ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३३- भगवती मङ्गलचण्डी और मनसादेवीका उपाख्यान
प्रकृतिखण्ड
२४९
है। जो मानव 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस पवित्र नामका त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्रका लाभ होता है। देवि! तुम पितरोंके लिये प्राणतुल्या और ब्राह्मणोंके लिये जीवनस्वरूपिणी हो। तुम्हें श्राद्धकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। तुम्हारी ही कृपासे श्राद्ध और तर्पण आदिके फल मिलते हैं। तुम पितरोंकी तुष्टि, द्विजातियोंकी प्रीति तथा गृहस्थोंकी अभिवृद्धिके लिये मुझ ब्रह्माके मनसे निकलकर बाहर जाओ। सुव्रते! तुम नित्य हो, तुम्हारा विग्रह नित्य और गुणमय है। तुम सृष्टिके समय प्रकट होती हो और प्रलयकालमें तुम्हारा तिरोभाव हो जाता है। तुम ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा हो। चारों वेदोंद्वारा तुम्हारे इन छः स्वरूपोंका निरूपण किया गया है, कर्मकाण्डी लोगोंमें इन छहोंकी बड़ी मान्यता है*।
इस प्रकार देवी स्वधाकी महिमा गाकर ब्रह्माजी अपनी सभामें विराजमान हो गये। इतनेमें सहसा भगवती स्वधा उनके सामने प्रकट हो गयीं। तब पितामहने उन कमलनयनी देवीको पितरोंके प्रति समर्पण कर दिया। उन देवीकी प्राप्तिसे पितर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे आनन्दसे विह्वल हो गये। यही भगवती स्वधाका पुनीत स्तोत्र है। जो पुरुष समाहित-चित्तसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया। उसको वेदपाठका फल मिलता है।
(अध्याय ४०-४१)
भगवती दक्षिणाके प्राकट्यका प्रसङ्ग, उनका ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्र-वर्णन एवं चरित्र-श्रवणकी फल-श्रुति
**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! भगवती स्वाहा और स्वधाका परम मधुर उत्तम उपाख्यान सुना चुका। अब मैं भगवती दक्षिणाके आख्यानका वर्णन करूँगा। तुम सावधान होकर सुनो। प्राचीन कालकी बात है, गोलोकमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेयसी एक गोपी थी। उसका नाम सुशीला था। उसे श्रीराधाकी प्रधान सखी होनेका सौभाग्य प्राप्त था। वह धन्य, मान्य एवं मनोहर अङ्गवाली गोपी परम सुन्दरी थी। सौभाग्यमें वह लक्ष्मीके समान थी। उसमें पातिव्रत्यके सभी शुभ लक्षण संनिहित थे। वह साध्वी गोपी विद्या, गुण और उत्तम रूपसे सदा सुशोभित थी। कलावती, कोमलाङ्गी, कान्ता, कमललोचना, सुश्रोणी, सुस्तनी, श्यामा और न्यग्रोधपरिमण्डला—ये सभी विशेषण उसमें उपयुक्त थे। उसका प्रसन्न मुख सदा मुस्कानसे भरा रहता था। रत्नमय अलंकार उसकी शोभा बढ़ाते थे। उसके शरीरकी कान्ति श्वेत चम्पाके समान गौर थी। बिम्बाफलके समान लाल-लाल ओष्ठ तथा मृगके सदृश मनोहर नेत्र थे। हंसके समान मन्दगतिसे चलनेवाली उस कामिनी
* स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। प्रियां विनीतां स लभेत् साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥
पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी। श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा॥
...........................................................................
नित्या त्वं नित्यरूपासि गुणरूपास सुव्रते। आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव॥
ॐ स्वस्तिश्च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा। निरूपिताश्चतुर्वेदैः षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्॥
(प्रकृतिखण्ड ४१। ३०-३१, ३३-३४)
२५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सुशीलाको काम-शास्त्रका सम्यक् ज्ञान था। वह सम्पूर्ण भावसे भगवान् श्रीकृष्णमें अनुरक्त थी। उनके भावको जानती और उनका प्रिय किया करती थी।
एक समय परमेश्वरी श्रीराधाने सुशीलाको कह दिया—‘आजसे तुम गोलोकमें नहीं आ सकोगी।’
तदनन्तर श्रीकृष्ण वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब देवदेवेश्वरी भगवती श्रीराधा रासमण्डलके मध्य रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको जोर-जोरसे पुकारने लगीं; परंतु भगवान्ने उन्हें दर्शन नहीं दिये। तब तो श्रीराधा अत्यन्त विरहकातर हो उठीं। उन साध्वी देवीको विरहका एक-एक क्षण करोड़ों युगोंके समान प्रतीत होने लगा। उन्होंने करुण प्रार्थना की—‘श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! आप मेरे प्राणनाथ हैं। मैं आपके प्रति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रेम करती हूँ। आप शीघ्र यहाँ पधारनेकी कृपा कीजिये। भगवन्! आप मेरे प्राणोंके अधिष्ठाता देव हैं। आपके बिना अब ये प्राण नहीं रह सकते। स्त्री पतिके सौभाग्यपर गर्व करती है। पतिके साथ प्रतिदिन उसका सुख बढ़ता रहता है। अतएव साध्वी स्त्रीको धर्मपूर्वक पतिकी सेवामें ही सदा तत्पर रहना चाहिये। पति ही कुलीन स्त्रियोंके लिये बन्धु, अधिदेवता, नित्य-आश्रय, परम सम्पत्तिस्वरूप तथा मूर्तिमान् सुख है। पति ही धर्म, सुख, निरन्तर प्रीति, सदा शान्ति, सम्मान एवं मान देनेवाला है। वही उसके लिये माननीय है, वही उसके मान (प्रणयकोप)-को शान्त करनेवाला है। स्वामी ही स्त्रीके लिये सारसे भी सारतम वस्तु है। वही बन्धुओंमें बन्धुभावको बढ़ानेवाला है। सम्पूर्ण बान्धवजनोंमें पतिके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं दिखायी देता। वह स्त्रीका भरण करनेसे ‘भर्ता’, पालन करनेसे ‘पति’, शरीरका मालिक होनेसे ‘स्वामी’ तथा कामनाकी पूर्ति करनेसे ‘कान्त’ कहलाता है।
सुखकी वृद्धि करनेसे ‘बन्धु’, प्रीति प्रदान करनेसे ‘प्रिय’, ऐश्वर्यका दाता होनेसे ‘ईश’, प्राणका स्वामी होनेसे ‘प्राणनाथ’ तथा रति-सुख प्रदान करनेसे ‘रमण’ कहलाता है। अतः स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। पतिके शुक्रसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है, इससे वह प्रिय माना जाता है। कुलाङ्गनाओंकी दृष्टिमें पति सदा सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर प्रिय है। जो असत् कुलमें उत्पन्न है, वह स्त्री पतिके इस महत्त्वको समझनेमें असमर्थ है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, अखिल यज्ञोंमें दक्षिणादान, पृथ्वीकी प्रदक्षिणा, अनेक प्रकारके तप, सभी व्रत, अमूल्य वस्तुदान, पवित्र उपासनाएँ तथा गुरु, देवता एवं ब्राह्मणोंकी सेवा—इन श्रेष्ठ कार्योंकी बड़ी प्रशंसा सुनी है; किंतु ये सब-के-सब स्वामीके चरण-सेवनकी सोलहवीं कलाकी भी तुलना नहीं कर सकते। गुरु, ब्राह्मण और देवता—इन सबकी अपेक्षा स्त्रीके लिये पति ही श्रेष्ठ गुरु है। जिस प्रकार पुरुषोंके लिये विद्या प्रदान करनेवाले गुरु आदरणीय माने जाते हैं, वैसे ही कुलीन स्त्रियोंके लिये पति ही गुरुतुल्य माननीय है।
‘हाय! मैं जिनके कृपा-प्रसादसे असंख्य गोपों, गोपियों, ब्रह्माण्डों तथा वहाँके निवासी प्राणियोंकी एवं रमा आदि देवियोंसे लेकर अखिल ब्रह्माण्ड गोलोकतककी अधीश्वरी हुई हूँ, उन्हीं प्राणवल्लभके तत्त्वको नहीं जान सकी; वास्तवमें स्त्रीस्वभावको लाँघ पाना बड़ा कठिन है।’
इस प्रकार कहकर श्रीराधा भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करने लगीं। फिर तो उन्होंने प्राणनाथको अपने समीप ही पाया और उनके साथ सानन्द विहार किया।
मुने! गोलोकसे भ्रष्ट हुई वह सुशीला नामवाली गोपी ही आगे चलकर दक्षिणा नामसे प्रसिद्ध हुई। उसने दीर्घकालतक तपस्या करके भगवती लक्ष्मीके शरीरमें प्रवेश किया। तदनन्तर अत्यन्त कठिन यज्ञ
प्रकृतिखण्ड
२५१
करनेपर भी देवता आदिको जब उसका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ, तब वे सभी उदास होकर ब्रह्माजीके पास गये। ब्रह्माजीने उनकी प्रार्थना सुनकर जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिका ध्यान किया। बहुत समयतक भक्तिपूर्वक ध्यान करनेके पश्चात् उन्हें भगवान्का आदेश प्राप्त हुआ। स्वयं भगवान् नारायणने महालक्ष्मीके दिव्य विग्रहसे मर्त्यलक्ष्मीको प्रकट किया और 'दक्षिणा' नाम रखकर उसे ब्रह्माजीको सौंप दिया। ब्रह्माजीने यज्ञसम्बन्धी समस्त कार्योंकी सम्पन्नताके लिये देवी दक्षिणाको यज्ञपुरुषके हाथमें दे दिया। उस समय यज्ञपुरुषका मन आनन्दसे भर गया। उन्होंने भगवती दक्षिणाकी विधिवत् पूजा और स्तुति की। उन देवीका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान था। प्रभा ऐसी थी, मानो करोड़ों चन्द्रमा हों। वे अत्यन्त कमनीया, सुन्दरी तथा परम मनोहारिणी थीं। कमलके समान मुखवाली वे कोमलाङ्गी देवी कमल-जैसे विशाल नेत्रोंसे शोभा पा रही थीं। भगवती लक्ष्मीसे प्रकट उन आदरणीया देवीके लिये कमल ही आसन भी था। अग्निशुद्ध वस्त्र उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। उन साध्वीका ओठ सुपक्व बिम्बाफलके सदृश था। उनकी दन्तावली बड़ी सुन्दर थी। उन्होंने अपने केशकलापमें मालतीके पुष्पोंकी माला धारण कर रखी थी। उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कान छायी थी। वे रत्ननिर्मित भूषणोंसे विभूषित थीं। उनका सुन्दर वेष था। उन्हें देखकर मुनियोंका मन भी मुग्ध हो जाता था। कस्तूरीमिश्रित चन्दनसे बिन्दीके रूपमें अर्द्धचन्द्राकार तिलक उनके ललाटपर शोभा पा रहा था। केशोंके नीचेका भाग (सीमन्त) सिन्दूरकी बेंदीसे अत्यन्त उद्दीप्त जान पड़ता था। सुन्दर नितम्ब, बृहत् श्रोणी और विशाल वक्षःस्थलसे वे शोभा पा रही थीं। फिर ब्रह्माजीके कथनानुसार यज्ञपुरुषने उन देवीको अपनी सहधर्मिणी बना लिया। कुछ समय बाद देवी दक्षिणा गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंके बाद उन्होंने सर्वकर्मफल नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न किया। वही कर्मफलोंका दाता है। कर्मपरायण सत्पुरुषोंको दक्षिणा फल देती है तथा कर्म पूर्ण होनेपर उनका पुत्र ही फलदायक होता है। अतएव वेदज्ञ पुरुष इस प्रकार कहते हैं कि भगवान् यज्ञ देवी दक्षिणा तथा अपने पुत्र 'फल' के साथ होनेपर ही कर्मोंका फल प्रदान करते हैं।
नारद! इस प्रकार यज्ञपुरुष दक्षिणा तथा फलदाता पुत्रको प्राप्त करके सबको कर्मोंका फल प्रदान करने लगे। तब देवताओंके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सभी सफलमनोरथ होकर अपने-अपने स्थानपर चले गये। मैंने धर्मदेवके मुखसे ऐसा सुना है। अतएव मुने! कर्ताको चाहिये कि कर्म करनेके पश्चात् तुरंत दक्षिणा दे दें। तभी सद्यः फल प्राप्त होता है—यह वेदोंकी स्पष्ट वाणी है। यदि दैववश अथवा अज्ञानसे यज्ञकर्ता कर्मसम्पन्न हो जानेपर तुरंत ही ब्राह्मणोंको दक्षिणा नहीं दे देता तो उस दक्षिणाकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती चली जाती है और साथ ही यजमानका सम्पूर्ण कर्म भी निष्फल हो जाता है। ब्राह्मणका स्वत्व अपहरण करनेसे वह अपवित्र मानव किसी कर्मका अधिकारी नहीं रह जाता। उसी पापके फलस्वरूप उस पातकी मानवको दरिद्र और रोगी होना पड़ता है। लक्ष्मी अत्यन्त भयंकर शाप देकर उसके घरसे चली जाती हैं। उसके दिये हुए श्राद्ध और तर्पणको पितर ग्रहण नहीं करते हैं। ऐसे ही, देवता उसकी की हुई पूजा तथा अग्निमें दी हुई आहुति भी स्वीकार नहीं करते। यज्ञ करते समय कतनि दक्षिणा संकल्प कर दी; किंतु दी नहीं और प्रतिग्रह लेनेवालेने उसे माँगा भी नहीं तो ये दोनों व्यक्ति नरकमें इस प्रकार गिरते हैं, जैसे रस्सी टूट जानेपर घड़ा। विप्र! इस प्रकारकी यह रहस्यभरी बातें बतला दीं। तुम्हें पुनः क्या सुननेकी इच्छा है?
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नारदजीने पूछा-मुने ! दक्षिणाहीन कर्मके
फलको कौन भोगता है ? साथ ही यज्ञपुरुषने
भगवती दक्षिणाकी किस प्रकार पूजा की थी;
यह भी बतलाइये।
भगवान् नारायण कहते हैं- मुने ! दक्षिणाहीन
कर्ममें फल ही कैसे लग सकता है; क्योंकि फल
प्रसव करनेकी योग्यता तो दक्षिणावाले कर्ममें ही
है। मुने ! बिना दक्षिणाका कर्म तो बलिके पेटमें
चला जाता है। पूर्वसमयमें भगवान् वामन बलिके
लिये आहाररूपमें इसे अर्पण कर चुके हैं। नारद !
अश्रोत्रिय और श्रद्धाहीन व्यक्तिके द्वारा श्राद्धमें दी
हुई वस्तुको बलि भोजनरूपसे प्राप्त करते हैं।
शूद्रोंसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणोंके पूजासम्बन्धी
द्रव्य, निषिद्ध एवं आचरणहीन ब्राह्मणोंद्वारा किया
हुआ पूजन तथा गुरुमें भक्ति न रखनेवाले
पुरुषका कर्म-ये सब बलिके आहार हो जाते हैं,
इसमें कोई संशय नहीं है।
मुने ! भगवती दक्षिणाके ध्यान, स्तोत्र और
पूजाकी विधिके क्रम कण्वशाखामें वर्णित हैं।
वह सब मैं कहता हूँ, सुनो।
यज्ञपुरुषने कहा-महाभागे ! तुम पूर्वसमयमें
गोलोककी एक गोपी थी। गोपियोंमें तुम्हारा
प्रमुख स्थान था। राधाके समान ही तुम उनकी
सखी थीं। भगवान् श्रीकृष्ण तुमसे प्रेम करते थे।
कार्तिकी पूर्णिमाके अवसरपर राधा-महोत्सव मनाया
जा रहा था। कुछ कार्यानन्तर उपस्थित हो जानेके
कारण तुम भगवान् श्रीकृष्णके दक्षिण कंधेसे
प्रकट हुई थीं। अतएव तुम्हारा नाम 'दक्षिणा'
पड़ गया। शोभने ! तुम इससे पहले परम
शीलवती होनेके कारण 'सुशीला' कहलाती थीं।
तुम ऐसी सुयोग्या देवी श्रीराधाके शापसे गोलोकसे
च्युत होकर दक्षिणा नामसे सम्पन्न हो मुझे
सौभाग्यवश प्राप्त हुई हो। सुभगे ! तुम मुझे अपना
स्वामी बनानेकी कृपा करो ! तुम्हीं यज्ञशाली
पुरुषोंके कर्मका फल प्रदान करनेवाली आदरणीया
देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियोंके सभी
कर्म निष्फल हो जाते हैं। तुम्हारी अनुपस्थितिमें
कर्मियोंका कर्म भी शोभा नहीं पाता। ब्रह्मा,
विष्णु, महेश तथा दिक्पाल प्रभृति सभी देवता
तुम्हारे न रहनेसे कर्मोंका फल देनेमें असमर्थ
रहते हैं। ब्रह्मा स्वयं कर्मरूप हैं। शंकरको
फलरूप बतलाया गया है। मैं विष्णु स्वयं
यज्ञरूपसे प्रकट हूँ। इन सबमें साररूपा तुम्हीं हो।
साक्षात् परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण, जो प्राकृत
गुणोंसे रहित तथा प्रकृतिसे परे हैं, समस्त
फलोंके दाता हैं, परंतु वे श्रीकृष्ण भी तुम्हारे
बिना कुछ करनेमें समर्थ नहीं हैं। कान्ते ! सदा
जन्म-जन्ममें तुम्हीं मेरी शक्ति हो। वरानने !
तुम्हारे साथ रहकर ही मैं समस्त कर्मोंमें समर्थ
हूँ। ऐसा कहकर यज्ञके अधिष्ठाता देवता दक्षिणाके
सामने खड़े हो गये। तब कमलाकी कलास्वरूपा
उस देवीने संतुष्ट होकर यज्ञपुरुषका वरण किया।
यह भगवती दक्षिणाका स्तोत्र है। जो पुरुष यज्ञके
अवसरपर इसका पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण
यज्ञोंके फल सुलभ हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।
सभी प्रकारके यज्ञोंके आरम्भमें जो पुरुष इस
स्तोत्रका पाठ करता है, उसके वे सभी यज्ञ निर्विघ्न
सम्पन्न हो जाते हैं, यह ध्रुव सत्य है।
प्रकृतिखण्ड
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यह स्तोत्र तो कह दिया, अब ध्यान और पूजा-विधि सुनो। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि शालग्रामकी मूर्तिमें अथवा कलशपर आवाहन करके भगवती दक्षिणाकी पूजा करे। ध्यान यों करना चाहिये—'भगवती लक्ष्मीके दाहिने कंधेसे प्रकट होनेके कारण दक्षिणा नामसे विख्यात ये देवी साक्षात् कमलाकी कला हैं। सम्पूर्ण यज्ञ-यागादि कर्मोंमें अखिल कर्मोंका फल प्रदान करना इनका सहज गुण है। ये भगवान् विष्णुकी शक्तिस्वरूपा हैं। मैं इनकी आराधना करता हूँ। ऐसी शुभा, शुद्धिदा, शुद्धिरूपा एवं सुशीला नामसे प्रसिद्ध भगवती दक्षिणाकी मैं उपासना करता हूँ।' नारद! इसी मन्त्रसे ध्यान करके विद्वान् पुरुष मूलमन्त्रसे इन वरदायिनी देवीकी पूजा करे। पाद्य, अर्घ्य आदि सभी इसी वेदोक्त मन्त्रके द्वारा अर्पण करने चाहिये। मन्त्र यह है—'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं दक्षिणायै स्वाहा।' सुधीजनोंको चाहिये कि सर्वपूजिता इन भगवती दक्षिणाकी अर्चना भक्तिपूर्वक उत्तम विधिके साथ करें।
ब्रह्मन्! इस प्रकार भगवती दक्षिणाका उपाख्यान कह दिया। यह उपाख्यान सुख, प्रीति एवं सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्रदान करनेवाला है। जो पुरुष देवी दक्षिणाके इस चरित्रका सावधान होकर श्रवण करता है, भारतकी भूमिपर किये गये उसके कोई कर्म अङ्गहीन नहीं होते। इसके श्रवणसे पुत्रहीन पुरुष अवश्य ही गुणवान् पुत्र प्राप्त कर लेता है और जो भार्याहीन हो, उसे परम सुशीला सुन्दरी पत्नी सुलभ हो जाती है। वह पत्नी विनीत, प्रियवादिनी एवं पुत्रवती होती है। पतिव्रता, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली, शुद्ध आचार-विचार रखनेवाली तथा श्रेष्ठ कुलकी कन्या होती है। विद्याहीन विद्या, धनहीन धन, भूमिहीन भूमि तथा प्रजाहीन मनुष्य श्रवणके प्रभावसे प्रजा प्राप्त कर लेता है। संकट, बन्धुविच्छेद, विपत्ति तथा बन्धनके कष्टमें पड़ा हुआ पुरुष एक महीनेतक इसका श्रवण करके इन सबसे छूट जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
(अध्याय ४२)
देवी षष्ठीके ध्यान, पूजन, स्तोत्र तथा विशद महिमाका वर्णन
नारदजीने कहा—प्रभो! भगवती 'षष्ठी', मङ्गलचण्डिका तथा देवी मनसा—ये देवियाँ मूलप्रकृतिकी कला मानी गयी हैं। मैं अब इनके प्राकट्यका प्रसङ्ग यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! मूलप्रकृतिके छठे अंशसे प्रकट होनेके कारण ये 'षष्ठी' देवी कहलाती हैं। बालकोंकी ये अधिष्ठात्री देवी हैं। इन्हें 'विष्णुमाया' और 'बालदा' भी कहा जाता है। मातृकाओंमें 'देवसेना' नामसे ये प्रसिद्ध हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली इन साध्वी देवीको स्वामी कार्तिकेयकी पत्नी होनेका सौभाग्य प्राप्त है। वे प्राणोंसे भी बढ़कर इनसे प्रेम करते हैं। बालकोंको दीर्घायु बनाना तथा उनका भरण-पोषण एवं रक्षण करना इनका स्वाभाविक गुण है। ये सिद्धियोगिनी देवी अपने योगके प्रभावसे बच्चोंके पास सदा विराजमान रहती हैं। ब्रह्मन्! इनकी पूजा-विधिके साथ ही यह एक उत्तम इतिहास सुनो। पुत्र प्रदान करनेवाला यह परम सुखदायी उपाख्यान धर्मदेवके मुखसे मैंने सुना है।
प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो चुके हैं। उनके पिताका नाम था—स्वायम्भुव मनु। प्रियव्रत योगिराज होनेके कारण विवाह करना नहीं चाहते थे। तपस्यामें उनकी विशेष रुचि