ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३२- देवी षष्ठीके ध्यान, पूजन, स्तोत्र तथा विशद महिमाका वर्णन
प्रकृतिखण्ड २४५
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! सृष्टिके प्रारम्भिक समयकी बात है—देवता भोजनकी व्यवस्थाके लिये ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी मनोहारिणी सभामें गये। मुने! वहाँ जाकर उन्होंने अपने आहारके लिये ब्रह्माजीसे प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें भोजन देनेकी प्रतिज्ञा करके श्रीहरिके चरणोंकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि अपनी कलासे यज्ञरूपमें प्रकट हुए। उस यज्ञमें जिस-जिस हविष्यकी आहुति दी गयी, वह सब ब्रह्माजीने देवताओंको दिया; किंतु ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि वर्ण भक्तिपूर्वक जो हवन करते थे, वह देवताओंको उपलब्ध नहीं होता था। इसीसे सब उदास होकर ब्रह्मसभामें गये थे और वहाँ जाकर उन्होंने आहार न मिलनेकी बात बतलायी। ब्रह्माजीने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर ध्यानके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। फिर भगवान्की आज्ञासे उन्होंने ध्यानके द्वारा ही मूलप्रकृतिकी पूजा की। तब सर्वशक्तिस्वरूपिणी भगवती प्रकृति अपनी कलाद्वारा अग्निकी दाहिकाशक्ति ‘स्वाहा’ के रूपमें प्रकट हुई। उन परम सुन्दरी देवीके विग्रहकी सुन्दर श्याम कान्ति थी। वे मनोहारिणी देवी मुस्करा रही थीं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्यग्रचित्तवाली उन भगवती स्वाहाने ब्रह्माजीके सम्मुख उपस्थित होकर उनसे कहा—‘पद्मयोने! तुम वर माँगो!’ तदनन्तर ब्रह्माजीने भगवतीका वचन सुनकर सम्भ्रमपूर्वक कहा।
ब्रह्माजी बोले—तुम अग्निकी दाहिकाशक्ति तथा उनकी परम सुन्दरी पत्नी होनेकी कृपा करो। तुम्हारे बिना अग्नि आहुतियोंको भस्म करनेमें असमर्थ हैं। जो मानव मन्त्रके अन्तमें तुम्हारे नामका उच्चारण करके देवताओंके लिये हवनीय पदार्थ अर्पण करें, उनका वह हविष्य देवताओंको सहज ही उपलब्ध हो जाय। अम्बिके! तुम अग्निदेवकी सर्वसम्पत्स्वरूपा एवं श्रीरूपिणी गृहस्वामिनी बनो। देवता और मनुष्य सदा तुम्हारी पूजा करेंगे।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवती स्वाहा देवी उदास हो गयीं। उन्होंने स्वयं ब्रह्माजीसे अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया।
स्वाहा बोलीं—ब्रह्मन्! मैं दीर्घकालतक तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करूँगी। उन परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त जो कुछ भी है सब स्वप्नके समान भ्रममात्र है। तुम जो जगत्की सृष्टि करते हो, भगवान् शंकरने जो मृत्युपर विजय प्राप्त की है, शेषनाग जो अखिल विश्वको धारण करते हैं, धर्म जो समस्त देहधारियोंके साक्षी हैं, गणेशजी जो सम्पूर्ण देव-समाजमें सर्वप्रथम पूजा प्राप्त करते हैं तथा जगदम्बा प्रकृतिदेवी जो सर्वपूज्या हुई हैं—यह सब उन भगवान् श्रीकृष्णके कृपा-प्रसादका ही फल है। भगवान् श्रीकृष्णके सेवक होनेसे ही ऋषियों और मुनियोंका सर्वत्र सम्मान है। अतः पद्मज! मैं भी एकमात्र उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्णके चरण-कमलोंका सानुराग चिन्तन करती हूँ।
ब्रह्माजीसे यों कहकर वे कमलमुखी देवी स्वाहा निरामय भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये चल दीं। फिर एक पैरसे खड़ी होकर उन्होंने श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए बहुत वर्षोंतक तप किया। तब प्रकृतिसे परे निर्गुण परब्रह्म श्रीकृष्णके दर्शन उन्हें प्राप्त हुए। भगवान्के परम कमनीय सौन्दर्यको देखकर सुरूपिणी देवी स्वाहा मूर्च्छित-सी हो गयीं; क्योंकि वे उन कामेश्वर प्रभुको कान्तभावसे चाहने लगी थीं।
| २४६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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चिरकालतक तपस्या करनेके कारण क्षीण शरीरवाली देवी स्वाहाके अभिप्रायको वे सर्वज्ञ प्रभु समझ गये। उन्होंने उन्हें उठाकर अपने अङ्कमें बैठा लिया और कहा।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— कान्ते! तुम वाराहकल्पमें अपने अंशसे मेरी प्रिया बनोगी। तुम्हारा नाम 'नाग्नजिती' होगा। राजा नग्नजित् तुम्हारे पिता होंगे। इस समय तुम दाहिकाशक्तिके रूपमें अग्निकी प्रिय पत्नी बनो। मेरे प्रसादसे तुम मन्त्रोंकी अङ्गभूता एवं परम पवित्र होओगी। अग्निदेव तुम्हें अपनी गृहस्वामिनी बनाकर भक्ति-भावके साथ तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम परम रमणीया देवीके साथ वे सानन्द विहार करेंगे।
नारद! देवी स्वाहासे इस प्रकार सम्भाषण करके उन्हें आश्वासन दे भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये। फिर ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार डरते हुए अग्निदेव वहाँ आये और सामवेदमें कही हुई विधिसे जगज्जननी भगवतीका ध्यान करके उन्होंने देवीकी भलीभाँति पूजा और स्तुति की। तत्पश्चात् अग्निदेवने मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्वाहादेवीका पाणिग्रहण किया। देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक वे उनके साथ आनन्द करते रहे। परम सुखप्रद निर्जन देशमें रहते समय देवी स्वाहा अग्निदेवके तेजसे गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं, तत्पश्चात् दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्निके क्रमसे उनके मनको मुग्ध करनेवाले परम सुन्दर तीन पुत्र उनसे उत्पन्न हुए। तब ऋषि, मुनि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय आदि सभी श्रेष्ठ वर्ण 'स्वाहान्त' मन्त्रोंका उच्चारण करके अग्निमें हवन करने लगे और देवताओंको वह आहाररूपसे प्राप्त होने लगा। जो पुरुष स्वाहायुक्त प्रशस्त मन्त्रका उच्चारण करता है, उसे केवल मन्त्र पढ़नेमात्रसे ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जिस प्रकार विषहीन सर्प, वेदहीन ब्राह्मण, पतिसेवाविहीन स्त्री, विद्याहीन पुरुष तथा फल एवं शाखाहीन वृक्ष निन्दाके पात्र हैं, वैसे ही स्वाहाहीन मन्त्र भी निन्द्य है। ऐसे मन्त्रसे किया हुआ हवन शीघ्र फल नहीं देता। फिर तो सभी ब्राह्मण संतुष्ट हो गये। देवताओंको आहुतियाँ मिलने लगीं। स्वाहान्त मन्त्रसे ही उनके सारे कर्म सफल होने लगे। मुने! भगवती स्वाहासे सम्बन्ध रखनेवाला इस प्रकार यह सारा श्रेष्ठ उपाख्यान कह सुनाया। यह सारभूत प्रसङ्ग सुख और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हो ?
नारदजीने कहा— प्रभो! मुनीश्वर! अब मुझे भगवती स्वाहाकी पूजाका वह विधान, ध्यान एवं स्तोत्र बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे अग्निदेवने उनकी पूजा करके स्तुति की थी।
भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मन्! मुनिवर! भगवती स्वाहाके ध्यान, स्तोत्र और पूजाका जो विधान सामवेदमें कहा गया है, वही मैं तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। पुरुषको चाहिये कि फल प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण यज्ञोंके आरम्भमें शालग्रामकी प्रतिमामें अथवा कलशपर यत्नपूर्वक भगवती स्वाहाका पूजन करके यज्ञ आरम्भ करे। ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—'देवी स्वाहा मन्त्रोंकी अङ्गभूता होनेसे परम पवित्र हैं। ये मन्त्रसिद्धिरूपिणी हैं। सिद्ध एवं सिद्धिदायिनी हैं तथा मनुष्योंको उनके सम्पूर्ण कर्मोंका फल