ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४३- श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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इन्द्र बोले— भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। कृपानिधान! कृपा कीजिये। अच्छे स्वामी अपने सेवकके अपराधको हृदयमें स्थान नहीं देते। अपनी पत्नी, अपने शिष्य, अपने भृत्य तथा अपने पुत्रोंको दुर्बल या सबल कौन मनुष्य दण्ड देनेमें असमर्थ होता है? तीन करोड़ देवताओंमें मैं ही एक देवाधम और मूढ़ हूँ। सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे ही मैं उच्च पदपर प्रतिष्ठित हूँ। आपने ही दया करके मुझे आगे बढ़ाया है। आप सारे जगत्का संहार करनेकी शक्ति रखते हैं। आपके सामने मेरी क्या बिसात है? मैं वैसा ही हूँ, जैसा बावलीका कीट। आप साक्षात् विधाताके पौत्र हैं; अतः स्वयं दूसरी सृष्टि रचनेमें समर्थ हैं।
इन्द्रके मुखसे यह स्तवन सुनकर गुरु बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए। उनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और वे प्रेमपूर्वक बोले।
बृहस्पतिने कहा— महाभाग! धैर्य धारण करो और पहलेसे भी चौगुना महान् ऐश्वर्य पाकर सुस्थिर लक्ष्मीका लाभ लो। वत्स पुरन्दर! मेरे प्रसादसे तुम्हारे शत्रु मारे गये। अब तुम अमरावतीमें जाकर राज्य करो और पतिव्रता शचीसे मिलो।
यों कहकर ज्यों ही शिष्यसहित गुरु वहाँसे चलनेको उद्यत हुए, त्यों ही उन्होंने अत्यन्त दुःसह एवं भयंकर ब्रह्महत्याको सामने खड़ी देखा। उसपर दृष्टि पड़ते ही इन्द्र अत्यन्त भयभीत हो गुरुकी शरणमें गये। बृहस्पतिको भी बड़ा भय हुआ। उन्होंने मन-ही-मन मधुसूदनका स्मरण किया। इसी बीचमें आकाशवाणी हुई, जिसमें अक्षर तो थोड़े थे, परंतु अर्थ बहुत। बृहस्पतिजीने वह आकाशवाणी सुनी— 'संसारविजय नामक जो राधिकाकवच है, वह समस्त अशुभोंका नाश करनेवाला है। इस समय उसीका उपदेश देकर तुम शिष्यकी रक्षा करो।' तब शिष्यवत्सल बृहस्पतिने शिष्यको उस कवचका उपदेश दिया और अनायास ही हुङ्कारमात्रसे ब्रह्महत्याको भस्म कर डाला। तदनन्तर शिष्यको साथ लेकर बृहस्पतिजी अमरावतीपुरीमें गये। इन्द्रने गुरुकी आज्ञासे उस पुरीकी दशा देखी। शत्रुने उस नगरीको तोड़-फोड़ डाला था।
पतिका आगमन सुनकर शचीके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उसने भक्तिभावसे गुरुदेवको प्रणाम करके प्राणवल्लभके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया। प्रिये! इन्द्रका शुभागमन सुनकर सब देवता, ऋषि और मुनि वहाँ आये। उनका चित्त हर्षसे गद्गद हो रहा था। इन्द्रने अमरावतीका निर्माण करनेके लिये एक श्रेष्ठ देवशिल्पीको नियुक्त किया। देवशिल्पीने पूरे सौ वर्षोंतक अमरावतीकी रचना की। नाना विचित्र रत्नोंसे सम्पन्न तथा श्रेष्ठ मणिरत्नोंद्वारा निर्मित उस मनोहर पुरीकी कहीं उपमा नहीं थी। फिर भी उससे देवराज इन्द्र संतुष्ट नहीं हुए। विश्वकर्माको आज्ञा नहीं मिली। इसलिये वे घर जा तो नहीं सके; परंतु उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो उठा। वे ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीने उनके अभिप्रायको जानकर कहा— 'कल तुम्हारे प्रतिरोधक कर्मका क्षय हो जानेपर ही तुम्हें छुटकारा मिलेगा।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर विश्वकर्मा शीघ्र ही अमरावती लौट आये और ब्रह्माजी वैकुण्ठधाममें गये। वहाँ उन्होंने अपने माता-पिता श्रीहरिको प्रणाम करके उनसे सारी बातें कहीं। तब श्रीहरिने ब्रह्माजीको धैर्य देकर अपने घरको लौटाया और स्वयं ब्राह्मणका रूप धारण करके वे अमरावतीपुरीमें आये। ब्राह्मणकी अवस्था बहुत छोटी थी। शरीर भी अधिक नाटा था। उन्होंने दण्ड और छत्र धारण कर रखे थे। शरीरपर श्वेत वस्त्र और ललाटमें उज्ज्वल तिलकसे वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। मुस्कराते समय उनकी श्वेत दन्तावली चमक उठती थी। अवस्थामें छोटे होनेपर भी
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वे ज्ञान और बुद्धिमें बढ़े-चढ़े थे। विद्वान् तो थे ही, स्वयं विधाताके भी विधाता तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता थे। इन्द्रके द्वारपर खड़े हो वे द्वारपालसे बोले—'द्वाररक्षक! तुम इन्द्रसे जाकर कहो कि द्वारपर एक ब्राह्मण खड़े हैं, जो आपसे शीघ्र मिलनेके लिये आये हैं।' द्वारपालने उनकी बात सुनकर इन्द्रको सूचना दी और इन्द्र शीघ्र आकर उन ब्राह्मणकुमारसे मिले। हँसते हुए बालक और बालिकाओंके समूह उन्हें घेरकर खड़े थे। वे बड़े उत्साहसे मुस्करा रहे थे और उनका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी जान पड़ता था। इन्द्रने उन शिशुरूपधारी हरिको भक्तिभावसे प्रणाम किया और भक्तवत्सल श्रीहरिने प्रेमपूर्वक उन्हें आशीर्वाद दिया। इन्द्रने मधुपर्क आदि देकर उनकी पूजा की और ब्राह्मणबालकसे पूछा—'कहिये, किसलिये आपका शुभागमन हुआ है?' इन्द्रका वचन सुनकर ब्राह्मणबालकने जो बृहस्पतिके गुरुके भी गुरु थे, मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा।
**ब्राह्मण बोले—**देवेन्द्र! मैंने सुना है कि तुम बड़े विचित्र और अद्भुत नगरका निर्माण करा रहे हो; अतः इस नगरको देखने तथा इसके विषयमें मनोवाञ्छित बातें पूछनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। कितने वर्षोंतक इसका निर्माण कराते रहनेके लिये तुमने संकल्प किया है? अथवा विश्वकर्मा कितने वर्षोंमें इसका निर्माणकार्य पूर्ण कर देंगे? ऐसा निर्माण तो किसी भी इन्द्रने नहीं किया था। ऐसे सुन्दर नगरके निर्माणमें दूसरा कोई विश्वकर्मा भी समर्थ नहीं है।
ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र हँसने लगे। वे सम्पत्तिके मदसे अत्यन्त मतवाले हो रहे थे; अतः उन्होंने उस द्विजकुमारसे पुनः पूछा—'ब्रह्मन्! आपने कितने इन्द्रोंका समूह देखा अथवा सुना है? तथा कितने प्रकारके विश्वकर्मा आपके देखने या सुननेमें आये हैं? यह मुझे इस समय बताइये।' इन्द्रका यह प्रश्न सुनकर ब्राह्मणकुमार हँसे और अमृतके समान मधुर एवं श्रवणसुखद वचन बोले।
**ब्राह्मणने कहा—**तात! मैं तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यपको जानता हूँ। उनके पिता तपोनिधि मरीचिमुनिसे भी परिचित हूँ। मरीचिके पिता देवेश्वर ब्रह्माजीको भी, जो भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं, जानता हूँ और उनके रक्षक सत्त्वगुणशाली महाविष्णुका भी परिचय रखता हूँ। मुझे उस एकार्णव प्रलयका भी ज्ञान है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंसे शून्य एवं भयानक दिखायी देता है। इन्द्र! निश्चय ही सृष्टि कई प्रकारकी है। कल्प भी अनेक हैं तथा ब्रह्माण्ड भी कितने ही प्रकारके हैं। उन ब्रह्माण्डोंमें अनेकानेक ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र भी बहुतेरे हैं। उन सबकी गणना कौन कर सकता है? सुरेश्वर! भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर ली जाय तो भी इन्द्रोंकी गणना नहीं हो सकती है; ऐसा विद्वानोंका मत है। इन्द्रकी आयु और अधिकार इकहत्तर चतुर्युगतक है। अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर विधाताका एक दिन-रात पूरा होता है। इस तरह एक सौ आठ वर्षोंतक ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण आयु है। जहाँ विधाताकी भी संख्या नहीं है, वहाँ देवेन्द्रोंकी गणना क्या हो सकती है? जहाँ ब्रह्माण्डोंकी ही संख्या ज्ञात नहीं होती; वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी कहाँ गिनती है? महाविष्णुके रोमकूपजनित निर्मल जलमें ब्रह्माण्डकी स्थिति उसी तरह है, जैसे सांसारिक नदी-नद आदिके जलमें कृत्रिम नौका हुआ करती है। इस प्रकार महाविष्णुके शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने ब्रह्माण्ड हैं; अतएव ब्रह्माण्ड असंख्य कहे गये हैं। एक-एक ब्रह्माण्डमें तुम्हारे-जैसे कितने ही देवता निवास करते हैं।
इसी बीचमें पुरुषोत्तम श्रीहरिने वहाँ चींटोंके समूहको देखा, जो सौ धनुषकी दूरीतक फैला
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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हुआ था। बारी-बारीसे उन सबकी ओर देखकर वे ब्राह्मणबालकका रूप धरकर पधारे हुए भगवान् उच्चस्वरसे हँसने लगे। किंतु कुछ बोले नहीं। मौन रह गये। उनका हृदय समुद्रके समान गम्भीर था। ब्राह्मण-वटुककी गाथा सुनकर और उनका अट्टहास देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। तदनन्तर उनके विनयपूर्वक पूछनेपर ब्राह्मणरूपधारी जनार्दनने भाषण देना आरम्भ किया।
**ब्राह्मण बोले—**इन्द्र! मैंने क्रमशः एक-एक करके चींटोंके समुदायकी सृष्टि की है। वे सब चींटे अपने कर्मसे देवलोकमें इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित हो चुके थे; परंतु इस समय वे सब अपने कर्मानुसार क्रमशः भिन्न-भिन्न जीवयोनियोंमें जन्म लेते हुए चींटोंकी जातिमें उत्पन्न हुए हैं। कर्मसे ही जीव निरामय वैकुण्ठधाममें जाते हैं, कर्मसे ब्रह्मलोकमें और कर्मसे ही शिवलोकमें पहुँचते हैं। अपने कर्मसे ही वे स्वर्गमें तथा स्वर्गतुल्य स्थान पातालमें भी प्रवेश करते हैं। कर्मसे ही अपने लिये दुःखके एकमात्र कारण घोर नरकमें गिरते हैं। कर्मसूत्रसे ही विधाता जीवधारियोंको फल देते हैं। कर्म स्वभावसाध्य है और स्वभाव अभ्यासजन्य। देवेन्द्र! चराचर प्राणियोंसहित समस्त संसार स्वप्नके समान मिथ्या है। यहाँ कालयोगसे सबकी मौत सदा सिरपर सवार रहती है। जीवधारियोंके शुभ और अशुभ सब कुछ पानीके बुलबुलेके समान हैं। इन्द्र! विद्वान् पुरुष इसमें सदा विचरता है; परंतु कहीं भी आसक्त नहीं होता।
यों कहकर ब्राह्मणदेवता वहाँ मुस्कराते हुए बैठे रहे। उनकी बात सुनकर देवेश्वर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे अपने-आपको अब अधिक महत्त्व नहीं दे रहे थे। इसी बीच एक मुनीश्वर वहाँ शीघ्रतापूर्वक आये जो ज्ञान और अवस्था दोनोंमें बड़े थे। उनका शरीर अत्यन्त वृद्ध था। वे महान् योगी जान पड़ते थे। वे कटिमें कृष्ण-मृगचर्म, मस्तकपर जटा, ललाटमें उज्ज्वल तिलक, वक्षःस्थलमें रोमचक्र तथा सिरपर चटाई धारण किये हुए थे। उनका सारा रोममण्डल विद्यमान था; केवल बीचमें कुछ रोम उखाड़े गये थे। वे मुनि ब्राह्मणबालक तथा इन्द्रके बीचमें आकर ठूँठे काठकी भाँति खड़े हो गये। महेन्द्रने ब्राह्मणको देखकर सहर्ष प्रणाम किया और मधुपर्क देकर भक्तिभावसे उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणसे कुशल-मङ्गल पूछा और सादर एवं सानन्द आतिथ्य करके उन्हें संतुष्ट किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणबालकने उनके साथ बातचीत की और विनयपूर्वक अपना सारा मनोभाव प्रकट किया।
**बालकने कहा—**विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं? और आपका नाम क्या है? यहाँ आनेका उद्देश्य क्या है? तथा आप कहाँके रहनेवाले हैं? आपने मस्तकपर चटाई किसलिये धारण कर रखी है? मुने! आपके वक्षःस्थलमें रोमचक्र कैसा है? यह बहुत बढ़ा हुआ है; किंतु बीचमेंसे कुछ रोम क्यों उखाड़ लिये गये हैं? ब्रह्मन्! यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो सब विस्तारपूर्वक कहिये। इन सब अद्भुत बातोंको सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है।
ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर वे महामुनि इन्द्रके सामने प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा वृत्तान्त बताने लगे।
**मुनि बोले—**ब्रह्मन्! आयु बहुत थोड़ी होनेके कारण मैंने कहीं भी रहनेके लिये घर नहीं बनाया है; विवाह भी नहीं किया है और जीविकाका साधन भी नहीं जुटाया है। आजकल भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करता हूँ। मेरा नाम लोमश है। आप-जैसे ब्राह्मणका दर्शन ही यहाँ मेरे आगमनका प्रयोजन है। मेरे सिरपर जो चटाई है, वह वर्षा और धूपका निवारण करनेके लिये है। मेरे वक्षःस्थलमें जो रोमचक्र है, उसका भी
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कारण सुनिये, जो सांसारिक जीवोंको भय देनेवाला और उत्तम विवेकको उत्पन्न करनेवाला है। मेरे वक्षःस्थलका यह रोममण्डल ही मेरी आयुकी संख्याका प्रमाण है। ब्रह्मन्! जब एक इन्द्रका पतन हो जाता है, तब मेरे इस रोमचक्रका एक रोम उखाड़ दिया जाता है। इसी कारणसे बीचके बहुत-से रोएँ उखाड़ दिये गये हैं; तथापि अभी बहुत-से विद्यमान हैं। ब्रह्माका दूसरा परार्द्ध पूर्ण होनेपर मेरी मृत्यु बतायी गयी है। विप्रवर! असंख्य विधाता मर चुके हैं और मरेंगे। फिर इस छोटी-सी आयुके लिये स्त्री, पुत्र और घरकी क्या आवश्यकता है? ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भगवान् श्रीहरिकी एक पलक गिरती है; अतः मैं निरन्तर उन्हींके चरणारविन्दोंका दर्शन करता रहता हूँ। श्रीहरिका दास्यभाव दुर्लभ है। भक्तिका गौरव मुक्तिसे भी बढ़कर है। सारा ऐश्वर्य स्वप्नके समान मिथ्या और भगवान्की भक्तिमें व्यवधान डालनेवाला है। यह उत्तम ज्ञान मेरे गुरु भगवान् शंकरने दिया है; अतः मैं भक्तिके बिना सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी नहीं ग्रहण करना चाहता हूँ।
ऐसे कहकर वे मुनि भगवान् शंकरके समीप चले गये और बालकरूपधारी श्रीहरि भी वहीं अन्तर्धान हो गये। इन्द्र स्वप्नकी भाँति यह घटना देखकर बड़े विस्मित हुए। अब उन परमेश्वरके मनमें सम्पत्तिके लिये तृष्णा नहीं रह गयी। उन्होंने विश्वकर्माको बुलाकर उनसे मीठी-मीठी बातें कीं तथा रत्न देकर पूजन करनेके पश्चात् उन्हें घर जानेकी आज्ञा दी। फिर सब कुछ अपने पुत्रको सौंपकर वे भगवान्की शरणमें जानेको उद्यत हो गये। उनका विवेक जाग उठा था; अतः वे शची तथा राजलक्ष्मीको त्यागकर प्रारब्ध-क्षयकी कामना करने लगे। अपने प्राणवल्लभको विवेक एवं वैराग्यसे युक्त हुआ देख शचीका हृदय व्यथित हो उठा। वे शोकसे व्याकुल एवं भयभीत हो गुरुकी शरणमें गयीं। वहाँ सब कुछ निवेदन करके बृहस्पतिजीको बुलाकर इन्द्रको नीतिके सार-तत्त्वका उपदेश कराया। गुरु बृहस्पतिने दाम्पत्य-प्रेमसे युक्त शास्त्र-विशेषकी रचना करके स्वयं प्रेमपूर्वक उन्हें पढ़ाया। बृहस्पतिजीने उस शास्त्र-विशेषका भाव इन्द्रको भलीभाँति समझा दिया। वृन्दावनविनोदिनि! तब इन्द्र पूर्ववत् राज्य करने लगे। सुरेश्वरि! इस प्रकार मैंने इन्द्रके अभिमान-भङ्गका सारा प्रसङ्ग कह सुनाया। पिता नन्दके यज्ञमें जो इन्द्रके दर्पका दलन हुआ था, उसे तो तुमने अपनी आँखों देखा ही था। (अध्याय ४७)
सूर्य और अग्निके दर्प-भङ्गकी कथा
राधिका बोलीं— भगवन्! आपने इन्द्रके दर्प-भङ्गका प्रसङ्ग मुझसे कहा। अब मैं सूर्यदेवके गर्वगञ्जनकी बात यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— सुन्दरि! सूर्य एक ही बार उदय लेकर फिर अस्त हो गये, परंतु माली और सुमाली नामक दो दैत्यराज सूर्यास्त हो जानेके बाद भी वैसा ही प्रकाश बनाये रखनेके लिये उद्यत हुए। भगवान् शंकरके वरसे महान् ऐश्वर्य पाकर वे दोनों दैत्य मदसे उन्मत्त हो गये थे। उनकी प्रभासे रात्रि नहीं होने पाती थी। (रातके समय भी दिनका-सा प्रकाश छाया रहता था।) यह देख सूर्यदेव रुष्ट हो गये और उन्होंने अपने शूलसे अवहेलनापूर्वक उन दोनों दैत्योंको मारा। सूर्यके शूलसे आहत हो वे दोनों दैत्य मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भक्तोंका विनाश हुआ जान भक्तवत्सल शंकर आये और उन्होंने अपने महान् ज्ञानद्वारा उन दोनोंको जीवन-दान दिया। तब वे दोनों दैत्य भगवान् शिवको
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपने घरको चले गये। इधर महादेवजी रोषसे आगबबूला हो उठे और सूर्यको मारनेके लिये दौड़े। संहारकर्ता हर मेरा विनाश करनेके लिये चले आ रहे हैं, यह देख सूर्यदेव भयसे भागते हुए तत्काल ब्रह्माजीकी शरणमें गये। तब महादेवजीने रोषसे शूल उठाकर ब्रह्माजीके भवनपर धावा किया। भगवान् शिव कालके भी काल और विधाताके भी विधाता हैं। उन परमेश्वर हरको रुष्ट हुआ देख लोकनाथ ब्रह्मा चारों मुखोंसे वेदोक्त स्तोत्र पढ़ते हुए उनकी स्तुति करने लगे।
**ब्रह्माजी बोले—**दक्ष-यज्ञ-विनाशक शिव ! सूर्यदेव मेरी शरणमें आये हैं; अतः आप इनपर कृपा कीजिये। जगद्गुरो ! सृष्टिके आरम्भमें आपने ही सूर्यकी सृष्टि की है। महाभाग आशुतोष ! भक्तवत्सल ! प्रसन्न होइये। कृपासिन्धो ! कृपापूर्वक दिन और रातकी रक्षा कीजिये। ब्रह्मस्वरूप भगवन् ! आप जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। क्या स्वयं ही सूर्यका निर्माण करके स्वयं ही इनका संहार करना चाहते हैं? आप स्वयं ही ब्रह्मा, शेषनाग, धर्म, सूर्य और अग्नि हैं। परात्पर परमेश्वर ! चन्द्र और इन्द्र आदि देवता आपसे भयभीत रहते हैं। ऋषि और मुनि आपकी ही आराधना करके तपस्याके धनी हुए हैं। आप ही तप हैं, आप ही तपस्याके फल हैं और आप ही तपस्याओंके फलदाता हैं।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी सूर्यको ले आये और भक्ति तथा प्रीतिके साथ दीनवत्सल शंकरको उन्हें सौंप दिया। भगवान् शिवका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन जगत्-विधाताने सूर्यको आशीर्वाद देकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और बड़े हर्षके साथ अपने धामको प्रस्थान किया।
जो मनुष्य संकटकालमें ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह भयभीत हो तो भयसे और बँधा हो तो बन्धनसे मुक्त हो जाता है। राजद्वारपर, श्मशान-भूमिमें और महासागरमें जहाज टूट जानेपर इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मनुष्य संकटमुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है।
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**तदनन्तर सूर्यदेव ब्रह्माजीको प्रणाम करके प्रसन्न हुए और उनकी आज्ञासे अभिमान छोड़ प्रेमपूर्वक विनयपूर्ण बर्ताव करने लगे। अब अग्निके मानभञ्जनका उपाख्यान सुनो। यह उत्तम प्रसङ्ग पुराणोंमें गोपनीय है और कानोंमें अमृतके समान मधुर प्रतीत होता है। एक समयकी बात है। अग्निदेव सौ ताड़ोंके बराबर ऊँची और भयंकर लपटें उठाकर तीनों लोकोंको भस्म कर डालनेके लिये उद्यत हो गये। महर्षि भृगुने उन्हें शाप दिया था; इसलिये वे क्षोभ और क्रोधसे भरे थे। अपनेको तेजस्वी और दूसरोंको तुच्छ मानकर वे त्रिलोकीको भस्म करना चाहते थे। इसी बीचमें मायासे शिशुरूपधारी जनार्दन भगवान् विष्णु लीलापूर्वक वहाँ आ पहुँचे और सामने खड़े हो अग्निकी उस दाहिका शक्तिको उन्होंने हर लिया। तत्पश्चात् मन्द-मन्द मुस्कराते हुए भक्तिसे मस्तक झुका वे विनयपूर्वक बोले।
**शिशुने कहा—**भगवन् ! आप क्यों रुष्ट हैं ? इसका कारण मुझे बताइये। व्यर्थ ही आप तीनों लोकोंको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए हैं ? भृगुजीने आपको शाप दिया है; अतः आप उनका ही दमन कीजिये। एकके अपराधसे तीनों लोकोंको भस्म कर डालना आपके लिये कदापि उचित नहीं है। ब्रह्माजीने इस विश्वकी सृष्टि की है, साक्षात् श्रीहरि इसके पालक हैं और भगवान् रुद्र संहारक। ऐसा ही क्रम है। जगदीश्वर शंकरके रहते हुए आप स्वयं जगत्को भस्म करनेके लिये क्यों उद्यत हुए हैं? पहले जगत्का पालन करनेवाले भगवान् विष्णुको जीतिये। उसके बाद इसका शीघ्रतापूर्वक संहार कीजिये।