ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४९- पार्वतीजीके निवेदन करनेपर शिवजीका प्रियतमा (पार्वती)-के साथ घरमें जाकर अपने पुत्रको देखना
गणपतिखण्ड
जाती है और वे ही उसका फल प्रदान करते हैं। जो जिस रूपसे उनका ध्यान करता है, उसे उसी रूपसे उसका फल देते हैं। अतः शिवे! तुम शिवको दक्षिणारूपमें देकर अपना व्रत पूर्ण करो। फिर समुचित मूल्य देकर अपने स्वामीको वापस कर लेना। शुभे! जैसे गौएँ विष्णुकी देहस्वरूपा हैं, उसी प्रकार शिव भी विष्णुके शरीर हैं; अतः तुम ब्राह्मणको गोमूल्य प्रदान करके अपने स्वामीको लौटा लेना। यह बात श्रुतिसम्मत है; क्योंकि जैसे स्वामी यज्ञपत्नीका दान करनेके लिये सदैव समर्थ है, उसी तरह यज्ञपत्नी भी स्वामीको दे डालनेकी अधिकारिणी है।
सभाके बीच यों कहकर नारायण वहीं अन्तर्धान हो गये। इसे सुनकर सभी सभासद् हर्षविभोर हो गये तथा हर्ष-गद्गद हुई पार्वती दक्षिणा देनेको उद्यत हुईं। तदनन्तर शिवाने हवनकी पूर्णाहुति करके शिवको दक्षिणारूपमें दे दिया और उधर सनत्कुमारजीने उस देवसभामें 'स्वस्ति' ऐसा कहकर दक्षिणा ग्रहण कर ली। उस समय भयभीत होनेके कारण दुर्गाका कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गया था, वे हाथ जोड़कर दुःखी हृदयसे ब्राह्मणसे बोलीं।
**पार्वतीजीने कहा—**विप्रवर! 'गौका मूल्य मेरे पतिके बराबर है'—ऐसा वेदमें कहा गया है, अतः मैं आपको एक लाख गौएँ प्रदान करूँगी। आप मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। पतिके मिल जानेपर मैं ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ बाँटूँगी। (अभी तो मैं आत्महीन हूँ, ऐसी दशामें) भला, आत्मासे रहित शरीर कौन-सा कर्म करनेमें समर्थ हो सकता है?
**सनत्कुमारजी बोले—**देवि! मैं ब्राह्मण हूँ। मुझे एक लाख गौओंसे क्या प्रयोजन है और इस अमूल्य रत्नको गौओंके बदले देनेसे भी क्या लाभ होगा? त्रिलोकीमें सभी लोग स्वयं अपने-अपने कर्मके कर्ता हैं। क्या कर्ताका अभीष्ट कर्म कहीं दूसरेकी इच्छासे होता है? मैं इन दिगम्बरको आगे करके तीनों लोकोंमें भ्रमण करूँगा। उस समय ये बालक-बालिकाओंके समुदायके लिये हँसीके कारण होंगे।
मुने! उस देवसभामें यों कहकर ब्रह्माके पुत्र तेजस्वी सनत्कुमारने शंकरजीको अपने संनिकट बैठा लिया। इस प्रकार कुमारद्वारा शंकरजीको ग्रहण किये जाते देखकर पार्वतीके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये। वे शरीर छोड़ देनेके लिये उद्यत हो गयीं। उस समय वे मन-ही-मन सोचने लगीं कि यह कैसी कठिन बात हुई कि न तो अभीष्टदेवका दर्शन मिला और न व्रतका फल ही प्राप्त हुआ। इसी बीच पार्वतीसहित देवताओंने आकाशमें एक परमोत्कृष्ट तेजसमूह देखा। उसकी प्रभा करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे उत्कृष्ट थी, वह दसों दिशाओंको प्रज्वलित कर रहा था और सम्पूर्ण देवताओंसे युक्त कैलास पर्वतको तथा सबको आच्छादित कर रहा था। उसकी मण्डलाकृति बड़ी विस्तृत थी। भगवान्के उस तेजको देखकर देवता लोग क्रमशः उनकी स्तुति करने लगे।
**विष्णुने कहा—**भगवन्! यह जो महाविराट् है, जिसके रोमछिद्रोंमें सभी ब्रह्माण्ड वर्तमान हैं, वह जब आपका सोलहवाँ अंश है, तब हम लोगोंकी क्या गणना है?
**ब्रह्माने कहा—**परमेश्वर! जो वेदोंके उपयुक्त दृश्य है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन करने, स्तवन करने तथा वर्णन करनेमें मैं समर्थ हूँ; परंतु जो वेदोंसे परे है, उसकी मैं क्या स्तुति करूँ?
**श्रीमहादेवजीने कहा—**भगवन्! जो सबके लिये अनिर्वचनीय, स्वेच्छामय, व्यापक और ज्ञानसे परे हैं, उन आपका मैं ज्ञानका अधिष्ठातृदेवता होकर किस प्रकार स्तवन करूँ?
**धर्मने कहा—**जो अदृश्य होते हुए भी अवतारके समय सभी प्राणियोंके लिये दृश्य हो
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जाते हैं, उन भक्तोंके मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप तेजोरूपकी मैं कैसे स्तुति करूँ?
देवताओंने कहा—देवेश्वर! भला जिनका गुणगान करनेमें वेद समर्थ नहीं हैं तथा सरस्वतीकी शक्ति कुण्ठित हो जाती है, उन आपका स्तवन करनेके लिये हमलोग कैसे समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि हम तो आपके कलांश हैं।
मुनियोंने कहा—देव! वेदोंको पढ़कर विद्वान् कहलानेवाले हमलोग वेदोंके कारणस्वरूप आपकी स्तुति कैसे कर सकते हैं? आप मन-वाणीके परे हैं; आपका स्तवन सरस्वती भी नहीं कर सकतीं।
सरस्वतीने कहा—अहो! यद्यपि वेदवादी लोग मुझे वाणीकी अधिष्ठातृदेवी कहते हैं, तथापि आपकी स्तुति करनेके लिये मुझमें कुछ भी शक्ति नहीं है; क्योंकि आप वाणी और मनके अगोचर हैं।
सावित्रीने कहा—नाथ! प्राचीनकालमें मेरी उत्पत्ति आपकी कलासे हुई थी। मैं वेदोंकी जननी हूँ। अतः स्त्रीस्वभाववश मैं सम्पूर्ण कारणोंके भी कारणस्वरूप आपकी किस प्रकार स्तुति करूँ?
लक्ष्मीने कहा—भगवन्! मैं आपके अंशभूत विष्णुकी पत्नी हूँ, जगत्का पालन-पोषण करनेवाली हूँ और आपकी कलासे उत्पन्न हुई हूँ। ऐसी दशामें जगत्की उत्पत्तिके कारणस्वरूप आपका स्तवन कैसे कर सकती हूँ?
हिमालयने कहा—नाथ! मैं कर्मसे स्थावर हूँ, अतः मुझे स्तुति करनेके लिये उद्यत देखकर सत्पुरुष मेरा उपहास कर रहे हैं। मैं क्षुद्र हूँ और स्तवन करनेके लिये सर्वथा अयोग्य हूँ; फिर किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ?
मुने! इस प्रकार जब सभी देवता, देवियाँ और मुनिगण क्रमशः उन नारायणकी स्तुति करके चुप हो गये, तब जो उत्तमव्रतपरायणा, तपस्याओं और सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्रदान करनेवाली और जगन्माता हैं, वे पार्वतीदेवी शिवजीकी प्रेरणासे व्रतके आराध्यदेव परमात्माकी स्तुति करनेको उद्यत हुईं। उस व्रतकालमें उन सतीका शरीर धौतवस्त्रसे आच्छादित था। वे सिरपर जटाका भार धारण किये हुए थीं। उनका रूप धधकती हुई अग्निकी लपटके समान प्रकाशमान था और वे तेजकी मूर्तिमान् विग्रह जान पड़ती थीं।
पार्वतीजी बोलीं—श्रीकृष्ण! आप तो मुझे जानते हैं; परंतु मैं आपको जाननेमें असमर्थ हूँ। भद्र! आपको वेदज्ञ, वेद अथवा वेदकर्ता—इनमेंसे कौन जानते हैं? अर्थात् कोई नहीं। भला, जब आपके अंश आपको नहीं जानते, तब आपकी कलाएँ आपको कैसे जान सकती हैं? इस तत्त्वको आप ही जानते हैं। आपके अतिरिक्त दूसरे लोग कौन इसे जाननेमें समर्थ हैं? आप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम, अव्यक्त, स्थूलसे भी महान् स्थूलतम हैं। आप सनातन, विश्वके कारण, विश्वरूप और विश्व हैं। आप ही कार्य, कारण, कारणोंके भी कारण, तेजःस्वरूप, षडैश्वर्योंसे युक्त, निराकार, निराश्रय, निर्लिप्त, निर्गुण, साक्षी, स्वात्माराम, परात्पर, प्रकृतिके अधीश्वर और विराट्के बीज हैं। आप ही विराट्रूप भी हैं। आप सगुण हैं और सृष्टि-रचनाके लिये अपनी कलासे प्राकृतिक रूप धारण कर लेते हैं। आप ही प्रकृति हैं, आप ही पुरुष हैं और आप ही वेदस्वरूप हैं। आपके अतिरिक्त अन्य कहीं कुछ भी नहीं है। आप जीव, साक्षीके भोक्ता और अपने आत्माके प्रतिबिम्ब हैं। आप ही कर्म और कर्मबीज हैं तथा कर्मोंके फलदाता भी आप ही हैं। योगीलोग आपके निराकार तेजका ध्यान करते हैं तथा कोई-कोई आपके चतुर्भुज, शान्त, लक्ष्मीकान्त मनोहर रूपमें ध्यान लगाते हैं। नाथ! जो वैष्णव भक्त हैं, वे आपके उस तेजस्वी, साकार, कमनीय, मनोहर, शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी,
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पीताम्बरसे सुशोभित, रूपका ध्यान करते हैं और आपके भक्तगण परमोत्कृष्ट, कमनीय, दो भुजावाले, सुन्दर, किशोर-अवस्थावाले, श्यामसुन्दर, शान्त, गोपीनाथ तथा रत्नाभरणोंसे विभूषित रूपका निरन्तर हर्षपूर्वक सेवन करते हैं। योगीलोग भी जिस रूपका ध्यान करते हैं, वह भी उस तेजस्वी रूपके अतिरिक्त और क्या है? देव! प्राचीनकालमें जब असुरोंका वध करनेके लिये ब्रह्माजीने मेरा स्तवन किया, तब मैं आपके उस तेजको धारण करनेवाले देवताओंके तेजसे प्रकट हुई। विभो! मैं अविनाशिनी तथा तेजःस्वरूपा हूँ। उस समय मैं शरीर धारण करके रमणीय रमणीरूप बनाकर वहाँ उपस्थित हुई। तत्पश्चात् आपकी मायास्वरूपा मैंने उन असुरोंको मायाद्वारा मोहित कर लिया और फिर उन सबको मारकर मैं शैलराज हिमालयपर चली गयी। तदनन्तर तारकाक्षद्वारा पीड़ित हुए देवताओंने जब मेरी सम्यक् प्रकारसे स्तुति की, तब मैं उस जन्ममें दक्ष-पत्नीके गर्भसे उत्पन्न होकर शिवजीकी भार्या हुई और दक्षके यज्ञमें शिवजीकी निन्दा होनेके कारण मैंने उस शरीरका परित्याग कर दिया। फिर मैंने ही शैलराजके कर्मोंके परिणामस्वरूप हिमालयकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया। इस जन्ममें भी अनेक प्रकारकी तपस्याके फलस्वरूप शिवजी मुझे प्राप्त हुए और ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे उन सर्वव्यापी योगीने मेरा पाणिग्रहण किया; परंतु देवमायावश मुझे उनके शृङ्गारजन्य तेजकी प्राप्ति नहीं हुई। परमेश्वर! इसी कारण पुत्र-दुःखसे दुःखी होकर मैं आपका स्तवन कर रही हूँ और इस समय आपके सदृश पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ; परंतु अङ्गोंसहित वेदमें आपने ऐसा विधान बना रखा है कि इस व्रतमें अपने स्वामीकी दक्षिणा दी जाती है (जो बड़ा दुष्कर कार्य है)। कृपासिन्धो! यह सब सुनकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये।
नारद! वहाँ ऐसा कहकर पार्वती चुप हो गयीं। जो मनुष्य मनको पूर्णतया एकाग्र करके भारतवर्षमें इस पार्वतीकृत स्तोत्रको सुनता है, उसे निश्चय ही विष्णुके समान पराक्रमी उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो वर्षभरतक हविष्यान्नका भोजन करके भक्तिभावसे श्रीहरिकी अर्चना करता है, वह इस उत्तम पुण्यक-व्रतके फलको पाता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। ब्रह्मन्! यह विष्णुका स्तवन सम्पूर्ण सम्पत्तियोंकी वृद्धि करनेवाला, सुखदायक, मोक्षप्रद, साररूप, स्वामीके सौभाग्यका वर्धक, सम्पूर्ण सौन्दर्यका बीज, यशकी राशिको बढ़ानेवाला, हरि-भक्तिका दाता और तत्त्वज्ञान तथा बुद्धिकी विशेषरूपसे उन्नति करनेवाला है।*
(अध्याय ७)
* पार्वत्युवाच—
कृष्ण जानासि मां भद्र नाहं त्वां ज्ञातुमीश्वरी। के वा जानन्ति वेदज्ञा वेदा वा वेदकारकाः॥
त्वदंशास्त्वां न जानन्ति कथं ज्ञास्यन्ति त्वत्कलाः। त्वं चापि तत्त्वं जानासि किमन्ये ज्ञातुमीश्वराः॥
सूक्ष्मात् सूक्ष्मतमोऽव्यक्तः स्थूलात् स्थूलतमो महान्। विश्वस्त्वं विश्वरूपश्च विश्वबीजं सनातनः॥
कार्यं त्वं कारणं त्वं च कारणानां च कारणम्। तेजःस्वरूपो भगवान् निराकारो निराश्रयः॥
निर्लिप्तो निर्गुणः साक्षी स्वात्मारामः परात्परः।
प्रकृतीशो विराड्बीजं विराड्रूपस्त्वमेव च। सगुणस्त्वं प्राकृतिकः कलया सृष्टिहेतवे॥
प्रकृतिस्त्वं पुमांस्त्वं च वेदान्यो न क्वचिद् भवेत्। जीवस्त्वं साक्षिणो भोगी स्वात्मनः प्रतिबिम्बकः॥
कर्म त्वं कर्मबीजं त्वं कर्मणां फलदायकः।
ध्यायन्ति योगिनस्तेजस्त्वदीयशरीरिणम्। केचिच्चतुर्भुजं शान्तं लक्ष्मीकान्तं मनोहरम्॥
वैष्णवाश्चैव साकारं कमनीयं मनोहरम्। शङ्खचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरं परम्॥
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पार्वतीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए श्रीकृष्णका पार्वतीको अपने रूपके दर्शन कराना, वर प्रदान करना और बालकरूपसे उनकी शय्यापर खेलना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! पार्वतीद्वारा किये गये उस स्तवनको सुनकर करुणानिधि श्रीकृष्णने पार्वतीको अपने उस स्वरूपके, जो सबके लिये अदृश्य और परम दुर्लभ है, दर्शन कराये। उस समय पार्वतीदेवी स्तुति करके अपने मनको एकमात्र श्रीकृष्णमें लगाकर ध्यानमें संलग्न थीं। उन्होंने उस तेजोराशिके मध्य सबको मोहित करनेवाले श्रीकृष्णके स्वरूपका दर्शन किया। वह एक रत्नपूर्ण मनोरम आसनपर, जो बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, जिसमें हीरे जड़े हुए थे और जो मणियोंकी मालाओंसे शोभित था, विराजमान था। उसके शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था, हाथमें वंशी शोभा दे रही थी। गलेमें वनमालाकी निराली छटा थी। शरीरका रंग श्याम था। रत्नोंके आभूषण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसकी किशोर-अवस्था तथा वेश-भूषा विचित्र थी। उसके ललाटपर चन्दनकी खौर लगी थी।
मुखपर मनोहर मुस्कान खेल रही थी। वह वन्दनीय स्वरूप शरद्-ऋतुके चन्द्रमाका उपहासक तथा मालतीकी मालाओंसे युक्त था। उसके मस्तकपर मयूरपिच्छकी अनोखी छवि थी। गोपाङ्गनाएँ उसे घेरे हुए थीं। वह राधाके वक्षःस्थलको उद्भासित कर रहा था, उसकी लावण्यता करोड़ों कामदेवोंको मात कर रही थी, वही लीलाका धाम, मनोहर, अत्यन्त प्रसन्न, सबका प्रेमपात्र और भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाला था। ऐसे उस रूपको देखकर सुन्दरी पार्वतीने मन-ही-मन उसीके अनुरूप पुत्रकी कामना की और उसी क्षण उन्हें वह वर प्राप्त भी हो गया। इस प्रकार वरदानी परमात्माने पार्वतीके मनमें जिस-जिस वस्तुकी कामना थी, उसे पूर्ण करके देवताओंका भी अभीष्ट सिद्ध किया। तत्पश्चात् यह तेज अन्तर्धान हो गया। तब देवताओंने कृपापरवश हो सनत्कुमारको समझाया और
द्विभुजं कमनीयं च किशोरं श्यामसुन्दरम्। शान्तं गोपाङ्गनाकान्तं रत्नभूषणभूषितम्॥
एवं तेजस्विनं भक्ताः सेवन्ते सततं मुदा। ध्यायन्ति योगिनो यत् तत् कुतस्तेजस्विनं विना॥
तत् तेजो बिभ्रतां देव देवानां तेजसा पुरा। आविर्भूतासुराणां च वधाय ब्रह्मणः स्तुता॥
नित्या तेजःस्वरूपांहं विधृत्य विग्रहं विभो। स्त्रीरूपं कमनीयं च विधाय समुपस्थिता॥
मायया तव मायाहं मोहयित्वासुरान् पुरा। निहत्य सर्वान् शैलेन्द्रमगमं तं हिमाचलम्॥
ततोऽहं संस्तुता देवैस्तारकाक्षेण पीडितैः। अभवं दक्षजायायां शिवस्त्री तत्र जन्मनि॥
त्यक्त्वा देहं दक्षयज्ञे शिवाहं शिवनिन्दया। अभवं शैलजायायां शैलाधीशस्य कर्मणा।
अनेकतपसा प्राप्तः शिवश्चात्रापि जन्मनि। पाणिं जग्राह मे योगी प्रार्थितो ब्रह्मणा विभुः॥
शृङ्गारजं च तत्तेजो नालभं देवमायया। स्तौमि त्वामेव तेनेश पुत्रदुःखेन दुःखिता॥
व्रते भवद्विधं पुत्रं लब्धुमिच्छामि साम्प्रतम्। देवेन विहिता वेदे साङ्गे स्वस्वामिदक्षिणा॥
श्रुत्वा सर्वं कृपासिन्धो कृपां मां कर्तुमर्हसि। इत्युक्त्वा पार्वती तत्र विरराम च नारद॥
भारते पार्वतीस्तोत्रं यः शृणोति सुसंयतः। सत्पुत्रं लभते नूनं विष्णुतुल्यपराक्रमम्॥
संवत्सरं हविष्याशी हरिमभ्यर्च्य भक्तितः। सुपुण्यकव्रतफलं लभते नात्र संशयः॥
विष्णुस्तोत्रमिदं ब्रह्मन् सर्वसम्पत्तिवर्धनम्। सुखदं मोक्षदं सारं स्वामिसौभाग्यवर्धनम्॥
सर्वसौन्दर्यबीजं च यशोराशिविवर्धनम्। हरिभक्तिप्रदं तत्त्वज्ञानबुद्धिविवर्धनम्॥
(गणपतिखण्ड ७।१०९–१३१)