ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२२- भगवती पृथ्वी देवी
१३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
ब्रह्माके भवनपर पधारें तथा पूर्ण अंशसे स्वयं मेरे पास रहें। ऐसे ही ये गङ्गा भगीरथके सत्प्रयत्नसे अपने कलांशसे त्रिलोकीको पवित्र करनेके लिये भारतवर्षमें जायँ और स्वयं पूर्ण अंशसे मेरे पास भवनपर रहें। वहाँ इन्हें शंकरके मस्तकपर रहनेका दुर्लभ अवसर भी प्राप्त होगा। ये स्वभावतः पवित्र तो हैं ही, किंतु वहाँ जानेपर इनकी पवित्रता और भी बढ़ जायगी। वामलोचने! तुम अपनी कलाके अंशांशसे भारतवर्षमें चलो। वहाँ तुम्हें 'पद्मावती' नदी और 'तुलसी' वृक्षके रूपसे विराजना होगा। कलिके पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर तुम नदीरूपिणी देवियोंका उद्धार हो जायगा। तदनन्तर तुमलोग मेरे भवनपर लौट आओगी। पद्मभवे! सम्पूर्ण प्राणियोंके पास जो सम्पत्ति और विपत्ति आती है—इसमें कोई-न-कोई हेतु छिपा रहता है। बिना विपत्ति सहे किन्हींको भी गौरव प्राप्त नहीं हो सकता। अब तुम्हारे शुद्ध होनेका उपाय बताता हूँ। मेरे मन्त्रोंकी उपासना करनेवाले बहुत-से संत पुरुष भी तुम्हारे जलमें नहाने-धोनेके लिये पधारेंगे। उस समय तुम उनके दर्शन और स्पर्श प्राप्त करके सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगी। सुन्दरि! इतना ही नहीं; किंतु भूमण्डलपर जितने असंख्य तीर्थ हैं, वे सभी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श पाकर परम पावन बन जायँगे। भारतवर्षकी भूमि अत्यन्त पवित्र है। मेरे मन्त्रोंके उपासक अनगिनत भक्त वहाँ वास करते हैं। प्राणियोंको पवित्र करना और तारना ही उनका प्रधान उद्देश्य है। मेरे भक्त जहाँ रहते और अपने पैर धोते हैं, वह स्थान महान् तीर्थ एवं परम पवित्र बन जाता है—यह बिलकुल निश्चित है*। घोर पापी भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शके प्रभावसे पवित्र होकर जीवन्मुक्त हो सकता है। नास्तिक व्यक्ति भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकता है।
जो कमरमें तलवार बाँधकर द्वारपालकी हैसियतसे जीविका चलाते हैं, मुनीमीमात्र जिनकी जीविकाका साधन है, जो इधर-उधर चिट्ठी-पत्री पहुँचाकर अपना भरण-पोषण करते हैं तथा गाँव-गाँव घूमकर भीख माँगना ही जिनका व्यवसाय है एवं जो बैलोंको जोतते हैं, ऐसे ब्राह्मणको अधम कहा जाता है; किंतु मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्श उन्हें पवित्र कर देते हैं। विश्वासघाती, मित्रघाती, झूठी गवाही देनेवाले तथा धरोहर हड़पनेवाले नीच व्यक्ति भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे शुद्ध हो सकते हैं। मेरे भक्तके दर्शन एवं स्पर्शमें ऐसी अद्भुत शक्ति है कि उसके प्रभावसे महापातकी व्यक्तितक पवित्र हो सकता है। सुन्दरि! पिता, माता, स्त्री, छोटा भाई, पुत्र, पुत्री, बहन, गुरुकुल, नेत्रहीन बान्धव, सासु और श्वशुर—जो पुरुष इनके भरण-पोषणकी व्यवस्था नहीं करता, उसे महान् पातकी कहते हैं; किंतु मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श करनेसे वह भी शुद्ध हो जाता है। पीपलके वृक्षको काटनेवाले, मेरे भक्तोंके निन्दक तथा नीच ब्राह्मणको भी मेरे भक्तका दर्शन और स्पर्श पवित्र बना देता है। घोर पातकी मनुष्य भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकते हैं।
**श्रीमहालक्ष्मीने कहा—**भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आतुर रहनेवाले प्रभो! अब आप उन अपने भक्तोंके लक्षण बतलाइये, जिनके दर्शन और स्पर्शसे हरिभक्तिहीन, अत्यन्त अहंकारी, अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले, धूर्त, शठ एवं साधुनिन्दक अत्यन्त अधम मानवतक तुरंत पवित्र हो जाते हैं तथा जिनके नहाने-धोनेसे सम्पूर्ण
* मद्भक्ता यत्र तिष्ठन्ति पादं प्रक्षालयन्ति च। तत्स्थानं च महातीर्थं सुपवित्रं भवेद् ध्रुवम्॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ९४)
प्रकृतिखण्ड १३३
तीर्थोंमें पवित्रता आ जाती है; जिनके चरणोंकी धूलिसे तथा चरणोदकसे पृथ्वीका कल्मष दूर हो जाता है तथा जिनका दर्शन एवं स्पर्श करनेके लिये भारतवर्षमें लोग लालायित रहते हैं; क्योंकि विष्णुभक्त पुरुषोंका समागम सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये परम लाभदायक है। जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं हैं और न मृण्मय एवं प्रस्तरमय देवता ही देवता हैं; क्योंकि वे दीर्घकालतक सेवा करनेपर ही पवित्र करते हैं। अहो! साक्षात् देवता तो विष्णु-भक्तोंको मानना चाहिये, जो क्षणभरमें पवित्र कर देते हैं।*
**सूतजी कहते हैं—**शौनक! महालक्ष्मीकी बात सुनकर उनके आराध्य स्वामी भगवान् श्रीहरिका मुखमण्डल मुस्कानसे खिल उठा। फिर वे अत्यन्त गूढ़ एवं श्रेष्ठ रहस्य कहनेके लिये प्रस्तुत हो गये।
**श्रीभगवान् बोले—**लक्ष्मी! भक्तोंके लक्षण श्रुति एवं पुराणोंमें छिपे हुए हैं। इन पुण्यमय लक्षणोंमें पापोंका नाश करने, सुख देने तथा भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेकी प्रचुर शक्ति है। जिसको सद्गुरुके द्वारा विष्णुका मन्त्र प्राप्त होता है (और जो सब कुछ छोड़कर केवल मुझको ही सर्वस्व मानता है), उसीको वेद-वेदाङ्ग पुण्यात्मा एवं श्रेष्ठ मनुष्य बतलाते हैं। ऐसे व्यक्तिके जन्म लेनेमात्रसे पूर्वके सौ पुरुष, चाहे वे स्वर्गमें हों अथवा नरकमें—तुरंत मुक्तिके अधिकारी हो जाते हैं। यदि उन पूर्वजोंमेंसे किन्हींका कहीं जन्म हो गया है तो उन्होंने जिस योनिमें जन्म पाया है, वहीं उनमें जीवन्मुक्तता आ जाती है और समयानुसार वे परमधाममें चले जाते हैं। मुझमें भक्ति रखनेवाला मानव मेरे गुणोंसे सम्पन्न होकर मुक्त हो जाता है। उसकी वृत्ति मेरे गुणका अनुसरण करनेमें ही लगी रहती है। वह सदा मेरी कथा-वार्तामें लगा रहता है। मेरा गुणानुवाद सुननेमात्रसे वह आनन्दमग्न हो उठता है। उसका शरीर पुलकित हो जाता है और वाणी गद्गद हो जाती है। उसकी आँखोंमें आँसू भर आते हैं और वह अपनी सुधि-बुधि खो बैठता है। मेरी पवित्र सेवामें नित्य नियुक्त रहनेके कारण सुख, चार प्रकारकी सालोक्यादि मुक्ति, ब्रह्माका पद अथवा अमरत्व—कुछ भी पानेकी अभिलाषा वह नहीं करता। मनु, इन्द्र एवं ब्रह्माकी उपाधि तथा स्वर्गके राज्यका सुख—ये सभी परम दुर्लभ हैं; किंतु मेरा भक्त स्वप्नमें भी इनकी इच्छा नहीं करता†। ऐसे मेरे बहुत-से भक्त भारतवर्षमें निवास करते हैं। उन भक्तोंके-जैसा जन्म सबके लिये सुलभ नहीं है। जो सदा मेरा गुणानुवाद सुनते और सुनने योग्य पद्योंको गाकर आनन्दसे विह्वल हो जाते हैं, वे बड़भागी भक्त अन्य साधारण मनुष्य, तीर्थ एवं मेरे परमधामको भी पवित्र करके धराधामपर पधारते हैं।
पद्मे! इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नका समाधान कर दिया। अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। तदनन्तर वे सभी देवियाँ, भगवान् श्रीहरिने जो कुछ आज्ञा दी थी, उसीके अनुसार कार्य करनेमें संलग्न हो गयीं। स्वयं भगवान् अपने सुखदायी आसनपर विराजमान हो गये।
(अध्याय ६)
* न ह्यम्भ्यानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । ते पुनन्त्यपि कालेन विष्णुभक्ताः क्षणादहो ॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ११०)
† न वाञ्छन्ति सुखं मुक्तिं सालोक्यादिचतुष्टयम् । ब्रह्मत्वममरत्वं वा तद्वाञ्छा मम सेवने ॥
इन्द्रत्वं च मनुत्वं च ब्रह्मत्वं च सुदुर्लभम् । स्वर्गराज्यादिभोगं च स्वप्नेऽपि च न वाञ्छति ॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ११९-१२०)