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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३६- परशुरामका कैलास-गमन, वहाँ शिव-भवनमें पार्षदोंसहित गणेशको प्रणाम करके आगे बढ़नेको उद्यत होना, गणेशद्वारा रोके जानेपर उनके साथ वार्तालाप

३९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सुचन्द्र-पुत्र पुष्कराक्षके साथ परशुरामका युद्ध, पाशुपतास्त्र छोड़नेके लिये उद्यत परशुरामके पास विष्णुका आना और उन्हें समझाना, विष्णुका विप्रवेषसे पुत्रसहित पुष्कराक्षसे लक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको माँग लेना, लक्ष्मीकवचका वर्णन

श्रीनारायण कहते हैं—ब्रह्मन्! रणक्षेत्रमें राजाधिराजोंके शिरोमणि सुचन्द्रके गिर जानेपर तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ पुष्कराक्ष आ धमका। महान् पराक्रमी राजा पुष्कराक्ष सूर्यवंशमें उत्पन्न, महालक्ष्मीका सेवक, लक्ष्मीवान् और सूर्यके समान प्रभावशाली था। वह सुचन्द्रका पुत्र था। उसके गलेमें महालक्ष्मीका मनोहर कवच बँधा था, जिसके प्रभावसे वह परमैश्वर्यसम्पन्न और त्रिलोकविजयी हो गया था। उसे देखकर बुद्धिमान् परशुरामके सभी भाई हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण करके युद्ध करनेके लिये आ डटे। राजाने लीलापूर्वक बाणसमूहकी वर्षा करके उन्हें छेद डाला। तब उन वीरोंने भी हँसते-हँसते उन बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर तो पुष्कराक्षके साथ घोर युद्ध आरम्भ हुआ। परशुरामने पाशुपतास्त्रके सिवा सभी अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग किया, पर पुष्कराक्षने सबको काट गिराया। तब अपने समस्त शस्त्रास्त्रोंको विफल देखकर परशुरामने स्नान करके शिवजीको प्रणाम किया और पाशुपतास्त्रका प्रयोग करना चाहा; इतनेमें भगवान् नारायण ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ प्रकट हो गये और बोले।

[ ब्राह्मणवेषधारी ] नारायणने कहा—वत्स भार्गव! यह क्या कर रहे हो? तुम तो ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो; फिर भ्रमवश क्रोधावेशमें आकर मनुष्यका वध करनेके लिये पाशुपतका प्रयोग क्यों कर रहे हो? इस पाशुपतसे तो तत्काल ही सारा विश्व भस्म हो सकता है; क्योंकि यह शस्त्र परमेश्वर श्रीकृष्णके अतिरिक्त और सबका विनाशक है। अहो! पाशुपतको जीतनेकी शक्ति तो सुदर्शनमें ही है; क्योंकि श्रीहरिका सुदर्शनचक्र समस्त अस्त्रोंका मान मर्दन करनेवाला है। शिवजीका पाशुपतास्त्र और श्रीहरिका सुदर्शनचक्र—ये ही दोनों तीनों लोकोंमें समस्त अस्त्रोंमें प्रधान हैं। इसलिये ब्रह्मन्! तुम पाशुपतास्त्रको रख दो और मेरी बात सुनो। इस समय तुम जिस प्रकार महाबली राजा पुष्कराक्षको जीत सकोगे तथा जिस प्रकार अजेय कार्तवीर्यपर विजय पा सकोगे, वह सारा उपाय तुम्हें बतलाता हूँ; सावधानतया श्रवण करो। महालक्ष्मीका कवच, जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, पुष्कराक्षने भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ अपने गलेमें धारण कर रखा है और पुष्कराक्षका पुत्र दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका परम अद्भुत एवं उत्तम कवच अपनी दाहिनी भुजापर बाँधे हुए है। इन कवचोंकी कृपासे वे दोनों विश्वपर विजय पा लेनेमें समर्थ हैं। उनके शरीरपर कवचोंके वर्तमान रहते त्रिभुवनमें उन्हें कौन जीत सकता है। मुने! मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा सफल करनेके निमित्त उन दोनोंके संनिकट माँगनेके लिये जाऊँगा और उनसे कवचकी याचना करूँगा। ब्राह्मणकी बात सुनकर परशुरामका मन भयभीत हो गया, तब वे दुःखी हृदयसे उस वृद्ध ब्राह्मणसे बोले।

परशुरामने कहा—‘महाप्राज्ञ! ब्राह्मणरूपधारी आप कौन हैं, मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ; अतः मुझ अनजानको शीघ्र ही अपना परिचय दीजिये, तत्पश्चात् राजाके पास जाइये।’ परशुरामका वचन सुनकर ब्राह्मणको हँसी आ गयी, वे ‘मैं विष्णु हूँ’ यों कहकर राजाके पास याचना करनेके लिये चले गये। उन दोनोंके संनिकट जाकर विष्णुने उनसे कवचकी याचना की। तब विष्णुकी

गणपतिखण्ड ३९७

मायासे मोहित होकर उन्होंने विष्णुको दोनों
कवच दान कर दिये। भगवान् विष्णु उन
कवचोंको लेकर वैकुण्ठको चले गये।
नारदजीने पूछा—महामुने! भूपाल पुष्कराक्षको
महालक्ष्मीका कवच किसने दिया था? तथा
पुष्कराक्षके पुत्रको दुर्गाका दुर्लभ कवच किसने
बताया था? आप इसे बतलानेकी कृपा करें;
क्योंकि इसे सुननेकी मेरी प्रबल उत्कण्ठा है।
जगद्गुरो! साथ ही मुझे यह भी बताइये कि उन
दोनोंके कवच कैसे थे, उनका क्या फल है और
वे दोनों मन्त्र किस तरहके थे?
श्रीनारायणने कहा—नारद! बुद्धिमान्
पुष्कराक्षको महालक्ष्मीका कवच और दशाक्षर-
मन्त्र सनत्कुमारने दिया था। उन्होंने ही गोपनीय
स्तोत्र, उसका चरित, पूजाकी विधि और
सामवेदोक्त मनोहर ध्यान भी बतलाया था।
दुर्गाका कवच, गुह्य स्तोत्र और दशाक्षर-मन्त्र
पूर्वकालमें दुर्वासाने पुष्कराक्ष-पुत्रको प्रदान किया
था। इसके पश्चात् देवीके उस परम अद्भुत सम्पूर्ण
चरितको सुनोगे, जिसे उन्होंने महायुद्धके आरम्भमें
प्रार्थना करनेपर बतलाया था। अब मैं तुम्हें
महालक्ष्मीका मन्त्र बतलाता हूँ; उसे श्रवण करो।
‘ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' यही वह परम
अद्भुत मन्त्र है। मुने! सनत्कुमारने बुद्धिमान्
पुष्कराक्षको जो पूजाविधि और सामवेदोक्त ध्यान
बतलाया था, उसे सुनो। सहस्रदलकमल जिनका
आसन है, जो भगवान् पद्मनाभकी सती-साध्वी
प्रियतमा हैं, कमल जिनका घर है, जिनका मुख
कमलके सदृश और नेत्र कमलपत्रकी-सी आभावाले
हैं, कमलका फूल जिन्हें अधिक प्रिय है, जो
कमल-पुष्पकी शय्यापर शयन करती हैं, जिनके
हाथमें कमल शोभा पाता है, जो कमल-पुष्पोंकी
मालासे विभूषित हैं, कमलोंके आभूषण जिनकी
शोभा बढ़ाते हैं, जो स्वयं कमलोंकी शोभाकी
वृद्धि करनेवाली हैं और मुस्कराती हुई जो
कमल-वनकी ओर निहार रही हैं; उन पद्मिनी
देवीका मैं आनन्दपूर्वक भजन करता हूँ।
साधकको चाहिये कि चन्दनका अष्टदल-
कमल बनाकर उसपर कमल-पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीकी
पूजा करे। फिर 'गण'का भलीभाँति पूजन करके
उन्हें षोडशोपचार समर्पित करे। तदनन्तर स्तुति
करके भक्तिपूर्वक उनके सामने सिर झुकावे।
ब्रह्मन् ! अब सबका साररूप कवच तुम्हें बतलाता
हूँ; सुनो।
श्रीनारायण आगे कहते हैं—विप्रवर!
भगवान् पद्मनाभने अपने नाभिकमलपर स्थित
ब्रह्माको लक्ष्मीका जो परम शुभकारक कवच
प्रदान किया था, उसे सुनो। उस कवचको पाकर
ब्रह्माने कमलपर बैठे-बैठे जगत्की सृष्टि की और
महालक्ष्मीकी कृपासे वे लक्ष्मीवान् हो गये। फिर
पद्मालयासे वरदान प्राप्त करके ब्रह्मा लोकोंके
अधीश्वर हो गये। उन्हीं ब्रह्माने पद्मकल्पमें अपने
प्रिय पुत्र बुद्धिमान् सनत्कुमारको यह परम अद्भुत
कवच दिया था। नारद! सनत्कुमारने वह कवच
पुष्कराक्षको प्रदान किया था, जिसके पढ़ने एवं
धारण करनेसे ब्रह्मा समस्त सिद्धोंके स्वामी,
महान् परमैश्वर्यसे सम्पन्न और सम्पूर्ण सम्पदाओंसे
युक्त हो गये।
सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता इस कवचके
प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है, स्वयं पद्मालया
देवी हैं और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षमें इसका
विनियोग किया जाता है। यह परम अद्भुत कवच
महापुरुषोंके पुण्यका कारण है। ‘ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै
स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘श्रीं' मेरे
कपालकी और ‘श्रीं श्रियै नमः' नेत्रोंकी रक्षा
करे। ‘ॐ श्रीं श्रियै स्वाहा' सदा दोनों कानोंकी
रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मै स्वाहा' मेरी
नासिकाकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा'