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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

९४- गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका शृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति

७७२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है और वे बाणको भी मारनेके लिये उद्यत थे; परंतु कार्तिकेयने उसे बचा लिया है। फिर आप भी अपने पौत्रका दमन करनेमें समर्थ बाणको मारनेके लिये पधारे हैं। जगदीश्वर! श्रुतिमें तो ऐसा सुना गया है कि आप सर्वात्माका सर्वत्र समभाव रहता है; फिर ऐसा व्यतिक्रम आप क्यों कर रहे हैं? भला, जिसका वध आप करना चाहते हैं, उसकी इस भूतलपर कौन रक्षा कर सकता है? सुदर्शनका तेज करोड़ों सूर्योंके समान परमोत्कृष्ट है। भला, किन देवताओंके अस्त्रसे उसका निवारण हो सकता है? जैसे सुदर्शन अस्त्रोंमें सर्वश्रेष्ठ है; उसी प्रकार आप भी समस्त देवताओंके परमेश्वर हैं। जैसे आप हैं; उसी तरह श्रीकृष्ण भी ब्रह्माके विधाता हैं। विष्णु सत्त्वगुणके आधार, शिव सत्त्वके आश्रयस्थान और स्वयं सृष्टिकर्ता पितामह रजोगुणके विधाता हैं। जो तमोगुणके आश्रय, एकादश रुद्रोंमें सर्वश्रेष्ठ, विश्वके संहार-कर्ता एवं महान् हैं; वे भगवान् कालाग्निरुद्र शंकरके अंश हैं। इनके अतिरिक्त अन्य रुद्रगण शंकरजीकी कलाएँ हैं। उन सबमें आप गुणरहित तथा प्रकृतिसे परे हैं। आप सबके परमात्मा हैं। सभी प्राणधारियोंके प्राण विष्णुके स्वरूप हैं; स्वयं ब्रह्मा मनरूप हैं और स्वयं शिव ज्ञानात्मक हैं। समस्त शक्तियोंमें श्रेष्ठ ईश्वरी प्रकृति बुद्धि है। समस्त देहधारियोंमें जो जीव है, वह आपके ही आत्माका प्रतिबिम्ब है। जीव अपने कर्मोंका भोक्ता है और स्वयं आप उसके साक्षी हैं। आपके चले जानेपर सभी उसी प्रकार आपका अनुगमन करते हैं, जैसे राजाके चलनेपर उसके अनुगामी। आपके निकल जानेपर शरीर तुरंत धराशायी हो जाता है और शवरूप होकर अस्पृश्य बन जाता है; परंतु आपकी मायासे वञ्चित होनेके कारण बुद्धिमान् संतलोग इसे नहीं जान पाते। जो संत आपका भजन करते हैं; वे ही इस मायासे तर पाते हैं। त्रिगुणा प्रकृति, दुर्गा, वैष्णवी, सनातनी परा नारायणी और ईशानी—ये सब आपकी मायाके स्वरूप हैं। इनसे पार पाना अत्यन्त कठिन है। प्रत्येक विश्वमें होनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही अंश हैं। जैसे विश्वेश्वर श्रीकृष्ण गोकुलमें वास करते हैं; उसी तरह जो समस्त लोकोंके आश्रय हैं, वे महान् विराट् योगबलसे जलमें शयन करते हैं। वे ही भगवान् वासु हैं, जिनके परम देवता आप हैं; इसीसे ‘वासुदेव’ नामसे विख्यात हैं—ऐसा पुरातत्त्ववेत्ता कहते हैं। आप ही अपनी कलासे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, पवन, वरुण, कुबेर, यम, महेन्द्र, धर्म, शेष, ईशान तथ निर्ऋतिके रूपमें विराजमान हैं। मुनिसमुदाय, मनुगण, फलदायक ग्रह और समस्त चराचर जीव आपकी कलाके कलांशसे उत्पन्न हुए हैं। आप ही परम ज्योतिः-स्वरूप ब्रह्म हैं। योगीलोग आपका ही ध्यान करते हैं। आपके भक्तगण अपने अन्तःकरणमें आपका ही आदर करते तथा ध्यान लगाते हैं। (ध्यानका प्रकार यों है—)

जिनके शरीरका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है, पीताम्बर ही जिनका परिधान है, जिनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, जो भक्तोंके स्वामी तथा भक्तवत्सल हैं, जिनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त है, जिनकी दो भुजाएँ हैं, जो मुरली धारण किये हुए हैं, जिनकी चूड़ामें मयूरपिच्छ शोभा दे रहा है; जो मालतीकी माला, अमूल्य रत्ननिर्मित बाजूबंद और कंकणसे विभूषित हैं, मणियोंके बने हुए दोनों कुण्डलोंसे जिनका गण्डस्थल उद्भासित हो रहा है, जो रत्नोंके सारभागसे बनी हुई अँगूठी और बजती हुई करधनीसे सुसज्जित हैं, जिनकी आभा करोड़ों कामदेवोंका उपहास कर रही है, जिनके नेत्र शारदीय कमलकी शोभाको पराजित कर रहे हैं, जिनकी मुख-छबि शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी निन्दा कर रही है और प्रभा करोड़ों चन्द्रमाओंके समान

· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ७७३

समुज्ज्वल है; करोड़ों-करोड़ों गोपियाँ मुसकराती हुई जिनकी ओर निहार रही हैं, समवयस्क गोप-पार्षद श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा कर रहे हैं, जिनका वेष गोपालकके सदृश है; जो राधाके वक्षःस्थलपर स्थित एवं ध्यानद्वारा असाध्य और दुराराध्य हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष जिनकी वन्दना करते हैं और सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र प्रणत होकर जिनका स्तवन करते हैं; जो वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, परस्वेच्छामय और सर्वव्यापक हैं एवं जिनका स्वरूप स्थूलसे स्थूलतम और सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम है; जो सत्य, नित्य, प्रशस्त, प्रकृतिसे परे, ईश्वर, निर्लिप्त और निरीह हैं; उन सनातन भगवान्‌का इस प्रकार ध्यान करके वे पवित्र हो जाते हैं और पद्माद्वारा समर्चित चरणकमलोंमें कोमल दूर्वाङ्कुर, अक्षत तथा जल निवेदित करनेके लिये उत्सुक हो उठते हैं। भगवन् ! वेद, सरस्वती, शेषनाग, ब्रह्मा, शम्भू, गणेश, सूर्य, चन्द्रमा, महेन्द्र और कुबेर—ये सभी आप परमेश्वरका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं; फिर अन्य जडबुद्धि जीवोंकी तो गणना ही क्या है। ऐसी दशामें मैं आप गुणातीत, निरीह, निर्गुण परमेश्वरकी क्या स्तुति कर सकता हूँ? नाथ ! यह एक मूर्ख असुर है, सुर नहीं है; अतः आप इसे क्षमा करें। बलिक कथन सुनकर जगदीश्वर परिपूर्णतम भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरि अपने उस भक्तसे बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा— वत्स! डरो मत। तुम मेरे द्वारा सुरक्षित अपने गृह सुतललोकको जाओ। मेरे वर-प्रसादसे तुम्हारा यह पुत्र भी अजर-अमर होगा। मैं इस मूर्ख अभिमानीके दर्पका ही विनाश करूँगा; क्योंकि मैंने प्रसन्नचित्तसे अपने तपस्वी भक्त प्रह्लादको ऐसा वर दे रखा है कि 'तुम्हारा वंश मेरे द्वारा अवध्य होगा।' मैं तुम्हारे पुत्रको मृत्युञ्जय नामक परम ज्ञान प्रदान करूँगा। तुमने जिस सामवेदोक्त अभीष्ट स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन किया है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्माने सूर्य-ग्रहणके अवसरपर प्रशस्त पुण्यतम सिद्धाश्रममें सनत्कुमारको प्रदान किया था। गौरीने मन्दाकिनीके तटपर इसे गौतमको बतलाया था। दयालु शंकरने अपने भक्त शिष्य ब्रह्माको इसका उपदेश किया था। विरजाके तटपर मैंने इसे शिवको प्रदान किया था। पूर्वकालमें बुद्धिमान् सनत्कुमारने इसे महर्षि भृगुको बतलाया था। इस समय तुम इसे बाणको दोगे और बाण इसके द्वारा मेरा स्तवन करेगा। यह स्तोत्र महान् पुण्यदायक है। जो मनुष्य भलीभाँति स्नानसे शुद्ध हो वस्त्र, भूषण और चन्दन आदिसे गुरुका वरण और पूजन करके उनके मुखसे इस स्तोत्रका उपदेश ग्रहणकर नित्य पूजाके समय भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, वह अपने करोड़ों जन्मोंके संचित पापसे मुक्त हो जायगा—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यह स्तोत्र विपत्तियोंका विनाशक, समस्त सम्पत्तियोंका कारण, दुःख-शोकका निवारक, भयंकर भवसागरसे उद्धार करनेवाला, गर्भवासका उच्छेदक, जरा-मृत्युका हरण करनेवाला, बन्धनों और रोगोंका खण्डन करनेवाला तथा भक्तोंके लिये शृङ्गार-स्वरूप है। जो इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसने मानो समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया, सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली, सभी व्रतोंका अनुष्ठान कर लिया और सभी तपस्याएँ पूर्ण कर लीं। उसे निश्चय ही सम्पूर्ण दानोंका सत्य फल प्राप्त हो जाता है। इस स्तोत्रका एक लाख पाठ करनेसे मनुष्योंको स्तोत्रसिद्धि मिल जाती है। यदि स्तोत्र सिद्ध हो जाय तो उसे सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। वह इस लोकमें देवतुल्य होकर अन्तमें श्रीहरिके पदको प्राप्त हो जाता है। (अध्याय ११९)

७७४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बाणका यादवी सेनाके साथ युद्ध, बाणका धराशायी होना, शंकरजीका बाणको उठाकर श्रीकृष्णके चरणोंमें डाल देना, श्रीकृष्णद्वारा बाणको जीवन-दान, बाणका श्रीकृष्णको बहुत-से दहेजके साथ अपनी कन्या समर्पित करना, श्रीकृष्णका पौत्र और पौत्रवधूके साथ द्वारकाको लौट जाना और द्वारकामें महोत्सव

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने उद्धव और बलदेवके साथ शुभ मन्त्रणा करके बाणके पास दूत भेजा। तब उस दूतने—जहाँ शिव, गणपति, दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, कार्तिकेय, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी—ये सब विद्यमान थे, वहाँ आकर शिव, शिवा, गणेश और पूजनीय मानवोंको नमस्कार किया और यथोचित वचन कहा।

दूत बोला— महेश्वर! भगवान् श्रीकृष्ण बाणको युद्धके लिये ललकार रहे हैं; अतः वह या तो युद्ध करे अथवा अनिरुद्ध और उषाको लेकर उनके शरणापन्न हो जाय; क्योंकि रणके लिये बुलाये जानेपर जो पुरुष भयभीत होकर सम्मुख युद्धार्थ नहीं जाता है, वह परलोकमें अपने सात पूर्वजोंके साथ नरकगामी होता है। दूतकी बात सुनकर स्वयं पार्वतीदेवी सभाके मध्यमें शंकरजीके संनिकट ही यथोचित वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा— महाभाग बाण! तुम अपनी कन्याको लेकर उनके पास जाओ और प्रार्थना करो। फिर अपना सर्वस्व दहेजमें देकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि वे सबके ईश्वर तथा कारण, समस्त सम्पत्तियोंके दाता, श्रेष्ठ, वरेण्य, आश्रयस्थान, कृपालु और भक्तवत्सल हैं। पार्वतीका वचन सुनकर सभामें उपस्थित सभी सुरेश्वरोंने धन्य-धन्य कहते हुए उनकी प्रशंसा की और बाणसे वैसा करनेके लिये कहा; परंतु बाण क्रोधसे आगबबूला हो उठा, उसका शरीर काँपने लगा और नेत्र लाल हो गये। फिर तो वह असुर सहसा उठ खड़ा हुआ और सबके मना करनेपर भी कवचसे सुसज्जित हो हाथमें धनुष ले शंकरजीको प्रणाम करके करोड़ों कवचधारी महाबली दैत्योंके साथ चल पड़ा। तब कुम्भाण्ड, कूपकर्ण, निकुम्भ और कुम्भ—इन प्रधान सेनापतियोंने भी कवच धारण करके उसका अनुगमन किया। फिर उन्मत्तभैरव, संहारभैरव, असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, महाभैरव, कालभैरव, प्रचण्डभैरव और क्रोधभैरव—ये सभी भी कवच धारण करके शक्तियोंके साथ गये। कवचधारी भगवान् कालाग्निरुद्रने भी रुद्रोंके साथ गमन किया। उग्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डिका, चण्डनायिका, चण्डेश्वरी, चामुण्डा, चण्डी और चण्डक पालिका—ये सभी आठों नायिकाएँ हाथमें खप्पर ले उसके पीछे-पीछे चलीं। शोणितपुरकी ग्रामदेवता कोटरीने भी रत्ननिर्मित रथपर सवार हो प्रस्थान किया। उस समय उसका मुख प्रफुल्लित था और वह खड्ग तथा खप्पर लिये हुए थी। चन्द्राणी, शान्तस्वरूपा वैष्णवी, ब्रह्मवादिनी ब्रह्माणी, कौमारी, नारसिंही, विकट आकारवाली वाराही, महामाया माहेश्वरी और भीमरूपिणी भैरवी—ये सभी आठों शक्तियाँ हर्षपूर्वक रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकलीं। जो रक्तवर्णवाली और त्रिनेत्रधारिणी हैं तथा जीभ लपलपानेके कारण जो भयंकर प्रतीत होती हैं, वे भद्रकालिका हाथोंमें शूल, शक्ति, गदा, खड्ग और खप्पर धारण करके बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे बने हुए रथपर सवार होकर चलीं। फिर महेश्वर हाथमें त्रिशूल ले नन्दीश्वरपर चढ़कर तथा धनुर्धर स्कन्द हाथमें शस्त्र ले अपने वाहन मयूरपर सवार होकर चले। इस प्रकार गणेश और पार्वतीको छोड़कर शेष

• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७५

सभी लोगोंने बाणका अनुगमन किया। इन सबसे युक्त महादेव और भद्रकालिकाको देखकर चक्रपाणि श्रीकृष्णने यथोचितरूपसे सम्भाषण किया। तदनन्तर बाणने शङ्खध्वनि करके पार्वतीश्वर शिवको प्रणाम किया और धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ाकर उसपर दिव्यास्त्रका संधान किया।

इस प्रकार बाणको युद्धके लिये उद्यत देखकर शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले सात्यकि उपस्थित सभी लोगोंके द्वारा मना किये जानेपर भी कवच धारण करके हर्षपूर्वक आगे बढ़े। नारद! तब बाणने उनपर मञ्छन नामक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया। वह अस्त्र अमोघ, ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यके समान प्रकाशमान तथा अत्यन्त तीखा था। फिर तो घोर युद्ध होने लगा। परस्पर बड़े-बड़े घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया गया। भयानक समर होते-होते जब भगवान् कालाग्नि नामक रुद्रके महाबली हलधर बलदेवजीको बाणासुरका वध करनेके लिये तैयार देखा, तब उन्होंने उनको रोक दिया। इसपर बलदेवजीने क्रुद्ध होकर कालाग्निरुद्रके रथ, घोड़े और सारथिका नाश कर दिया। तब कालाग्निरुद्रने कोपमें भरकर भयंकर ज्वर छोड़ा। इससे श्रीहरिके अतिरिक्त अन्य सभी यादव ज्वरसे आक्रान्त हो गये। उस ज्वरको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने वैष्णव-ज्वरकी सृष्टि की और उस रणके मुहानेपर माहेश्वर-ज्वरका विनाश करनेके लिये उसे चला दिया। फिर तो दो घड़ीतक उन दोनों ज्वरोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें उस रणाङ्गणमें वैष्णव-ज्वरसे आक्रान्त होकर माहेश्वर-ज्वर धराशायी हो गया, उसकी सारी चेष्टाएँ शान्त हो गयीं। पुनः चेतनामें आकर वह माधवकी स्तुति करने लगा।

ज्वर बोला— भक्तानुग्रहमूर्तिधारी भगवन्! आप सबके आत्मा और पूर्णपुरुष हैं; सबपर आपका समान प्रेम है, अतः जगन्नाथ! मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये।

उस ज्वरके विनीत वचनको सुनकर श्रीकृष्णने अपने वैष्णव-ज्वरको लौटा लिया। तब माहेश्वर-ज्वर भयभीत होकर रणभूमिसे भाग खड़ा हुआ।

तत्पश्चात् बाणने पुनः आकर ऐसे हजारों बाण चलाये, जो प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान तथा मन्त्रोंद्वारा पावन किये गये थे; परंतु अर्जुनने खेल-ही-खेलमें अपने बाणसमूहोंद्वारा उन्हें रोक दिया। तब बाणने

७७६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान चमकीली शक्ति चलायी, किंतु महाबली अर्जुनने उसे भी अनायास ही काट गिराया। यह देखकर बाणने पाशुपतास्त्रको, जिसकी प्रभा सैकड़ों सूर्योंके समान थी और जो अत्यन्त भयंकर, अमोघ तथा विश्वका संहार करनेवाला था, हाथमें लिया। उसे देखकर चक्रपाणिने अपने भयंकर सुदर्शनचक्रको चला दिया। उस चक्रने रणभूमिमें बाणके हजारों हाथोंको काट डाला और वह भयंकर पाशुपतास्त्र पहाड़ी सिंहकी तरह भूमिपर गिर पड़ा। तदनन्तर जो प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान, लोकमें दारुण तथा अमोघ है; वह पाशुपतास्त्र पशुपति शिवके हाथमें लौट गया। बाणके शरीर-रक्तसे वहाँ भयंकर नदी बह चली और बाण चेष्टारहित होकर भूमिपर गिर पड़ा। उस समय व्यथाके कारण उसकी चेतना नष्ट हो गयी थी। तब जगद्गुरु भगवान् महादेव वहाँ आये और बाणको उठाकर उन्होंने अपनी छातीसे लगा लिया। फिर बाणको लेकर वे वहाँ चले, जहाँ भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर

उन्होंने पद्माद्वारा समर्चित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें बाणको समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् बलिने जिस वेदोक्त स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की थी, उसी स्तोत्रद्वारा चन्द्रशेखरने शक्तियोंके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया। तब श्रीहरिने बुद्धिमान् बाणको 'मृत्युञ्जय' नामक ज्ञान प्रदान किया और उसके शरीरपर अपना कर-कमल फिराकर उसे अजर-अमर बना दिया।

तदनन्तर बाणने बलिकृत स्तोत्रद्वारा भक्तिपूर्वक श्रीहरिका स्तवन किया और उसी देवसमाजमें रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित अपनी श्रेष्ठ कन्या उषाको लाकर भक्तिसहित श्रीकृष्णको प्रदान कर दिया। फिर उसने भक्तिपूर्वक कंधे झुकाकर पाँच लाख गजराज, बीस लाख घोड़े, रत्नाभरणोंसे विभूषित एक हजार दासियाँ, सब कुछ प्रदान करनेवाली बछड़ोंसहित एक सहस्र गौएँ, करोड़ों-करोड़ों मनोहर माणिक्य, मोती, रत्न, श्रेष्ठ मणियाँ और हीरे तथा हजारों सुवर्णनिर्मित जलपात्र एवं भोजनपात्र श्रीकृष्णको दहेजमें दिये। नारद! फिर बाणने शंकरजीकी आज्ञासे सभी तरहके अग्निशुद्ध श्रेष्ठ महीन वस्त्र तथा ताम्बूल और उसकी सामग्रियोंके विविध प्रकारके हजारों श्रेष्ठ पूर्णपात्र भक्तिपूर्ण हृदयसे दहेजमें दिये। तत्पश्चात् कन्याको भी श्रीहरिके चरणकमलोंमें समर्पित करके वह ढाह मारकर रो पड़ा। इस प्रकार उसने वह कार्य सम्पन्न किया। तब श्रीकृष्ण बाणको वेदोक्त मधुर वचनोंद्वारा वरदान देकर शंकरजीकी अनुमतिसे द्वारकापुरीको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर स्वयं श्रीहरिने महात्मा बाणकी उस कन्याको नवोढ़ा (नवविवाहिता वधू) समझकर शीघ्र ही देवकी और रुक्मिणीके हाथों सौंप दिया; फिर यत्नपूर्वक मङ्गल-महोत्सव कराया, ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें बहुत-सा धन-दान किया।

(अध्याय १२०)