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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३६- अनरण्यकी पुत्री पद्माकी धर्मद्वारा परीक्षा, सती पद्माका उनको शाप देना तथा उस शापसे उनकी रक्षाकी भी व्यवस्था करना, वसिष्ठजीका हिमवान्‌को संक्षेपसे सतीके देह-त्यागका प्रसङ्ग सुनाना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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करके वे विष्णुलोकको चले जायँगे। फिर तो अनायास ही उन्हें नारायणका सारूप्य प्राप्त हो जायगा। वे भगवान्‌के पार्षदभावको पाकर हरिदास हो जायँगे।' यह सब सोचकर देवताओंने आपसमें सलाह की और वे गुरु बृहस्पतिको हिमालयके घर भेजनेके लिये गये। उन सबने गुरुको प्रणाम करके निवेदन किया—'गुरुदेव! आप हिमालयके यहाँ जाकर उनके समक्ष भगवान् शिवकी निन्दा कीजिये। यह तो निश्चय है कि दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें हिमवान् अनिच्छासे ही अपनी पुत्री शिवको देंगे। ऐसा करनेसे कन्यादानका फल कम हो जायगा। कालान्तरमें गिरिराज भले ही मुक्त हो जायँ; परंतु इस समय तो इन्हें पृथ्वीपर रहना ही चाहिये। भगवन्! आप ही अनन्त रत्नोंके आधारभूत हिमालयको भारतवर्षमें रखिये। (इन्हें यहाँसे जाने न दीजिये।)

देवताओंका वचन सुनकर गुरु बृहस्पतिजीने दोनों हाथ कानोंमें लगा लिये और 'नारायण!' 'नारायण!' का स्मरण करते हुए उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी। वेद-वेदान्तके विद्वान् बृहस्पति हरि और हरके महान् भक्त थे। उन्होंने देवताओंको बारंबार फटकारकर कहा।

बृहस्पति बोले—स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहनेवाले देवताओ! मेरी सच्ची बात सुनो। मेरा यह वचन नीतिका सारतत्त्व, वेदोंद्वारा प्रतिपादित तथा परिणाममें सुख देनेवाला है। जो पापी शिव और विष्णुके भक्तकी, भूदेवता ब्राह्मणोंकी, गुरु और पतिव्रताकी, पति, भिक्षु, ब्रह्मचारी तथा सृष्टिके बीजभूत देवताओंकी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके रहनेतक कालसूत्र नामक नरकमें पकाये जाते हैं। उन्हें कफ तथा मल-मूत्रमें दिन-रात सोना पड़ता है। उन्हें कीड़े खाते हैं और वे कातर वाणीमें आर्तनाद करते हैं। जो सृष्टिकर्ता जगद्गुरु ब्रह्माकी निन्दा करते हैं; जो सुरश्रेष्ठ शिव, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गीता, तुलसी, गङ्गा, वेद, वेदमाता सावित्री, व्रत, तपस्या, पूजा, मन्त्र तथा मन्त्रदाता गुरुमें दोष बताते हैं; वे अन्धकूप नामक नरकमें यातना भोगते हैं और वहाँ उन्हें ब्रह्माकी आधी आयुतक रहना पड़ता है तथा वे सर्प-समूहोंसे भक्षित हो सदा चीखते-चिल्लाते रहते हैं। जो दूसरे देवताओंके साथ तुलना करके भगवान् हृषीकेशकी निन्दा करते हैं; विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाले पुराणमें, जो श्रुतिसे भी उत्कृष्ट है, दोष निकालते हैं; राधा तथा उनकी कायव्यूहरूपा गोपियोंकी और सदा पूजित होनेवाले ब्राह्मणोंकी भी निन्दा करते हैं; वे देवता ही क्यों न हों, ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त नरकके गड्ढेमें पकाये जाते हैं। उनके मुँह नीचे लटकाये जाते हैं और उनकी जाँघें ऊपरकी ओर होती हैं। विकृताकार सर्पसमूह तथा सर्पकी-सी आकृतिवाले कीट उनके सारे अङ्गोंमें लिपटकर काटते रहते हैं और वे अत्यन्त कातर तथा भयभीत हो सदा आर्तनाद किया करते हैं। निश्चय ही वहाँ उन्हें क्षोभपूर्वक कफ एवं मल-मूत्र खाने पड़ते हैं। रोषसे भरे हुए यमराजके किङ्कर उनके मुँहमें जलती हुई लुआठी डाल देते हैं। तीनों संध्याओंके समय उन्हें डाँट बताते हुए डंडोंसे पीटते हैं। डंडोंके प्रहारसे जब उन्हें प्यास लगती है, तब वे उन यमदूतोंके भयसे मूत्र-पान करते हैं। जब दूसरा कल्प आरम्भ होता है और पहले-पहल सृष्टिका आयोजन किया जाता है, उस समय उन पापियोंके पापोंका निवारण होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। निश्चय ही शिवकी निन्दा करनेवाले देवता नरकमें पड़ेंगे। मेरे बच्चो! क्या तुमलोग मेरा यही उपकार करना चाहते हो? ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिने शूलपाणि शंकरको अपनी पुत्री दी। उसीके पुण्यसे शिवकी निन्दा करनेपर भी उन्हें पाप नहीं लगा; अपितु परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। उन्होंने अनिच्छासे ही

५९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भगवान् शंकरको कन्यादान किया था। इसलिये उन्हें चौथाई पुण्यकी ही प्राप्ति हुई। अतएव वे सारूप्य मोक्षको न पाकर तुच्छ सृष्टिका ही अधिकार प्राप्त कर सके। देवताओ! तुम्हीं लोगोंमेंसे कोई हिमवान्‌के घर जाकर अपने मतके अनुसार कार्य करे और प्रयत्नपूर्वक शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करे। अनिच्छासे कन्यादान करके गिरिराज हिमवान् सुखपूर्वक भारतवर्षमें स्थित रहें। भक्तिपूर्वक शिवको पुत्री देकर तो वे निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे। अश्रद्धा उत्पन्न होनेके बाद अरुन्धतीको साथ ले सब सप्तर्षि अवश्य ही गिरिराजके घर जाकर उन्हें समझायेंगे। दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें पुत्रीके आग्रहसे वे अनिच्छापूर्वक शिवको अपनी कन्या देंगे। इस प्रकार मैंने अपना सारा विचार व्यक्त कर दिया। अब देवतालोग अपने-अपने घरको पधारें।

यों कहकर बृहस्पतिजी शीघ्र ही तपस्याके लिये आकाशगङ्गाके तटपर चले गये।

(अध्याय ४०)


ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका शिवजीसे शैलराजके घर जानेका अनुरोध करना, शिवका ब्राह्मण-वेषमें जाकर अपनी ही निन्दा करके शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करना, मेनाका पुत्रीको साथ ले कोप-भवनमें प्रवेश और शिवको कन्या न देनेके लिये दृढ़ निश्चय, सप्तर्षियों और अरुन्धतीका आगमन तथा शैलराज एवं मेनाको समझाना, वसिष्ठ और हिमवान्‌की बातचीत, शिवकी महत्ता तथा देवताओंकी प्रबलताका प्रतिपादन, प्रसङ्गवश राजा अनरण्य, उनकी पुत्री पद्मा तथा पिप्पलादमुनिकी कथा

श्रीकृष्ण कहते हैं— तब देवतालोग आपसमें विचार करके ब्रह्माजीके निकट गये। वहाँ उन्होंने उन लोकनाथ ब्रह्मासे अपना अभिप्राय निवेदन किया।

देवता बोले— संसारकी सृष्टि करनेवाले पितामह! आपकी सृष्टिमें हिमालय सब रत्नोंका आधार है। वह यदि मोक्षको प्राप्त हो जायगा तो पृथ्वी रत्नगर्भा कैसे कहलायेगी? शूलपाणि शंकरको भक्तिपूर्वक अपनी पुत्री देकर शैलराज स्वयं नारायणका सारूप्य प्राप्त कर लेंगे—इसमें संशय नहीं है। अतः आप शिवकी निन्दा करके गिरिराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न कीजिये। प्रभो! आपके सिवा दूसरा कोई यह कार्य करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये आप उनके घर जाइये।

देवताओंकी यह बात सुनकर स्वयं ब्रह्माजी उनसे कानोंको अमृतके समान मधुर प्रतीत होनेवाला तथा नीतिका सारभूत उत्तम वचन बोले।

ब्रह्माजीने कहा— बच्चो! मैं शिवकी निन्दा करनेमें समर्थ नहीं हूँ। यह अत्यन्त दुष्कर कार्य है। शिवकी निन्दा सम्पत्तिका नाश करनेवाली और विपत्तिका बीज है। तुमलोग भूतनाथ शिवको ही वहाँ भेजो। वे स्वयं अपनी निन्दा करें। परायी निन्दा विनाशका और अपनी निन्दा यशका कारण होती है*।

प्रिये! ब्रह्माजीका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम


* परनिन्दा विनाशाय स्वनिन्दा यशसे परम्। (४१।७)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५९७

करके देवतालोग शीघ्र ही कैलास पर्वतको गये
और वहाँ पहुँचकर भगवान् शिवकी स्तुति करने
लगे। स्तुति करके उन सबने करुणानिधान
शंकरको अपना अभिप्राय बताया। उनकी बात
सुनकर भगवान् शंकर हँसे और उन्हें आश्वासन
दे स्वयं शैलराजके पास गये; फिर तो सब
देवता शीघ्र ही अपने घर लौटकर आनन्दका
अनुभव करने लगे। क्यों न हो, इष्टसिद्धि आनन्द
देनेवाली और अभीष्ट वस्तुकी असिद्धि सदा
दुःख बढ़ानेवाली होती है।

उधर शैलराज अपनी सभामें बन्धुवर्गसे घिरे
हुए प्रसन्नतापूर्वक बैठे थे। उनके साथ पार्वती भी
थीं। इसी बीच स्वयं भगवान् शिव ब्राह्मणका रूप
धारण करके सहसा वहाँ आ पहुँचे। उनके मुख
और नेत्रोंसे प्रसन्नता प्रकट हो रही थी। ब्राह्मणके
हाथमें दण्ड और छत्र था। उनका वस्त्र लंबा था।
उन्होंने ललाटमें उत्तम तिलक लगा रखा था।
उनके एक हाथमें स्फटिकमणिकी माला थी और
उन्होंने गलेमें भगवान् शालग्रामको धारण कर
रखा था। उन्हें देखते ही हिमवान् अपने
सेवकगणोंसहित उठकर खड़े हो गये। उन्होंने
भूमिपर दण्डकी भाँति पड़कर भक्तिभावसे उस
अपूर्व अतिथिको प्रणाम किया। पार्वतीने भी
विप्ररूपधारी प्राणेश्वरको भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाया।
फिर ब्राह्मणने सबको प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद
दिये। गिरिराजके दिये हुए आसनपर वे शीघ्रतापूर्वक
बैठे और आतिथ्यमें मधुपर्क आदि जो कुछ भी
मिला, वह सब उन्होंने प्रेमपूर्वक ग्रहण किया।
शैलराजने ब्राह्मणका कुशल-समाचार पूछते हुए
कहा—'विप्रवर! आपका परिचय क्या है?' तब
उन द्विजराजने गिरिराजको आदरपूर्वक सब कुछ
बताया।

ब्राह्मण बोले—गिरिराज! मैं घटक¹-वृत्तिका
आश्रय लेकर भूमण्डलमें घूमता रहता हूँ। मेरी
मनके समान तीव्र गति है। गुरुदेवके वरदानसे मैं
सर्वत्र पहुँचनेमें समर्थ एवं सर्वज्ञ हूँ। मुझे ज्ञात
हुआ है कि तुम अपनी इस लक्ष्मी-सरीखी दिव्य
कन्याको शंकरके हाथमें देना चाहते हो, जिसके
शील और कुलका कुछ भी पता नहीं है। शंकर
निराश्रय हैं—उनका कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं
है। वे असङ्ग—सदा अकेले रहनेवाले हैं। उनके
न रूप है, न गुण। वे श्मशानमें विचरनेवाले,
सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति तथा योगी हैं। शरीरपर
वस्त्रतक नहीं है। सदा दिगम्बर—नंग-धड़ंग
रहते हैं। उनके शरीरमें सर्पोंका वास है। अङ्गरागके
स्थानमें राख—भभूत ही उनके अंगोंको विभूषित
करती है। उनका स्वरूप ही व्यालग्राही (दुष्टों
अथवा सर्पोंको ग्रहण करनेवाला) है। वे कालका
व्यापादन (नाश या अपव्यय) करनेवाले हैं।
अज्ञात²मृत्यु, ज्ञ³ अथवा अज्ञ, अनाथ⁴ और अबन्धु⁵
हैं। भव (संसारकी उत्पत्तिके कारण) अथवा अभव
(जन्मरहित) हैं। वे सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी-
सी कान्तिवाली जटाओंका बोझ धारण करनेवाले
(विरक्त) तथा निर्धन हैं। उनकी अवस्था कितनी


१- जो वरके लिये योग्य कन्या और कन्याके लिये योग्य वरका पता देकर उन दोनोंमें सगाई या वैवाहिक सम्बन्ध पक्का कराते हैं, उन्हें 'घटक' कहते हैं। उनकी वृत्ति ही घटक या घाटिका-वृत्ति है।
२- निन्दापक्षमें अज्ञातमृत्युका अर्थ है, जिसकी मृत्युका किसीको ज्ञान नहीं है अर्थात् जन्मकुण्डली आदि न होनेसे जिनकी आयुका पता लगाना असम्भव है। कन्या उसको दी जाती है, जिसके दीर्घायु होनेका निश्चय कर लिया गया हो। स्तुतिपक्षमें—जिन्हें मृत्युका कभी अनुभव नहीं हुआ अर्थात् जो अमर एवं मृत्युञ्जय है।
३- निन्दापक्षमें 'अज्ञ' पदच्छेद है और स्तुतिपक्षमें 'ज्ञ'।
४- निन्दापक्षमें अनाथका अर्थ असहाय है और स्तुतिपक्षमें जो नाथरहित है—स्वयं ही सबके नाथ हैं।
५- अबन्धु—बन्धुहीन, बेसहारा अथवा अद्वितीय।

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है, इसका ज्ञान किसीको नहीं है। वे अत्यन्त वृद्ध हैं। विकारशून्य हैं। सबके आश्रय हैं अथवा सभी उनके आश्रय हैं। व्यर्थ घूमते रहते हैं। सर्पोंका हार धारण किये भीख माँगते हैं। (यही उनका परिचय है, जिन्हें तुम अपनी पुत्री देने जा रहे हो।) भगवान् नारायण ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा कुलीन हैं। (अथवा समस्त कुलोंकी उत्पत्तिके स्थान हैं।) तुम उनके महत्त्वको समझो। पार्वतीका दान करनेके निमित्त वे ही तुम्हारे लिये योग्य पात्र हैं। पार्वतीका विवाह शंकरसे हो रहा है, यह सुनते ही बड़े-बड़े लोगोंके मुखपर उपहाससूचक मुस्कराहट दौड़ जायगी। एक तुम हो, जो लाखों पर्वतोंके राजाधिराज हो और एक शिव हैं, जिनके एक भी भाई-बन्धु नहीं है। तुम अपने बन्धु-बान्धवोंसे तथा धर्मपत्नी मेनासे भी शीघ्र ही पूछो और इन सबकी सम्मति जाननेका प्रयत्न करो। भैया! और सबसे तो यत्नपूर्वक पूछना, किंतु पार्वतीसे इस विषयमें न पूछना; क्योंकि उसे शंकरके अनुरागका रोग लगा हुआ है। रोगीको दवा नहीं अच्छी लगती। उसे सदा कुपथ्य ही रुचिकर जान पड़ता है।

वृन्दावनविनोदिनी राधे! यों कह शान्त स्वभाववाले ब्राह्मणने शीघ्र ही स्नान और भोजन करके प्रसन्नतापूर्वक अपने घरका रास्ता लिया। ब्राह्मणकी पूर्वोक्त बात सुनकर मेना शोकयुक्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं। उनका हृदय व्यथित हो उठा। वे हिमालयसे बोलीं।

मेनाने कहा—शैलराज! मेरी बात सुनिये, जो परिणाममें सुख देनेवाली है। आप इन श्रेष्ठ पर्वतोंसे पूछिये, इनकी क्या राय है। मैं तो अपनी बेटीको शंकरके हाथमें नहीं दूँगी। देखिये, मैं सारे विषयोंको त्याग दूँगी, विष खा लूँगी और पार्वतीके गलेमें फाँसी लगाकर भयानक वनमें चली जाऊँगी।

ऐसा कह मेना रोषपूर्वक पार्वतीका हाथ पकड़कर कोपभवनमें चली गयीं। खाना-पीना छोड़कर रोने लगीं और भूमिपर ही सो गयीं। इसी समय भाइयोंसहित वसिष्ठ वहाँ आये। उन सबके साथ अरुन्धती भी थीं। शैलराजने उन सब महर्षियोंको प्रणाम करके बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया और सोलह उपचार अर्पित करके भक्तिभावसे उनका पूजन किया। ऋषिलोग सभाके बीच उस सुखद सिंहासनपर बैठे और अरुन्धतीदेवी तत्काल वहाँ चली गयीं, जहाँ मेना और पार्वती थीं। जाकर उन्होंने देखा, मेना शोकसे अचेत हो पृथ्वीपर सो रही हैं। तब उन साध्वी देवीने मधुर वाणीमें कहा।

अरुन्धती बोलीं—पतिव्रते मेनके! उठो। मैं अरुन्धती तुम्हारे घर आयी हूँ। मुझे पितरोंकी मानसी कन्या तथा ब्रह्माजीकी पुत्रवधू समझो।

अरुन्धतीका स्वर सुनकर मेना शीघ्र ही उठकर खड़ी हो गयीं। उन्होंने लक्ष्मीके समान तेजस्विनी देवी अरुन्धतीके चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।

मेना बोलीं—अहो! हमारा जन्म बड़ा ही पुण्यमय है। हमलोगोंका यह कौन-सा पुण्य आज फलित हुआ है, जिससे ब्रह्माजीकी पुत्रवधू तथा वसिष्ठजीकी धर्मपत्नीने मेरे घरमें पदार्पण किया है। देवि! मैं आपकी किङ्करी हूँ। यह घर आपका है। हमारे बड़े पुण्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है।

सम्भ्रमपूर्वक इतना ही कहकर मेनाने सती अरुन्धतीको सोनेकी चौकीपर बिठाया और उनके चरण पखारकर उन्हें मिष्टान्न भोजन कराया। फिर स्वयं भी पुत्रीके साथ भोजन किया। तदनन्तर अरुन्धतीने मेनाको शिवके लिये नीतिकी बातें समझायीं और प्रसङ्गवश उनके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाले वचन भी कहे। इधर उन महर्षियोंने भी शैलराजको उत्तम वाणीमें नीतिका सारतत्त्व समझाया और प्रसङ्गवश ऐसी बातें कहीं, जो