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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३४- आदिगौ सुरभीदेवीका उपाख्यान

२५८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

—इक्कीस अक्षरका यह मन्त्र सुपूजित होनेपर भक्तोंको सम्पूर्ण कामना प्रदान करनेके लिये कल्पवृक्षस्वरूप है। दस लाख जप करनेपर इस मन्त्रकी सिद्धि होती है।

ब्रह्मन्! अब ध्यान सुनो। सर्वसम्मत ध्यान वेदप्रणीत है। 'सुस्थिरयौवना भगवती मङ्गलचण्डिका सदा सोलह वर्षकी ही जान पड़ती हैं। ये सम्पूर्ण रूप-गुणसे सम्पन्न, कोमलाङ्गी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पाके समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओंके तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। ये अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। मल्लिका-पुष्पोंसे समलंकृत केशपाश धारण करती हैं। बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्कालके प्रफुल्ल कमलकी भाँति शोभायमान मुखवाली मङ्गलचण्डिकाके प्रसन्न वदनारविन्दपर मन्द मुसकानकी छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमलके समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करनेवाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागरसे उबारनेमें जहाजका काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।' मुने! यह तो भगवती मङ्गलचण्डिकाका ध्यान हुआ। ऐसे ही स्तवन भी है, सुनो।

महादेवजीने कहा—जगन्माता भगवती मङ्गलचण्डिके! तुम सम्पूर्ण विपत्तियोंका विध्वंस करनेवाली हो एवं हर्ष तथा मङ्गल प्रदान करनेको सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और मङ्गल देनेवाली हर्षमङ्गलचण्डिके! तुम शुभा, मङ्गलदक्षा, शुभमङ्गलचण्डिका, मङ्गला, मङ्गलार्हा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला कहलाती हो। देवि! साधुपुरुषोंको मङ्गल प्रदान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम सबके लिये मङ्गलका आश्रय हो। देवि! तुम मङ्गलग्रहकी इष्टदेवी हो। मङ्गलके दिन तुम्हारी पूजा होनी चाहिये। मनुवंशमें उत्पन्न राजा मङ्गलकी पूजनीया देवी हो। मङ्गलाधिष्ठात्री देवि! तुम मङ्गलोंके लिये भी मङ्गल हो। जगत्के समस्त मङ्गल तुमपर आश्रित हैं। तुम सबको मोक्षमय मङ्गल प्रदान करती हो। मङ्गलको सुपूजित होनेपर मङ्गलमय सुख प्रदान करनेवाली देवि! तुम संसारकी सारभूता मङ्गलाधारा तथा समस्त कर्मोंसे परे हो।'

इस स्तोत्रसे स्तुति करके भगवान् शंकरने देवी मङ्गलचण्डिकाकी उपासना की। वे प्रति मङ्गलवारको उनका पूजन करके चले जाते हैं। यों ये भगवती सर्वमङ्गला सर्वप्रथम भगवान् शंकरसे पूजित हुईं। उनके दूसरे उपासक मङ्गल ग्रह हैं। तीसरी बार राजा मङ्गलने तथा चौथी बार मङ्गलके दिन कुछ सुन्दरी स्त्रियोंने इन देवीकी पूजा की। पाँचवीं बार मङ्गलकी कामना रखनेवाले बहुसंख्यक मनुष्योंने मङ्गलचण्डिकाका पूजन किया। फिर तो विश्वेश शंकरसे सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्वमें सदा पूजित होने लगीं। मुने! इसके बाद देवता, मुनि, मनु और मानव—सभी सर्वत्र इन परमेश्वरीकी पूजा करने लगे।

जो पुरुष मनको एकाग्र करके भगवती मङ्गलचण्डिकाके इस मङ्गलमय स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे सदा मङ्गल प्राप्त होता है। अमङ्गल उसके पास नहीं आ सकता। उसके पुत्र और पौत्रोंमें वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मङ्गल ही दृष्टिगोचर होता है।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! आगमोंके अनुसार देवी षष्ठी और मङ्गलचण्डिकाका उपाख्यान कह चुका। अब मनसादेवीका चरित्र, जो धर्मके मुखसे मैं सुन चुका हूँ, तुमसे कहता हूँ, सुनो। ये भगवती कश्यपजीकी मानसी कन्या हैं तथा मनसे उद्दीप्त होती हैं, इसलिये 'मनसा' देवीके नामसे विख्यात हैं। आत्मामें रमण करनेवाली इन सिद्धयोगिनी वैष्णवीदेवीने तीन युगोंतक परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या की है।

प्रकृतिखण्ड
२५९

गोपीपति परम प्रभु उन परमेश्वरने इनके वस्त्र और शरीरको जीर्ण देखकर इनका ‘जरत्कारु’ नाम रख दिया। साथ ही, उन कृपानिधिने कृपापूर्वक इनकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण कर दीं, इनकी पूजाका प्रचार किया और स्वयं भी इनकी पूजा की। स्वर्गमें, ब्रह्मलोकमें, भूमण्डलमें और पातालमें—सर्वत्र इनकी पूजा प्रचलित हुई। सम्पूर्ण जगत्‌में ये अत्यधिक गौरवर्ण, सुन्दरी और मनोहारिणी हैं; अतएव ये साध्वी देवी ‘जगद्गौरी’—के नामसे विख्यात होकर सम्मान प्राप्त करती हैं। भगवान् शिवसे शिक्षा प्राप्त करनेके कारण ये देवी ‘शैवी’ कहलाती हैं। भगवान् विष्णुकी ये अनन्य उपासिका हैं। अतएव लोग इन्हें ‘वैष्णवी’ कहते हैं। राजा जनमेजयके यज्ञमें इन्हींके सत्प्रयत्नसे नागोंके प्राणोंकी रक्षा हुई थी, अतः इनका नाम ‘नागेश्वरी’ और ‘नागभगिनी’ पड़ गया। विषका संहार करनेमें परम समर्थ होनेसे इनका एक नाम ‘विषहरी’ है। इन्हें भगवान् शंकरसे योगसिद्धि प्राप्त हुई थी। अतः ये ‘सिद्धयोगिनी’ कहलाने लगीं। इन्होंने शंकरसे महान् गोपनीय ज्ञान एवं मृतसंजीवनी नामक उत्तम विद्या प्राप्त की है, इस कारण विद्वान् पुरुष इन्हें ‘महाज्ञानयुता’ कहते हैं। ये परम तपस्विनी देवी मुनिवर आस्तीककी माता हैं। अतः ये देवी जगत्‌में सुप्रतिष्ठित होकर ‘आस्तीकमाता’ नामसे विख्यात हुई हैं। जगत्पूज्य योगी महात्मा मुनिवर जरत्कारुकी प्यारी पत्नी होनेके कारण ये ‘जरत्कारुप्रिया’ नामसे विख्यात हुईं। जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरी और महाज्ञानयुता—इन बारह नामोंसे विश्व इनकी पूजा करता है। जो पुरुष पूजाके समय इन बारह नामोंका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजको भी सर्पका भय नहीं हो सकता।* जिस शयनागारमें नागोंका भय हो, जिस भवनमें बहुतेरे नाग भरे हों, नागोंसे युक्त होनेके कारण जो महान् दारुण स्थान बन गया हो तथा जो नागोंसे वेष्टित हो, वहाँ भी पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करके सर्पभयसे मुक्त हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं है। जो नित्य इसका पाठ करता है, उसे देखकर नाग भाग जाते हैं। दस लाख पाठ करनेसे यह स्तोत्र मनुष्योंके लिये सिद्ध हो जाता है। जिसे यह स्तोत्र सिद्ध हो गया, वह विष-भक्षण करने तथा नागोंको भूषण बनाकर नागपर सवारी करनेमें भी समर्थ हो सकता है। वह नागासन, नागकल्प तथा महान् सिद्ध हो जाता है।

मुनिवर! अब मैं देवी मनसाकी पूजाका विधान तथा सामवेदोक्त ध्यान बतलाता हूँ, सुनो। ‘भगवती मनसा श्वेतचम्पक-पुष्पके समान वर्णवाली हैं। इनका विग्रह रत्नमय भूषणोंसे विभूषित है। अग्निशुद्ध वस्त्र इनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इन्होंने सर्पोंका यज्ञोपवीत धारण कर रखा है। महान् ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण प्रसिद्ध ज्ञानियोंमें भी ये प्रमुख मानी जाती हैं। ये सिद्धपुरुषोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। सिद्धि प्रदान करनेवाली तथा सिद्धा हैं; मैं इन भगवती मनसाकी उपासना करता हूँ।’ इस प्रकार ध्यान करके मूलमन्त्रसे भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। अनेक प्रकारके नैवेद्य तथा गन्ध, पुष्प और अनुलेपनसे देवीकी पूजा होती है। सभी उपचार मूलमन्त्रको पढ़कर अर्पण करने चाहिये। मुने! इनके मूलमन्त्रका नाम है—‘मूल कल्पतरु’—यह सुसिद्ध मन्त्र है। इसमें बारह


* जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा॥
जरत्कारुप्रियाऽऽस्तीकमाता विषहरीति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता॥
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च॥
(प्रकृतिखण्ड ४५। १५—१७)