ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४४- नित्य वैकुण्ठधाममें वनमालाधारी चतुर्भुज नारायणदेवका लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसी और सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदोंके साथ निवास
२७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जो रूखा और मलिन वस्त्र पहने था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसने मुसकराते हुए हाथ जोड़कर रत्नसिंहासनपर बैठे हुए पुष्पमाला और चन्दनसे चर्चित राजाको आशीर्वाद दिया। राजाने भी ब्राह्मणको प्रणाम तो किया, किंतु वे अपने स्थानसे उठे नहीं। उस सभाके सभासद् भी ब्राह्मणकी ओर देखकर खड़े नहीं हुए। वे सभी थोड़ा-थोड़ा हँसते रहे। तब वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मुनियों और देवताओंको नमस्कार करके निरङ्कुश-भावसे वहाँ खड़ा हो गया और क्रोधपूर्वक राजाको शाप देता हुआ बोला—'ओ पामर! तू इस राज्यसे दूर चला जा, श्रीहीन हो जा तथा शीघ्र ही गलित कोढ़से युक्त, बुद्धिहीन और उपद्रवोंसे ग्रस्त हो जा।' ऐसा कहकर क्रोधसे काँपता हुआ ब्राह्मण सभासदोंको शाप देनेके लिये उद्यत हो गया। जो लोग वहाँ हँसे थे, वे सब उठकर खड़े हो गये। उन सबने अपने दोषका परिहार कर लिया। अतः उनकी ओरसे ब्राह्मणका क्रोध जाता रहा।
राजा उस ब्राह्मणको प्रणाम करके भयसे कातर हो रोने लगे। वे व्यथित-हृदयसे सभाके बीचसे बाहर निकले। तब गूढ़रूपवाले वे ब्राह्मणदेवता भी ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हुए चल दिये। उनके पीछे-पीछे भयसे कातर हुए समस्त मुनि भी चले और बारंबार उच्चस्वरसे पुकारने लगे—'हे विप्र! ठहरो, ठहरो।' उन मुनियोंके नाम इस प्रकार हैं—पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, भृगु, अङ्गिरा, मरीचि, कश्यप, वसिष्ठ, क्रतु, शुक्र, बृहस्पति, दुर्वासा, लोमश, गौतम, कणाद, कण्व, कात्यायन, कठ, पाणिनि, जाजलि, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, आपिशालि, तैत्तिलि, महातपस्वी मार्कण्डेय, वोढु, पैल, सनक, सनन्दन, सनातन, भगवान् सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, पराशर, जरत्कारु, संवर्त, करथ, और्व, च्यवन, भरद्वाज, वाल्मीकि, अगस्त्य, अत्रि, उतथ्य, संवर्त, आस्तीक, आसुरि, शिलालि, लाङ्गलि, शाकल्य, शाकटायन, गर्ग, वात्स्य, पञ्चशिख, जमदग्नि, देवल, जैगीषव्य, वामदेव, बालखिल्य आदि, शक्ति, दक्ष, कर्दम, प्रस्कन्न, कपिल, विश्वामित्र, कौत्स, ऋचीक और अघमर्षण—ये तथा और भी मुनि, पितर, अग्नि, हरिप्रिय, दिक्पाल तथा समस्त देवता भी ब्राह्मणके पीछे-पीछे चले। पार्वति! उन नीतिविशारद मुनियोंने
प्रकृतिखण्ड
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ब्राह्मणको समझाया, एक स्थानपर ठहराया और क्रमशः उनसे नीतिकी बातें कहीं।
पार्वतीने पूछा—प्रभो! ब्राह्मणों और ब्रह्माजीके पुत्रोंने, जो नीतिके विद्वान् थे, उस समय उन ब्राह्मणदेवतासे नीतिकी कौन-सी बात कही, यह मुझे बतानेकी कृपा करें।
श्रीमहादेवजी बोले—सुमुखि! उस मुनि-समुदायने स्तुति और विनयसे ब्राह्मणको संतुष्ट करके क्रमशः इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
सनत्कुमारने कहा—ब्रह्मन्! तुम्हारे पीछे-पीछे राजाकी लक्ष्मी और कीर्ति भी चली आयी है। सत्त्व, यश, सुशीलता, महान् ऐश्वर्य, पितर, अग्नि और देवता भी राजाको श्रीहीन करके उनके घरसे बाहर चले आये हैं। द्विजश्रेष्ठ! अब तुम संतुष्ट हो जाओ; क्योंकि ब्राह्मण शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाला कहा गया है। मुने! ब्राह्मणोंका हृदय नवनीतके समान कोमल होता है। वह तपस्यासे परिमार्जित होनेके कारण अत्यन्त निर्मल और शुद्ध होता है। अतः विप्रवर! अब क्षमा करो। आओ और राजभवनको पवित्र करो। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसके देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश होकर लौट जाते हैं; क्योंकि वहाँ अतिथिका सत्कार नहीं हुआ। इसलिये विप्रवर! क्षमा करो, आओ और राजभवनको शुद्ध करो।
पुलस्त्यजी बोले—जो घरपर आये हुए अतिथिको टेढ़ी आँखोंसे देखते हैं, उन्हें अतिथि अपना पाप देकर और उनके पुण्य लेकर चला जाता है। अतः तुम राजाके दोषको क्षमा कर दो। वत्स! तुम्हारी जहाँ मौज हो, जाओ। राजा अपने कर्मदोषसे ही उठकर खड़े नहीं हुए थे। उनके उस दोषको तुम क्षमा कर दो।
पुलहने कहा—जो क्षत्रिय, राजलक्ष्मीके मदसे अथवा जो ब्राह्मण विद्याके मदसे किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह क्षत्रिय श्रीहीन होता है तथा वह ब्राह्मण त्रिकाल संध्यासे शून्य हो जाता है। वे दोनों ही एकादशीव्रत तथा भगवान् विष्णुके नैवेद्यसे वञ्चित हो जाते हैं।
क्रतु बोले—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र कोई भी क्यों न हो, जो ब्राह्मणका अपमान करता है, वह दीक्षाके पुण्य और अधिकारसे भ्रष्ट हो जाता है। इतना ही नहीं, उसका धन नष्ट हो जाता है तथा वह पुत्र और पत्नीसे भी हीन हो जाता है। यह एक अटल सत्य है, अतः भगवन्! क्षमा करो। आओ और राजाके घरको पवित्र करो।
अङ्गिराने कहा—जो ज्ञानवान् ब्राह्मण होकर किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह भारतवर्षमें सात जन्मोंतक सवारी ढोनेवाला बैल होता है।
मरीचि बोले—जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें देवता, ब्राह्मण तथा गुरुका अपमान करता है, वह भगवान् विष्णुकी भक्तिसे वञ्चित हो जाता है।
कश्यपने कहा—जो वैष्णव ब्राह्मणको देखकर उसका अपमान करता है, वह विष्णुमन्त्रकी दीक्षासे वञ्चित हो विष्णुपूजासे भी विरत हो जाता है।
प्रचेता बोले—जो अतिथि ब्राह्मणको आया देख उसके लिये अभ्युत्थान नहीं करता—उठकर खड़ा नहीं हो जाता, वह भारतभूमिमें माता-पिताकी भक्तिसे रहित होता है। उस मूढ़को सात जन्मोंतक हाथीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। अतः द्विजश्रेष्ठ! शीघ्र चलो। राजाको आशीर्वाद दो।
दुर्वासाने कहा—जो गुरु, ब्राह्मण अथवा देवताकी प्रतिमाको देखकर शीघ्र ही उसके सामने मस्तक नहीं झुकाता, वह पृथ्वीपर सूअर होता है। अतः ब्रह्मन्! हमारे सब अपराधोंको क्षमा करो और चलकर अतिथि-सत्कार ग्रहण करो।
राजाने पूछा—आप सब लोग श्रेष्ठ मुनि हैं। आपने किसी-न-किसी बहानेसे धर्मका उपदेश किया है। अतः सब कुछ स्पष्ट बताकर
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मुझ मूर्खको समझाइये। विद्वद्वरो! आपलोग पहले
मुझे यह बतावें कि स्त्रीहत्या, गोहत्या, कृतघ्नता,
गुरुपत्नीगमन तथा ब्रह्महत्या करनेवालोंको
कौन-सा दोष लगता है तथा उसका परिहार कैसे
होता है ?
वसिष्ठजी बोले- राजन् ! यदि स्वेच्छापूर्वक
गो-वधका पाप किया गया हो तो उसके
प्रायश्चित्तके लिये मनुष्य एक वर्षतक तीर्थोंमें
भ्रमण करता रहे। वह प्रतिदिन जौकी रोटी
अथवा जौकी लप्सी खाये और हाथसे ही जल
पीये। वर्ष पूरा होनेपर ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित
सौ अच्छी और दुधारू गौओंका दान करे।
प्रायश्चित्तसे पाप क्षीण हो जानेपर भी मनुष्य
अपने सम्पूर्ण पापसे मुक्त नहीं होता। जो पाप
शेष रह जाता है, उसीके फलसे वह दुःखी एवं
चाण्डाल होता है। यदि आतिदेशिक हत्या हुई हो
अर्थात् साक्षात् गोवध आदि न होकर उसके
समान बताया गया कोई पापकर्म बन गया हो तो
उसमें साक्षात् की हुई हत्यासे आधा फल भोगना
पड़ता है। अनुकल्परूप प्रायश्चित्तसे उस हत्याका
पाप यद्यपि क्षीण हो जाता है तथापि उससे
पूर्णतया छुटकारा नहीं मिलता।
शुकने कहा - स्त्रीकी हत्या करनेपर निश्चय
ही गोहत्यासे दूना पाप लगता है। स्त्रीहत्यारा
हजारों वर्षोंतक कालसूत्र नामक नरकमें निवास
करता है। तदनन्तर वह महापापी मानव सात
जन्मोंतक सूअर और सात जन्मोंतक सर्प होता
है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है।
बृहस्पति बोले - स्त्रीहत्यासे दूना पाप लगता
है ब्रह्महत्यामें। ब्रह्महत्यारा एक लाख वर्षोंतक
निश्चय ही महाभयंकर कुम्भीपाक नरकमें निवास
करता है। तदनन्तर उस महापापीको सौ वर्षोंतक
विष्ठाका कीड़ा होना पड़ता है, इसके बाद सात
जन्मोंतक सर्प होकर वह उस पापसे शुद्ध होता है।
गौतमने कहा- राजेन्द्र ! कृतघ्नको ब्रह्महत्यासे
चौगुना पाप लगता है। वेदमें अवश्य ही
कृतघ्नोंकी शुद्धिके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं कहा
गया है।
राजाने पूछा- वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे !
आप मुझे कृतघ्नोंका लक्षण बताइये। कृतघ्नोंके
कितने भेद हैं और उनमेंसे किन्हें किस दोषकी
प्राप्ति होती है ?
ऋष्यशृङ्गने उत्तर दिया - सामवेदमें सोलह
प्रकारके कृतघ्नोंका निरूपण किया गया है। वे
सब-के-सब प्रत्येक दोषसे प्रत्येक फलके भागी
होते हैं। सत्कर्म, सत्य, पुण्य, स्वधर्म, तप,
प्रतिज्ञा, दान, स्वगोष्ठी-परिपालन, गुरुकृत्य, देवकृत्य,
कामकृत्य, द्विजपूजन, नित्य-कृत्य, विश्वास, परधर्म
और परप्रदान - इनमें स्थित हुए मनुष्योंका जो
वध करता है, वह पापिष्ठ कृतघ्न कहा गया है।
इनके लिये जो लोक हैं, वे उस जन्मसे भिन्न
योनियोंमें उपलब्ध होते हैं। राजेन्द्र ! वे पापी
कृतघ्न जिन-जिन नरकोंमें जाते हैं, वे-वे नरक
निश्चय ही यमलोकमें विद्यमान हैं।
सुयज्ञने पूछा - प्रभो ! किस प्रकारके कृतघ्न
कौन-सा कर्म करके किन-किन भयंकर नरकोंमें
जाते हैं ? इसे एक-एक करके मैं सुनना चाहता
हूँ। आप बतानेकी कृपा करें।
कात्यायनने कहा- जो शपथ खाकर भी
अपने सत्यको मिटा देता है, उसका पालन नहीं
करता, वह कृतघ्न अवश्य ही चार युगोंतक
कालसूत्र नरकमें निवास करता है। फिर सात-
सात जन्मोंतक कौआ और उल्लू होकर पुनः
सात जन्मोंतक महारोगी शूद्र होता है। इसके
बाद उसकी शुद्धि होती है। तत्पश्चात् सर्वश्री
सनन्दन, सनातन, पराशर, जरत्कारु, भरद्वाज
और विभाण्डकने विभिन्न कृतघ्नोंके भेद तथा
उनको प्राप्त होनेवाली दुर्गतिका वर्णन किया।
तदनन्तर श्रीमार्कण्डेयजी बोले।
मार्कण्डेयने कहा- नरेश्वर ! शूद्रजातीय स्त्रीके
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साथ समागम करनेपर ब्राह्मणको जो दोष प्राप्त होता है, उसका वर्णन वेदोंमें किया गया है। उसे बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। जो ब्राह्मण शूद्रजातीय स्त्रीके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वह कृतघ्नोंमें प्रधान है। उसे चौदह इन्द्रोंके स्थितिकालतक कृमिदंष्ट्र नामक नरकमें निवास करना पड़ता है। वहाँ वह ब्राह्मण कीड़ोंके काटनेसे व्याकुल रहता है। यमराजके दूत उससे प्रतिदिन तपायी हुई लोहेकी प्रतिमाका आलिङ्गन करवाते हैं। तदनन्तर निश्चय ही वह व्यभिचारिणी स्त्रीकी योनिका कीड़ा होता है। इस अवस्थामें एक हजार वर्षोंतक रहनेके बाद वह शूद्र होता है। तत्पश्चात् उसकी शुद्धि होती है।
सुयश बोले—मुने! अन्य कृतघ्नोंके भी कर्मोंका फल बताइये। यह ब्राह्मणका शाप मेरे लिये श्लाघ्य है; क्योंकि इसके कारण मुझे सत्संगका लाभ हुआ। भला, विपत्तिमें पड़े बिना किसको सम्पत्ति प्राप्त होती है। मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया; क्योंकि आज मेरे घरपर मुक्त मुनिगण और देवता पधारे हैं।
(अध्याय ५०-५१)
शेष कृतघ्नोंके कर्मफलोंका विभिन्न मुनियोंद्वारा प्रतिपादन
पार्वतीने पूछा—प्रभो! अन्य कृतघ्नोंको जिस-जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें उन वेद-वेदाङ्गके पारंगत विद्वानोंने क्या कहा?
श्रीमहेश्वर बोले—प्रिये! राजेन्द्र सुयज्ञके प्रश्न करनेपर उन सब मुनियोंमें महान् ऋषि नारायणने प्रवचन देना आरम्भ किया।
नारायणने कहा—भूपाल! जो अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है, उसे कृतघ्न समझना चाहिये। उसे जो फल मिलता है, उसको सुनो। जिनकी जीविका छिन जाती है, उन ब्राह्मणोंके आँसुओंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह 'शूलप्रोत' नामक नरकमें रहता है। दहकते हुए अंगार उसे खानेको मिलते हैं और औटाया हुआ मूत्र पीनेको। तपे हुए अंगारोंकी शय्यापर उसे सोना पड़ता है। उठनेकी चेष्टा करनेपर यमराजके दूत उन्हें पीटते हैं। उस नरकयातनाके अन्तमें वह महापापी जीव भारतवर्षमें विष्ठाका कीड़ा होता है। उस योनिमें उसे देवताके वर्षसे साठ हजार वर्षोंतक रहना पड़ता है। तत्पश्चात् वह मानव भूमिहीन, संतानहीन, दरिद्र, कृपण, रोगी और निन्दनीय शूद्र होता है। उसके बाद उसकी शुद्धि होती है।
नारद बोले—जो नराधम अपनी अथवा परायी कीर्तिका हनन करता है, वह कृतघ्न कहा गया है। उसको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। नरेश्वर! वह अत्यन्त दीर्घकालतक अन्धकूप नामक नरकमें निवास करता है। उसमें सरौते-जैसे कीड़े उसे सदा काटते और खाते रहते हैं। वह पापी वहाँ तपाया हुआ खारा पानी पीता और खाता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक सर्प और पाँच जन्मोंतक कौआ होनेके बाद वह शूद्र होता है।
देवलने कहा—जो भारतवर्षमें ब्राह्मण, गुरु अथवा देवताके धनका अपहरण करता है, उसे महान् पापी एवं कृतघ्न समझना चाहिये। वह बहुत लंबे समयतक 'अवटोद' नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर शराबी और शूद्र होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है।
जैगीषव्य बोले—जो पिता, माता तथा गुरुके प्रति भक्तिसे हीन होकर उनका पालन नहीं करता, उलटे वाणीद्वारा उनकी ताड़ना करता है, उसे 'कृतघ्न' कहा गया है। जो कुलटा नारी
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प्रतिदिन वाणीद्वारा अपने स्वामीको ताने मारती या
फटकारती है, वह 'कृतघ्नी' कही गयी है। भारतवर्षमें
वह बहुत बड़ी पापिनी है। कृतघ्न पुरुष हो या
स्त्री, दोनों 'वह्रिकुण्ड' नामक महाघोर नरकमें
पड़ते हैं। वहाँ बहुत लंबे समयतक वे अग्निमें ही
वास करते हैं। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक जलौका
(जोंक) होकर वह शुद्ध होता है।
वाल्मीकिने कहा—राजन् ! जैसे सभी तरुओंमें
सर्वत्र वृक्षत्व है, कहीं भी वृक्षत्वका त्याग नहीं
है, उसी तरह सम्पूर्ण पापोंमें कृतघ्नता है। जो
काम, क्रोध तथा भयके कारण झूठी गवाही देता
है तथा सभामें पक्षपातपूर्वक बात करता है, वह
कृतघ्न माना गया है। राजन्! जो पुण्यमात्रका
हनन करता है, वह भी कृतघ्न ही है। सर्वत्र
सबके पुण्यकी हानिमें कृतघ्नता निहित है।
नरेश्वर ! जो भारतवर्षमें झूठी गवाही देता या
पक्षपातपूर्ण बात करता है, वह निश्चय ही बहुत
लंबे समयतक सर्पकुण्डमें निवास करता है। सदा
उसके शरीरमें साँप लिपटे रहते हैं; वह डरा
रहता है और साँप उसे खाये जाते हैं। यमदूतोंकी
मार पड़नेपर वह साँपोंका मल-मूत्र खानेको
विवश होता है। तदनन्तर भारतमें सात-सात
जन्मोंतक वह अपनी सात पीढ़ीके पूर्वजोंसहित
गिरगिट और मेढक होता है। इसके बाद विशाल
वनमें सेमलका वृक्ष होता है। तत्पश्चात् गूँगा
मनुष्य एवं शूद्र होकर वह शुद्धि-लाभ करता है।
आस्तीक बोले- गुरुपत्नीगमन करनेपर मानव
मातृगामी समझा जाता है। मातृगमन करनेपर
मनुष्योंके लिये प्रायश्चित्त नहीं मिलता। नृपश्रेष्ठ !
भारतवर्षमें मातृगामी पुरुषोंको जो दोष प्राप्त होता
है, वह शूद्रोंको ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर
लगता है। यदि ब्राह्मणी शूद्रके साथ मैथुन करे
तो उसे भी उतना ही दोष प्राप्त होता है। कन्या,
पुत्रवधू, सास, गर्भवती भौजाई और भगिनीके
साथ समागम करनेपर भी वैसा ही दोष लगता
है। राजेन्द्र ! अब ब्रह्माजीके बताये अनुसार दोषका
निरूपण करूँगा। जो महापापी मानव इन सबके
साथ मैथुन करता है वह जीते-जी ही मृतक-
तुल्य होता है, चाण्डाल एवं अस्पृश्य समझा
जाता है। उसे सूर्यमण्डलके दर्शनका भी अधिकार
नहीं होता। वह शालग्रामका, उनके चरणामृतका,
तुलसीदल मिश्रित जलका, सम्पूर्ण तीर्थजलका
तथा ब्राह्मणोंके चरणोदकका स्पर्श भी नहीं कर
सकता। वह पातकी मनुष्य विष्ठाके तुल्य घृणित
होता है। उसे देवता, गुरु और ब्राह्मणको
नमस्कार करनेका भी अधिकार नहीं रह जाता
है। उसका जल मूत्रसे भी अधिक अपवित्र होता
है। भारतमें पृथ्वी उसके भारसे दब जाती है। वह
उसके बोझको ढोनेमें असमर्थ हो जाती है। बेटी
बेचनेवाले पापीकी भाँति गुरुपत्नीगामीके पापसे
भी सारा देश पतित हो जाता है। उसके स्पर्शसे,
उसके साथ वार्तालाप करनेसे, सोनेसे, एक
स्थानमें रहने और साथ-साथ भोजन करनेसे मनुष्योंको
पाप लगता है। वह कुम्भीपाकमें निवास करता है।
वहाँ उसे दिन-रात अविरामगतिसे चक्रकी भाँति
घूमना पड़ता है। वह आगकी लपटोंसे जलता और
यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है। इस प्रकार वह
महापापी प्रतिदिन नरक-यातना भोगता है। घोर
प्राकृतिक महाप्रलय बीतनेपर जब पुनः सृष्टिका
आरम्भ होता है तो वह फिर वैसा ही हो जाता है।
नरक-यातनाके पश्चात् हजारों वर्षोंतक उसे विष्ठाका
कीड़ा होना पड़ता है। तदनन्तर वह पत्नीहीन
नपुंसक चाण्डाल होता है। तत्पश्चात् उसे सात
जन्मोंतक गलित कोढ़से युक्त शूद्र एवं नपुंसक होना
पड़ता है। इसके बाद वह कोढ़ी, अन्धा एवं नपुंसक
ब्राह्मण होता है। इस प्रकार सात जन्म धारण
करनेके पश्चात् उस महापापीकी शुद्धि होती है।
मुनि बोले- इस प्रकार हमने शास्त्रके
अनुसार सब बातें बतायीं। राजन्! तुम इन
विप्रवरको प्रणाम करो और निश्चय ही इन्हें अपने