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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

४५- इन्द्रके दर्प-भङ्गकी कथा—नहुषकी शचीपर कुदृष्टि, शचीका धर्मकी बातें बताकर नहुषको समझाना और उसके न माननेपर बृहस्पतिजीकी शरणमें जाकर उनका स्तवन करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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थे। उन असंख्य नागोंको देखकर धन्वन्तरिके शिष्योंको बड़ा भय हुआ। वे सब शिष्य नागोंके निःश्वास-वायुसे मृतक-तुल्य हो गये और निश्चेष्ट तथा ज्ञानशून्य हो पृथ्वीपर पड़ गये। भगवान् धन्वन्तरिने गुरुका स्मरण करते हुए मन्त्रका पाठ और अमृतकी वर्षा करके सब शिष्योंको जीवित कर दिया। उनमें चेतना उत्पन्न करके जगद्गुरु धन्वन्तरिने मन्त्रोंद्वारा भयानक विषवाले सर्पसमूहको जृम्भित कर दिया। फिर तो वे सब-के-सब ऐसे निश्चेष्ट हुए, मानो मर गये हों। उन नागगणोंमें कोई ऐसा भी नहीं रह गया, जो नागराजको समाचार दे सके; परंतु नागराज वासुकि सर्वज्ञ हैं, उन्होंने सर्पोंके उन समस्त संकटको जान लिया और अपनी ज्ञानरूपिणी बहिन जगद्गौरी मनसा (या जरत्कारु)-को बुलाया।

वासुकिने उससे कहा—मनसे! तुम जाओ और अत्यन्त संकटसे नागोंकी रक्षा करो। महाभागे! ऐसा करनेपर तुम्हारी तीनों लोकोंमें पूजा होगी।

वासुकिकी बात सुनकर वह नागकन्या हँस पड़ी और विनीत भावसे खड़ी हो अमृतके समान मधुर वचन बोली।

मनसाने कहा—नागराज ! मेरी बात सुनिये। मैं युद्धके लिये जाऊँगी। शुभ और अशुभ (जीत और हार) तो दैवके हाथमें है; परंतु मैं यथोचित कर्तव्यका पालन करूँगी। समराङ्गणमें लीलापूर्वक उस शत्रुका संहार कर डालूँगी। जिसे मैं मार दूँगी, उसकी रक्षा कौन कर सकता है? मेरे बड़े भाई और गुरु भगवान् शेषने मुझे जगदीश्वर नारायणका परम अद्भुत सिद्ध मन्त्र प्रदान किया है। मैं अपने कण्ठमें 'त्रैलोक्य-मङ्गल' नामक उत्तम कवच धारण करती हूँ; अतः संसारको भस्म करके पुनः उसकी सृष्टि करनेमें समर्थ हूँ। मन्त्रशास्त्रोंमें मैं भगवान् शंकरकी शिष्या हूँ। पूर्वकालमें भगवान् शिवने कृपापूर्वक मुझे महान् ज्ञान दिया था।

ऐसा कहकर श्रीहरि, शिव तथा शेषनागको प्रणाम करके मनमें हर्ष और उत्साह लिये मनसा अन्य नागोंको वहीं छोड़ अकेली ही रोषपूर्वक उस स्थानको गयी। उस समय मनसादेवीकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। वह उस स्थानपर आयी, जहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले धन्वन्तरिदेव विराजमान थे। सुन्दरी मनसाने दृष्टिमात्रसे ही सम्पूर्ण सर्पोंको जीवित कर दिया और अपनी विषपूर्ण दृष्टि डालकर शत्रुके शिष्योंको चेष्टाशून्य बना दिया। भगवान् धन्वन्तरि मन्त्र-शास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे। उन्होंने मन्त्रद्वारा शिष्योंको उठानेका यत्न किया, परंतु वे सफल न हो सके। तब मनसादेवीने धन्वन्तरिकी ओर देख हँसकर अहंकारभरी बात कही।

मनसा बोली—सिद्धपुरुष! बताओ तो सही, क्या तुम मन्त्रका अर्थ, मन्त्रशिल्प, मन्त्रभेद और महान् औषधका ज्ञान रखते हो? गरुड़के शिष्य हो न? मैं और गरुड़ दोनों भगवान् शंकरके विख्यात शिष्य हैं और दीर्घकालतक गुरुके पास शिक्षा लेते रहे हैं।

यों कहकर जगदम्बा मनसा सरोवरसे कमल ले आयी और उसे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके क्रोधपूर्वक धन्वन्तरिकी ओर चलाया। प्रज्वलित अग्निशिखाके समान जलते हुए उस कमल-पुष्पको आते देख धन्वन्तरिने निःश्वासमात्रसे उसको भस्म कर दिया। तत्पश्चात् मन्त्रसे अभिमन्त्रित एक मुट्ठी धूल लेकर उसके द्वारा उन्होंने उस भस्मको भी निष्फल कर दिया। फिर वे अवहेलनापूर्वक हँसने लगे। तब मनसादेवीने ग्रीष्मकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाली शक्ति हाथमें ले ली और उसे मन्त्रसे आवेष्टित करके शत्रुके ओर चला दिया। उस जाज्वल्यमान शक्तिको आते देख धन्वन्तरिने भगवान् विष्णुके दिये हुए शूलसे अनायास ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। शक्तिको भी व्यर्थ हुई देख देवी मनसा

६२६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

रोषसे जल उठी। अब उसने कभी व्यर्थ न जानेवाले दुःसह एवं भयंकर नागपाशको हाथमें लिया, जो एक लाख नागोंसे युक्त, सिद्धमन्त्रसे अभिमन्त्रित तथा काल और अन्तकके समान तेजस्वी था। उसने क्रोधपूर्वक उस नागपाशको चलाया। नागपाशको देखकर धन्वन्तरि प्रसन्नतासे मुस्करा उठे; उन्होंने तत्काल गरुड़‌का स्मरण किया और पक्षिराज गरुड़ वहाँ आ पहुँचे। नागास्त्रको आया देख दीर्घकालके भूखे हुए हरिवाहन गरुड़‌ने चोंचसे मार-मारकर सब नागोंको अपना आहार बना लिया। प्रिये! नागास्त्रको निष्फल हुआ देख मनसाके नेत्र रोषसे लाल हो उठे। उसने एक मुट्ठी भस्म उठाया, जिसे पूर्वकालमें भगवान् शिवने दिया था। मन्त्रसे पवित्र किये गये उस मुट्ठीभर भस्मको चलाया गया देख गरुड़‌ने शिष्य धन्वन्तरिको पीछे करके अपने पंखकी हवासे वह सारा भस्म बिखेर दिया। यह देख देवी मनसाको बड़ा क्रोध हुआ। उसने धन्वन्तरिका वध करनेके लिये स्वयं अमोघ शूल हाथमें लिया। उस शूलको भी भगवान् शिवने ही दिया था। उससे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभा फैल रही थी। वह अमोघ शूल तीनों लोकोंमें प्रलयाग्निके समान प्रकाशित होता था। इसी समय ब्रह्मा और शिव धन्वन्तरिकी रक्षा तथा गरुड़‌के सम्मानके लिये उस समराङ्गणमें आये। भगवान् शम्भु तथा जगदीश्वर ब्रह्माको उपस्थित देख मनसाने भक्तिभावसे उन दोनोंको नमस्कार किया। उस समय भी वह निःशङ्क-भावसे शूल धारण किये रही। धन्वन्तरि तथा गरुड़‌ने भी उन दोनों देवेश्वरोंको मस्तक झुकाया और बड़ी भक्तिसे उनकी स्तुति की। उन दोनोंने भी इन दोनोंको आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् लोकहितकी कामनासे मनसादेवीकी पूजाका प्रचार करनेके लिये ब्रह्माजीने धन्वन्तरिसे मधुर एवं हितकर वचन कहा।

ब्रह्माजी बोले— सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् महाभाग धन्वन्तरे! मनसादेवीके साथ तुम्हारा युद्ध हो, यह मुझे उचित नहीं जान पड़ता। इसके साथ तुम्हारी कोई समता ही नहीं है। यह देवेश्वरी मनसा शिवके दिये हुए अमोघ शूलसे तीनों लोकोंको जलाकर भस्म करनेकी शक्ति रखती है। कौथुम-शाखामें वर्णित ध्यानके अनुसार मनसादेवीका भक्तिभावसे ध्यान करके एकाग्रचित्त हो षोडशोपचार अर्पित करते हुए इसकी पूजा करो। फिर आस्तीकमुनिद्वारा किये गये स्तोत्रसे तुम्हें इसकी स्तुति करनी चाहिये। इससे संतुष्ट हो मनसादेवी तुम्हें वर प्रदान करेगी।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर शिवजीने भी उसका अनुमोदन किया। फिर गरुड़‌ने प्रेमसे प्रयत्नपूर्वक उन्हें समझाया। इन सबकी बात सुनकर स्नानसे शुद्ध हो वस्त्र और आभूषण धारण करके धन्वन्तरि ब्रह्माजीको पुरोहित बना मनसाकी पूजा करनेको उद्यत हुए।

धन्वन्तरि बोले— जगद्गौरी मनसे! यहाँ आओ और मेरी पूजा ग्रहण करो। कश्यपनन्दिनि! पहलेसे ही तीनों लोकोंमें तुम्हारी पूजा होती आयी है। देवि! तुम विष्णुस्वरूपा हो। तुमने सम्पूर्ण जगत्‌को जीत लिया है; इसीलिये रणभूमिमें अस्त्र-प्रयोग नहीं किया है।

ऐसा कहकर संयत हो भक्तिसे मस्तक झुका हाथमें श्वेत पुष्प ले वे ध्यान करनेको उद्यत हुए।

ध्यान

मनसादेवीकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके समान गौर है। उनके सभी अङ्ग मनको मोह लेनेवाले हैं। प्रसन्नमुखपर मन्द हासकी छटा छा रही है। महीन वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। परम सुन्दर केशोंकी वेणी अद्भुत शोभासे सम्पन्न है। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। सबको अभय देनेवाली वे देवी भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर देखी जाती हैं। सम्पूर्ण विद्याओंकी देनेवाली, शान्तस्वरूपा, सर्वविद्याविशारदा,

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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नागेन्द्रवाहना और नागोंकी स्वामिनी हैं; उन परा देवी मनसाका मैं भजन करता हूँ।

प्रिये! इस प्रकार ध्यानकर पुष्प दे नाना द्रव्योंसे युक्त षोडशोपचार चढ़ाकर धन्वन्तरिने उनका पूजन किया। तत्पश्चात् पुलकित-शरीर हो भक्तिसे मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़ उन्होंने यत्नपूर्वक मनसादेवीकी स्तुति की।

धन्वन्तरि बोले—सिद्धस्वरूपा मनसादेवीको नमस्कार है। उन सिद्धिदायिनी देवीको बारंबार मेरा प्रणाम है। वरदायिनी कश्यपकन्याको नमस्कार, नमस्कार और पुनः नमस्कार। कल्याणकारिणी शंकरकन्याको बारंबार नमस्कार। तुम नागोंपर सवार होनेवाली नागेश्वरी हो। तुम्हें नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार। तुम आस्तीककी माता और जगज्जननी हो; तुम्हें मेरा नमस्कार है। जगत्की कारणभूता जरत्कारुको नमस्कार है। जरत्कारु मुनिकी पत्नीको नमस्कार है। नागभगिनीको नमस्कार है। योगिनीको बारंबार नमस्कार है। चिरकालतक तपस्या करनेवाली सुखदायिनी मनसादेवीको बारंबार नमस्कार है। तपस्यारूपा देवीको नमस्कार है। फलदायिनी मनसादेवीको नमस्कार है। साध्वी, सुशीला एवं शान्तस्वरूपा देवीको बारंबार नमस्कार है।

ऐसा कहकर धन्वन्तरिने भक्तिभावसे यत्नपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। उस स्तुतिसे संतुष्ट हुई देवी मनसा धन्वन्तरिको वर देकर शीघ्र ही अपने घरको चली गयीं। ब्रह्मा, रुद्र और गरुड़ भी अपने-अपने धामको चले गये। भगवान् धन्वन्तरि भी अपने भवनको पधारे। फणोंसे सुशोभित नागगण प्रसन्नतापूर्वक पातालको चले गये। प्रिये! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण स्तवराज तुमसे कहा है। आस्तीकने विधिपूर्वक माताकी भक्ति की। इससे वह जगद्गौरी अपने पुत्र मुनिवर आस्तीकपर बहुत संतुष्ट हुईं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है; उसके वंशजोंको नागोंसे भय नहीं होता, इसमें संशय नहीं है।

(अध्याय ५१)


श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय

श्रीकृष्णने कहा—प्रिये! मैंने छोटे-बड़े सभी लोगोंके दर्प-भङ्गकी कहानी कही और तुमने सुनी। इसमें संदेह नहीं कि उन सबका अभिमान भङ्ग किया ही गया था। अब उठो और वृन्दावनमें चलो। सुन्दरि ! अब मैं विरहसे पीड़ित हुई गोपिकाओंको शीघ्र देखना चाहता हूँ।

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! श्यामसुन्दरकी यह बात सुनकर मानिनी रसिकेश्वरी राधाने उनसे कहा—'प्राणेश्वर ! मैं चलनेमें असमर्थ हो गयी हूँ; अतः तुम्हीं मुझे ले चलो।' राधाकी यह बात सुन मधुसूदन हँसकर बोले—'तब मुझपर ही सवार हो जाओ।' ऐसा कह वे तत्काल अदृश्य हो गये। राधा मनकी गतिसे चलनेवाली थीं। वे क्षणभर वहाँ रोती रहीं; फिर इधर-उधर श्यामसुन्दरको ढूँढ़ती हुई वृन्दावनमें जा पहुँचीं। शोकसे कातर हुई राधाने रोते-रोते चन्दनवनमें प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने शोकाकुल गोपियोंको देखा, जो भयसे विह्वल थीं। उनके मुँह लाल हो गये थे।

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
आँखें इधर-उधर घूमती थीं। वे सम्पूर्ण वनमें
भ्रमण करतीं और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती
हुई बिना खाये-पीये रह रही थीं। उनके मनमें
बड़ा रोष था। प्रेमविच्छेदसे कातर राधिकाने उन
सबको देखकर उनसे मलयवनमें भ्रमण आदिका
अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वे उन
सबके साथ रोदन करने लगीं। विरहसे आतुर हो
'हा नाथ ! हा नाथ !' का उच्चारण करके बारंबार
विलाप करती हुई सब गोपियाँ कुपित हो अपने
शरीरका त्याग कर देनेको उद्यत हो गयीं। इसी
समय वहाँ चन्दनवनमें पधारकर श्रीकृष्णने राधा
तथा गोपियोंको दर्शन दिये। प्राणेश्वरको आया
देख गोपाङ्गनाओंसहित राधा आनन्दसे मुस्करायीं
और पुलकित-शरीर हो उनकी ओर दौड़ीं। पास
जाकर वे सब गोपाङ्गनाएँ प्रेमसे विह्नल हो रोने
लगीं। फिर उन सबने श्रीकृष्णसे विरहजनित
अपने सारे दुःखको निवेदन किया। दिन-रात
स्नान और खाना-पीना छोड़कर वन-वनमें निरन्तर
भटकते रहना तथा अन्तमें शरीरको त्याग देनेका
विचार करना आदि सब बातें बताकर उन सबने
क्षणभर उन्हें बहुत फटकारा। फिर वे एक
क्षणतक प्रसन्नतासे उनके गुण गाती रहीं। इसके
बाद कुछ देर उन्हें आभूषण पहनाती तथा चन्दन
लगाती रहीं। कोई-कोई गोपियाँ बोलीं- 'अरी
सखि ! देखो, श्यामसुन्दर हमारे प्राणोंके चोर हैं।
इनकी निरन्तर रखवाली करो। ये कहीं जाने न
पावें।' यह सुनकर दूसरी बोल उठी- 'नहीं
सखी ! अब ये फिर ऐसा अपराध कभी नहीं
करेंगे।' कोई कहने लगी- 'अरी सखियो ! इन्हें
शीघ्र ही चारों ओरसे घेरकर बीचमें कर लो।'
दूसरी बोली- 'नहीं, नहीं सखी ! इन्हें प्रेमपाशसे
बाँधकर हृदय-मन्दिरमें कैद कर लो।' कोई
बोली- 'ये पुरुष हैं; इनपर कभी विश्वास नहीं
किया जा सकता।' अन्य बोल उठी- 'इन
चित्तचोरकी यत्नपूर्वक देखभाल करो।' कोई-कोई
कुपित होकर कहने लगीं- 'ये निष्ठुर हैं, नरघाती
हैं।' कोई बोली- 'अब फिर इनसे बात न करो।'
तदनन्तर जो-जो रमणीय और निर्जन वन
थे, उन सबमें गोपियाँ श्रीकृष्णके साथ कौतूहलपूर्वक
घूमती रहीं। इस तरह उन परमेश्वरको बीचमें
करके वे सब गोपियाँ दूसरे वनमें गयीं, जहाँ
सुरम्य रासमण्डल विद्यमान था। रासमण्डलमें
जाकर रसिकशेखर श्रीकृष्ण स्वर्णसिंहासनपर
विराजमान हुए। जैसे रातके समय आकाशमें
तारागणोंके साथ चन्द्रमा शोभा पाते हैं; उसी
प्रकार वे गोपियोंके साथ सुशोभित हो रहे थे।
जनार्दनने अपनी अनेक मूर्तियाँ प्रकट करके
गोपियोंके साथ पुनः रासक्रीड़ा की।
नारदजीने पूछा- भक्तजनोंके प्रियतम नारायण !
विद्वान् पुरुष पहले 'राधा' शब्दका उच्चारण
करके पीछे 'कृष्ण' का नाम लेते हैं, इसका क्या
कारण है? यह मुझ भक्तको बताइये।
श्रीनारायण बोले- नारद ! इसके तीन
कारण हैं; बताता हूँ, सुनो ! प्रकृति जगत्की माता
हैं और पुरुष जगत्के पिता। त्रिभुवनजननी
प्रकृतिका गौरव पितृस्वरूप पुरुषकी अपेक्षा
सौगुना अधिक है। श्रुतिमें 'राधाकृष्ण', 'गौरीशंकर'
इत्यादि शब्द ही सुना गया है। 'कृष्ण-राधा'
'शंकर-गौरी' इत्यादिका प्रयोग कभी लोकमें भी
नहीं सुना गया है। 'हे रोहिणीचन्द्र ! प्रसन्न होइये
और इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये। संज्ञासहित
सूर्यदेव ! मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको स्वीकार
कीजिये। कमलाकान्त ! प्रसन्न होइये और मेरी
पूजा ग्रहण कीजिये।' इत्यादि मन्त्र सामवेदकी