्रद्वारा प्रतिहत कर दिया। तब नृपवरने, जो सैकड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् एवं दसों दिशाओंको उद्दीप्त करनेवाला था, उस माहेश्वर नामक महान् अस्त्रका प्रयोग किया। नारद! तब मुनिने बड़े यत्नके साथ त्रिलोकव्यापी दिव्य वैष्णवास्त्रद्वारा उसका निवारण कर दिया और फिर यत्नपूर्वक नारायणास्त्र चलाया। उस अस्त्रको देखकर महाराज कार्तवीर्य उसे नमस्कार करके शरणागत हो गया। तब प्रलयाग्निके समान वह अस्त्र वहाँ ऊपर-ही-ऊपर घूमकर क्षणभरतक दसों दिशाओंको प्रकाशित करके स्वयं अन्तर्धान हो गया। फिर मुनिने रणके मुहानेपर जृम्भणास्त्र छोड़ा। उस अस्त्रके प्रभावसे राजाको निद्राने आ घेरा और वह मृतक-तुल्य होकर सो गया। तब राजाको निद्रित देखकर मुनिने उसी क्षण अर्धचन्द्रद्वारा उस भूपालके सारथि, रथ और धनुषबाणको छिन्न-भिन्न कर दिया। क्षुरप्रसे मुकुट, छत्र और कवच काट डाला तथा भाँति-भाँतिके अस्त्र-प्रयोगसे उसके अस्त्र, तरकस और घोड़ोंकी धज्जियाँ उड़ा दीं। फिर युद्धस्थलमें हँसते हुए मुनिने खेल-ही-खेलमें नागास्त्रद्वारा राजाके सभी मन्त्रियोंको बाँधकर कैद कर लिया; फिर लीलापूर्वक उत्तम मन्त्रका प्रयोग करके उस राजाको जगाया और उन बँधे हुए सभी मन्त्रियोंको उसे दिखाया। राजाको दिखाकर मुनिने तत्काल ही उन्हें बन्धन-मुक्त कर दिया और नरेशको आशीर्वाद देकर कहा—'राजन्! अब अपने घर जाओ।' परंतु राजा क्रोधसे भरा हुआ था। उसने उठकर त्रिशूल उठा लिया और यत्नपूर्वक उसे मुनिवर जमदग्निपर चला दिया। तब मुनिने उसपर शक्तिसे प्रहार किया। इसी बीच उस युद्धस्थलमें ब्रह्माने आकर उत्तम नीतिद्वारा उन दोनोंमें परस्पर प्रेम स्थापित करा दिया। तब मुनिने संतुष्ट होकर रणक्षेत्रमें ब्रह्माके चरणोंमें प्रणिपात किया और राजा ब्रह्मा तथा मुनिको नमस्कार करके अपने घरको प्रस्थान कर गया। फिर मुनि और ब्रह्मा अपने-अपने भवनको चले गये। इस प्रकार इसका वर्णन तो कर दिया, अब आगे तुमसे कुछ और कहूँगा। (अध्याय २५-२६)
जमदग्नि-कार्तवीर्य-युद्ध, कार्तवीर्यद्वारा दत्तात्रेयदत्त शक्तिके प्रहारसे जमदग्निका वध, रेणुकाका विलाप, परशुरामका आना और क्षत्रियवधकी प्रतिज्ञा करना, भृगुका आकर उन्हें सान्त्वना देना
नारायण कहते हैं— नारद! राजा घर लौट तो गया पर उसके मनमें युद्धकी लगी रही; इससे उसने लाखों सेना संग्रह करके फिर जमदग्निके आश्रमपर जाकर आश्रमको घेर लिया। राजाकी विशाल सेनाको देखकर जमदग्निके आश्रमवासी भयसे मूर्च्छित हो गये। महर्षिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक
| ३६६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
बाणोंका एक ऐसा जाल बिछाया कि उससे आश्रमभूमि पूरी ढक गयी। सारी सेना उसीमें आबद्ध हो गयी। तब राजाने रथसे उतरकर महर्षिको नमस्कार किया। महर्षिने उसे आशीर्वाद दिया। राजाने फिर आक्रमण किया। यों कई बार राजा आक्रमण करता रहा, मूर्च्छित होता रहा, पर क्षमाशील मुनिने उसका वध नहीं किया। बड़ा घोर युद्ध हुआ। अन्तमें राजा कार्तवीर्यने दत्तात्रेय मुनिके द्वारा प्राप्त एक पुरुषका नाश करनेवाली अमोघ शक्तिका प्रयोग किया। वह भगवान् विष्णुकी शक्ति थी। उसने मुनिके हृदयको बींध डाला। मुनिने उसके आघातसे जीवनविसर्जन कर दिया। शक्ति भगवान् विष्णुके पास चली गयी।
जगत्में हाहाकार मच गया। कपिला गौ 'तात-तात' पुकारती हुई गोलोकको प्रस्थान कर गयी। तदनन्तर राजा कार्तवीर्यार्जुन ब्रह्महत्या-जनित पापका प्रायश्चित्त करके अपनी राजधानीको लौट गया।
इधर पतिव्रता महर्षिपत्नी रेणुका पतिके मरणसे अत्यन्त दुःखी होकर रोने लगीं। वे अपने पुत्र परशुरामको पुकारने लगीं। उस समय योगी परशुराम पुष्करमें थे। वे उसी क्षण मानस-गतिसे चलकर माताके पास आ पहुँचे। उन्होंने माताको प्रणाम किया और पिताकी अन्त्येष्टि-क्रियाकी तैयारी की। सारी बातें सुनकर माताके युद्ध न करनेका अनुरोध करनेपर भी भार्गव परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन करनेकी प्रतिज्ञा कर ली और राजा कार्तवीर्यार्जुनके वध करनेका प्रण कर लिया। फिर विलाप करती हुई पति-शोकपीड़िता माताको समझाते हुए बोले!
परशुरामने कहा—माता! जो पिताकी आज्ञा भङ्ग करनेवाले तथा पिताके हिंसकका वध नहीं करता, वह महान् मूर्ख है। उसे निश्चय ही रौरव नरकमें जाना पड़ता है। आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें हथियार लेकर मारनेके लिये आनेवाला, धनका अपहरण करनेवाला, क्षेत्रका विनाश करनेवाला, स्त्रीको चुरानेवाला, पिताका वध करनेवाला, बन्धुओंकी हिंसा करनेवाला, सदा अपकार करनेवाला, निन्दक और कटु वचन कहनेवाला—ये ग्यारह वेदविहित घोर पापी हैं। ये मार डालने योग्य हैं।
इसी बीच वहाँ स्वयं महर्षि भृगु आ पहुँचे। वे मनस्वी मुनि अत्यन्त भयभीत थे और उनका हृदय दुःखी था। उन्हें देखकर रेणुका और परशुराम उनके चरणोंपर गिर पड़े। तब भृगुमुनि उन दोनोंसे ऐसी वेदोक्त बात कहने लगे जो परलोकके लिये हितकारिणी थी।
भृगुजी बोले—बेटा! तुम तो मेरे वंशमें उत्पन्न और ज्ञानसम्पन्न हो; फिर विलाप कैसे कर रहे हो। इस संसारमें सभी चराचर प्राणी जलके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर हैं। पुत्र! सत्यके सार तथा सत्यके बीज तो श्रीकृष्ण ही हैं। तुम उन्हींका स्मरण करो। वत्स! जो बीत गया, सो गया; क्योंकि बीती हुई बात पुनः लौटती नहीं। जो होनेवाला है, वह होता ही है और आगे भी जो होनेवाला होगा वह होकर ही रहेगा; क्योंकि
गणपतिखण्ड ३६७
निषेकजन्य (प्रारब्धजन्य) कर्म सत्य (अटल) होता है। भला, कर्मफलभोगको कौन हटा सकता है ? वत्स ! श्रीकृष्णने जिस प्रकारके भूत, वर्तमान और भविष्यकी रचना की है, उनके द्वारा निरूपित उस कर्मको कौन निवारण कर सकता है ? बेटा ! मायाका कारण, मायावियोंके पाञ्चभौतिक शरीर और संकेतपूर्वक नाम—ये प्रातःकालके स्वप्नसदृश निरर्थक हैं। परमात्माके अंशभूत आत्माके चले जानेपर भूख, निद्रा, दया, शान्ति, क्षमा, कान्ति, प्राण, मन तथा ज्ञान सभी चले जाते हैं। जैसे राजाधिराजके पीछे नौकर-चाकर चलते हैं, उसी प्रकार बुद्धि तथा सारी शक्तियाँ उसीका अनुगमन करती हैं; अतः तुम यत्नपूर्वक श्रीकृष्णका भजन करो। बेटा ! कौन किसके पितर हैं और कौन किसके पुत्र हैं। ये सभी इस दुस्तर भवसागरमें कर्मरूपी लहरियोंसे प्रेरित हो रहे हैं। पुत्र ! ज्ञानीलोग विलाप नहीं करते, अतः अब तुम भी रुदन मत करो; क्योंकि रोनेके कारण आँसुओंके गिरनेसे मृतकोंको निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है।* भाई-बन्धु आदि कुटुम्बके लोग जिस सांकेतिक नामका उच्चारण करके रुदन करते हैं, उसे वे सौ वर्षोंतक रोते रहनेपर भी नहीं पा सकते—यह निश्चित है; क्योंकि त्वचा आदि पृथ्वीके अंशको पृथ्वी, जलांशको जल, शून्यांशको आकाश, वायुके अंशको वायु तथा तेजांशको तेज ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार सभी अंश अपने-अपने अंशीमें विलीन हो जाते हैं; फिर रोनेसे कौन वापस आयेगा। मरनेके बाद तो नाम, शास्त्र, ज्ञान, यश और कर्मकी कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। इसलिये जो वेदविहित पारलौकिक कर्म है, इस समय तुम वही करो; क्योंकि जो परलोकके लिये हितकारी हो, वही वास्तवमें पुत्र है और वही बन्धु है। भृगुके उस वचनको सुनकर महासाध्वी रेणुकाने उसी क्षण शोकका परित्याग कर दिया और मुनिसे कहना आरम्भ किया। (अध्याय २७)
रेणुका-भृगु-संवाद, रेणुकाका पतिके साथ सती होना, परशुरामका पिताकी अन्त्येष्टि क्रिया करके ब्रह्माके पास जाना और अपनी प्रतिज्ञा सुनाना, ब्रह्माका उन्हें शिवजीके पास भेजना
रेणुकाने पूछा—ब्रह्मन् ! अब मैं अपने प्राणनाथका अनुगमन करना चाहती हूँ। दूसरोंको मान देनेवाले ये मेरे पतिदेव आज मेरे ऋतुकालके चौथे दिन मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! बतलाइये, अब इस विषयमें कैसी व्यवस्था करनी चाहिये। मेरे कई जन्मोंका पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप सहसा उपस्थित हुए हैं।
भृगुने कहा—अहो महासति ! तुम अपने पुण्यात्मा पतिका अनुगमन करो; क्योंकि ऋतुका चौथा दिन पतिके सभी कार्योंमें शुद्ध माना जाता है। जो भक्तिदाता है, वही पुत्र है; जो अनुगमन करती है, वही स्त्री है; जो दान देता है, वही बन्धु है; जो गुरुकी अर्चना करता है, वही शिष्य है; जो रक्षा करे, वही अभीष्ट देवता है; जो प्रजाका पालन करे, वही राजा है; जो अपनी पत्नीकी बुद्धिको धर्ममें नियोजित करता है, वही स्वामी है; जो धर्मोपदेशक तथा हरिभक्ति प्रदान करनेवाला
* ज्ञानिनो मा रुदन्त्येव मा रोदीः पुत्र साम्प्रतम्। रोदनाश्रुप्रपतानामृतानां नरकं ध्रुवम्॥ (२७।६२)
३६८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
है, वही गुरु है—ये सभी वेदों तथा पुराणोंमें निश्चितरूपसे प्रशंसनीय कहे गये हैं।*
रेणुकाने पूछा—मुने! भारतवर्षमें कैसी नारियाँ अपने पतिके साथ सती हो सकती हैं और कैसी नहीं हो सकतीं? तपोधन! यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।
भृगुने कहा—रेणुके! जिनके बच्चे छोटे हों, जो गर्भिणी हों, जिन्होंने ऋतुकालको देखा ही न हो, जो रजस्वला, कुलटा, कुष्ठरोगसे ग्रस्त, पतिकी सेवा न करनेवाली, पति-भक्तिरहित और कटुवादिनी हों—ये यदि दैववश सती भी हो जायँ तो वे अपने पतिको नहीं प्राप्त होतीं। पतिव्रताएँ चितामें शयन करनेवाले पतिको पहले संस्कारसे शुद्ध हुई आग देकर पीछे उसका अनुगमन करती हैं। यदि वे सचमुच पतिव्रता होती हैं तो अपने पतिको पा लेती हैं। जो अपने प्रियतमका अनुगमन करती हैं, वे उसीको पतिरूपमें पाती हैं और प्रत्येक जन्ममें उसीके साथ स्वर्गमें पुण्यका उपभोग करती हैं। पतिव्रते! गृहस्थोंकी यह व्यवस्था तो मैंने तुम्हें बतला दी। अब तीर्थमें मरनेवाले ज्ञानियों तथा वैष्णवोंके विषयमें श्रवण करो। जो साध्वी नारी जहाँ-जहाँ अपने वैष्णव पतिका अनुगमन करती है, वहाँ-वहाँ वह स्वामीके साथ वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी संनिधि प्राप्त करती है। नारद! कृष्णभक्तिपरायण जीवन्मुक्त भक्तोंके तीर्थमें अथवा अन्यत्र मरनेमें कोई विशेषता नहीं है; क्योंकि उन्हें दोनों जगह समान फल मिलता है। इसलिये यदि स्त्री अथवा पुरुष भगवान् नारायण तथा कमलालया लक्ष्मीका भजन करे तो उस भजनके प्रभावसे महाप्रलय होनेपर भी उन दोनोंका नाश नहीं होता। वहाँ रेणुकासे इतना कहकर भृगुमुनि परशुरामसे समयोचित तथा वेदविहित वचन बोले।
"महाभाग वत्स! यहाँ आओ और इस अमाङ्गलिक शोकको त्याग दो। भृगुनन्दन! अपने पिताको दक्षिण सिर करके उत्तान कर दो, नया वस्त्र और यज्ञोपवीत पहनाओ और आँसू रोककर दक्षिणाभिमुख हो बैठ जाओ। फिर भक्तिपूर्वक अरणीसे उत्पन्न हुई अग्नि हाथमें लो और पृथ्वीपर जो-जो तीर्थ हैं, उन सबका स्मरण करो। गया आदि तीर्थ, पुण्यमय पर्वत, कुरुक्षेत्र, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा, यमुना, कौशिकी, सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली चन्द्रभागा, गण्डकी, काशी, पनसा, सरयू, पुष्पभद्रा, भद्रा, नर्मदा, सरस्वती, गोदावरी, कावेरी, स्वर्णरेखा, पुष्कर, रैवत, वराह, श्रीशैल, गन्धमादन, हिमालय, कैलास, सुमेरु, रत्नपर्वत, वाराणसी, प्रयाग, पुण्यमय वन वृन्दावन, हरिद्वार और बदरी—इनका बारंबार स्मरण करो। फिर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुगन्धित पुष्प देकर और वस्त्रसे आच्छादित करके पिताके शवको चिताके ऊपर स्थापित करो। तात! फिर सोनेकी सलाईसे कान, आँख, नाक और मुखमें निर्मन्थन करके उसे आदरसहित ब्राह्मणको दान कर दो। तत्पश्चात्, तिलसहित ताँबेका पात्र, गौ, चाँदी और सोना दक्षिणासहित दान करके स्वस्थचित्त हो दाह-कर्म करो। 'ॐ जो जानकारीमें अथवा अनजानमें पाप-कर्म करके मृत्यु-कालके वशीभूत हो पञ्चत्वको प्राप्त हुआ। ॐ धर्म-अधर्मसे युक्त तथा लोभ-मोहसे समावृत उस मनुष्यके सारे शरीरको जलाता हूँ; वह दिव्य लोकोंमें जाय।' इस मन्त्रको पढ़कर पिताकी प्रदक्षिणा करो और फिर 'ॐ तुम हमारे कुलमें उत्पन्न हुए हो, मैं
* स पुत्रो भक्तिदाता यः सा च स्त्री यानुगच्छति। स बन्धुर्दानदाता यः स शिष्यो गुरुमर्चयेत्॥
सोऽभीष्टदेवो यो रक्षेत् स राजा पालयेत् प्रजाः। स च स्वामी प्रियां धर्मे मतिं दातुमिहेश्वरः॥
स गुरुर्धर्मदाता यो हरिभक्तिप्रदायकः। एते प्रशंस्या वेदेषु पुराणेषु च निश्चितम्॥
(२८।७—९)
गणपतिखण्ड ३६९
पुनः तुम्हारा होकर उत्पन्न होऊँ, तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हो स्वाहा' इस प्रकार उच्चारण करो तथा श्रीहरिका स्मरण करते हुए इसी मन्त्रसे पिताका दाह करो।* हे भृगुनन्दन! पहले तुम भाइयोंके साथ सिरमें आग लगाओ।'' तब भृगुमुनिके आज्ञानुसार परशुरामने अपने गोत्रवालोंके साथ वह सारा कार्य सम्पन्न किया।
तदनन्तर रेणुकाने वहाँ अपने पुत्र परशुरामको छातीसे लगा लिया और परिणाममें सुखदायक कुछ वचन कहे—'बेटा! इस भवसागरमें विरोध न करना सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल है और विरोध नाशका कारण तथा समस्त उपद्रवोंका हेतु है। अतः भयंकर क्षत्रियोंके साथ विरोध न करना ही उचित है; किंतु मेरे सुनते-सुनते तुमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूर्ण करना चाहिये। इसके लिये तुम दिव्य मन्त्रोंके ज्ञाता भृगु और ब्रह्माके साथ विचार करके जैसा उचित हो वैसा करना। सज्जनोंद्वारा आलोचित कर्म शुभकारक होता है।' यों कहकर रेणुका परशुरामको छोड़कर अपने पतिका आलिङ्गन करके श्रीहरिका स्मरण करते हुए परशुरामकी ओर निहारती हुई चितामें सो गयी। तब भाइयोंके साथ परशुरामने चितामें आग लगा दी। फिर भाइयों और पिताके शिष्योंके साथ वे विलाप करने लगे। इतनेमें ही सती रेणुका 'राम, राम, राम' यों उच्चारण करके परशुरामके देखते-देखते जलकर राख हो गयी। तब अपने स्वामीका नाम सुनकर वहाँ श्रीहरिके दूत आ पहुँचे। वे सभी रथपर सवार थे। उनके शरीरका रंग श्याम था। सुन्दर चार भुजाएँ थीं, जिनमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे। उनके गलेमें वनमाला लटक रही थी और वे किरीट, कुण्डल तथा रेशमी पीताम्बरसे विभूषित थे। वे उस रेणुकाको रथमें बिठाकर ब्रह्मलोकमें गये और जमदग्निको लेकर श्रीहरिके संनिकट जा पहुँचे। वहाँ वैकुण्ठमें वे दोनों पति-पत्नी निरन्तर श्रीहरिकी परिचर्या, जो मङ्गलोंकी मङ्गल है, करते हुए श्रीहरिके संनिकट रहने लगे।
नारद! इधर परशुरामने ब्राह्मणों तथा भृगुजीके सहयोगसे माता-पिताकी शेष क्रिया समाप्त करके ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान दिया। फिर गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, सुवर्णनिर्मित पलंगसहित मनोरम दिव्य शय्या, जल, अन्न, चन्दन, रत्नदीप, चाँदीका पहाड़, सुवर्णके आधारसहित स्वर्णनिर्मित उत्तम आसन, सुवासित ताम्बूल, छत्र, पादुका, फल, मनोहर माला, फल-मूल-जल और मनोहर मिष्टान्न तथा धन ब्राह्मणोंको देकर वे ब्रह्मलोकको चल पड़े। ब्रह्मलोकमें पहुँचकर परशुरामने भक्तिभावसे अव्ययात्मा ब्रह्माजीको नमस्कार करके रोते हुए सारी घटना कह सुनायी। कृपामय ब्रह्माजीने सारी बातें सुनकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिया और अपने हृदयसे लगा लिया। भृगुवंशी परशुरामकी बहुत-से जीवोंका विनाश करनेवाली, दुष्कर एवं भयंकर प्रतिज्ञाको सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माको महान् विस्मय हुआ। वे 'प्रारब्धवश सब कुछ घटित हो सकता है' ऐसा मनमें विचारकर परशुरामसे परिणाममें सुखदायक वचन बोले।
**ब्रह्माने कहा—**वत्स! बहुसंख्यक जीवोंका विनाश करनेवाली तुम्हारी प्रतिज्ञा दुष्कर है; क्योंकि यह सृष्टि भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे उत्पन्न होती है। बेटा! उन्हीं परमेश्वरकी आज्ञासे
* ॐ कृत्वा तु दुष्कृतं कर्म जानता वाप्यजानता। मृत्युकालवशं प्राप्य नरं पञ्चत्वमागतम्॥
ॐ धर्माधर्मसमायुक्तं लोभमोहसमावृतम्। दहेयं सर्वगात्राणि दिव्यान् लोकान् स गच्छतु॥
इमं मन्त्रं पठित्वा तु तातं कृत्वा प्रदक्षिणम्। मन्त्रेणानेन देहाग्नि जनकाय हरिं स्मरन्॥
ॐ अस्मत्कुले त्वं जातोऽसि त्वदीयो जायतां पुनः। असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहेति वद साम्प्रतम्॥
(२८। ३२-३५)
३७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मैंने बड़े कष्टसे इस सृष्टिकी रचना की है; किंतु तुम्हारी निर्दयतापूर्ण घोर प्रतिज्ञा सृष्टिका लोप कर देनेवाली है। तुम एक क्षत्रियके अपराधसे पृथ्वीको इक्कीस बार भूपरहित कर देना चाहते हो और क्षत्रिय-जातिको समूल नष्ट करनेकी तुमने ठान ली है। किंतु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र— यह चार प्रकारकी सृष्टि नित्य है, जो श्रीहरिकी ही आज्ञासे पुनः-पुनः आविर्भूत और तिरोहित होती रहती है। अन्यथा किसी प्राक्तन कर्मानुसार तुम्हारी प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। तुम्हें अपनी कार्यसिद्धिके लिये बड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। अतः वत्स! तुम शिवलोकमें जाओ और शंकरकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि भूतलपर बहुत-से नरेश शंकरके भक्त हैं। जब वे शक्तिस्वरूपा पार्वती और शंकरके दिव्य कवचको धारण करके खड़े होंगे, तब महेश्वरकी आज्ञाके बिना उन्हें मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? अतः जो विजयका कारण एवं शुभकारक है, उस उपायको तुम यत्नपूर्वक करो; क्योंकि उपायपूर्वक आरम्भ किये गये कार्य ही सिद्ध होते हैं। इसलिये तुम शंकरसे श्रीकृष्णके मन्त्र और कवचको ग्रहण करो। वह वैष्णव तेज परम दुर्लभ है। उसके प्रभावसे तुम शैव और शाक्त दोनों तेजोंपर विजय पा सकोगे। जगदीश्वर शिव तुम्हारे जन्म-जन्मान्तरके गुरु हैं। अतः मुझसे मन्त्र ग्रहण करना तुम्हारे लिये युक्त नहीं है; क्योंकि जो उपयुक्त होता है, वही विधि है। कर्मभोगसे ही मन्त्र, स्वामी, स्त्री, गुरु और देवता प्राप्त होते हैं। जो जिनके हैं, वे उनके पास स्वयं ही उपस्थित होते हैं, यह ध्रुव है। भृगुनन्दन! तुम त्रैलोक्यविजय नामक श्रेष्ठ कवच ग्रहण करके इक्कीस बार पृथ्वीको भूपरहित कर डालोगे। दानी शंकर तुम्हें दिव्य पाशुपतास्त्र प्रदान करेंगे। उस दिये हुए मन्त्रके बलसे तुम क्षत्रियसमुदायको जीत लोगे।
(अध्याय २८)
परशुरामका शिवलोकमें जाकर शिवजीके दर्शन करके उनकी स्तुति करना
नारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर परशुरामने ब्रह्माकी बात सुनकर उन जगद्गुरुको प्रणाम किया और उनसे वरदान पाकर वे सफलमनोरथ हो शिवलोकको चले। वायुके आधारपर टिका हुआ वह मनोहर लोक एक लाख योजन ऊँचा तथा ब्रह्मलोकसे विलक्षण है। उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। उसके दक्षिणभागमें वैकुण्ठ और वामभागमें गौरीलोक है। नीचेकी ओर ध्रुवलोक है, जो सम्पूर्ण लोकोंसे परे कहा जाता है। उन सबके ऊपर पचास करोड़ योजनके विस्तारवाला गोलोक है। उससे ऊपर दूसरा लोक नहीं है। वही सर्वोपरि कहा जाता है। मनके समान वेगशाली योगीन्द्र परशुरामने उस शिवलोकको देखा। वह महान् अद्भुत लोक उपमान और उपमेयसे रहित अर्थात् अनुपम, श्रेष्ठ योगीन्द्रों, सिद्धों, विद्याविशारदों, करोड़ों कल्पोंकी तपस्यासे पवित्र शरीरवाले पुण्यात्माओंसे निषेवित, मनोरथ पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्षोंके समूहोंसे परिवेष्टित, असंख्य कामधेनुओंके समुदायोंसे सुशोभित, पारिजात-वृक्षोंकी वनावलीसे विशेष शोभायमान, दस हजार पुष्पोद्यानोंसे युक्त, सदा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न, बहुमूल्य मणियोंद्वारा रचित सुन्दर मणिवेदियों तथा सैकड़ों दिव्य राजमार्गोंद्वारा बाहर-भीतर विभूषित और नाना प्रकारकी पच्चीकारीसे युक्त उत्तम मणियोंके कलशोंसे उज्ज्वल दीखनेवाले अमूल्य मणियोंद्वारा निर्मित सौ करोड़ भवनोंसे युक्त था।
उसके रमणीय मध्यभागमें उन्हें शंकरजीका भवन दीख पड़ा। उस परम मनोहर भवनके चारों ओर बहुमूल्य मणियोंकी चहारदीवारीका निर्माण
गणपतिखण्ड ३७१
हुआ था। वह इतना ऊँचा था कि आकाशका स्पर्श कर रहा था। उसका रंग दूध और जलके समान उज्ज्वल था। उसमें सोलह दरवाजे थे तथा वह सैकड़ों ऐसे मन्दिरोंसे सुशोभित था, जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा रत्नोंकी सीढ़ियोंसे विभूषित थे। उनमें हीरे जड़े हुए रत्नोंके खंभे और किवाड़ लगे थे। वे मणियोंकी जालियोंसे सुशोभित, उत्तम रत्नोंके कलशोंसे प्रकाशित, नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे चित्रित अतएव परम मनोहर थे। वहाँ उस भवनके आगे परशुरामने सिंहद्वारका दर्शन किया, जिसमें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए किवाड़ लगे थे। उसका भीतरी भाग पद्मराग एवं महामरकत मणियोंद्वारा रचित वेदियोंसे सदा बाहर-भीतर सुशोभित रहता था। नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित होनेके कारण वह अत्यन्त सुहावना लग रहा था। उसके द्वारपर दो भयंकर द्वारपाल नियुक्त थे, जिन्हें परशुरामने देखा। उनकी आकृति बेडौल थी, दाँत और मुख बड़े विकराल थे। तीन बड़े-बड़े नेत्र थे, जिनमें कुछ पीलिमा और ललाई छायी हुई थी। वे जले हुए पर्वतके समान काले और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। शरीर उत्तम बाघम्बर तथा विभूतिसे विभूषित थे। त्रिशूल और पट्टिश धारण किये हुए वे दोनों ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें देखकर परशुरामका मन भयग्रस्त हो गया। फिर भी वे डरते-डरते कुछ कहनेको उद्यत हुए। उन्होंने विनीत होकर बड़ी नम्रताके साथ उन दोनों महाबली उच्छृंखलोंके सामने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मणकी बात सुनकर उन दोनोंके मनमें दयाका संचार हो आया, तब उन श्रेष्ठ अनुचरोंने दूतद्वारा महात्मा शंकरकी आज्ञा लेकर परशुरामको भीतर प्रवेश करनेका आदेश दिया। परशुराम उनकी आज्ञा पाकर श्रीहरिका स्मरण करते हुए भवनके अंदर प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने एक-एक करके सोलह दरवाजोंको देखा, जो नाना प्रकारकी चित्रकारीसे चित्रित होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर थे तथा उनपर द्वारपाल नियुक्त थे। उन्हें देखकर परशुरामको महान् आश्चर्य हुआ। आगे बढ़नेपर उन्हें शंकरजीकी सभा दिखायी पड़ी, जो बहुत-से सिद्धगणोंसे व्याप्त, महर्षियोंद्वारा सेवित तथा पारिजात-पुष्पोंके गन्धसे युक्त वायुद्वारा सुवासित थी। उस सभामें उन्होंने देवेश्वर शंकरके दर्शन किये। वे रत्नाभरणोंसे सुसज्जित हो रत्नसिंहासनपर विराजमान थे। उनके ललाटपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था। वे बाघाम्बर पहने तथा त्रिशूल और पट्टिश धारण किये हुए थे। उनका शरीर विभूतिसे सुशोभित था। वे सर्पका यज्ञोपवीत पहने थे तथा महान् कल्याणस्वरूप, कल्याण करनेवाले, कल्याणके कारण, कल्याणके आश्रयस्थान, आत्मामें रमण करनेवाले, पूर्णकाम और करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली थे। उनका मुख प्रसन्न था, जिसपर मन्द मुस्कानकी अद्भुत छटा बिखर रही थी, वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये अधीर हो रहे थे। वे सनातन ज्योतिःस्वरूप, लोकोंके लिये अनुग्रहके मूर्त रूप, जटाधारी, सतीकी हड्डियोंसे शोभित, तपस्याओंके फल देनेवाले तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता थे। उनका वर्ण शुद्ध स्फटिकके सदृश उज्ज्वल था। उनके पाँच मुख और तीन नेत्र थे। वे तत्त्वमुद्राद्वारा शिष्योंको गुह्य ब्रह्मका उपदेश कर रहे थे। योगीन्द्र उनके स्तवनमें तथा बड़े-बड़े सिद्ध उनकी सेवामें नियुक्त थे। श्रेष्ठ पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा निरन्तर उनकी सेवा कर रहे थे। वे बुढ़ापा और मृत्युका हरण करनेवाले, गुणातीत, स्वेच्छामय, परिपूर्णतम परब्रह्मके ध्यानमें निमग्न थे, जो ज्योतीरूप सबके आदि, प्रकृतिसे परे और परमानन्दमय हैं। उन श्रीकृष्णका ध्यान करते समय उनके शरीरमें रोमाञ्च हो रहा था तथा वे आँखोंमें आँसू भरे उत्तम स्वरसे उनकी गुणावलीका गान कर रहे थे और भूतेश्वर, रुद्रगण तथा क्षेत्रपाल उन्हें घेरे हुए थे। उन्हें देखकर परशुरामने
| ३७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
बड़े आदरके साथ सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् शिवजीके वामभागमें कार्तिकेय, दाहिनी ओर गणेश्वर, सामने नन्दीश्वर, महाकाल और वीरभद्र तथा उनकी गोदमें उनकी प्रियतमा पत्नी गिरिराजनन्दिनी गौरीको देखा। उन सबको भी परशुरामने बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर नमस्कार किया। उस समय शिवजीका दर्शन करके परशुराम परम संतुष्ट हुए। शोकसे पीड़ित तो वे थे ही; अतः आँखोंमें आँसू भरकर अत्यन्त कातर हो हाथ जोड़कर शान्तभावसे दीन एवं गद्गदवाणीके द्वारा शिवजीकी स्तुति करने लगे।
परशुराम बोले—ईश! मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, परंतु स्तवन करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। आप अक्षर और अक्षरके कारण तथा इच्छारहित हैं, तब मैं आपकी क्या स्तुति करूँ? मैं मन्दबुद्धि हूँ; मुझमें शब्दोंकी योजना करनेका ज्ञान तो है नहीं और चला हूँ देवेश्वरकी स्तुति करने। भला, जिनका स्तवन करनेकी शक्ति वेदोंमें नहीं है, उन आपकी स्तुति करके कौन पार पा सकता है? आप मन, बुद्धि और वाणीके अगोचर, सारसे भी साररूप, परात्पर, ज्ञान और बुद्धिसे असाध्य, सिद्ध, सिद्धोंद्वारा सेवित, आकाशकी तरह आदि, मध्य और अन्तसे हीन तथा अविनाशी, विश्वपर शासन करनेवाले, तन्त्ररहित, स्वतन्त्र, तन्त्रके कारण, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, साधन करनेमें अत्यन्त सुगम और दयाके सागर हैं। दीनबन्धो! मैं अत्यन्त दीन हूँ। करुणासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। आज मेरा जन्म सफल तथा जीवन सुजीवन हो गया; क्योंकि भक्तगण जिन्हें स्वप्नमें भी नहीं देख पाते, उन्हींको इस समय मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। जिनकी कलासे इन्द्र आदि देवगण तथा जिनके कलांशसे चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, जल और वायुके रूपमें विराजमान हैं, उन महेश्वरको मैं अभिवादन करता हूँ। जो स्त्रीरूप, नपुंसकरूप और पुरुषरूप धारण करके जगत्का विस्तार करते हैं, जो सबके आधार और सर्वरूप हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। हिमालयकन्या देवी पार्वती ने कठोर तपस्या करके जिनको प्राप्त किया है। दीर्घ तपस्याके द्वारा भी जिनका प्राप्त होना दुर्लभ है; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सबके लिये कल्पवृक्षरूप हैं और अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करते हैं, जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं और जो भक्तोंके बन्धु हैं; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो लीलापूर्वक क्षणभरमें अनन्त विश्व-सृष्टियोंका संहार करनेवाले हैं; उन भयंकर रूपधारी महेश्वरको मेरा प्रणाम है। जो कालरूप, कालके काल, कालके कारण और कालसे उत्पन्न होनेवाले हैं तथा जो अजन्मा एवं बारंबार जन्म धारण करनेवाले आदि सब कुछ हैं; उन महेश्वरको मैं मस्तक झुकाता हूँ। यों कहकर भृगुवंशी परशुराम शंकरजीके चरण-कमलोंपर गिर पड़े। तब शिवजीने परम प्रसन्न होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिये। नारद! जो भक्तिभावसहित इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे पूर्णतया मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है।*
(अध्याय २९)
* परशुराम उवाच—
ईश त्वां स्तोतुमिच्छामि सर्वथा स्तोतुमक्षमम्। अक्षराक्षरबीजं च किं वा स्तौमि निरीहकम्॥
न योजनां कर्तुमीशो देवेशं स्तौमि मूढधीः। वेदा न शक्ता यं स्तोतुं कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः॥
बुद्धेर्वाङ्मनसोः पारं सारात्सारं परात्परम्। ज्ञानबुद्धेरसाध्यं च सिद्धं सिद्धैर्निषेवितम्॥
गणपतिखण्ड
३७३
परशुरामका शिवजीसे अपना अभिप्राय प्रकट करना, उसे सुनकर भद्रकालीका कुपित होना, परशुरामका रोने लगना, शिवजीका कृपा करके उन्हें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र एवं शस्त्रास्त्र प्रदान करना
[ तदनन्तर महादेवजीके पूछनेपर ] परशुरामने कहा—'दयानिधान! मैं भृगुवंशी जमदग्निका पुत्र परशुराम हूँ। आपका दास हूँ। आपके शरणागत हूँ। आप मेरी रक्षा करें।' इसके बाद सारी
घटना विस्तारसे सुनाकर परशुरामने कहा कि मैंने पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियशून्य करने तथा मेरे पिताका वध करनेवाले कार्तवीर्यको मारनेकी प्रतिज्ञा की है। आप मेरी प्रतिज्ञाको पूर्ण करें।
इस बातको सुनकर भगवती पार्वती और भद्रकालीने क्रुद्ध होकर परशुरामकी भर्त्सना की। तब परशुराम भगवती गौरी और कालिकाके क्रोधभरे वचन सुनकर उच्चस्वरसे रोने लगे और प्राण-विसर्जनके लिये तैयार हो गये। तब दयासागर भक्तानुग्रहकारी प्रभु महादेवने ब्राह्मण-बालकको रोते देखकर स्नेहार्द्रचित्तसे अत्यन्त विनयपूर्ण वचनोंके द्वारा गौरी और कालिकाका क्रोध शान्त किया और उन दोनोंकी तथा अन्यान्य सबकी अनुमति लेकर परशुरामसे कहना आरम्भ किया।
शंकरजीने कहा—हे वत्स! आजसे तुम मेरे लिये एक श्रेष्ठ पुत्रके समान हुए; अतः मैं तुम्हें ऐसा गुह्य मन्त्र प्रदान करूँगा, जो त्रिलोकीमें दुर्लभ है। इसी प्रकार एक ऐसा परम अद्भुत कवच बतलाऊँगा, जिसे धारण करके तुम मेरी कृपासे अनायास ही कार्तवीर्यका वध कर डालोगे। विप्रवर! तुम इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे शून्य भी कर दोगे और सारे जगत्में तुम्हारी कीर्ति
यमाकाशमिवाद्यन्तमध्यहीनं तथाव्ययम्। विश्वतन्त्रमतन्त्रं च स्वतन्त्रं तन्त्रबीजकम्॥
ध्यानासाध्यं दुराराध्यमतिसाध्यं कृपानिधिम्। त्राहि मां करुणासिन्धो दीनबन्धोऽतिदीनकम्॥
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्। स्वप्नादृष्टं च भक्तानां पश्यामि चक्षुषाधुना॥
शक्रादयः सुरगणाः कलया यस्य सम्भवाः। चराचराः कलांशेन तं नमामि महेश्वरम्॥
यं भास्करस्वरूपं च शशिरूपं हुताशनम्। जलरूपं वायुरूपं तं नमामि महेश्वरम्॥
स्त्रीरूपं क्लीबरूपं च पुंरूपं च बिभर्ति यः। सर्वाधारं सर्वरूपं तं नमामि महेश्वरम्॥
देव्या कठोरतपसा यो लब्धो गिरिकन्यया। दुर्लभस्तपसां यो हि तं नमामि महेश्वरम्॥
सर्वेषां कल्पवृक्षं च वाञ्छाधिकफलप्रदम्। आशुतोषं भक्तबन्धुं तं नमामि महेश्वरम्॥
अनन्तविश्वसृष्टीनां संहर्तारं भयंकरम्। क्षणेन लीलामात्रेण तं नमामि महेश्वरम्॥
यः कालः कालकालश्च कालबीजं च कालजः। अजः प्रजश्च यः सर्वस्तं नमामि महेश्वरम्॥
इत्येवमुक्त्वा स भृगुः पपात चरणाम्बुजे। आशिषं च ददौ तस्मै सुप्रसन्नो बभूव सः॥
जामदग्न्यकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिसंयुतः। सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति॥
(२९। ४३–५७)
| ३७४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
व्यास हो जायगी—इसमें संशय नहीं है।
नारद! इतना कहकर शंकरजीने परशुरामको परम दुर्लभ मन्त्र और ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक परम अद्भुत कवच प्रदान किया। फिर स्तोत्र, पूजाका विधान, पुरश्चरणपूर्वक मन्त्रसिद्धिका अनुष्ठान, नियमका ठीक-ठीक क्रम, सिद्धिस्थान और कालकी संख्या आदि बतलायी। उसी समय उन्हें सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्ग भी पढ़ा दिये। तत्पश्चात् शिवजीने परशुरामको नागपाश, पाशुपतास्त्र, अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र, नारायणास्त्र, वायव्यास्त्र, वारुणास्त्र, गान्धर्वास्त्र, गारुडास्त्र, जृम्भणास्त्र, गदा, शक्ति, परशु, अमोघ उत्तम त्रिशूल, विधिपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंके मन्त्र, शस्त्रास्त्रोंके संहार और संधान, अक्षय धनुष, आत्मरक्षाका उपाय, संग्राममें विजय पानेका क्रम, अनेक प्रकारके मायायुद्ध, मन्त्रपूर्वक हुंकार, अपनी सेनाकी रक्षा तथा शत्रुसेनाके विनाशका ढंग, युद्धसंकटके समय नाना प्रकारके अनुपम उपाय, संसारको मोहित करनेवाली तथा बुढ़ापा और मृत्युका हरण करनेवाली विद्या भी सिखायी। परशुरामने चिरकालतक गुरुकुलमें ठहरकर सम्पूर्ण विद्याओंको सीखा। फिर तीर्थमें जाकर मन्त्रसिद्धि प्राप्त की। इसके बाद शिव आदिको नमस्कार करके वे अपने आश्रमको लौट आये।
(अध्याय ३०)
शिवजीका प्रसन्न होकर परशुरामको त्रैलोक्यविजय नामक कवच प्रदान करना
नारदने पूछा— भगवन्! अब मेरी यह सुननेकी इच्छा है कि भगवान् शंकरने दयावश परशुरामको कौन-सा मन्त्र तथा कौन-सा स्तोत्र और कवच दिया था? उस मन्त्रके आराध्य देवता कौन हैं? कवच धारण करनेका क्या फल है? तथा स्तोत्रपाठसे किस फलकी प्राप्ति होती है? वह सब आप बतलाइये।
नारायण बोले— नारद! उस मन्त्रके आराध्य देव गोलोकनाथ गोपगोपीश्वर सर्वसमर्थ परिपूर्णतम स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। शंकरने रत्नपर्वतके निकट स्वयंप्रभा नदीके तटपर पारिजात वनके मध्य स्थित आश्रममें लोकोंके देवता माधवके समक्ष परशुरामको ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक परम अद्भुत कवच, विभूतियोगसे सम्भूत महान् पुण्यमय ‘स्तवराज’ नामवाला स्तोत्र और सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला ‘मन्त्रकल्पतरु’ नामक मन्त्र प्रदान किया था।
महादेवजीने कहा— भृगुवंशी महाभाग वत्स! तुम प्रेमके कारण मुझे पुत्रसे भी अधिक प्रिय हो; अतः आओ कवच ग्रहण करो। राम! जो ब्रह्माण्डमें परम अद्भुत तथा विजयप्रद है, श्रीकृष्णके उस ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक कवचका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें श्रीकृष्णने गोलोकमें स्थित वृन्दावन नामक वनमें राधिकाश्रममें रासमण्डलके मध्य यह कवच मुझे दिया था। यह अत्यन्त गोपनीय तत्त्व, सम्पूर्ण मन्त्रसमुदायका विग्रहस्वरूप, पुण्यसे भी बढ़कर पुण्यतर परमोत्कृष्ट है और इसे स्नेहवश मैं तुम्हें बता रहा हूँ। जिसे पढ़कर एवं धारण करके मूलप्रकृति भगवती आद्याशक्तिने शुम्भ, निशुम्भ, महिषासुर और रक्तबीजका वध किया था। जिसे धारण करके मैं लोकोंका संहारक और सम्पूर्ण तत्त्वोंका जानकार हुआ हूँ तथा पूर्वकालमें जो दुरन्त और अवध्य थे, उन त्रिपुरोंको खेल-ही-खेलमें दग्ध कर सका हूँ। जिसे पढ़कर और धारण करके ब्रह्माने इस उत्तम सृष्टिकी रचना की है। जिसे धारण करके भगवान् शेष सारे विश्वको धारण करते हैं। जिसे धारण करके कूर्मराज शेषको