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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३९- परशुरामको गौरीका स्तवन करनेके लिये कहकर विष्णुका वैकुण्ठ-गमन, परशुरामका पार्वतीकी स्तुति करना

४०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अन्नदाता पिता है, वह जन्मदाता पितासे बड़ा है; क्योंकि पितासे उत्पन्न हुआ शरीर अन्नके बिना नित्य क्षीण होता जाता है। माता उन दोनोंसे सौ गुनी पूज्या, मान्या और वन्दनीया है; क्योंकि गर्भमें धारण करने और पालन-पोषण करनेसे वह उन दोनोंसे बड़ी है। श्रुतिमें ऐसा सुना गया है कि अपना अभीष्टदेव उन सबसे सौगुना बढ़कर पूज्य है और ज्ञान, विद्या तथा मन्त्र देनेवाला गुरु अभीष्टदेवसे भी बढ़कर है। गुरुपुत्र गुरुकी भाँति ही मान्य है; किंतु गुरुपत्नी उससे भी अधिक पूज्या है। देवताके रुष्ट होनेपर गुरु रक्षा कर लेते हैं, परंतु गुरुके क्रुद्ध होनेपर कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। इसलिये गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वरदेव, गुरु ही परब्रह्म और ब्राह्मणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। गुरु ही ज्ञान देते हैं और वह ज्ञान हरि-भक्ति उत्पन्न करता है। इस प्रकार जो हरि-भक्ति प्रदान करनेवाला है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए मनुष्यको जहाँसे ज्ञानरूपी दीपक प्राप्त होता है, जिसे पाकर सब कुछ निर्मल दीखने लगता है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? गुरुके दिये हुए मन्त्रका जप करनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उस ज्ञानसे सर्वज्ञता तथा सिद्धि मिलती है; अतः गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? गुरुद्वारा दी गयी जिस विद्याके बलसे मनुष्य सर्वत्र सुखपूर्वक विजयी होता है और जगत्में पूज्य भी हो जाता है, उस गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? हे पुत्र! श्रीकृष्ण तुम्हारे अभीष्टदेव हैं और स्वयं शंकर गुरु हैं; अतः तुम अभीष्टदेवसे भी बढ़कर पूजनीय गुरुकी शरण ग्रहण करो। जिनके आश्रयसे तुमने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे रहित कर दिया है और श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त की है; उन शिवकी शरणमें जाओ। जो मङ्गलस्वरूप, कल्याणकी मूर्ति, कल्याणदाता, कल्याणके कारण, पार्वतीके आराध्य और शान्तरूप हैं; अपने गुरुदेव उन शिवकी शरणमें जाओ। तुम्हारे इष्टदेव जो गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे ही अपने अंशसे शिवका रूप धारण करके तुम्हारे गुरु हुए हैं, अतः उन्हींकी शरण ग्रहण करो। बेटा! समस्त प्राणियोंमें श्रीकृष्ण आत्मा हैं, शिव ज्ञान हैं, मैं मन हूँ और विष्णुकी सारी शक्तियोंसे सम्पन्न प्रकृति प्राण है। जो ज्ञानदाता, ज्ञानस्वरूप, ज्ञानके कारण, सनातन मृत्युको जीतनेवाले तथा कालके भी काल हैं; उन गुरुकी शरणमें जाओ। जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह, सर्वज्ञ, ऐश्वर्यशाली और सनातन हैं; उन गुरुदेवकी शरणका आश्रय लो। प्रकृतिस्वरूपिणी पार्वतीने लाखों वर्षोतक तपस्या करके जिन परमेश्वरको अपने मनोनीत प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त किया है; उन गुरुदेवकी शरण ग्रहण करो। नारद! इतना कहकर कमलजन्मा ब्रह्मा मुनियोंके साथ चले गये। तब परशुरामने भी कैलास जानेका विचार किया।

(अध्याय ४०)


परशुरामका कैलास-गमन, वहाँ शिव-भवनमें पार्षदोंसहित गणेशको प्रणाम करके आगे बढ़नेको उद्यत होना, गणेशद्वारा रोके जानेपर उनके साथ वार्तालाप

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! श्रीहरिका कवच धारण करके जब परशुरामने पृथ्वीको क्षत्रियोंसे रहित कर दिया, तब वे अपने गुरुदेव शिवको नमस्कार करने और गुरुपत्नी अम्बा शिवाको तथा दोनों गुरुपुत्र कार्तिकेय और गणेश्वरको, जो गुणोंमें नारायणके समान थे, देखनेके लिये कैलासको चले। वे भृगुवंशी महात्मा मनके समान वेगशाली थे; अतः उसी

गणपतिखण्ड४०५

क्षण कैलासपर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अत्यन्त रमणीय परम मनोहर नगर देखा। वह नगर ऐसी बड़ी-बड़ी सड़कोंसे सुशोभित था, जो अत्यन्त भली लगती थीं। उनकी भूमि सोनेकी भूमिकी-सी थी, जिनपर शुद्ध स्फटिकके सदृश मणियाँ जड़ी हुई थीं। उस नगरमें चारों ओर सिंदूरकी-सी रंगवाली मणियोंकी वेदिकाएँ बनी थीं। वह राशि-की-राशि मुक्ताओंसे संयुक्त और मणियोंके मण्डपोंसे परिपूर्ण था। उसमें यक्षोंके एक अरब दिव्य भवन थे, जो रत्नों और काञ्चनोंसे परिपूर्ण, यक्षेन्द्रगणोंसे परिवेष्टित और मणिनिर्मित किवाड़, खम्भे और सीढ़ियोंसे शोभायमान थे। वह नगर दिव्य सुवर्ण-कलशों, चाँदीके बने हुए श्वेत चँवरों, रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित था। वह उदीप्त होती हुई सुन्दरियों, हाथोंमें चित्रलिखित पुत्तलिकाएँ लिये हुए निरन्तर स्वच्छन्दतापूर्वक हँसते और खेलते हुए सुन्दर-सुन्दर बालकों एवं बालिकाओं तथा स्वर्गगङ्गाके तटपर उगे हुए पारिजातके वृक्षसमूहोंसे खचाखच भरा था। सुगन्धित एवं खिले हुए पुष्पसमूहोंसे सम्पन्न, कल्पवृक्षोंका आश्रय लेनेवाले कामधेनुसे पुरस्कृत, सिद्धविद्यामें अत्यन्त निपुण पुण्यवान् सिद्धोंद्वारा सेवित था। जो तीन लाख योजन ऊँचे और सौ योजनके विस्तारवाले थे। जिनमें सैकड़ों मोटी-मोटी डालियाँ थीं, जो असंख्य शाखासमूहों और असंख्य फलोंसे संयुक्त थे। परम मनोहर शब्द करनेवाले विभिन्न प्रकारके पक्षिसमूहोंसे व्याप्त थे। शीतल-सुगन्ध वायु जिन्हें कम्पायमान कर रही थी, ऐसे अविनाशी वटवृक्षोंसे, सहस्रों पुष्पोद्यानोंसे, सैकड़ों सरोवरोंसे तथा मणियों एवं रत्नोंसे बने हुए सिद्धेन्द्रोंके लाखों भवनोंसे वह नगर सुशोभित था। उसे देखकर परशुरामका मन अत्यन्त प्रसन्नतासे खिल उठा। फिर सामने ही उन्हें शंकरजीका शोभाशाली रमणीय आश्रम दीख पड़ा। विश्वकर्माने बहुमूल्य सुनहली मणियोंद्वारा उसकी रचना की थी। उसमें हीरे जड़े हुए थे। वह पंद्रह योजन ऊँचा और चार योजन विस्तृत था। उसके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर सुडौल चौकोर परकोटा बना हुआ था। दरवाजोंपर नाना प्रकारकी चित्रकारियोंसे युक्त रत्नोंके किवाड़ लगे थे। वह उत्तम मणियोंकी वेदियोंसे युक्त तथा मणियोंके खंभोंसे सुशोभित था।

नारद! परशुरामने उस आश्रमके प्रधानद्वारके दाहिनी ओर वृषेन्द्रको और बायीं ओर सिंह तथा नन्दीश्वर, महाकाल, भयंकर पिंगलाक्ष, विशालाक्ष, बाण, महाबली विरूपाक्ष, विकटाक्ष, भास्कराक्ष, रक्ताक्ष, विकटोदर, संहारभैरव, भयंकर कालभैरव, रुरुभैरव, ईशकी-सी आभावाले महाभैरव, कृष्णाङ्गभैरव, दृढ़पराक्रमी क्रोधभैरव, कपालभैरव, रुद्रभैरव तथा सिद्धेन्द्रों, रुद्रगणों, विद्याधरों, गुह्यकों, भूतों, प्रेतों, पिशाचों, कूष्माण्डों, ब्रह्मराक्षसों, वेतालों, दानवों, जटाधारी योगीन्द्रों, यक्षों, किंपुरुषों और किन्नरोंको देखा। उन्हें देखकर भृगुनन्दनने उनके साथ वार्तालाप किया। फिर नन्दिकेश्वरकी आज्ञा ले वे प्रसन्न मनसे भीतर घुसे। आगे बढ़नेपर उन्हें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए सैकड़ों मन्दिर दीख पड़े, जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित चमचमाते हुए कलशोंसे सुशोभित थे। अमूल्य रत्नोंके बने हुए किवाड़, जिनमें हीरे जड़े हुए थे और मोतियाँ एवं निर्मल शीशे लगे हुए थे, उन मन्दिरोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनमें गोरोचना नामक मणियोंके हजारों खंभे लगे थे और वे मणियोंकी सीढ़ियोंसे सम्पन्न थे। परशुरामने उनके भीतरी द्वारको देखा, जो नाना प्रकारकी चित्रकारीसे चित्रित तथा हीरे-मोतियोंकी गुँथी हुई मालाओंसे सुशोभित था। उसकी बायीं ओर कार्तिकेय और दाहिनी ओर गणेश तथा शिव-तुल्य पराक्रमी विशालकाय वीरभद्र दीख पड़े। नारद! वहाँ प्रधान-प्रधान पार्षद और क्षेत्रपाल भी रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनोंपर बैठे हुए थे। महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न भृगुवंशी