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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

२२- राजा अश्वपतिद्वारा सावित्रीकी उपासना तथा फलस्वरूप सावित्री नामक कन्याकी उत्पत्ति, सत्यवान्के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद

प्रकृतिखण्ड १८७
मृत्युकालमें जो शालग्रामके जलका पान
करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर
विष्णुलोकको चला जाता है। उसे निर्वाणमुक्ति
सुलभ हो जाती है। वह कर्मभोगसे छूटकर
भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें लीन हो जाता है—
इसमें कोई संशय नहीं। शालग्रामको हाथमें लेकर
मिथ्या बोलनेवाला व्यक्ति 'कुम्भीपाक' नरकमें
जाता है और ब्रह्माकी आयुपर्यन्त उसे वहाँ रहना
पड़ता है। जो शालग्रामको धारण करके की हुई
प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, उसे लाख मन्वन्तरतक
'असिपत्र' नामक नरकमें रहना पड़ता है।
कान्ते ! जो व्यक्ति शालग्रामपरसे तुलसीके पत्रको
दूर करेगा, उसे दूसरे जन्ममें स्त्री साथ न दे
सकेगी। शङ्खसे तुलसीपत्रका विच्छेद करनेवाला
व्यक्ति भार्याहीन तथा सात जन्मोंतक रोगी होगा।
शालग्राम, तुलसी और शङ्ख—इन तीनोंको जो
महान् ज्ञानी पुरुष एकत्र सुरक्षितरूपसे रखता है,
उससे भगवान् श्रीहरि बहुत प्रेम करते हैं।
नारद! इस प्रकार देवी तुलसीसे कहकर
भगवान् श्रीहरि मौन हो गये। उधर देवी तुलसी
अपना शरीर त्यागकर दिव्य रूपसे सम्पन्न हो
भगवान् श्रीहरिके वक्षःस्थलपर लक्ष्मीकी भाँति
शोभा पाने लगी। कमलापति भगवान् श्रीहरि उसे
साथ लेकर वैकुण्ठ पधार गये। नारद! लक्ष्मी,
सरस्वती, गङ्गा और तुलसी—ये चार देवियाँ भगवान्
श्रीहरिकी पत्नियाँ हुईं। उसी समय तुलसीकी देहसे
गण्डकी नदी उत्पन्न हुई और भगवान् श्रीहरि भी
उसीके तटपर मनुष्योंके लिये पुण्यप्रद शालग्राम-
शिला बन गये। मुने ! वहाँ रहनेवाले कीड़े शिलाको
काट-काटकर अनेक प्रकारकी बना देते हैं। वे
पाषाण जलमें गिरकर निश्चय ही उत्तम फल प्रदान
करते हैं। जो पाषाण धरतीपर पड़ जाते हैं, उनपर
सूर्यका ताप पड़नेसे पीलापन आ जाता है, ऐसी
शिलाको पिङ्गला समझनी चाहिये। (वह शिला
पूजामें उत्तम नहीं मानी जाती है।)
नारद! इस प्रकार यह सभी प्रसङ्ग मैंने कह
सुनाया; अब पुनः क्या सुनना चाहते हो ?
(अध्याय २१)
तुलसी-पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसी-स्तवनका वर्णन
नारदजीने पूछा- प्रभो! तुलसी भगवान्
नारायणकी प्रिया हैं, इसलिये परम पवित्र हैं।
अतएव वे सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीया हैं; परंतु
इनकी पूजाका क्या विधान है और इनकी स्तुतिके
लिये कौन-सा स्तोत्र है ? यह मैंने अभीतक नहीं
सुना है। मुने! किस मन्त्रसे उनकी पूजा होनी
चाहिये ? सबसे पहले किसने तुलसीकी स्तुति की
है? किस कारणसे वह आपके लिये भी पूजनीया
हो गयीं ? अहो ! ये सब बातें आप मुझे बताइये।
सूतजी कहते हैं- शौनक ! नारदकी बात
सुनकर भगवान् नारायणका मुखमण्डल प्रसन्नतासे
खिल उठा। उन्होंने पापोंका ध्वंस करनेवाली परम
पुण्यमयी प्राचीन कथा कहनी आरम्भ कर दी।
भगवान् नारायण ऋषि बोले- मुने ! भगवान्
श्रीहरि तुलसीको पाकर उसके और लक्ष्मीके साथ
आनन्द करने लगे। उन्होंने तुलसीको भी गौरव
तथा सौभाग्यमें लक्ष्मीके समान बना दिया। लक्ष्मी
और गङ्गाने तो तुलसीके नवसङ्गम, सौभाग्य और
गौरवको सह लिया, किंतु सरस्वती क्रोधके कारण
यह सब सहन न कर सकीं। सरस्वतीके द्वारा
अपना अपमान होनेसे तुलसी अन्तर्धान हो गयीं।
ज्ञानसम्पन्ना देवी तुलसी सिद्धयोगिनी एवं
सर्वसिद्धेश्वरी थीं। अतः उन्होंने श्रीहरिकी आँखोंसे
अपनेको सर्वत्र ओझल कर लिया। भगवान्ने उसे
न देखकर सरस्वतीको समझाया और उससे आज्ञा
लेकर वे तुलसीवनमें गये। लक्ष्मीबीज (श्रीं),

१८८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और वाणीबीज (ऐं)—इन बीजोंका पूर्वमें उच्चारण करके 'वृन्दावनी' इस शब्दके अन्तमें (ङे) विभक्ति लगायी और अन्तमें वह्निजाया (स्वाहा)-का प्रयोग करके 'श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा' इस दशाक्षर-मन्त्रका उच्चारण किया। नारद! यह मन्त्रराज कल्पतरु है। जो इस मन्त्रका उच्चारण करके विधिपूर्वक तुलसीकी पूजा करता है, उसे निश्चय ही सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। घृतका दीपक, धूप, सिन्दूर, चन्दन, नैवेद्य और पुष्प आदि उपचारोंसे तथा स्तोत्रद्वारा भगवान्‌से सुपूजित होनेपर तुलसीको बड़ी प्रसन्नता हुई। अतः वह वृक्षसे तुरंत बाहर निकल आयी और परम प्रसन्न होकर भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंकी शरणमें चली गयी। तब भगवान्‌ने उसे वर दिया—'देवी! तुम सर्वपूज्या हो जाओ। मैं स्वयं तुम्हें अपने मस्तक तथा वक्षःस्थलपर धारण करूँगा। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण देवता तुम्हें अपने मस्तकपर धारण करेंगे।' यों कहकर उसे साथ ले भगवान् श्रीहरि अपने स्थानपर लौट गये।

**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! तुलसीके अन्तर्धान हो जानेपर भगवान् श्रीहरि विरहसे आतुर होकर वृन्दावन चले गये थे और वहाँ जाकर उन्होंने तुलसीकी पूजा करके इस प्रकार स्तुति की थी।

**श्रीभगवान् बोले—**जब वृन्दा (तुलसी)-

रूप वृक्ष तथा दूसरे वृक्ष एकत्र होते हैं, तब वृक्षसमुदाय अथवा वनको बुधजन 'वृन्दा' कहते हैं। ऐसी वृन्दा नामसे प्रसिद्ध अपनी प्रिया तुलसीकी मैं उपासना करता हूँ। जो देवी प्राचीनकालमें वृन्दावनमें प्रकट हुई थी, अतएव जिसे 'वृन्दावनी' कहते हैं, उस सौभाग्यवती देवीकी मैं उपासना करता हूँ। जो असंख्य वृक्षोंमें निरन्तर पूजा प्राप्त करती है, अतः जिसका नाम 'विश्वपूजिता' पड़ा है, उस जगत्पूज्या देवीकी मैं उपासना करता हूँ। देवि! जिसने सदा अनन्त विश्वोंको पवित्र किया है, उस 'विश्वपावनी' देवीका मैं विरहसे आतुर होकर स्मरण करता हूँ। जिसके बिना अन्य पुष्प-समूहोंके अर्पण करनेपर भी देवता प्रसन्न नहीं होते, ऐसी 'पुष्पसारा'—पुष्पोंमें सारभूता शुद्धस्वरूपिणी तुलसी देवीका मैं शोकसे व्याकुल होकर दर्शन करना चाहता हूँ। संसारमें जिसकी प्राप्तिमात्रसे भक्त परम आनन्दित हो जाता है, इसीलिये 'नन्दिनी' नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, वह भगवती तुलसी अब मुझपर प्रसन्न हो जाय। जिस देवीकी अखिल विश्वमें कहीं तुलना नहीं है, अतएव जो 'तुलसी' कहलाती है, उस अपनी प्रियाकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ। वह साध्वी तुलसी वृन्दारूपसे भगवान् श्रीकृष्णकी जीवनस्वरूपा है और उनकी सदा प्रियतमा होनेसे 'कृष्णजीवनी' नामसे विख्यात है। वह देवी तुलसी मेरे जीवनकी रक्षा करे*।


* नारायण उवाच—
अन्तर्हितायां तस्यां च गत्वा च तुलसीवनम्। हरिः सम्पूज्य तुष्टाव तुलसीं विरहातुरः॥
श्रीभगवानुवाच—
वृन्दारूपाश्च वृक्षाश्च यदैकत्र भवन्ति च। विदुर्बुधास्तेन वृन्दां मत्प्रियां तां भजाम्यहम्॥
पुरा बभूव या देवी त्वादौ वृन्दावने वने। तेन वृन्दावनी ख्याता सौभाग्यां तां भजाम्यहम्॥
असंख्येषु च विश्वेषु पूजिता या निरन्तरम्। तेन विश्वपूजिताख्यां जगत्पूज्यां भजाम्यहम्॥
असंख्यानि च विश्वानि पवित्राणि यया सदा। तां विश्वपावनीं देवीं विरहेण स्मराम्यहम्॥
देवा न तुष्टाः पुष्पाणां समूहेन यया विना। तां पुष्पसारां शुद्धां च द्रष्टुमिच्छामि शोकतः॥
विश्वे यत्प्राप्तिमात्रेण भक्तानन्दो भवेद् ध्रुवम्। नन्दिनी तेन विख्याता सा प्रीता भवताद्धि मे॥

प्रकृतिखण्ड १८९

इस प्रकार स्तुति करके लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि वहीं बैठ गये। इतनेमें उनके सामने साक्षात् तुलसी प्रकट हो गयी। उस साध्वीने उनके चरणोंमें तुरंत मस्तक झुका दिया। अपमानके कारण उस मानिनीकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे; क्योंकि पहले उसे बड़ा सम्मान मिल चुका था। ऐसी प्रिया तुलसीको देखकर प्रियतम भगवान् श्रीहरिने तुरंत उसे अपने हृदयमें स्थान दिया। साथ ही सरस्वतीसे आज्ञा लेकर उसे अपने महलमें ले गये। उन्होंने शीघ्र ही सरस्वतीके साथ तुलसीका प्रेम स्थापित करवाया। साथ ही भगवान्ने तुलसीको वर दिया—'देवि! तुम सर्वपूज्या और शिरोधार्या होओ। सब लोग तुम्हारा आदर एवं सम्मान करें।' भगवान् विष्णुके इस प्रकार कहनेपर वह देवी परम संतुष्ट हो गयी। सरस्वतीने उसे हृदयसे लगाया और अपने पास बैठा लिया। नारद! लक्ष्मी और गङ्गा इन दोनों देवियोंने मन्द मुस्कानके साथ विनयपूर्वक साध्वी तुलसीका हाथ पकड़कर उसे भवनमें प्रवेश कराया। वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपावनी, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी—ये देवी तुलसीके आठ नाम हैं। यह सार्थक नामावली स्तोत्रके रूपमें परिणत है। जो पुरुष तुलसीकी पूजा करके इस 'नामाष्टक' का पाठ करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त हो जाता है।* कार्तिककी पूर्णिमा तिथिको देवी तुलसीका मङ्गलमय प्राकट्य हुआ और सर्वप्रथम भगवान् श्रीहरिने उसकी पूजा सम्पन्न की। जो इस कार्तिकी पूर्णिमाके अवसरपर विश्वपावनी तुलसीकी भक्तिभावसे पूजा करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है। जो कार्तिक महीनेमें भगवान् विष्णुको तुलसीपत्र अर्पण करता है, वह दस हजार गोदानका फल निश्चितरूपसे पा जाता है। इस तुलसीनामाष्टकके स्मरणमात्रसे संतानहीन पुरुष पुत्रवान् बन जाता है। जिसे पत्नी न हो, उसे पत्नी मिल जाती है तथा बन्धुहीन व्यक्ति बहुत-से बान्धवोंको प्राप्त कर लेता है। इसके स्मरणसे रोगी रोगमुक्त हो जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ व्यक्ति छुटकारा पा जाता है, भयभीत पुरुष निर्भय हो जाता है और पापी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

नारद! यह तुलसी-स्तोत्र बतला दिया। अब ध्यान और पूजा-विधि सुनो। तुम तो इस ध्यानको जानते ही हो। वेदकी कण्व-शाखामें इसका प्रतिपादन हुआ है। ध्यानमें सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेकी अबाध शक्ति है। ध्यान करनेके पश्चात् बिना आवाहन किये भक्तिपूर्वक तुलसीके वृक्षमें षोडशोपचारसे इस देवीकी पूजा करनी चाहिये।

परम साध्वी तुलसी पुष्पोंमें सार हैं। ये पूजनीया तथा मनोहारिणी हैं। सम्पूर्ण पापरूपी ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्निकी लपटके समान हैं। पुष्पोंमें अथवा देवियोंमें किसीसे भी इनकी तुलना नहीं हो सकी। इसीलिये उन सबमें पवित्ररूपा इन देवीको तुलसी कहा गया। ये सबके द्वारा अपने मस्तकपर धारण करने योग्य हैं। सभीको इन्हें पानेकी इच्छा रहती है। विश्वको पवित्र करनेवाली ये देवी जीवन्मुक्त हैं।

यस्या देव्यास्तुला नास्ति विश्वेषु निखिलेषु च । तुलसी तेन विख्याता तां यामि शरणं प्रियाम् ॥
कृष्णजीवनरूपा या शश्वत्प्रियतमा सती । तेन कृष्णजीवनीति मम रक्षतु जीवनम् ॥
(प्रकृतिखण्ड २२। १८—२६)

* वृन्दा वृन्दावनी विश्वपावनी विश्वपूजिता । पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी ॥
एतन्नामाष्टकं चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् । यः पठेत् तां च सम्पूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
(प्रकृतिखण्ड २२। ३३-३४)