ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६- मालावतीके पूछनेपर ब्राह्मणद्वारा वैद्यक-संहिताका वर्णन, आयुर्वेदकी आचार्यपरम्परा, उसके सोलह प्रमुख विद्वानों तथा उनके द्वारा रचित तन्त्रोंका नाम-निर्देश, ज्वर आदि चौंसठ रोग, उनके हेतुभूत वात, पित्त, कफकी उत्पत्तिके कारण और उनके निवारणके उपायोंका विवेचन
ब्रह्मखण्ड ५५
संस्कार मङ्गलके दिन सम्पन्न हुआ। 'उप' शब्द अधिक अर्थका बोधक है और पुँल्लिङ्ग 'बर्हण' शब्द पूज्य-अर्थमें प्रयुक्त होता है। यह बालक पूज्य पुरुषोंमें सबसे अधिक है; इसलिये इसका नाम 'उपबर्हण' होगा—ऐसा वसिष्ठजीने कहा।
(अध्याय १२)
ब्रह्माजीके शापसे उपबर्हणका योगधारणाद्वारा अपने शरीरको त्याग देना, मालावतीका विलाप एवं प्रार्थना करना, देवताओंको शाप देनेके लिये उद्यत होना, आकाशवाणीद्वारा भगवान्का आश्वासन पाकर देवताओंका कौशिकीके तटपर मालावतीके दर्शन करना
सौति कहते हैं—शौनक! अपने यहाँ पुत्र-जन्मके उत्सवमें गन्धर्वराजने बड़ी प्रसन्नताके साथ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न और धन दिये। समयानुसार बड़े होनेपर उपबर्हणने वसिष्ठजीके द्वारा परम दुर्लभ हरि-मन्त्रकी दीक्षा पाकर दुष्कर तपस्या प्रारम्भ की। एक समयकी बात है, वे गण्डकीके तटपर विराजमान थे। उन्हें युवावस्था प्राप्त हो चुकी थी। उस समय पचास गन्धर्वकन्याओंने उन्हें देखा। देखते ही वे सब-की-सब मोहित हो गयीं। उन सबने उपबर्हणको पतिरूपमें प्राप्त करनेका संकल्प ले योगशक्तिसे प्राणोंको त्याग दिया और चित्ररथ गन्धर्वके घर जन्म लेकर पिताकी आज्ञासे उनके साथ विवाह कर लिया। उपबर्हणने दीर्घकालतक उन सबके साथ विहार किया। चिरकालतक निरन्तर उनके साथ राज्य करके एक दिन वे ब्रह्माजीके स्थानपर गये और वहाँ श्रीहरिका यशोगान करने लगे। वहीं रम्भाको नृत्य करते देख उपबर्हणके मनमें वासना जाग उठी और उनका वीर्य स्खलित हो गया। इससे उनकी बड़ी हँसी हुई और ब्रह्माजीने उन्हें शाप देते हुए कहा—'तुम गन्धर्व-शरीरको त्याग दो और शूद्रयोनिको प्राप्त हो जाओ। फिर समयानुसार वैष्णवोंका संसर्ग प्राप्त कर तुम पुनः मेरे पुत्रके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाओगे। बेटा! विपत्तिका सामना किये बिना पुरुषोंकी महत्ता प्रकट नहीं होती। संसारमें सभीको बारी-बारीसे सुख और दुःख प्राप्त होते हैं।'
ऐसा कहकर ब्रह्माजी पुष्करसे अपने धामको चले गये और उपबर्हण गन्धर्वने तत्काल उस शरीरको इस प्रकारसे त्याग दिया—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा नामवाले छः चक्रोंका क्रमशः भेदन करके उन्होंने इडा आदि नाड़ियोंका भेदन आरम्भ किया। इडा, सुषुम्णा, मेधा, पिङ्गला, प्राणहारिणी, सर्वज्ञानप्रदा, मनःसंयमनी, विशुद्धा, निरुद्धा, वायुसंचारिणी, तेजः-शुष्ककरी, बलपुष्टिकरी, बुद्धिसंचारिणी, ज्ञानजृम्भन-कारिणी, सर्वप्राणहरा तथा पुनर्जीवनकारिणी—इन सोलह नाड़ियोंका भेदन करके मनसहित जीवात्माको ब्रह्मरन्ध्रमें लाकर वे योगासनसे बैठ गये और दो घड़ीतक उन्होंने आत्माको आत्मामें ही लगाया। तत्पश्चात् वे जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाले) योगिराज उपबर्हण ब्रह्मभावको प्राप्त हो गये। तीन तारवाली दुर्लभ वीणाको बायें कंधेपर रखकर दाहिने हाथमें शुद्ध स्फटिककी माला लिये वे वेदके सारतत्त्व तथा उद्धारके उत्तम बीजरूप परात्पर परब्रह्ममय (कृष्ण) इन दो अक्षरोंका जप करने लगे। उन्होंने कुशकी चटाईपर पूर्वकी ओर सिरहाना करके पश्चिम दिशाकी ओर दोनों चरण फैला दिये और इस तरह सो गये, मानो कोई पुरुष सो रहा हो।
उनके पिता गन्धर्वराजने उन्हें इस प्रकार देहत्याग करते देख स्वयं भी अपनी पत्नीके साथ
५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मन-ही-मन श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए योगधारणाद्वारा प्राण त्याग दिये और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया। उस समय उपबर्हणके सभी भाई-बन्धु और पत्नियाँ बारंबार विलाप करते हुए जोर-जोरसे रोने लगे। विष्णुकी मायासे मोहित होनेके कारण शोकसे पीड़ित हो वे उनके शरीरके पास गये। उपबर्हणकी पचास पत्नियोंमें जो उनकी परम प्रेयसी तथा प्रधान पटरानी थी, वह सती साध्वी मालावती अपने प्रियतमको छातीसे लगाकर अत्यन्त उच्च-स्वरसे रोदन करने लगी।
भाँति-भाँतिसे करुण विलाप करके मालावती बोली— कमलोद्भव ब्रह्माजीका यह कथन है कि मुझ सती-साध्वी, कुलीन नारियोंके लिये उसके पतिके सिवा दूसरा कोई विशिष्ट बान्धव नहीं दिखायी देता। अतः हे दिशाओंके स्वामी दिक्पालो! हे धर्म! हे प्रजापते! हे गिरीश शंकर! तथा हे कमलाकान्त नारायण! आपलोग मुझे पति-दान दीजिये।
ऐसा कहकर विरहसे आतुर हुई चित्ररथकी कन्या मालावती वहीं उस दुर्गम गहन वनमें मूर्च्छित हो गयी। प्रियतमको अपने वक्षःस्थलसे लगाकर पूरे एक दिन और एक रात वह अचेत-अवस्थामें वहाँ पड़ी रही। उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उसकी रक्षा की। प्रातःकाल फिर होशमें आनेपर वह पुनः जोर-जोरसे विलाप करने लगी। उस सतीने श्रीहरिको सम्बोधित करके पुनः वहाँ इस प्रकार कहा।
मालावती बोली— हे श्रीकृष्ण! आप सम्पूर्ण जगत्के नाथ (स्वामी तथा संरक्षक) हैं। नाथ! मैं जगत्से बाहर नहीं हूँ। प्रभो! आप ही जगत्के पालक हैं। फिर मेरा पालन क्यों नहीं कर रहे हैं! ‘यह पति है और मैं इसकी स्त्री हूँ’। इस प्रकार जो ‘इदम्’ और ‘मम’ का भाव उत्पन्न होता है, वह आपकी मायाकी ही करामात है। आप ही सबके स्वामी हैं और ऐसा होना ही अधिक सम्भव है; क्योंकि आप ही सबके कारण हैं। कर्मके फलसे गन्धर्व उपबर्हण मेरे प्रियतम पति हुए और कर्मवश ही मैं उनकी प्रियतमा पत्नी हुई। अब कर्मभोगके अन्तमें वे मुझ प्रियाको किस स्थानमें रखकर कहाँ चले गये? अथवा प्रभो! कौन किसका पति या पुत्र है? तथा कौन किसकी प्रिया है? विधाता ही कर्मके अनुसार प्राणियोंको एक-दूसरेसे संयुक्त और वियुक्त करता रहता है। संयोगमें परम आनन्द मिलता है और वियोगमें प्राणोंपर संकट उपस्थित हो जाता है। संसारमें सदा मूर्ख और अज्ञानीके ही जीवनमें ऐसी बात देखी जाती है। आत्माराम महात्माके हृदयपर निश्चय ही संयोग-वियोगका वैसा प्रभाव नहीं पड़ता। विषय नाशवान् हैं, यह बात सर्वथा सत्य है, तथापि भूतलपर विषयभोग ही बान्धव बना हुआ है। यदि विषयभोगको स्वयं त्याग दिया जाय तो वह सुखका ही कारण होता है। परंतु जब दूसरे लोग बलपूर्वक उसका त्याग करवाते हैं, तब वह दुःखदायी जान पड़ता है। इसीलिये साधु पुरुष महान्-से-महान् मनोवाञ्छित ऐश्वर्यको स्वयं त्यागकर भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका, जहाँ आपत्ति या विपत्तिकी पहुँच नहीं है, सदा चिन्तन करते हैं। ज्ञानवान् संत पुरुष तो सर्वत्र हैं, परंतु भूतलपर ज्ञानवती स्त्री कौन है? अतः मुझ मूढ़ अबलाको आप मनोवाञ्छित पति प्रदान करें। मैं अमरत्व नहीं चाहती, इन्द्रपदकी इच्छा नहीं रखती और मोक्षके मार्गमें भी मेरी रुचि नहीं है; अतः आप मेरे इन श्रेष्ठ प्राणवल्लभको ही मुझे लौटा दें; क्योंकि ये मेरे लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाले श्रेष्ठ देवता हैं।
ब्रह्मखण्ड ५७
जगदीश्वर ! पृथ्वीपर जितनी भी स्त्री-जातियाँ हैं, उनमेंसे किसीको भी विधाताने इन गन्धर्वकुमारके समान गुणवान् पति नहीं दिया है।
इसके अनन्तर मालावती अपने स्वामीके गुणोंका बखान करने लगी और अन्तमें सहसा कुपित हो नारायण, ब्रह्मा, महादेव तथा धर्म आदि समस्त देवताओंको सम्बोधित करके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गयी। तब ब्रह्मा आदि देवताओंने क्षीरसागरके तटपर जाकर भगवान् विष्णुकी शरण ली और मालावतीके भीषण शापसे बचानेकी उनसे प्रार्थना की। देवताओंके प्रार्थना कर चुकनेपर आकाशवाणी हुई—'देवताओ! अब तुमलोग जाओ। यज्ञके मूल हैं भगवान् विष्णु, वे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके मालावतीको शान्त करने तथा तुमलोगोंको शापके संकटसे बचानेके लिये जायेंगे।'
आकाशवाणीका यह कथन सुनकर सब देवताओंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सब-के-सब उत्कण्ठित हो कौशिकीके तटपर मालावतीके स्थानमें गये। वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस सती मालावती देवीको देखा। वह रत्नोंके सारभूत इन्द्रनील आदि मणियोंके आभूषणोंसे उद्दीप्त हो भगवती लक्ष्मीकी कला-सी जान पड़ती थी। उसके अङ्गोंको अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई सुनहरी साड़ी सुशोभित कर रही थी। भालदेशमें सिन्दूरकी बेंदी शोभा दे रही थी। वह शरत्कालके चन्द्रमाकी शान्त प्रभा-सी प्रकाशित होती और अपनी दीप्तिसे सम्पूर्ण दिशाओंको उद्भासित करती थी। पतिसेवारूप महान् धर्मका अनुष्ठान करके चिरकालसे संचित किये हुए तेजसे अग्निकी उत्तम एवं प्रज्वलित शिखा-सी उद्दीप्त हो रही थी। पतिके शवको छातीसे लगाकर योगासन लगाये बैठी थी और स्वामीकी सुरम्य वीणाको दाहिने हाथमें लिये हुए थी।
प्राणवल्लभके प्रति भक्ति तथा स्नेहके कारण योगमुद्रापूर्वक तर्जनी और अङ्गुष्ठ अंगुलियोंके अग्रभागसे शुद्ध स्फटिक मणिकी माला धारण किये थी। मनोहर चम्पाकी-सी अङ्ग-कान्ति, बिम्बफलके सदृश अरुण ओष्ठ और गलेमें रत्नोंकी माला शोभा पाती थी। वह सुन्दरी सोलह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त तथा नित्य सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थी। वह सती अपने स्वामीके शवको बारंबार शुभदृष्टिसे देख रही थी।
इस रूपमें मालावतीको देखकर उन सब देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे सभी धर्मात्मा और धर्मभीरु थे; अतः क्षणभर वहाँ अपनेको छिपाये खड़े रहे।
(अध्याय १३)
५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
ब्राह्मण-बालकरूपधारी विष्णुका मालावतीके साथ संवाद, ब्राह्मणके पूछनेपर
मालावतीका अपने दुःख और इच्छाको व्यक्त करना तथा ब्राह्मणका
कर्मफलके विवेचनपूर्वक विभिन्न देवताओंकी आराधनासे प्राप्त
होनेवाले फलका वर्णन करना, श्रीकृष्ण एवं
उनके भजनकी महिमा बताना
सौति कहते हैं—मुने ! क्षणभर वहाँ खड़े
रहकर परम मङ्गलदायक ब्रह्मा और शिव आदि
देवता मालावतीके निकट गये। देवताओंको आया
देख पतिव्रता मालावतीने अपने प्राणवल्लभको
उनके समीप रखकर उन सबको प्रणाम किया।
तत्पश्चात् वह फूट-फूटकर रोने लगी। इसी बीचमें
वहाँ उस देवसमाजके भीतर कोई ब्राह्मण-बालक
आया। उसकी आकृति बड़ी मनोहर थी। दण्ड,
छत्र, श्वेत वस्त्र और उज्ज्वल तिलक धारण किये
तथा हाथमें एक बड़ी-सी पुस्तक लिये वह
ब्राह्मण-कुमार अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा
था। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वह
परम शान्त जान पड़ता था और मन्द-मन्द मुस्करा
रहा था। विष्णुकी मायासे विस्मित हुए देवताओंकी
अनुमति ले वह वहीं देवसभाके मध्यभागमें बैठ
गया और तारामण्डलके बीचमें प्रकाशित होनेवाले
चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगा। वह ब्राह्मण-
बालक समस्त देवताओं तथा मालती (मालावती)-
से इस प्रकार बोला।
ब्राह्मणने कहा—यहाँ ब्रह्मा और शिव
आदि सम्पूर्ण देवता किसलिये पधारे हैं? जगत्की
सृष्टि करनेवाले साक्षात् विधाता यहाँ किस
कार्यसे आये हैं? समस्त ब्रह्माण्डोंका संहार
करनेवाले स्वयं सर्वव्यापी शम्भु भी यहाँ विराज
रहे हैं। इसका क्या कारण है? तीनों लोकोंके
समस्त कर्मोंके साक्षी धर्म भी यहाँ उपस्थित हैं,
यह महान् आश्चर्य है। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, काल,
मृत्युकन्या तथा यम आदिका समागम ही यहाँ
किसलिये सम्भव हुआ है? हे मालावति ! तुम्हारी
गोदमें अत्यन्त सूखा हुआ शव कौन है? जीती-
जागती स्त्रीके पास मरा हुआ पुरुष क्यों है?
उस सभामें देवताओं तथा मालावतीसे ऐसा
प्रश्न करके वे ब्राह्मण देवता जब चुप हो गये,
तब मालावती उन विद्वान् ब्राह्मणको प्रणाम करके
यों बोली।
मालावतीने कहा—मैं ब्राह्मणरूपधारी भगवान्
विष्णुको प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करती हूँ, जिनके
दिये हुए जल और पुष्पमात्रसे सम्पूर्ण देवता तथा
श्रीहरि भी संतुष्ट होते हैं। प्रभो ! मैं शोकसे आतुर
हूँ। आप मेरे इस निवेदनपर ध्यान दीजिये; क्योंकि
योग्य और अयोग्यपर भी कृपा करनेवाले संत-
महात्माओंका अनुग्रह सदा सबपर समानरूपसे
प्रकट होता है। विप्रवर ! मैं उपबर्हणकी पत्नी तथा
चित्ररथकी कन्या हूँ। मुझे सब लोग मालावती
कहते हैं। मैंने लक्ष दिव्य वर्षोंतक अपने इन
स्वामीके साथ प्रत्येक सुरम्य तथा मनोहर स्थानपर
स्वच्छन्द क्रीडा की है। द्विजेन्द्र ! आप विद्वान् हैं।
साध्वी युवतियोंका अपने प्रियतमके प्रति जितना
स्नेह होता है, वह सब आपको शास्त्रके अनुसार
विदित है। मेरे पतिने अकस्मात् ब्रह्माजीका शाप
प्राप्त होनेसे अपने प्राणोंको त्याग दिया है। अतः
मैं देवताओंसे यह उद्देश्य रखकर विलाप करती
हूँ कि मेरे पति जीवित हो जायँ। पृथ्वीपर सब
लोग अपने-अपने कार्यकी सिद्धिके लिये व्यग्र
रहते हैं। वे लाभ-हानिको नहीं जानते। केवल
स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहते हैं। सुख, दुःख, भय,
शोक, संताप, ऐश्वर्य, परमानन्द, जन्म, मृत्यु और
मोक्ष—ये सब मनुष्योंको अपने कर्म एवं प्रयत्नके
अनुसार प्राप्त होते हैं। देवता सबके जनक हैं। वे
ही कर्मोंका फल देते हैं। साथ ही वे लीलापूर्वक
ब्रह्मखण्ड ५९
कर्मरूपी वृक्षोंका मूलोच्छेद करनेमें भी समर्थ होते हैं। देवतासे बढ़कर कोई बन्धु नहीं है। देवतासे बढ़कर कोई बलवान् नहीं है। देवतासे बढ़कर दयालु और दाता भी दूसरा कोई नहीं है। मैं समस्त देवताओंसे याचना करती हूँ कि वे मुझे पतिदान दें। यही मुझे अभीष्ट है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके फल देनेवाले देवता कल्पवृक्षरूप हैं। इसलिये मैं इनसे याचना करती हूँ, ये मेरा मनोरथ सफल करें। यदि देवतालोग मुझे अभीष्ट पतिदान देंगे, तब तो इनका भला है; अन्यथा मैं इन सबको निश्चय ही स्त्रीके वधका पाप दूँगी। इतना ही नहीं, मैं इन सबको दारुण एवं दुर्निवार शाप भी दे सकती हूँ। सतीके शापको टालना बहुत कठिन होता है। किस तपस्यासे उसका निवारण किया जायगा?
शौनक! ऐसा कहकर शोकातुर पतिव्रता मालावती उस देवसभामें चुप हो गयी। तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने उससे कहा।
ब्राह्मण बोले—मालावती! इसमें संदेह नहीं कि देवतालोग कर्मोंका फल देनेवाले हैं; परंतु वह फल तत्काल नहीं, देरसे मिलता है। ठीक वैसे ही, जैसे किसान बोये हुए अनाजका फल तुरंत नहीं, देरसे पाता है। पतिव्रते! गृहस्थ पुरुष हलवाहेके द्वारा अपने खेतमें जो अनाज बोता है, उसका समयानुसार अङ्कुर प्रकट होता है। फिर समय आनेपर वह वृक्ष होता और फलता भी है। तत्पश्चात् अन्य समयमें वह पकता है और अन्य समयमें गृहस्थ पुरुष उसके फलको पाता है। इसी प्रकार सबके विषयमें समझ लेना चाहिये। प्रत्येक कर्मका फल देरसे ही मिलता है। संसारमें गृहस्थ पुरुष जो बीज बोता है, वही भगवान् विष्णुकी मायासे समयानुसार अङ्कुर और वृक्ष होता है और यथासमय गृहस्थ पुरुषको उसके फलकी उपलब्धि होती है। पुण्यात्मा पुरुष पुण्यभूमिमें चिरकालतक जो तप करता है, उसका फल देनेवाले सचमुच देवता ही हैं; इसमें संशय नहीं है। ब्राह्मणोंके मुखमें तथा ऊसर भूमिसे रहित उत्तम खेतमें मनुष्य भक्तिभावसे जो आहुति डालता है, उसका फल उसे निश्चय ही प्राप्त होता है। बल, सौन्दर्य, ऐश्वर्य, धन, पुत्र, स्त्री और उत्तम पति—कोई भी पदार्थ तपस्याके बिना नहीं मिलता। अतः तपके बिना क्या हो सकता है? जो भक्तिभावसे प्रकृति (दुर्गादेवी)-का सेवन करता है, वह प्रत्येक जन्ममें विनयशील सद्गुणवती तथा सुन्दरी प्राणवल्लभा पत्नीको प्राप्त करता है। प्रकृतिके ही वरसे भक्त पुरुष लीलापूर्वक अविचल लक्ष्मी, पुत्र-पौत्र, भूमि, धन और संततिको पाता है। भगवान् शिव कल्याणस्वरूप, कल्याणदाता और कल्याणप्राप्तिके कारण हैं। वे ज्ञानानन्दस्वरूप, महात्मा, परमेश्वर एवं मृत्युञ्जय हैं। जो भक्तिभावसे उन महेश्वरका सेवन करता है, वह पुरुष प्रत्येक जन्ममें सुन्दरी पत्नी पाता है और उनकी आराधना करनेवाली स्त्री प्रत्येक जन्ममें उत्तम पति पाती है। भगवान् हरके वरसे मनुष्यको विद्या, ज्ञान, उत्तम कविता, पुत्र-पौत्र, उत्कृष्ट लक्ष्मी, धन, बल और पराक्रमकी प्राप्ति होती है। जो मानव ब्रह्माजीका भजन करता है, वह भी संतान और लक्ष्मीको पाता है। ब्रह्माजीके वरदानसे मनुष्यको विद्या, ऐश्वर्य और आनन्दकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य भक्तिभावसे दीनानाथ, दिनेश्वर सूर्यकी आराधना करता है, वह निश्चय ही यहाँ विद्या, आरोग्य, आनन्द, धन और पुत्र पाता है। जो सबसे प्रथम पूजने योग्य, सर्वेश्वर, सनातन, देवाधिदेव गणेशजीकी भक्तिभावसे पूजा करता है, उसके जन्म-जन्ममें समस्त विघ्नोंका नाश होता है। वह सोते-जागते हर समय परम आनन्दका अनुभव करता है। गणेशजीके वरदानसे उसको ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र, धन, प्रजा, ज्ञान, विद्या और उत्तम कवित्वकी प्राप्ति होती है। जो देवताओंके स्वामी लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका भजन करता है, वह यदि वर पानेका इच्छुक