ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३२- देवी सती और पार्वतीके गर्व-मोचनकी कथा, सतीका देहत्याग, पार्वतीका जन्म, गर्ववश उनके द्वारा आकाशवाणीकी अवहेलना, शंकरजीका आगमन, शैलराजद्वारा उनकी स्तुति तथा उस स्तुतिकी महिमा
| ५७६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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तत्पश्चात् वे भी आज्ञा पाकर सबसे आगे बैठे। उनसे श्रीहरिने समस्त ब्रह्माण्डोंके ब्रह्माओंका और उनके राज्यमें रहनेवाले देवताओंका क्रमशः कुशल-समाचार पूछा। उन सब ब्रह्माओंको देखकर अपनेको विष्णु-तुल्य माननेवाले चतुर्मुख ब्रह्माका घमंड चूर-चूर हो गया। इसके बाद श्रीहरिने विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले अन्यान्य ब्रह्माओंके भी दर्शन कराये। उन्हें देखकर चतुर्मुख ब्रह्मा मृतक-तुल्य हो गये। उस समय भगवान्ने कहा—‘मुझ नारायणके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही ब्रह्माण्ड और उनके उतने ही ब्रह्मा विद्यमान हैं।’ यह सुनकर वे सभी आगन्तुक ब्रह्मा नारायणको प्रणाम करके शीघ्र ही अपने-अपने स्थानको चले गये। चतुर्मुख ब्रह्माने अपनेको अत्यन्त छोटा तथा अल्प राज्यका अधिपति माना। लज्जासे उनका सिर झुक गया और वे भगवान् विष्णुके चरणोंमें पड़ गये। तब भगवान्ने उनसे पूछा—‘ब्रह्मन्! बोलो, इस समय तुमने स्वप्नकी भाँति यह क्या देखा है।’ उनका प्रश्न सुनकर ब्रह्मा बोले—‘प्रभो! भूत, वर्तमान और भविष्य—सारा जगत् आपकी मायासे ही उत्पन्न हुआ है।’ यों कह चतुर्भुज ब्रह्मा वैकुण्ठकी सभामें लज्जाका अनुभव करते हुए चुप हो गये। तब सर्वान्तर्यामी भगवान् श्रीहरिने उनके शाप-निवारणका उपाय किया।
(अध्याय ३१—३३)
गङ्गाकी उत्पत्ति तथा महिमा
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**प्रिये! इसी बीचमें भगवान् शंकर वहाँ उपस्थित हुए। उनके मुखपर मुस्कराहट थी। वे सारे अङ्गोंमें विभूति लगाये वृषभराज नन्दिकेश्वरकी पीठपर बैठे थे। व्याघ्रचर्मका वस्त्र, सर्पमय यज्ञोपवीत, सिरपर सुनहरे रंगकी जटाका भार, ललाटमें अर्धचन्द्र, हाथोंमें त्रिशूल, पट्टिश तथा उत्तम खट्वाङ्ग धारण किये, श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित स्वर-यन्त्र लिये भगवान् शिव शीघ्र ही वाहनसे उतरे और भक्तिभावसे मस्तक झुका कमलाकान्तको प्रणाम करके उनके वामभागमें बैठे। फिर इन्द्र आदि समस्त देवता, मुनि, आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, सिद्ध और चारण वहाँ पधारे। उन सबने पुरुषोत्तमकी स्तुति की। उस समय उनके सारे अङ्ग पुलकित हो रहे थे। फिर समस्त देवताओंने सिर झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया। तदनन्तर स्वर-यन्त्र लिये भगवान् शंकरने सुमधुर तालस्वरके साथ संगीत आरम्भ किया। प्रिये! उसमें हम दोनोंके गुणों तथा राससम्बन्धी सुन्दर पदोंका गान होने लगा।
मनको मोह लेनेवाले सामयिक राग,* कण्ठकी
* संगीतमें षड्ज आदि स्वरों, उनके वर्णों और अङ्गोंसे युक्त वह ध्वनि जो किसी विशिष्ट तालमें बैठायी हुई हो और जो मनोरञ्जनके लिये गायी जाती हो। संगीत-शास्त्रके भारतीय आचार्योंने छः राग माने हैं; परंतु इन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७७
एकतानता, एक मनोहर मौन, गुरु-लघुके क्रमसे पद-भेद-विराम, अतिदीर्घ गमक तथा मधुर आनन्दके साथ उन्होंने प्रेमपूर्वक स्वयं-निर्मित ऐसा संगीत छेड़ा, जो संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय भगवान् शिवके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था और वे नेत्रोंसे बारंबार आँसू बहाते थे। प्रिये! उस संगीतको सुननेमात्रसे वहाँ बैठे हुए मुनि तथा देवता मूर्च्छित एवं बेसुध हो द्रव (जल)-रूप हो गये। श्रीहरिके पार्षदोंकी तथा ब्रह्माजीकी भी यही दशा हुई। भगवान् नारायण, लक्ष्मी तथा गान करनेवाले स्वयं शिव भी द्रवरूप हो गये। प्राणेश्वरि! उस समय वैकुण्ठधामको जलसे पूर्ण हुआ देख मुझे शङ्का हुई। तब वहाँ जाकर मैंने उन सब देवता आदिकी मूर्तियों (शरीरों)-का पूर्ववत् निर्माण किया। उनके वैसे ही रूप, वैसे ही अस्त्र-शस्त्र तथा वैसे ही वाहन-भूषण बनाये। उनके स्वभाव, मन तथा विषय-वासनाएँ भी पूर्ववत् थीं। तदनन्तर उस जलराशिके लिये वैकुण्ठके चारों ओर स्थान बनाया; फिर उसकी अधिष्ठात्री देवी (गङ्गा) अपने उस वासस्थानमें आयीं।
समस्त देवताओंके शरीरोंसे उत्पन्न हुई वह
रागोंके नामोंके सम्बन्धमें बहुत मतभेद है। भरत और हनुमत्के मतसे ये छः राग इस प्रकार हैं—भैरव, कौशिक (मालकोस), हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ। सोमेश्वर और ब्रह्माके मतसे इन छः रागोंके नाम इस प्रकार हैं—श्री, वसंत, पञ्चम, भैरव, मेघ और नटनारायण। नारद-संहिताका मत है कि मालव, मल्हार, श्री, वसंत, हिंडोल और कर्णाट—ये छः राग हैं। परंतु आजकल प्रायः ब्रह्मा और सोमेश्वरका मत ही अधिक प्रचलित है। स्वर-भेदसे राग तीन प्रकारके कहे गये हैं—(१) सम्पूर्ण, जिसमें सातों स्वर लगते हों; (२) षाड़व, जिसमें केवल छः स्वर लगते हों और कोई एक स्वर वर्जित हो; और (३) ओड़व, जिसमें केवल पाँच स्वर लगते हों और दो स्वर वर्जित हों। मतङ्गके मतसे रागोंके ये तीन भेद हैं—(१) शुद्ध, जो शास्त्रीय नियम तथा विधानके अनुसार हो और जिसमें किसी दूसरे रागकी छाया न हो; (२) सालंक या छायालग, जिसमें किसी दूसरे रागकी छाया भी दिखायी देती हो अथवा जो दो रागोंके योगसे बना हो और (३) संकीर्ण, जो कई रागोंके मेलसे बना हो। संकीर्णको ‘संकर राग’ भी कहते हैं। ऊपर जिन छः रागोंके नाम बतलाये गये हैं, उनमेंसे प्रत्येक रागका एक निश्चित सरगम या स्वर-क्रम है। उसका एक विशिष्ट स्वरूप माना गया है। उसके लिये एक विशिष्ट ऋतु, समय और पहर आदि निश्चित हैं। उसके लिये कुछ रस नियत हैं तथा अनेक ऐसी बातें भी कही गयी हैं, जिनमेंसे अधिकांश केवल कल्पित ही हैं। जैसे, माना गया है कि अमुक रागका अमुक द्वीप या वर्षपर अधिकार है, उसका अधिपति अमुक ग्रह है, आदि। इसके अतिरिक्त भरत और हनुमत्के मतसे प्रत्येक रागकी पाँच-पाँच रागिनियाँ और सोमेश्वर आदिके मतसे छः-छः रागिनियाँ हैं। इस अन्तिम मतके अनुसार प्रत्येक रागके आठ-आठ पुत्र तथा आठ-आठ पुत्रवधुएँ भी हैं। (४) यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो राग और रागिनीमें कोई अन्तर नहीं है। जो कुछ अन्तर है, वह केवल कल्पित है। हाँ, रागोंमें रागिनियोंकी अपेक्षा कुछ विशेषता और प्रधानता अवश्य होती है और रागिनियाँ उनकी छायासे युक्त जान पड़ती हैं; अतः हम रागिनियोंको रागोंके अवान्तर भेद कह सकते हैं। इसके सिवा और भी बहुत-से राग हैं, जो कई रागोंकी छायापर अथवा मेलसे बनते हैं और ‘संकर राग’ कहलाते हैं। शुद्ध रागोंकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें लोगोंका विश्वास है कि जिस प्रकार श्रीकृष्णकी वंशीके सात छेदोंमेंसे सात स्वर निकले हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्णजीकी १६०८ गोपिकाओंके गानेसे १६०८ प्रकारके राग उत्पन्न हुए थे और उन्हींमेंसे बचते-बचते अन्तमें केवल छः राग और उनकी ३० या ३६ रागिनियाँ रह गयीं। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि महादेवजीके पाँच मुखोंसे पाँच राग (श्री, वसंत, भैरव, पञ्चम और मेघ) निकले हैं और पार्वतीके मुखसे छठा ‘नटनारायण’ राग निकला है।
१- संगीत-शास्त्रके अनुसार तालमेंका विराम जो सम, विषम, अतीत और अनागत—चार प्रकारका होता है।
२- संगीतमें एक श्रुति या स्वरपरसे दूसरी श्रुति या स्वरपर जानेका एक प्रकार। इसके सात भेद हैं—कम्पित, स्फुरित, लीन, भिन्न, स्थविर, आहत और आन्दोलित। पर साधारणतः लोग गानेमें स्वरके कँपानेको ही गमक कहते हैं। तबलेकी गम्भीर आवाजको भी गमक कहते हैं।
(हिंदी-शब्दसागरसे संकलित)
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दिव्य जलराशि ही देवनदी गङ्गाके नामसे प्रख्यात
हुई। वह मुमुक्षुओंको मोक्ष और भक्तोंको हरि-
भक्ति प्रदान करनेवाली है। उसका स्पर्श करके
आयी हुई वायुके सम्पर्कसे भी पापियोंके करोड़ों
जन्मोंके नानाविध पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।
प्राणेश्वरि ! देवनदीके साक्षात् दर्शन तथा स्पर्शका
क्या फल होगा—यह मैं भी नहीं जानता; फिर
उसके जलमें स्नान करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके
विषयमें तो कहना ही क्या है ? उसकी महिमाका
सम्यक् निरूपण असम्भव है। पृथ्वीपर 'पुष्कर'
को सब तीर्थोंसे उत्तम बताया गया है। वेदोंने
उसे सर्वश्रेष्ठ कहा है; परंतु वह भी इस
(गङ्गा)-की सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं
है। राजा भगीरथ इस देवनदीको भूतलपर लाये
थे, इसलिये यह 'भागीरथी' नामसे प्रसिद्ध हुई।
सुरधुनी अपने स्रोतके अंशसे पृथ्वीपर आयी थी;
अतः 'गां गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका
'गङ्गा' नाम प्रसिद्ध हुआ। इसके जलपर क्रोध
होनेके कारण महात्मा जह्नुने इस नदीको अपने
जानुओं (घुटनों)-द्वारा ग्रहण कर लिया था।
फिर उनकी कन्यारूपसे इसका प्राकट्य हुआ;
अतः इसका दूसरा नाम 'जाह्नवी' है। वसुके
अवतार भीष्म इसके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, इस
कारण यह 'भीष्मसू' (भीष्मजननी) कहलाती
है। गङ्गा मेरी आज्ञासे तीन धाराओंद्वारा स्वर्ग,
पृथ्वी तथा पातालमें गयी है; अतः 'त्रिपथगा'
कही जाती है। इसकी प्रमुख धारा स्वर्गमें है।
वहाँ इसे 'मन्दाकिनी' कहते हैं। स्वर्गमें इसका
पाट एक योजन चौड़ा है और यह दस हजार
योजनकी दूरीमें प्रवाहित होती है। इसका जल
दूधके समान स्वच्छ एवं स्वादिष्ट है तथा इसमें
सदा ऊँची-ऊँची लहरें उठती रहती हैं। वैकुण्ठसे
यह ब्रह्मलोकमें और वहाँसे स्वर्गमें आयी है।
स्वर्गसे चलकर हिमालयके शिखरपर होती हुई
यह प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर उतरी है। इसकी उस
धाराका नाम 'अलकनन्दा' है। यह क्षार-समुद्रमें
जाकर मिली है। इसकी जलराशि शुद्ध स्फटिकके
समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। यह
पापियोंके पापरूपी सूखे काठको जलानेके लिये
अग्निरूपिणी है। इसीने राजा सगरके पुत्रोंको
निर्वाणमोक्ष प्रदान किया है। यह वैकुण्ठधामतक
जानेके लिये श्रेष्ठ सोपान है।
यदि मृत्युकालमें पहले पुण्यात्मा सत्पुरुषोंके
चरणोंको धोकर उस चरणोदकको मुमूर्षु मनुष्यके
मुखमें दिया जाय तो उसे गङ्गाजल पीनेका पुण्य
होता है। ऐसे पुण्यात्मा सत्पुरुष गङ्गारूपी
सोपानपर आरूढ़ हो निरामयपद (वैकुण्ठधाम)-
को प्राप्त होते हैं। वे ब्रह्मलोकतकको लाँघकर
विमानपर बैठे हुए निर्बाध गतिसे ऊपरके लोक
(वैकुण्ठ)-में चले जाते हैं। यदि दैववश
पूर्वकर्मके प्रभावसे पापी पुरुष गङ्गामें डूब जायँ
तो वे शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने दिव्य वर्षोंतक
भगवद्धाममें सानन्द निवास करते हैं। तदनन्तर
उन्हें निश्चय ही अपने पाप-पुण्यका फल भोगना
पड़ता है। परंतु वह भोग स्वल्पकालमें ही पूरा
हो जाता है; तत्पश्चात् भारतवर्षमें पुण्यवानोंके
घरमें जन्म ले निश्चल भक्ति पाकर वे भगवत्स्वरूप
हो जाते हैं। जो शुद्धिके लिये यात्रा करके देवेश्वरी
गङ्गामें नहानेके लिये जाता है, वह जितने पग
चलता है, उतने वर्षोंतक अवश्य ही वैकुण्ठधाममें
आनन्द भोगता है। यदि आनुषङ्गिकरूपसे भी
गङ्गाको पाकर कोई पापयुक्त मनुष्य उसमें स्नान
करता है तो वह उस समय सब पापोंसे मुक्त हो
जाता है। यदि वह फिर पापमें लिप्त न हो
तो निष्पाप ही रहता है। कलियुगमें पाँच हजार
वर्षोंतक भारतवर्षमें गङ्गाकी साक्षात् स्थिति है।
उसके विद्यमान होते हुए कलिका क्या प्रभाव
रह सकता है ? कलिमें दस हजार वर्षोंतक मेरी
प्रतिमाएँ तथा पुराण रहते हैं। उनके होते हुए
वहाँ कलिका प्रभाव क्या हो सकता है ?