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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

१७- भगवान् शंकरऔर शङ्खचूड़के पक्षोंमें युद्ध, भद्रकालीका घोर युद्ध और आकाशवाणी सुनकर कालीका शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र न चलाना

१७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मुने! ऐसे परम विशिष्ट परिपूर्णतम भगवान् श्रीहरिके दर्शन प्राप्त होनेपर ब्रह्मा प्रभृति समस्त भगवद्भक्त देवता भयभीत-से होकर भक्तिभावसे गर्दन झुकाये उन्हें प्रणाम करके स्तुति करने लगे। उस समय हर्षके कारण उनके सर्वाङ्गमें पुलकावली छा गयी थी, आँखोंमें आँसू भर आये थे और वाणी गद्गद थी। परम श्रद्धाके साथ उपासना करके जगत्के व्यवस्थापक ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर बड़ी विनयके साथ भगवान् श्रीहरिके सामने सारी परिस्थिति निवेदित की। श्रीहरि सर्वत्र एवं सबके अभिप्रायसे पूर्ण परिचित हैं। ब्रह्माकी बात सुनकर उनके मुखपर हँसी छा गयी और उन्होंने मनको मुग्ध करनेवाला अद्भुत रहस्य कहना आरम्भ किया।

भगवान् श्रीहरि बोले—ब्रह्मन्! यह महान् तेजस्वी शङ्खचूड़ पूर्वजन्ममें एक गोप था। यह मेरा ही अंश था। मेरे प्रति इसकी अटूट श्रद्धा थी। इसके सम्पूर्ण वृत्तान्तसे मैं पूर्ण परिचित हूँ। यह वृत्तान्त एक पुराना इतिहास है। गोलोकसे सम्बन्ध रखनेवाले इस समस्त पुण्यप्रद इतिहासको सुनिये। शङ्खचूड़ उस समय सुदामा नामसे प्रसिद्ध गोप था। मेरे पार्षदोंमें उसकी प्रधानता थी। श्रीराधाके शापने उसे दानव-योनिमें उत्पन्न होनेके लिये विवश कर दिया।

राधा अति करुणामयी हैं। सखियोंका तिरस्कार करनेके कारण राधाने शाप तो दे दिया, परंतु जब सुदामा मुझे प्रणाम करके रोता हुआ सभाभवनसे बाहर जाने लगा, तब दयामयी राधा कृपावश तुरंत संतुष्ट हो गयीं। उनकी आँखोंमें आँसू भर आये। उन्होंने सुदामाको रोक लिया। कहा—'वत्स! रुके रहो, मत जाओ, कहाँ जाओगे?' तब मैंने उन राधाको समझाया और कहा—'सभी धैर्य रखें, यह सुदामा आधे क्षणमें ही शापका पालन करके पुनः लौट आयेगा।' 'सुदामन्! तुम यहाँ अवश्य आ जाना'—यों कहकर मैंने किसी प्रकार राधाको शान्त किया। अखिल जगत्के रक्षक ब्रह्मन्! गोलोकके आधे क्षणमें ही भूमण्डलपर एक मन्वन्तरका समय हो जाता है।

ब्रह्मन्! इस प्रकार यह सब कुछ पूर्वनिश्चित व्यवस्थाके अनुसार ही हो रहा है। अतः सम्पूर्ण मायाओंका पूर्ण ज्ञाता अपार बलशाली योगीश यह शङ्खचूड़ समयपर पुनः उस गोलोकमें ही चला जायगा। आपलोग मेरा यह त्रिशूल लेकर शीघ्र भारतवर्षमें चलें। शंकर मेरे त्रिशूलसे उस दानवका संहार करें। दानव शङ्खचूड़ मेरे ही सम्पूर्ण मङ्गल प्रदान करनेवाले कवचोंको कण्ठमें सदा धारण किये रहता है; इसीलिये वह अखिल विश्वविजयी है। ब्रह्मन्! उसके कण्ठमें कवच रहते हुए कोई भी उसे मारनेमें सफल नहीं हो सकता। अतः मैं ही ब्राह्मणका वेष धारण करके कवचके लिये उससे याचना करूँगा। साथ ही जिस समय उसकी स्त्रीका सतीत्व नष्ट होगा, उसी समय उसकी मृत्यु होगी—यह आपने उसको वर दे रखा है। एतदर्थ उसकी पत्नीके उदरमें मैं वीर्य स्थापित करूँगा—मैंने यह निश्चित कर लिया है। (वैसे 'तुलसी' मेरी नित्यप्रिया है, इससे वस्तुतः मुझ सर्वात्माको कोई दोष भी नहीं होगा।) उसी समय शङ्खचूड़की मृत्यु हो जायगी—इसमें कोई संदेह नहीं है। तदनन्तर उस दानवकी वह पत्नी अपने उस शरीरको त्यागकर पुनः मेरी प्रिय पत्नी बन जायगी।

नारद! इस प्रकार कहकर जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिने शंकरको त्रिशूल सौंप दिया। त्रिशूल लेकर रुद्र और ब्रह्मा सब देवताओंके साथ भारतवर्षको चल दिये।

(अध्याय १६)

प्रकृतिखण्ड १७१


पुष्पदन्तका दूत बनकर शङ्खचूड़के पास जाना और शङ्खचूड़के द्वारा तुलसीके प्रति ज्ञानोपदेश

**भगवान् नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर ब्रह्मा दानवके संहार-कार्यमें शंकरको नियुक्त करके स्वयं उसी क्षण अपने स्थानपर चले गये। देवता भी अपने-अपने स्थानोंको चले गये। तब चन्द्रभागा नदीके तटपर एक मनोहर वट-वृक्षके नीचे जाकर देवताओंका अभ्युदय करनेके विचारसे महादेवजीने आसन जमा लिया। गन्धर्वराज पुष्पदन्त शंकरका बड़ा प्रेमी था। उन्होंने उसे दूत बनाकर तुरंत हर्षपूर्वक शङ्खचूड़के पास भेजा। उनकी आज्ञा पाकर पुष्पदन्त उसी क्षण शङ्खचूड़के नगरकी ओर चल दिया। दानवराजकी पुरी अमरावतीसे भी श्रेष्ठ थी। कुबेरका भवन उसके सामने तुच्छ था। उस नगरकी लम्बाई दस योजन थी और चौड़ाई पाँच योजन। स्फटिक-मणिके समान रत्नोंसे बने हुए परकोटोंद्वारा वह घिरा था। सात दुर्गम खाइयोंसे वह सुरक्षित था। प्रज्वलित अग्निके समान निरन्तर चमकनेवाले करोड़ों रत्नोंद्वारा उसका निर्माण किया गया था। उसमें सैकड़ों सुन्दर सड़कें और मणिमय विचित्र वेदियाँ थीं। व्यापारकुशल पुरुषोंके द्वारा बनवाये हुए भवन और ऊँचे-ऊँचे महल चारों ओर सुशोभित थे, जिनमें नाना प्रकारकी बहुमूल्य वस्तुएँ भरी थीं। सिन्दूरके समान लाल मणियोंद्वारा बने हुए असंख्य, विचित्र, दिव्य एवं सुन्दर आश्रम उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे।

मुने! इस प्रकारके सुन्दर नगरमें जाकर पुष्पदन्तने शङ्खचूड़का भवन देखा। वह नगरके बिलकुल मध्यभागमें था। नगरकी आकृति वलयके समान गोल थी। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो पूर्ण चन्द्रमण्डल हो। प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान चार परिखाएँ उसे सुरक्षित किये हुए थीं। शत्रुओंके लिये उस भवनमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था, परंतु हितैषी व्यक्ति बड़ी सुगमतासे उसमें जा सकते थे। अत्यन्त उच्च, गगनस्पर्शी मणिमय प्राचीरोंसे वह भवन घिरा हुआ था। बारह द्वारोंसे भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी। प्रत्येक द्वारपर द्वारपाल थे। सर्वोत्तम मणियोंद्वारा निर्मित लाखों मन्दिर, बहुत-से सोपान तथा रत्नमय खंभे थे। एक द्वारको देखनेके बाद पुष्पदन्तने दूसरे प्रधान द्वारको भी देखा। उस द्वारपर हाथमें त्रिशूल लिये एक पुरुष विराजमान था। उसके मुखपर हँसी छायी थी। उसकी पीली आँखें थीं। उसके शरीरका रंग ताँबेके सदृश लाल था। भय उत्पन्न करनेवाले उस द्वारपालसे आज्ञा पाकर पुष्पदन्त आगे बढ़ा और दूसरे द्वारको लाँघकर भीतर चला गया। यह दूत युद्धकी सूचना पहुँचानेवाला है—यह सुनकर कोई भी उसे रोकता नहीं था। इस तरह नौ द्वारोंको लाँघकर पुष्पदन्त सबसे भीतरके द्वारपर पहुँच गया। वहाँ द्वारपालसे अनुमति लेकर वह भीतर गया। वहाँ जाकर देखा, परम मनोहर शङ्खचूड़ राजाओंके मध्यमें सुवर्णके सिंहासनपर बैठा था। उसके मस्तकपर सोनेका सुन्दर छत्र तना था, जिसे एक भृत्यने ले रखा था। उस छत्रमें मणियाँ जड़ी गयी थीं। वह विचित्र छत्र रत्नमय दण्डसे सुशोभित था। रत्ननिर्मित कृत्रिम पुष्प उसकी शोभाको और भी प्रशस्त कर रहे थे। सफेद एवं चमकीले चँवर हाथमें लेकर अनेक पार्षद शङ्खचूड़की सेवामें संलग्न थे। उत्तम वेष एवं रत्नमय भूषणोंसे विभूषित होनेके कारण वह बड़ा सुन्दर जान पड़ता था। मुने! उसके गलेमें माला थी। शरीरपर चन्दनका अनुलेपन था। वह दो महीन उत्तम वस्त्र पहिने हुए था। वह दानव उस समय सुन्दर वेषवाले असंख्य प्रसिद्ध दानवोंसे घिरा था और

१७२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

असंख्य दूसरे दानव हाथोंमें अस्त्र लिये इधर-उधर घूम रहे थे। ऐसे वैभव-सम्पन्न शङ्खचूड़को देखकर पुष्पदन्त आश्चर्यमें पड़ गया। तदनन्तर उसने शंकरके कथनानुसार युद्धविषयक संदेश सुनाना आरम्भ किया।

पुष्पदन्तने कहा—राजेन्द्र! प्रभो! मैं भगवान् शंकरका दूत हूँ। मेरा नाम पुष्पदन्त है। शंकरजीकी कही हुई बातें ही मैं यहाँ आपसे कह रहा हूँ, सुननेकी कृपा करें। अब आप देवताओंका राज्य तथा उनका अधिकार उन्हें लौटा दें; क्योंकि वे देवेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये थे। उन प्रभुने अपना त्रिशूल देकर आपके विनाशके लिये शंकरको भेजा है। त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव इस समय चन्द्रभागा नदीके तटपर वटवृक्षके नीचे विराजमान हैं। आप या तो देवताओंका राज्य लौटा दें या निश्चित रूपसे युद्ध करें। मुझे यह भी बता दें कि मैं भगवान् शंकरके पास जाकर उनको क्या उत्तर दूँ?

नारद! दूतके रूपमें गये हुए पुष्पदन्तकी बात सुनकर शङ्खचूड़ ठठाकर हँस पड़ा और बोला—'दूत! मैं कल प्रातःकाल चलूँगा, तुम जाओ।' तब पुष्पदन्त तुरंत वटके नीचे विराजमान भगवान् शंकरके पास लौट गया और उनसे शङ्खचूड़की बात, जो स्वयं उसने अपने मुखसे कही थी, कह सुनायी। साथ ही, उसके पास जो सेना आदि युद्धोपकरण थे, उनका भी परिचय दिया। इतनेमें योजनानुसार कार्तिकेय शंकरके समीप आ पहुँचे। वीरभद्र, नन्दीश्वर, महाकाल, सुभद्रक, विशालाक्ष, बाणासुर, पिङ्गलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र, बास्कल, कपिलाक्ष, दीर्घदंष्ट्र, विकट, ताम्रलोचन, कालंकट, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, बलोन्मत्त, रणश्लाघी, दुर्जय, दुर्गम, आठों भैरव, ग्यारहों रुद्र, आठों वसु, इन्द्र आदि देवता, बारहों सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनीकुमार, कुबेर, यमराज, जयन्त, नलकुबर, वायु, वरुण, बुध, मङ्गल, धर्म, शनि, ईशान और प्रतापी कामदेव आदि भी आ गये।

साथ ही, उग्रदंष्ट्रा, उग्रचण्डा, कोटरा, कैटभी तथा स्वयं सौ भुजावाली भयंकर भगवती भद्रकाली देवी भी वहाँ आ गयीं। वे देवी अतिशय श्रेष्ठ रत्नद्वारा निर्मित विमानपर बैठी थीं। उनका विग्रह लाल रंगके वस्त्रसे सुशोभित था। उनके गलेमें लाल पुष्पोंकी माला थी। सभी अङ्ग लाल चन्दनसे अनुलिप्त थे। नाचना, हँसना, हर्षके उल्लासमें भरकर मीठे स्वरोंमें गाना, भक्तोंको अभय प्रदान करना तथा शत्रुओंको डराना उन अभयस्वरूपिणी भगवती भद्रकालीका सहज गुण बन गया था। उनके मुखमें बड़ी विकराल लंबी जीभ लपलपा रही थी। शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, ढाल, तलवार, धनुष, बाण, एक योजन विस्तृत वर्तुलाकार गम्भीर खप्पर, गगनचुम्बी त्रिशूल, एक योजनमें फैली हुई शक्ति, मुद्गर, मुसल, वज्र, पाश, खेटक, प्रकाशमान फलक, वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गन्धर्व, गरुड़, पार्जन्य एवं पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पार्वतास्त्र, माहेश्वरास्त्र, वायव्यास्त्र, सम्मोहन दण्ड, शतशः अमोघास्त्र तथा सैकड़ों दिव्यास्त्रको धारण करके भगवती भद्रकाली अनन्त योगिनियोंके साथ वहाँ आकर विराज गयीं। उनके साथमें अत्यन्त भयंकर असंख्य डाकिनियोंका यूथ भी सुशोभित था। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, वेताल, राक्षस, यक्ष और किन्नर भी सहयोग देनेके लिये आ पहुँचे। इन सबको साथ लेकर स्वामी कार्तिकेयने अपने पिता चन्द्रशेखर शिवको प्रणाम किया और सहायता करनेके विचारसे उनकी आज्ञा लेकर पास बैठ गये।

इधर दूतके चले जानेपर प्रतापी शङ्खचूड़ अन्तःपुरमें गया और उसने अपनी पत्नी तुलसीसे युद्धसम्बन्धी बातें बतायीं। सुनते ही तुलसीके होठ और तालु सूख गये। उसका हृदय संतप्त