ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०- तुलसी-पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसी-स्तवनका वर्णन
प्रकृतिखण्ड १७९
लिया। नारद! शङ्खचूड़ मायावियोंका शिरोमणि था। उसने मायासे उस युद्धभूमिमें बाणोंका जाल बिछा दिया और उसके द्वारा कार्तिकेयको ढककर सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित होनेवाली एक अमोघ शक्ति हाथमें ली। भगवान् विष्णुके तेजसे व्याप्त हुई वह शक्ति प्रलयाग्निकी शिखाके समान जान पड़ती थी। दानवराजने उसे क्रोधपूर्वक कार्तिकेयके ऊपर बड़े वेगसे दे मारा। वह शक्ति उनके शरीरपर प्रज्वलित अग्निकी राशिके समान गिरी। महाबली कार्तिकेय उस शक्तिसे आहत हो मूर्च्छित हो गये। तब काली उन्हें गोदमें उठाकर भगवान् शिवके पास ले गयी।
शिवने लीलापूर्वक ज्ञान-बलसे उन्हें जीवित कर दिया। साथ ही असीम बल प्रदान किया। प्रतापी वीर कार्तिकेय तत्काल उठकर खड़े हो गये। उसी क्षण भगवान् शंकरने अपनी सेना तथा देवताओंको युद्धके लिये प्रेरित किया। सेनासहित दानवराजोंके साथ देवताओंका युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ। स्वयं देवराज इन्द्र वृषपर्वाके साथ युद्ध करने लगे। सूर्यदेवने विप्रचित्तिके साथ युद्ध छेड़ दिया। चन्द्रमा दम्भके साथ भिड़ गये और बड़ा भारी युद्ध करने लगे। कालने कालेश्वरके साथ और अग्निदेवने गोकर्णके साथ जूझना आरम्भ किया। कालकेयसे कुबेर और मयासुरसे विश्वकर्मा लड़ने लगे। मृत्युदेवता भयंकर नामक दानवसे और यम संहारके साथ भिड़ गये। कलविङ्क और वरुणमें, चञ्चल और वायुमें, बुध और घृतपृष्ठमें तथा रक्ताक्ष और शनैश्चरमें युद्ध होने लगा। जयन्तने रत्नसारका सामना किया। वसुगण और वर्चोगण परस्पर जूझने लगे। दीप्तिमान्के साथ अश्विनीकुमार और धूम्रके साथ नलकूबरका युद्ध आरम्भ हुआ। धर्म और धनुर्धर, मङ्गल और मण्डूकाक्ष, शोभाकर और ईशान तथा पीठर और मन्मथ एक-दूसरेका सामना करने लगे। उल्कामुख, धूम्र, खड्गध्वज, काञ्चीमुख, पिण्ड, धूम्र, नन्दी, विश्व और पलाश—इन सबके साथ आदित्यगण घोर युद्ध करने लगे। ग्यारह महारुद्रगण ग्यारह भयंकर दानवोंके साथ भिड़ गये। उग्रदण्डा आदि और महामारीमें युद्ध होने लगा। नन्दीश्वर आदि समस्त रुद्रगण दानवगणोंके साथ लड़ने लगे। वह महान् युद्ध प्रलयकालके समान भयंकर जान पड़ता था। उस समय भगवान् शंकर काली और पुत्रके साथ वटवृक्षके नीचे ठहरे हुए थे। मुने! शेष समस्त सैन्यसमुदाय निरन्तर युद्धमें तत्पर थे। शङ्खचूड़ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो करोड़ों दानवोंके साथ रमणीय रत्नमय सिंहासनपर विराजमान था। उस युद्धमें भगवान् शंकरके समस्त योद्धा पराजित हो गये। समस्त देवता क्षत-विक्षत हो भयके मारे भाग चले।
यह देख भगवान् स्कन्दको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने देवताओंको अभय दान दिया और अपने तेजसे आत्मीय गणोंका बल बढ़ाया। वे स्वयं भी दानवगणोंके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने समराङ्गणमें दानवोंकी सौ अक्षौहिणी सेनाका संहार कर डाला। कमलोचना कालीने कुपित हो खप्पर गिराना आरम्भ किया। वे दानवोंके सौ-सौ खप्पर खून एक साथ पी जाती थीं। लाखों हाथी और घोड़ोंको एक ही हाथसे समेटकर लीलापूर्वक लील जाती थीं। मुने! समरभूमिमें सहस्रों कबन्ध (बिना सिरके धड़) नृत्य करने लगे। स्कन्दके बाण-समूहोंसे क्षत-विक्षत हुए महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न सभी दानव भयके मारे भाग चले। वृषपर्वा, विप्रचित्ति, दम्भ और विकङ्कन—ये सब बारी-बारीसे स्कन्दके साथ युद्ध करने लगे। अब कालीने समराङ्गणमें प्रवेश किया। भगवान् शिव कार्तिकेयकी रक्षा करने लगे। नन्दीश्वर आदि वीर कालीके ही पीछे-पीछे गये। समस्त देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, किन्नर, बहुत-से राज्यभाण्ड और करोड़ों मेघ भी उन्हींके साथ थे। संग्राममें पहुँचकर
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कालीने सिंहनाद किया। देवीके उस सिंहनादसे दानव मूर्च्छित हो गये। कालीने बारंबार दैत्योंके लिये अमङ्गलसूचक अट्टहास किया। वे युद्धके मुहानेपर हर्षपूर्वक मधु पीने और नृत्य करने लगीं। उग्रदंष्ट्रा, उग्रचण्डा और कौट्टरी भी मधु-पान करने लगीं। योगिनियों और डाकिनियोंके गण तथा देवगण आदि भी इस कार्यमें योग देने लगे। कालीको उपस्थित देख शङ्खचूड़ तुरंत रणभूमिमें आ पहुँचा। दानव डरे हुए थे। दानवराजने उन सबको अभय दान दिया। कालीने प्रलयाग्निकी शिखाके समान अग्नि फेंकना आरम्भ किया, परंतु राजा शङ्खचूड़ने पार्जन्यास्त्रके द्वारा उसे अवहेलनापूर्वक बुझा दिया। तब कालीने तीव्र एवं परम अद्भुत वारुणास्त्र चलाया। परंतु दानवेन्द्रने गान्धर्वास्त्र चलाकर खेल-खेलमें ही उसे काट डाला। तदनन्तर कालीने अग्निशिखाके समान तेजस्वी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, किंतु राजा शङ्खचूड़ने वैष्णवास्त्रका प्रयोग करके उस अस्त्रको अवहेलनापूर्वक शीघ्र शान्त कर दिया। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक नारायणास्त्र चलाया। उसे देखते ही राजा रथसे उतर पड़ा और उस नारायणास्त्रको प्रणाम करने लगा। शङ्खचूड़ने दण्डकी भाँति भूमिपर पड़कर भक्तिभावसे नारायणास्त्रको साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तब प्रलयाग्निकी शिखाके समान तेजस्वी वह अस्त्र ऊपरको चला गया। तदनन्तर कालीने मन्त्रके साथ यत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्र चलाया; किंतु महाराज शङ्खचूड़ने अपने ब्रह्मास्त्रसे उसे शान्त कर दिया। फिर तो देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक बड़े-बड़े दिव्यास्त्र चलाये। परंतु राजाने अपने दिव्यास्त्रोंसे उन सबको शान्त कर दिया। इसके बाद देवीने बड़े यत्नसे शक्तिका प्रहार किया, जो एक योजन लंबी थी। परंतु दानवराजने अपने तीखे अस्त्रोंके समूहसे उसके सौ टुकड़े कर डाले। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक पाशुपतास्त्रको हाथमें उठा लिया और उसे चलाना ही चाहती थीं कि उन्हें मना करती हुई यह स्पष्ट आकाशवाणी हुई—'यह राजा एक महान् पुरुष है, इसकी मृत्यु पाशुपतास्त्रसे कदापि नहीं होगी। जबतक यह अपने गलेमें भगवान् श्रीहरिके मन्त्रका कवच धारण किये रहेगा और जबतक इसकी पतिव्रता पत्नी अपने सतीत्वकी रक्षा करती रहेगी, तबतक इसके समीप जरा और मृत्यु अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकती—यह ब्रह्माका वर है।'
इस आकाशवाणीको सुनकर भगवती भद्रकालीने शस्त्र चलाना बंद कर दिया। अब वे क्षुधातुर होकर करोड़ों दानवोंको लीलापूर्वक निगलने लगीं। भयंकर वेषवाली वे देवी शङ्खचूड़को खा जानेके लिये बड़े वेगसे उसकी ओर झपटीं। तब दानवने अपने अत्यन्त तेजस्वी दिव्यास्त्रसे उन्हें रोक दिया। भद्रकाली अपनी सहयोगिनी योगिनियोंके साथ भाँति-भाँतिसे दैत्यदलका विनाश करने लगीं। उन्होंने दानवराज शङ्खचूड़को भी बड़ी चोट पहुँचायी, पर वे दानवराजका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकीं। तब वे भगवान् शंकरके पास चली गयीं और उन्होंने आरम्भसे लेकर अन्ततक क्रमशः युद्ध-सम्बन्धी सभी बातें भगवान् शंकरको बतलायीं। दानवोंका विनाश सुनकर भगवान् हँसने लगे।
भद्रकालीने यह भी कहा—'अब भी रणभूमिमें लगभग एक लाख प्रधान दानव बचे हुए हैं। मैं उन्हें खा रही थी, उस समय जो मुखसे निकल गये, वे ही बच रहे हैं। फिर जब मैं संग्राममें दानवराज शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र छोड़नेको तैयार हुई और जब आकाशवाणी हुई कि यह राजा तुमसे अवध्य है, तबसे महान् ज्ञानी एवं असीम बल-पराक्रमसे सम्पन्न उस दानवराजने मुझपर अस्त्र छोड़ना बंद कर दिया। वह मेरे छोड़े हुए बाणोंको काट भर देता था। (अध्याय १९)
प्रकृतिखण्ड १८१
भगवान् शंकर और शङ्खचूड़ का युद्ध, शंकरके त्रिशूलसे शङ्खचूड़का भस्म
होना तथा सुदामा गोपके स्वरूपमें उसका विमानद्वारा गोलोक पधारना
भगवान् नारायण कहते हैं- नारद ! भगवान्
शिव तत्त्व जाननेमें परम प्रवीण हैं। भद्रकालीद्वारा
युद्धकी सारी बातें सुनकर वे स्वयं अपने गणोंके
साथ संग्राममें पहुँच गये। उन्हें देखकर शङ्खचूड़
विमानसे उतर गया और उसने परम भक्तिके साथ
पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें दण्डवत् प्रणाम
किया। यों भक्तिविनम्र होकर प्रणाम करनेके पश्चात्
वह तुरंत रथपर सवार हो गया और भगवान्
शिवके साथ युद्ध करने लगा। ब्रह्मन् ! उस समय
शिव और शङ्खचूड़में बहुत लंबे कालतक युद्ध
होता रहा। कोई किसीसे न जीतते थे और न
हारते थे। कभी समयानुसार शङ्खचूड़ शस्त्र
रखकर रथपर ही विश्राम कर लेता और कभी
भगवान् शंकर भी शस्त्र रखकर वृषभपर ही
आराम कर लेते। शंकरके बाणोंसे असंख्य
दानवोंका संहार हुआ। इधर संग्राममें देवपक्षके
जो-जो योद्धा मरते थे, उनको विभु शंकर पुनः
जीवित कर देते थे। उसी समय भगवान् श्रीहरि
एक अत्यन्त आतुर बूढ़े ब्राह्मणका वेष बनाकर
युद्धभूमिमें आये और दानवराज शङ्खचूड़से
कहने लगे।
वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें पधारे हुए श्रीहरिने
कहा - राजेन्द्र ! तुम मुझ ब्राह्मणको भिक्षा देनेकी
कृपा करो। इस समय सम्पूर्ण शक्तियाँ प्रदान
करनेकी तुममें पूर्ण योग्यता है। अतः तुम मेरी
अभिलाषा पूर्ण करो। मैं निरीह, तृषित एवं वृद्ध
ब्राह्मण हूँ। पहले तुम देनेके लिये सत्य प्रतिज्ञा
कर लो, तब मैं तुमसे कहूँगा।
राजेन्द्र शङ्खचूड़ने अत्यन्त प्रसन्न होकर
कहा - 'हाँ, हाँ, बहुत ठीक - आप जो चाहें
सो ले सकते हैं।' तब अतिशय माया फैलाते
हुए उन वृद्ध ब्राह्मणने कहा- 'मैं तुम्हारा
'कृष्णकवच' चाहता हूँ।' उनकी बात सुनकर
सत्यप्रतिज्ञ शङ्खचूड़ने तुरंत वह दिव्य कवच उन्हें
दे दिया और उन्होंने उसे ले भी लिया। फिर
वे ही श्रीहरि शङ्खचूड़का रूप बनाकर तुलसीके
निकट गये। वहाँ जाकर कपटपूर्वक उन्होंने उससे
हास-विलास किया। (इस प्रकार शङ्खचूड़की
पत्नीके रूपमें उसका सतीत्व भङ्ग हो गया। यद्यपि
तत्त्वरूपसे तो वह श्रीहरिकी परम प्रेयसी पत्नी ही
थी।) ठीक इसी समय शंकरने शङ्खचूड़पर
चलानेके लिये श्रीहरिका दिया हुआ त्रिशूल
हाथमें उठा लिया। वह त्रिशूल इतना प्रकाशमान
था, मानो ग्रीष्म ऋतुका मध्याह्नकालीन सूर्य हो,
अथवा प्रलयकालीन प्रचण्ड अग्नि। वह दुर्निवार्य,
दुर्धर्ष, अव्यर्थ और शत्रुसंहारक था। सम्पूर्ण
शस्त्रोंके सारभूत उस त्रिशूलकी तेजमें चक्रके
साथ तुलना की जाती थी। उस भयंकर त्रिशूलको
शिव अथवा केशव - ये दो ही उठा सकते थे।
अन्य किसीके मानका वह नहीं था। वह साक्षात्
सजीव ब्रह्म ही था। उसके रूपका कभी परिवर्तन
नहीं होता और सभी उसे देख भी नहीं पाते थे।
नारद ! अखिल ब्रह्माण्डका संहार करनेकी उस
त्रिशूलमें पूर्ण शक्ति थी। भगवान् शंकरने लीलासे
ही उसे उठाकर हाथपर जमाया और शङ्खचूड़पर
फेंक दिया। तब उस बुद्धिमान् नरेशने सारा
रहस्य जानकर अपना धनुष धरतीपर फेंक
दिया और वह बुद्धिपूर्वक योगासन लगाकर
भक्तिके साथ अनन्य-चित्तसे भगवान् श्रीकृष्णके
चरणकमलका ध्यान करने लगा। त्रिशूल कुछ
समयतक तो चक्कर काटता रहा। तदनन्तर वह
शङ्खचूड़के ऊपर जा गिरा। उसके गिरते ही तुरंत
वह दानवेश्वर तथा उसका रथ - सभी जलकर
भस्म हो गये।