ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३५- ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका शिवजीसे शैलराजके घर जानेका अनुरोध करना, शिवका ब्राह्मण-वेषमें जाकर अपनी ही निन्दा करके शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करना, मेनाका पुत्रीको साथ ले कोप-भवनमें प्रवेश और शिवको कन्या न देनेके लिये दृढ़ निश्चय, सप्तर्षियों और अरुन्धतीका आगमन तथा शैलराज एवं मेनाको समझाना, वसिष्ठ और हिमवान्की बातचीत, शिवकी महत्ता तथा देवताओंकी प्रबलताका प्रतिपादन, प्रसङ्गवश राजा अनरण्य, उनकी पुत्री पद्मा तथा पिप्पलादमुनिकी कथा
५८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जान पड़ी। चन्द्रमा भाल-देशमें चन्दन जान पड़े। मस्तकपर गङ्गाकी मनोहारिणी धारा परम सुन्दर मालती मालाके रूपमें परिणत हो गयी। अस्थियोंकी माला रत्नमाला बन गयी। धतूर मनोहर चम्पाके रूपमें बदल गया। पाँच मुखके स्थानमें उन्हें एक ही मुख दिखायी देने लगा, जो दो नेत्र-कमलोंसे सुशोभित था। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको प्रतिहत करके अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा था। बन्धुजीव (दुपहरिया)-की लालीको तिरस्कृत करनेवाले उनके ओष्ठ और अधरसे मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। श्वेत चन्द्रमा ही मानो वृषभराज नन्दी बन गये थे और भूत आदि नर्तकोंका काम करते थे। महेश्वरके स्वरूपमें तत्काल सब कुछ बदल गया। शिवका ऐसा रूप देख मेना बहुत संतुष्ट हुई। कितनी रमणियाँ भगवान् शंकरके रूप-सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त मुग्ध हो गयीं और नाना प्रकारकी अभिलाषाएँ करने लगीं। अहो! पार्वती बड़ी पुण्यवती है। भारतवर्षमें इसीका जन्म स्पृहणीय है; क्योंकि ये शिव इसके स्वामी होनेवाले हैं।
इस प्रकारकी बातें कितनी ही स्त्रियाँ कर रही थीं। शिवका दर्शन करके मेना सानन्द अपने घरको लौट गयीं। शिवका पूजन करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर शैलराज भी अपने घरको गये। गिरिराजने मेनाके साथ एकान्तमें सलाह करके पार्वतीको उसकी मङ्गल-कामनासे शिवके समीप भेजा। पार्वतीका हृदय भगवान् शंकरमें अनुरक्त था। सखियोंके साथ मनोहर वेष धारण करके हर्षपूर्वक वे शिवके निकट गयीं। वहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले शान्तस्वरूप शिवका दर्शन करके शिवाने सात बार परिक्रमा की और मुस्कराकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय भगवान् शिवने आशीर्वाद देते हुए कहा—'सुन्दरि! तुम्हें अनन्य प्रेमी, गुणवान्, अमर, ज्ञानिशिरोमणि और सुन्दर पति प्राप्त हो। शुभे! तुम्हारा पतिविषयक सौभाग्य सतत बना रहे। साध्वि! तुम्हारा पुत्र नारायणके समान गुणवान् होगा। जगदम्बिके! तीनों लोकोंमें तुम्हारी उत्कृष्ट पूजा होगी। तुम समस्त ब्रह्माण्डोंमें सबसे श्रेष्ठ होओ। सुन्दरि! तुमने सात बार परिक्रमा करके भक्तिभावसे मुझे नमस्कार किया है। अतः मैं सात जन्मोंके लिये संतुष्ट हो गया। तुम उसका फल पाओ। तीर्थ, प्रियतम पति, इष्टदेवता, गुरुमन्त्र तथा औषधमें जिनकी जैसी आस्था होती है, उन्हें वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है।'
ऐसा कहकर योगीश्वर शंकरने व्याघ्रचर्मपर योगासन लगाया और मुझ परब्रह्मरूप ज्योतिका तत्काल ध्यान आरम्भ कर दिया। तब देवी पार्वतीने उनके दोनों चरण पखारकर चरणामृत-पान किया और अग्निशुद्ध वस्त्रसे भक्तिपूर्वक उन चरणोंका मार्जन किया। विश्वकर्माद्वारा निर्मित रमणीय रत्नसिंहासन उनकी सेवामें अर्पित किया। फिर कांस्यपात्रमें रखे हुए अपूर्व नैवेद्यका भोग लगाया। तत्पश्चात् उनके चरणोंमें गङ्गाजलसे युक्त अर्घ्य दिया। इसके बाद मनोहर सुगन्धयुक्त चन्दन तथा कस्तूरी और कुंकुम भी सेवामें प्रस्तुत किये। तदनन्तर हालाहल विषके चिह्नसे सुन्दर प्रतीत होनेवाले कण्ठमें मालतीकी माला पहनायी। भक्ति-भावसे पूजा की। शिवकी प्रसन्नताके लिये उनपर पुष्पोंकी वृष्टि की। सुवर्णपात्रमें अमृत और मधुर मधु दिया। सैकड़ों रत्नमय दीप जलाये। सब ओर उत्तम धूपकी सुगन्ध फैलायी। त्रिभुवन-दुर्लभ वस्त्र, सोनेके तारोंका यज्ञोपवीत तथा पीनेके लिये सुगन्धित एवं शीतल जल पार्वतीने अपने प्रियतमकी सेवामें प्रस्तुत किये। फिर रत्नसारेन्द्रनिर्मित अतिशय सुन्दर रमणीय भूषण, सुवर्णमढ़ी सींगवाली दुर्लभ कामधेनु, स्नानोपयोगी द्रव्य, तीर्थजल तथा मनोहर ताम्बूल भी
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५८९
क्रमशः अर्पित किये। इस प्रकार षोडशोपचार
चढ़ाकर पार्वतीने बारंबार प्रणाम किया। यह
उनका नित्यका नियम बन गया। वे प्रतिदिन
भक्तिभावसे शिवकी पूजा करके पिताके घर लौट
जाया करती थीं।
अप्सराओंके मुखसे इन्द्रने यह सुना कि
भगवान् महेश्वर पार्वतीदेवीके प्रति अनुरक्त हैं।
यह समाचार सुनकर इन्द्र हर्षसे नाचने लगे।
उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ दूत भेजकर कामदेवको
बुलवाया। इन्द्रकी आज्ञासे कामदेव अमरावतीपुरीमें
गये। तब इन्द्रने उन्हें शीघ्र ही उस स्थानपर भेजा,
जहाँ शिवा और शिव विद्यमान थे। पञ्चबाण
कामने अपने पाँचों बाणोंको साथ ले उस
स्थानको प्रस्थान किया, जहाँ शक्तिसहित शिव
विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर मदनने देखा,
भगवान् शिव शिवाके साथ विद्यमान हैं। उनके
मुख और नेत्र प्रसन्न दिखायी देते हैं। वे
त्रिभुवनकान्त एवं शान्त हैं। उन्हें देखकर कामदेव
बाणसहित धनुष हाथमें लिये आकाशमें खड़ा हो
गया। उसने बड़े हर्षके साथ अपने अमोघ एवं
अनिवार्य अस्त्रका शंकरपर प्रयोग किया; परंतु
वह अमोघ अस्त्र भी परमात्मा शंकरपर व्यर्थ हो
गया। जैसे आकाश निर्लेप होता है, उसी तरह
निर्लिप्त परमात्मा शिवपर जब वह शस्त्र विफल
हो गया, तब कामदेवको बड़ा भय हुआ। वह
सामने खड़ा हो भगवान् मृत्युञ्जयकी ओर देखता
हुआ काँपने लगा। भयसे विह्वल हुए कामने इन्द्र
आदि देवताओंका स्मरण किया। तब सब देवता
वहाँ आये और शंकरके कोपसे डरकर काँपने
लगे। उन्होंने स्तोत्र पढ़कर देवाधिदेव शंकरका
स्तवन किया। इतनेमें ही शिवके ललाटवर्ती
नेत्रसे कोपाग्नि प्रकट हुई। देवतालोग स्तुति कर
ही रहे थे कि शम्भुसे उत्पन्न हुई वह आग
ऊँची-ऊँची लपटें उठाती हुई प्रज्वलित हो उठी।
वह प्रलयकालिक अग्निकी ज्वालाके समान जान
पड़ती थी। आकाशमें ऊपर उठकर चक्कर काटती
हुई वह आग पृथ्वीपर उतर आयी और चारों
ओर चक्कर देकर कामदेवपर टूट पड़ी। भगवान्
शंकरके कोपसे कामदेव एक ही क्षणमें भस्म हो
गये। यह देख सब देवता विषादमें डूब गये और
पार्वतीने भी सिर नीचा कर लिया। तदनन्तर रति
भगवान् शिवके सामने बहुत विलाप करने लगी।
भयसे काँपते हुए समस्त देवताओंने शिवका
स्तवन किया। इसके बाद वे बार-बार रोते हुए
रतिसे बोले—'माँ ! पतिके शरीरका थोड़ा-सा
भस्म लेकर उसकी रक्षा करो और भय छोड़ो।
हमलोग उन्हें जीवित करायेंगे। तुम पुनः अपने
प्रियतमको प्राप्त करोगी; परंतु जब भगवान्
शंकरका क्रोध दूर हो जायगा और उनकी
प्रसन्नताका समय होगा, तभी यह कार्य सम्भव
हो सकेगा।'
रतिका विलाप देखकर पार्वती मूर्च्छित हो
गयीं और उन अतीन्द्रिय गुणातीत चन्द्रशेखरकी
स्तुति करने लगीं। तब भगवान् शिव रोती हुई
पार्वतीको वहीं छोड़कर अपने स्थानको चले
गये। फिर तो उसी क्षण पार्वतीका सारा अभिमान
चूर हो गया। गिरिराजनन्दिनीने अपने रूप और
यौवनका गर्व त्याग दिया। अब उन्हें सखियोंको
अपना मुँह दिखानेमें भी लज्जाका अनुभव होने
लगा। सब देवता रतिको आश्वासन दे रुद्रदेवको
दण्डवत् प्रणाम करनेके पश्चात् अपने स्थानको
चले गये। उस समय उनका मन शोकसे उद्विग्न
हो रहा था। राधिके ! कामपत्नी रति रोषसे लाल
आँखोंवाले रुद्रदेवका भयसे स्तवन करके शोकसे
रोती हुई अपने घरको चली गयी। परंतु पार्वती
लज्जावश पिताके घर नहीं गयी। वह सखियोंके
मना करनेपर भी तपस्याके लिये वनमें चली गयी।
तब शोकसे विह्वल हुई सखियोंने भी उन्हींका
अनुगमन किया। माताओंके रोकनेपर भी वे
सब-की-सब गङ्गातटवर्ती वनकी ओर चली
५९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
गयीं। आगे चलकर पार्वतीने दीर्घकालतक तपस्या | सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें कही गयीं।
करके भगवान् त्रिलोचनको पतिरूपमें प्राप्त किया। | पार्वतीका यह चरित्र गूढ़ है। बताओ, तुम और
रतिने भी शंकरके वरसे यथासमय कामदेवको | क्या सुनना चाहती हो ?
प्राप्त किया। राधे ! इस प्रकार पार्वतीके दर्पमोचनसे | (अध्याय ३९)
पार्वतीकी तपस्या, उनके तपके प्रभावसे अग्निका शीतल होना, ब्राह्मण-बालकका
रूप धारण करके आये हुए शिवके साथ उनकी बातचीत, पार्वतीका घरको
लौटना और माता-पिता आदिके द्वारा उनका सत्कार, भिक्षुवेषधारी
शंकरका आगमन, शैलराजको उनके विविध रूपोंके दर्शन,
उनकी शिव-भक्तिसे देवताओंको चिन्ता, उनका
बृहस्पतिजीको शिव-निन्दाके लिये उकसाना तथा
बृहस्पतिका देवताओंको शिव-निन्दाके
दोष बताकर तपस्याके लिये जाना
श्रीराधिका बोलीं- प्रभो ! यह बहुत ही | निराहार रहकर भक्ति-भावसे तपस्या की। तदनन्तर
विचित्र और अपूर्व चरित्र सुननेको मिला है, जो | और भी कठोर तप आरम्भ किया। ग्रीष्म-ऋतुमें
कानोंमें अमृतके समान मधुर, सुन्दर, निगूढ़ एवं | अपने चारों ओर आग प्रज्वलित करके वह दिन-
ज्ञानका कारण है। भगवन् ! यह न तो अधिक | रात उसे जलाये रखती और उसके बीचमें
संक्षेपसे सुना गया है और न विस्तारसे ही। परंतु | बैठकर निरन्तर मन्त्र जपती रहती थी। वर्षा-ऋतु
अब विस्तारसे ही सुननेकी इच्छा है; अतः आप | आनेपर श्मशानभूमिमें शिवा सदा योगासन लगाकर
विस्तारपूर्वक इस विषयका वर्णन कीजिये। पार्वतीने | बैठती और शिलाकी ओर देखती हुई जलकी
स्वयं कौन-कौन-सा कठोर तप किया था ? और | धारासे भीगती रहती थी। शीतकाल आनेपर वह
किस-किस वरको पाकर किस तरह महेश्वरको | सदा जलके भीतर प्रवेश कर जाती तथा शरत्की
प्राप्त किया तथा रतिने फिर किस प्रकार कामदेवको | भयंकर बर्फवाली रातोंमें भी निराहार रहकर
जिलाया ? प्यारे कृष्ण ! आप पार्वती और शिवके | भक्तिपूर्वक तपस्या करती थी।
विवाहका वर्णन कीजिये। | इस प्रकार अनेक वर्षोंतक कठोर तप करके
श्रीकृष्णने कहा- प्राणाधिके राधिके ! | भी जब सती-साध्वी पार्वती शंकरको न पा सकी,
प्राणवल्लभे ! सुनो। प्राणेश्वरि ! तुम प्राणोंकी अधिष्ठात्री | तब वह शोकसे संतप्त हो अग्निकुण्डका निर्माण
देवी हो। प्राणाधारे! मनोहरे ! जब रुद्रदेव | करके उसमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गयी।
वटवृक्षके नीचेसे चले गये, तब पार्वती माता- | तपस्यासे अत्यन्त कृशकाय हुई सती शैल-पुत्रीको
पिताके बार-बार रोकनेपर भी तपस्याके लिये | अग्निकुण्डमें प्रवेश करनेको उद्यत देख कृपासिन्धु
चली गयी। गङ्गाके तटपर जा तीनों काल स्नान | शिव कृपा करके स्वयं उसके पास गये। अत्यन्त
करके वह मेरे दिये हुए मन्त्रका प्रसन्नतापूर्वक | नाटे कदके बालक ब्राह्मणका रूप धारण करके
जप करने लगी। उस जगदम्बाने पूरे एक वर्षतक | अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् शिव
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५९१
मन-ही-मन बड़े हर्षका अनुभव कर रहे थे। उनके सिरपर जटा थी। उन्होंने दण्ड और छत्र भी ले रखे थे। श्वेत वस्त्र, श्वेत यज्ञोपवीत, श्वेत कमलके बीजोंकी माला एवं श्वेत तिलक धारण किये वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। निर्जन स्थानमें उस बालकको देखकर पार्वतीके हृदयमें स्नेह उमड़ आया। उसके तेजसे अत्यन्त आच्छादित हो उन्होंने स्वयं तप छोड़ दिया और सामने खड़े हुए शिशुसे पूछा—'तुम कौन हो?' शिवा बड़े आदरके साथ उसे हृदयसे लगा लेना चाहती थी। शैलकुमारीका प्रश्न सुनकर परमेश्वर शिव हँसे और ईश्वरीके कानोंमें अमृत उँड़ेलते हुए-से मधुर वाणीमें बोले।
शंकरने कहा—मैं इच्छानुसार विचरनेवाला ब्रह्मचारी एवं तपस्वी ब्राह्मण-बालक हूँ; परंतु सुन्दरि! तुम कौन हो, जो परम कान्तिमती होकर भी इस दुर्गम वनमें तप कर रही हो? बताओ, किसके कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है? तुम किसकी कन्या हो और तुम्हारा नाम क्या है? तुम तो तपस्याका फल देनेवाली हो; फिर स्वयं किसलिये तपस्या करती हो? कमललोचने! तुम तपस्याकी मूर्तिमती राशि हो। अवश्य ही तुम्हारा यह तप लोकशिक्षाके लिये है। तुम मूलप्रकृति ईश्वरी, लक्ष्मी, सावित्री और सरस्वती—इन देवियोंमेंसे कौन हो? इसका अनुमान करनेमें मैं असमर्थ हूँ। कल्याणि! तुम जो भी हो, मुझपर प्रसन्न हो जाओ; क्योंकि तुम्हारे प्रसन्न होनेपर परमेश्वर प्रसन्न होंगे। पतिव्रता स्त्रीके संतुष्ट होनेपर स्वयं नारायण संतुष्ट होते हैं और नारायणदेवके संतुष्ट होनेपर सदा तीनों लोक संतोषका अनुभव करते हैं; ठीक उसी तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींच देनेपर उसकी शाखाएँ स्वतः सिंच जाती हैं।
शिशुकी यह बात सुनकर परमेश्वरी शिवा हँसने लगी और कानोंमें अमृतकी वर्षा करती हुई मनोहर वाणी बोली।
पार्वतीने कहा—ब्रह्मन्! न तो मैं वेदजननी सावित्री हूँ, न लक्ष्मी हूँ और न वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती ही हूँ। मेरा जन्म भारतवर्षमें हुआ है। मैं इस समय गिरिराज हिमवान्की पुत्री हूँ। इससे पहले मेरा जन्म प्रजापति दक्षके घरमें हुआ था। उस समय मैं शंकर-पत्नी सतीके नामसे प्रसिद्ध थी। एक बार पिताने पतिकी निन्दा की। इसलिये मैंने योगके द्वारा अपने शरीरको त्याग दिया। इस जन्ममें भी पुण्यके प्रभावसे भगवान् शंकर मुझे मिल गये थे; परंतु दुर्भाग्यवश वे मुझे छोड़कर और कामदेवको भस्म करके चले गये। शंकरजीके चले जानेपर मैं मानसिक संताप और लज्जासे विवश हो पिताके घरसे तपस्याके लिये निकल पड़ी। अब मेरा मन इस गङ्गाजीके तटपर ही लगता है। दीर्घकालतक कठोर तप करके भी मैं अपने प्राणवल्लभको न पा सकी। इसलिये अग्निमें प्रवेश करने जा रही थी। किंतु तुम्हें देखकर क्षणभरके लिये रुक गयी। अब तुम जाओ। मैं प्रलयाग्निकी शिखाके समान प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करूँगी। ब्रह्मन्! महादेवजीकी प्राप्तिका संकल्प मनमें
५९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
लेकर शरीरका त्याग करूँगी और जहाँ-जहाँ भी जन्म लूँगी, परमेश्वर शिवको ही पतिके रूपमें प्राप्त करूँगी। प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिव ही मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम पति होंगे। सब स्त्रियाँ अपने प्रियतमको ही पानेके लिये मनोवाञ्छित जन्म ग्रहण करती हैं। उन सबका वह जन्म अपने अभीष्ट पतिकी उपलब्धिके लिये ही होता है, ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। पूर्वजन्मका जो पति है, वही स्त्रियोंके प्रत्येक जन्ममें पति होता है। जो स्त्री जिनकी पत्नी नियत है, वही उन्हें प्रत्येक जन्ममें प्राप्त होती है; अतः इस जन्ममें घोरतर तपके पश्चात् भी पतिको न पाकर मैं यहाँ इस शरीरको अग्निकुण्डमें होम दूँगी। मेरा यह कार्य पतिकी कामनाको लेकर होगा; इसलिये परलोकमें मैं उन्हें अवश्य प्राप्त करूँगी।
यों कहकर पार्वती वहाँ ब्राह्मणके बार-बार मना करनेपर भी उसके सामने ही अग्निकुण्डमें समा गयी। परमेश्वरी राधे! पार्वतीके अग्नि-प्रवेश करते ही उसकी तपस्याके प्रभावसे वह अग्नि तत्काल चन्दनके समान शीतल हो गयी। वृन्दावनविनोदिनि! एक क्षणतक अग्निकुण्डमें रहकर जब शिवा ऊपर आने लगी, तब शिवने पुनः सहसा उससे पूछा।
श्रीमहादेवजी बोले—भद्रे! तुम्हारी तपस्या क्या है? (सफल है या असफल?) यह कुछ भी मेरी समझमें नहीं आया। जिस तपके प्रभावसे अग्निने तुम्हारा शरीर नहीं जलाया, उसीसे तुम्हारी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण नहीं हुई; यह आश्चर्यकी बात है। तुम कल्याणस्वरूप शिवको पति बनाना चाहती हो; परंतु वे तो निराकार हैं! निराकारको पति बनाकर तुम्हारा कौन-सा मनोरथ सिद्ध होगा? शुचिस्मिते! यदि संहारकर्ता हरको स्वामी बनानेकी इच्छा है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि कौन ऐसी स्त्री है जो सर्वसंहारकारीको अपना कान्त (प्राणवल्लभ) बनानेकी इच्छा करेगी?
देवि! यदि उन्हें अपना स्वामी बनाकर तुम मोक्ष लेना चाहती हो तो इसके लिये तुम्हारी तपस्या व्यर्थ है; क्योंकि सबको मुक्ति प्रदान करनेवाली तो तुम स्वयं ही हो! ‘शिव’ का अर्थ है—मङ्गल (कल्याण), मोक्ष और संहारकर्ता। इसके अतिरिक्त अन्य अर्थमें इस शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। शिव शब्दका दूसरा कोई अर्थ वेदमें नहीं निरूपित हुआ है। सुन्दरि! यदि तुम संहारकर्ता शिवको चाहती हो, तब तो सर्वलोकभयंकर रुद्रको अपने प्रति अनुरक्त पाओगी। न तो तुम्हारा मोक्ष होगा और न अपने अभीष्ट देवताकी सेवा ही उपलब्ध होगी। भगवान् श्रीहरिका स्मरण अमोघ है, वह सदा सब प्रकारसे सम्पूर्ण मङ्गलोंका दाता है। अब तुम शीघ्र ही अपने पिताके घर जाओ। वहाँ मेरे आशीर्वादसे और अपने तपके फलसे तुम्हें परम दुर्लभ शिवके दर्शन प्राप्त होंगे।
ऐसा कहकर ब्राह्मण वहीं अन्तर्धान हो गया। दुर्गा ‘महादेव! महादेव!’ का उच्चारण करती हुई पिताके घरकी ओर चल दी। पार्वतीका आगमन सुनकर मेना और हिमालय दिव्य यानको आगे करके हर्षविह्वल हो अगवानीके लिये चले। सारा नगर सजाया गया। मार्गोंपर चन्दन, कस्तूरी आदिका छिड़काव हुआ। बाजे बजने लगे। शङ्खध्वनि गूँज उठी। सड़कोंपर सिन्दूर तथा चन्दनके जलसे कीच मच गयी। नगरमें प्रवेश करके दुर्गाने माता-पिताके दर्शन किये। वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो दौड़ते हुए सामने आये। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे और अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो रहा था। देवी शिवाके मुखपर भी प्रसन्नता थी। उसने सखियोंसहित निकट जा माता-पिताको प्रणाम किया। तब उन दोनोंने आशीर्वाद देकर पुत्रीको हृदयसे लगा लिया और ‘ओ मेरी बच्ची!’ कहकर प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। उस समय दुर्गाको रथपर बिठाकर वे दोनों अपने घर गये। स्त्रियोंने निर्मञ्छन किया और
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५९३
ब्राह्मणोंने आशीर्वाद दिया। पर्वतराजने ब्राह्मणों और बन्दीजनोंको धन दिया। उनसे वेद-पाठ और मङ्गल-पाठ करवाये। इस प्रकार वे दोनों अपनी पुत्रीके साथ सुखसे घरमें रहने लगे। शिवाके आ जानेसे उनके मनमें बड़ा हर्ष था।
एक दिन हिमवान् तप करनेके लिये गङ्गाजीके तटपर गये। मेना अपनी पुत्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक घरके आँगनमें बैठी थीं। इसी समय एक नाचने-गानेवाला भिक्षुक सहसा मेनाके पास आया। उसके बायें हाथमें सींगका बाजा और दायें हाथमें डमरू था। बहुत ही वृद्ध और जरासे अत्यन्त जर्जर हो चुका था। उसने सारे शरीरमें विभूति लगा रखी थी। पीठपर गुदड़ी लिये और लाल वस्त्र पहने वह भिक्षुक बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उसका कण्ठ बड़ा ही मधुर था। वह मनोहर नृत्य करते हुए मेरे गुणोंका गान करने लगा। कभी शृङ्ग बजाता और कभी डमरू। उसके बाजेकी आवाज सुनकर बहुत-से नागरिक हर्षविह्वल हो वहाँ आ गये। दर्शकोंमें बालक, बालिका, वृद्ध, युवक, युवतियाँ तथा वृद्धाएँ भी थीं। मधुर तान और स्वरसे युक्त उस सुन्दर गीतको सुनकर सहसा सब लोग मोहित एवं मूर्च्छित हो गये। दुर्गाको भी मूर्च्छा आ गयी। उसने अपने हृदयमें भगवान् शंकरको देखा। वे त्रिशूल, पट्टिश और व्याघ्रचर्म धारण किये सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूतिसे विभूषित थे। बड़ा ही रम्य रूप था। गलेमें अत्यन्त निर्मल अस्थियोंकी माला शोभा देती थी। प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। उनकी आकृतिसे आन्तरिक उल्लास सूचित होता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते थे। हाथमें माला, कंधेपर नागोंका यज्ञोपवीत और मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट—बड़ी सुन्दर झाँकी थी। वे पार्वतीसे कह रहे थे कि वर माँगो। हृदयस्थित हरको देखकर पार्वतीने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया और वर माँगा, ‘आप हमारे पति हो जाइये।’ ‘एवमस्तु’ कहकर शिव अन्तर्धान हो गये। हृदयमें शिवको न देखकर दुर्गाकी मूर्च्छा भङ्ग हुई। उसने आँख खोलकर देखा, सामने वही भिक्षुक गा रहा है।
भिक्षुके नृत्य और संगीतसे संतुष्ट हो मेना सोनेके पात्रमें बहुत-से रत्न ले उसे देनेके लिये गयीं; परंतु भिक्षुने भिक्षामें दुर्गाको ही माँगा; दूसरी कोई वस्तु नहीं ली। वह कौतुकवश पुनः नृत्य करनेको उद्यत हुआ; परंतु मेना उसकी बात सुनकर कुपित हो उठी थीं। उन्हें आश्चर्य भी हुआ था। उन्होंने भिक्षुकको बहुत डाँटा तथा उसे घरसे बाहर निकाल देनेकी आज्ञा दी। इसी बीचमें अपना तप पूरा करके हिमवान् घरपर आये। वहाँ उन्हें आँगनमें खड़ा हुआ एक भिक्षु दिखायी दिया, जो बड़ा मनोहर था। उसके विषयमें मेनाके मुखसे सब बातें सुनकर हिमवान् हँसे और रुष्ट भी हुए। उन्होंने अपने सेवकको आज्ञा दी—‘इस भिक्षुकको बाहर निकाल दो।’ परंतु वह कोई साधारण भिक्षुक नहीं था। आकाशकी भाँति उसका स्पर्श करना भी कठिन था। वह अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। उसे कोई बाहर न कर सका। उसके निकट जानेकी भी किसीमें क्षमता नहीं थी। हिमवान्ने एक ही क्षणमें देखा—उस भिक्षुकके सुन्दर चार भुजाएँ हैं; मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल तथा शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है; श्याम-सुन्दर रुचिर वेष मनको मोहे लेता है; मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं तथा वे श्रीहरि (रूपधारी शिव) भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते हैं।
हिमवान् श्रीहरिके उपासक थे। उन्होंने पूजाकालमें भगवान् गदाधरको जो-जो फूल चढ़ाये थे, वे सब भिक्षुकके अङ्गमें और
५९४
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मस्तकपर देखे। उनके द्वारा जो धूप-दीप दिये गये थे अथवा जो मनोरम नैवेद्य निवेदित हुआ था, वह भी भिक्षुकके सामने प्रस्तुत दिखायी दिया। दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक द्विभुज-रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। अब उसके हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली थी। गोपवेष, किशोर-अवस्था, श्यामसुन्दर वर्ण, मुस्कराता हुआ मुख, मस्तकपर मोरपंखका मुकुट, श्रीअङ्गोंमें रत्नमय आभूषण, चन्दनके अङ्गराग तथा गलेमें वनमाला—मानो साक्षात् श्रीकृष्ण दर्शन दे रहे हों। फिर क्षणभरमें वह उज्ज्वल-कान्ति चन्द्रशेखर शिवके रूपमें दिखायी दिया। उसके हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे। वस्त्रकी जगह सुन्दर बाघम्बर था। सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूति लगी थी। धवल वर्ण था। गलेमें अस्थियोंकी माला थी, जो आभूषणका काम देती थी। कंधेपर सर्पमय यज्ञोपवीत तथा सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली जटा थी। हाथोंमें शृङ्ग और डमरू थे। सुप्रशस्त एवं मनोहर रूप चित्तको आकृष्ट कर लेता था। भगवान् शिव श्वेत कमलोंके बीजकी मालासे हरिनामका जप करते थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्दहासकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर दिखायी देते थे। अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। फिर दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक 'जगत्स्रष्टा' चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। ब्रह्माजी स्फटिककी माला लेकर हरिनामका जप कर रहे थे।
हिमवान्ने देखा, क्षणभरमें वह त्रिगुणात्मक सूर्यस्वरूप हो गया। अत्यन्त दुःसह प्रकाशसे युक्त सूर्यदेव ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। फिर एक क्षणतक वह अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित अग्निके रूपमें विद्यमान रहा। तत्पश्चात् क्षणभर आह्लादजनक चन्द्रमाके रूपमें शोभा पाता रहा। तदनन्तर एक ही क्षणमें तेजःस्वरूप, निराकार, निरञ्जन, निर्लिप्त, निरीह परमात्मस्वरूपमें स्थित हो गया। इस प्रकार स्वेच्छामय नाना रूप धारण करनेवाले परमेश्वरका दर्शनकर शैलराजके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो गया। उन्होंने साष्टाङ्ग दण्डवत्-प्रणाम किया और भक्तिभावसे परिक्रमा करके बारंबार मस्तक झुकाया। फिर हर्षसे उछलकर हिमवान्ने जब पुनः देखा तो वही भिक्षुक सामने था। वास्तवमें वह भिक्षुक ही है—ऐसा उन्हें दिखायी दिया। भगवान् विष्णुकी मायासे शैलराज उसके नाना रूप-धारण-सम्बन्धी सब बातोंको भूल गये। भिक्षुक उनसे भीख माँगने लगा। उसके पास भिक्षाका पात्र था। उसने रक्त वस्त्र धारण किया था। हाथोंमें शृङ्ग और विचित्र डमरूके बाजे थे। वह भिक्षामें केवल दुर्गाको ग्रहण करनेके लिये उत्सुक था, दूसरी किसी वस्तुको नहीं, परंतु विष्णु-मायासे मोहित हुए शैलराजने उसकी याचना स्वीकार नहीं की। भिक्षुने भी और कुछ नहीं लिया। वह वहीं अन्तर्धान हो गया। प्रिये! उस समय मेना और गिरिराजको ज्ञान हुआ। वे बोले—'अहो! हमने विश्वनाथको दिनमें स्वप्नकी भाँति देखा है। भगवान् शिव हम दोनोंको वञ्चित करके अपने स्थानको चले गये।'
उन दोनों पति-पत्नीकी भगवान् शिवमें भक्ति बढ़ रही है—यह देख सब देवताओंको चिन्ता हो गयी। इन्द्र आदि देवता भारसे सुमेरुकी रक्षाके लिये युक्ति करने लगे। वे आपसमें कहने लगे—'यदि हिमवान् अनन्य भक्तिसे भारतमें भगवान् शिवको कन्यादान करेंगे तो निश्चय ही निर्वाण-मोक्षको प्राप्त होंगे। अनन्त रत्नोंका आधार हिमालय यदि पृथ्वीको छोड़कर चला जायगा तो इसका 'रत्नगर्भा' नाम अवश्य ही मिथ्या हो जायगा। शूलपाणि शिवको अपनी कन्या दे स्थावरत्वका परित्याग और दिव्य रूप धारण