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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

४०- सबका स्तवन-पूजन और नमस्कार करके परशुरामका जानेके लिये उद्यत होना, गणेश-पूजामें तुलसी-निषेधके प्रसङ्गमें गणेश-तुलसीके संवादका वर्णन तथा गणपति-खण्डका श्रवण-माहात्म्य

गणपतिखण्ड ४०७


गोलोकधाममें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कराये। उस समय भगवान् रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनपर आसीन थे। राधाजी उनके वक्षःस्थलसे सटी हुई थीं। तेजमें वे करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली थे। उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली शोभा पा रही थी, परम मनोहर रूप था और वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। इस प्रकार श्रीकृष्णके दर्शन कराकर उनसे बारंबार प्रणाम कराया। यों सम्पूर्ण पापोंका पूर्णतया नाश कर देनेवाले इष्टदेव श्रीकृष्णके दर्शन कराकर गणेशजीने परशुरामके भ्रूणहत्याजनित पापको दूर कर दिया। यों तो पापजनित यातना भोगे बिना नष्ट नहीं होती, किंतु परशुरामको थोड़ी ही भोगनी पड़ी और सब श्रीकृष्णके दर्शनसे नष्ट हो गयी। क्षणभरके बाद परशुरामकी चेतना लौट आयी और वे वेगपूर्वक भूतलपर गिर पड़े। उस समय उनका गणेशद्वारा किया गया स्तम्भन भी दूर हो गया। तब उन्होंने अपने अभीष्टदेव श्रीकृष्ण, अपने गुरु जगद्गुरु शम्भु तथा गुरुद्वारा दिये गये परम दुर्लभ स्तोत्र और कवचका स्मरण किया। मुने! तदनन्तर परशुरामने अपने अमोघ फरसेको, जिसकी प्रभा ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभासे सौगुनी थी और जो तेजमें शिव-तुल्य था, गणेशपर चला दिया। पिताके उस अमोघ अस्त्रको आते देखकर स्वयं गणपतिने उसे अपने बायें दाँतसे पकड़ लिया; उस अस्त्रको व्यर्थ नहीं होने दिया। तब महादेवजीके बलसे वह फरसा वेगपूर्वक गिरकर मूलसहित गणेशके दाँतको काटकर पुनः परशुरामके हाथमें लौट आया। यह देखकर वीरभद्र, कार्तिकेय और क्षेत्रपाल आदि पार्षद तथा आकाशमें देवगण महान् भयसे भीत होकर हाहाकार करने लगे।

इधर वह दाँत खूनसे सनकर शब्द करता हुआ भूमिपर गिर पड़ा, मानो गेरुसे युक्त स्फटिकका पर्वत धराशायी हो गया हो। विप्रवर! उस महान् शब्दसे भयभीत होकर पृथ्वी काँप उठी। सभी कैलासवासी प्राणी उसी क्षण डरके मारे मूर्च्छित हो गये। उस समय निद्राके स्वामी जगदीश्वर शिवकी निद्रा भंग हो गयी। वे घबराये हुए पार्वतीके साथ अन्तःपुरसे बाहर आये। मुने! उस समय गणेश घायल हो गये थे, उनका दाँत टूट गया था और मुख रक्तसे सराबोर था। उनका क्रोध शान्त हो गया था और वे लज्जित होकर मुस्कराते हुए सिर झुकाये हुए थे। उन्हें इस दशामें सामने देखकर पार्वतीने शीघ्र ही स्कन्दसे पूछा—‘बेटा! यह क्या बात है?’ तब स्कन्दने भयपूर्वक पूर्वापरका सारा वृत्तान्त उनसे कह सुनाया। उसे सुनकर दुर्गाको क्रोध आ गया। वे कृपापरवश हो रोने लगीं और शम्भुके सामने अपने पुत्र गणेशको छातीसे लगाकर बोलीं। सती-साध्वी पार्वतीने शोकके कारण डरकर विनयपूर्वक शम्भुको समझाया और फिर प्रणत होकर प्रणतकी पीड़ा हरनेवाले पतिदेवसे कहने लगीं।

(अध्याय ४२-४३)

४०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पार्वतीकी शिवसे प्रार्थना, परशुरामको देखकर उन्हें मारनेके लिये उद्यत होना,
परशुरामद्वारा इष्टदेवका ध्यान, भगवान्का वामनरूपसे पधारना,
शिव-पार्वतीको समझाना और गणेशस्तोत्रको प्रकट करना
पार्वतीने कहा- प्रभो! जगत्में सभी लोग
शंकरकी किंकरी मुझ दुर्गाको जानते हैं कि यह
अपेक्षारहित दासी है, उसका जीवन व्यर्थ है।
परंतु ईश्वरके लिये तृणसे लेकर पर्वतपर्यन्त सभी
जातियाँ समान हैं; अतः दासीपुत्र गणेश और
आपके शिष्य परशुराम-इन दोनोंमें किसका दोष
है, इसपर विचार करना उचित है; क्योंकि आप
धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं। वीरभद्र, कार्तिकेय और पार्षदगण
इसके साक्षी हैं। भला, गवाहीके काममें झूठ
कौन कहेगा। साथ ही ये दोनों भाई इन लोगोंके
लिये समान हैं। यों तो धर्म-निर्णयके अवसरपर
गवाही देते समय सत्पुरुषोंके लिये शत्रु और मित्र
समान हो जाते हैं (अर्थात् उनकी पक्षपातकी
भावना नहीं रहती); क्योंकि जो गवाह गवाहीके
विषयको ठीक-ठीक जानते हुए भी सभामें
काम, क्रोध, लोभ अथवा भयके कारण झूठी
गवाही देता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको नरकमें
गिराकर स्वयं भी कुम्भीपाक नरकमें जाता है।
यद्यपि मैं इन दोनोंको समझाने तथा इसका निर्णय
करनेमें समर्थ हूँ, तथापि आपके समक्ष मेरा
आज्ञा देना श्रुतिमें निन्दित कहा गया है। प्रभो!
सभामें राजाके वर्तमान रहते भृत्योंकी प्रभाका
उसी प्रकार मूल्य नहीं होता, जैसे सूर्यके उदय
होनेपर पृथ्वीपर जुगनूकी कोई गणना नहीं
होती। सदा परित्यागके भयसे डरी हुई मैंने
चिरकालतक तपस्या करके आपके चरणकमलोंको
पाया है; अतः जगन्नाथ ! दारुण पुत्र-स्नेहके कारण
क्रोध, शोक और मोहके वशीभूत होकर मैंने
जो कुछ कहा है, उसे क्षमा कीजिये। यदि आपने
मेरा परित्याग कर दिया तो उस पुत्रसे क्या
लाभ ? क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई पतिव्रता
नारीके लिये पति सौ पुत्रोंसे बढ़कर है। जो नारी
नीच कुलमें उत्पन्न, दुष्टस्वभाववाली, ज्ञानहीन
और माता-पिताके दोषसे निन्दित होती है, वह
अपने पतिको नहीं मानती। उत्तम कुलमें पैदा हुई
स्त्री अपने निन्दित, पतित, मूर्ख, दरिद्र, रोगी
और जड पतिको भी सदा विष्णुके समान
समझती है। समस्त तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ अग्नि अथवा
सूर्य पतिव्रताके तेजकी सोलहवीं कलाकी समानता
नहीं कर सकते। महादान, पुण्यप्रद व्रतोपवास
और तप- ये सभी पति-सेवाके सोलहवें अंशकी
समता करनेके योग्य नहीं हैं। * उत्तम कुलमें जन्म
लेनेवाली स्त्रियोंके लिये चाहे पुत्र हो, पिता हो
अथवा सहोदर भाई हो, कोई भी पतिके समान
नहीं होता। स्वामीसे इतना कहकर दुर्गाने अपने
सामने परशुरामको देखा, जो निर्भय होकर
शम्भुके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे थे। तब
पार्वती उनसे बोलीं।
पार्वतीने कहा- हे महाभाग राम! तुम
ब्रह्मवंशमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी बुद्धि सदसत्का
विवेचन करनेवाली है। तुम जमदग्निके पुत्र और
योगियोंके गुरु इन महादेवके शिष्य हो। सती-
साध्वी रेणुका, जो लक्ष्मीके अंशसे उत्तम कुलमें
उत्पन्न हुई हैं, तुम्हारी माता हैं। तुम्हारे नाना
विष्णुभक्त और मामा उनसे भी बढ़कर वैष्णव हैं।
तुम मनुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा रेणुकके दौहित्र

  • कुत्सितं पतितं मूढं दरिद्रं रोगिणं जडम्। कुलजा विष्णुतुल्यं च कान्तं पश्यति संततम् ॥
    हुताशनो वा सूर्यो वा सर्वतेजस्विनां परः। पतिव्रतातेजसश्च कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
    महादानानि पुण्यानि व्रतान्यनशनानि च। तपांसि पतिसेवायां कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
    (गणपतिखण्ड ४४ । १३-१५)

गणपतिखण्ड ४०९
हो। साधुस्वभाववाले शूरवीर राजा विष्णुयशा
तुम्हारे मामा हैं। तुम किसके दोषसे ऐसे दुर्धर्ष हो
गये हो ? इस अशुद्धिका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो
रहा है; क्योंकि जिनके दोषसे मनुष्य दूषित हो
जाता है, तुम्हारे वे सभी सम्बन्धी शुद्ध मनवाले
हैं। तुमने करुणासागर गुरु और अमोघ फरसा
पाकर पहले क्षत्रिय-जातिपर परीक्षा करके पुनः
गुरु-पुत्रपर परीक्षा की है। कहाँ तो श्रुतिमें 'गुरुको
दक्षिणा देना उचित है' - यों सुना जाता है और
कहाँ तुमने गुरुपुत्रके दाँतको ही तोड़ दिया, अब
उसका मस्तक भी काट डालो। शंकरके वरदान
तथा अमोघवीर्य फरसेसे तो चूहोंको खानेवाला
सियार सिंह और शार्दूलको भी मार सकता है।
जितेन्द्रिय पुरुषोंमें श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे-जैसे लाखों-
करोड़ों जन्तुओंको मार डालनेकी शक्ति रखता है,
परंतु वह मक्खीपर हाथ नहीं उठाता। श्रीकृष्णके
अंशसे उत्पन्न हुआ यह गणेश तेजमें श्रीकृष्णके
ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्णकी कलाएँ हैं।
इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है।
यों कहकर पार्वती क्रोधवश उन परशुरामको
मारनेके लिये उद्यत हो गयीं। तब परशुरामने
मन-ही-मन गुरुको प्रणाम करके अपने इष्टदेव
श्रीकृष्णका स्मरण किया। इतनेमें ही दुर्गाने अपने
सामने एक अत्यन्त बौने ब्राह्मण-बालकको उपस्थित
देखा। उसकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी।
उसके दाँत स्वच्छ थे। वह शुक्ल वस्त्र, शुक्ल
यज्ञोपवीत, दण्ड, छत्र और ललाटपर उज्ज्वल
तिलक धारण किये हुए था। उसके गलेमें
तुलसीकी माला पड़ी थी। उसका रूप परम
मनोहर था, मुखपर मन्द मुसकान थी और
वह रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और रत्नमालासे
विभूषित था। पैरोंमें रत्नोंके नूपुर थे। मस्तकपर
बहुमूल्य रत्नोंके मुकुटकी उज्ज्वल छटा थी और
कपोलोंपर रत्ननिर्मित दो कुण्डल झलमला रहे
थे, जिससे उसकी विशेष शोभा हो रही थी।
वह भक्तोंका ईश और भक्तवत्सल था तथा
भक्तोंको बायें हाथसे स्थिरमुद्रा और दाहिने हाथसे
अभयमुद्रा दिखा रहा था। उसके साथ नगरके
हँसते हुए बालक और बालिकाओंका समूह था
और कैलासवासी आबालवृद्ध सभी उसकी ओर
हर्षपूर्वक देख रहे थे। उस बालकको देखकर
पुत्रों तथा भृत्योंसहित शम्भुने घबराकर भक्तिपूर्वक
सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् दुर्गाने भी
दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर नमस्कार किया।
तब बालकने सबको अभीष्टप्रद आशीर्वाद दिया।
उसे देखकर सभी बालक भयके कारण महान्
आश्चर्यमें पड़ गये। तदनन्तर शिवजीने भक्तिपूर्वक
उसे षोडशोपचार समर्पित करके उस परिपूर्णतमकी
वेदोक्त-विधिसे पूजा की और फिर सिर झुकाकर
काण्वशाखामें कहे हुए स्तोत्रद्वारा उन सनातन
भगवान्की स्तुति की। उस समय उनके सर्वाङ्गमें
रोमाञ्च हो आया था। पुनः जो रत्नसिंहासनपर
आसीन थे और अपने उत्कृष्ट तेजसे जिन्होंने
सबको आच्छादित कर रखा था, उन वामन-
भगवान्से स्वयं शंकरजी कहने लगे।
शंकरजीने कहा - ब्रह्मन् ! जो आत्माराम
हैं, उनके विषयमें कुशलप्रश्न करना अत्यन्त
विडम्बनाकी बात है; क्योंकि वे स्वयं कुशलके
आधार और कुशल-अकुशलके प्रदाता हैं। श्रीकृष्णकी
सेवाके फलोदयसे आज आप जो मुझे अतिथिरूपसे
प्राप्त हुए हैं, इससे मेरा जन्म सफल और जीवन
धन्य हो गया। कृपासागर परिपूर्णतम श्रीकृष्ण
लोगोंके उद्धारके लिये पुण्यक्षेत्र भारतमें अपनी
कलासे अवतीर्ण हुए हैं। जिसने अतिथिका
आदर-सत्कार किया है, उसने मानो सम्पूर्ण
देवताओंकी पूजा कर ली; क्योंकि जिसपर
अतिथि प्रसन्न हो जाता है, उसपर स्वयं श्रीहरि
प्रसन्न हो जाते हैं। समस्त तीर्थोंमें स्नान करनेसे,
सर्वस्व दान करनेसे, सभी प्रकारके व्रतोपवाससे,
सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे, सभी प्रकारकी