ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
श्रीराधाकी प्रार्थनासे भगवान्का सब वस्तुएँ लौटा देना, व्रतका विधान, दुर्गाका ध्यान, गौरी-व्रतकी कथा, लक्ष्मीस्वरूपा वेदवतीका सीता होकर इस व्रतके प्रभावसे श्रीरामको पतिरूपमें पाना, सीताद्वारा की हुई पार्वतीकी स्तुति, श्रीराधा आदिके द्वारा व्रतान्तमें दान, देवीका उन सबको दर्शन देकर राधाको स्वरूपकी स्मृति कराना, उन्हें अभीष्ट वर देना तथा श्रीकृष्णका राधा आदिको पुनः दर्शनसम्बन्धी मनोवाञ्छित वर देना
• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४७
भगवान् शंकरके अंश हैं तथा तेजमें भी उन्हींके
समान हैं। फिर कौन ऐसा महातेजस्वी पुरुष था,
जिसने उनका भी पराभव कर दिया ?
भगवान् श्रीनारायणने कहा - मुने ! सूर्यवंशमें
अम्बरीष नामसे प्रसिद्ध एक राजाधिराज (सम्राट्)
हो गये हैं। उनका मन सदा श्रीकृष्णके
चरणकमलोंके चिन्तनमें ही लगा रहता था।
राज्यमें, रानियोंमें, पुत्रोंमें, प्रजाओंमें तथा पुण्य
कर्मोंद्वारा अर्जित की हुई सम्पत्तियोंमें भी उनका
चित्त क्षणभरके लिये भी नहीं लगता था। वे
धर्मात्मा नरेश दिन-रात सोते-जागते हर समय
प्रसन्नतापूर्वक श्रीहरिका ध्यान किया करते थे।
राजा अम्बरीष बड़े भारी जितेन्द्रिय, शान्तस्वरूप
तथा विष्णुसम्बन्धी व्रतोंके पालनमें तत्पर रहते
थे। वे एकादशीका व्रत रखते और श्रीकृष्णकी
आराधनामें संलग्न रहते थे। उनके सारे कर्म
श्रीकृष्णको समर्पित थे और वे उनमें कभी लिप्त
नहीं होते थे।
भगवान्का सोलह अरोंसे युक्त और अत्यन्त
तीक्ष्ण जो सुदर्शन नामक चक्र है, वह करोड़ों
सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा श्रीहरिके ही तुल्य
तेजस्वी है। ब्रह्मा आदि भी उसकी स्तुति करते
हैं। वह अस्त्र देवताओं और असुरोंसे भी पूजित
है। भगवान्ने अपने उस चक्रको राजाकी निरन्तर
रक्षाके लिये उनके पास ही रख दिया था।
एक समयकी बात है। राजा अम्बरीष
एकादशी-व्रतका अनुष्ठान करके द्वादशीके दिन
समयानुसार विधिपूर्वक स्नान और पूजन करके
ब्राह्मणोंको भोजन करा स्वयं भी भोजनके लिये
बैठे। इसी समय तपस्वी ब्राह्मण दुर्वासा भूखसे
व्याकुल हो वहाँ राजाके समक्ष आ गये। उन्होंने
दण्ड और छत्र ले रखा था, उनके शरीरपर श्वेत
वस्त्र शोभा पा रहे थे। ललाटमें उज्ज्वल तिलक
चमक रहा था। सिरपर जटाएँ थीं और शरीर
अत्यन्त कृश हो रहा था। वे त्रस्त-से जान पड़ते
थे। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे।
मुनीन्द्रपर दृष्टि पड़ते ही राजाने उठकर उन्हें
प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक पैर धोनेके लिये
जल प्रस्तुत करके बैठनेको स्वर्णका सिंहासन
दिया। विप्रवर दुर्वासा उन्हें आशीर्वाद देकर उस
सुखद आसनपर बैठे। तब राजाने भयभीत होकर
उनसे पूछा-'मुने! मेरे लिये आपकी क्या आज्ञा
है? यह मुझे बताइये।' राजाकी बात सुनकर
मुनिवर दुर्वासाने कहा- 'नृपश्रेष्ठ ! मैं भूखसे
पीड़ित होकर यहाँ आया हूँ। अतः मुझे भोजन
कराओ; परंतु मैं अघमर्षण-मन्त्रका जप करके
शीघ्र ही आ रहा हूँ, क्षणभर प्रतीक्षा करो।' ऐसा
कहकर मुनि चले गये।
ब्राह्मण दुर्वासाके चले जानेपर राजर्षि अम्बरीषको
बड़ी भारी चिन्ता हुई। द्वादशी तिथि प्रायः बीत
चली है; यह देख वे डर गये। इसी समय गुरु
वसिष्ठ वहाँ आ गये। तब प्रसन्नतापूर्वक उन्हें
नमस्कार करके राजाने सारी बातें उन्हें बतायीं
और पूछा- 'गुरुदेव ! मुनिवर दुर्वासा अभीतक
आ नहीं रहे हैं और पारणाके लिये विहित
द्वादशी तिथि बीती जा रही है। ऐसे संकटके
समय मुझे क्या करना चाहिये ? इसपर भलीभाँति
विचार करके मुझे शीघ्र बताइये कि क्या करना
शुभ है और क्या अशुभ ?'
वसिष्ठजीने कहा - द्वादशीको बिताकर
त्रयोदशीमें पारण करना पाप है और अतिथिसे
पहले भोजन कर लेना भी पाप है। ऐसी दशामें
तुम भोजन न करके भगवान्का चरणोदक ले
लो। इससे पारणा भी हो जायगी और अतिथिकी
अवहेलना भी नहीं होगी।
महामुने ! ऐसा कहकर ब्रह्मपुत्र वसिष्ठजी
चुप हो गये। राजाने श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका
चिन्तन करते हुए थोड़ा-सा चरणोदक पी लिया।
ब्रह्मन् ! इतनेमें ही मुनीश्वर दुर्वासा आ पहुँचे।
वे सर्वज्ञ तो थे ही, अपना अपमान समझकर
५४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कुपित हो उठे। उन्होंने राजाके सामने ही अपनी
एक जटा तोड़ डाली। उस जटासे शीघ्र ही एक
पुरुष प्रकट हुआ, जो अग्निशिखाके समान
तेजस्वी था। उसके हाथमें तलवार थी। वह
महाभयंकर पुरुष महाराज अम्बरीषको मार डालनेके
लिये उद्यत हो गया। यह देख करोड़ों सूर्योंके
समान प्रकाशमान श्रीहरिके सुदर्शनचक्रने उस
कृत्या-पुरुषको काट डाला। अब वह बाबा
दुर्वासाको भी काटनेके लिये उद्यत हुआ। यह
देख विप्रवर दुर्वासा भयसे व्याकुल हो भाग
चले। उन्होंने अपने पीछे-पीछे प्रज्वलित अग्निशिखाके
समान तेजस्वी चक्रको आते देखा। वे अत्यन्त
व्याकुल हो सारे ब्रह्माण्डका चक्कर लगाते-
लगाते थक गये, खिन्न हो गये और ब्रह्माजीको
सम्पूर्ण जगत्का रक्षक मान उनकी शरणमें गये।
'बचाइये-बचाइये' - पुकारते हुए उन्होंने ब्रह्माजीकी
सभामें प्रवेश किया। ब्रह्माजीने उठकर विप्रवर
दुर्वासाका कुशल-मङ्गल पूछा। तब उन्होंने आदिसे
ही सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया।
सुनकर ब्रह्माजीने लम्बी साँस ली और भयसे
व्याकुल होकर कहा।
ब्रह्माजीने कहा- बेटा! तुम किसके
बलपर श्रीहरिके दासको शाप देने गये थे?
जिसके रक्षक भगवान् हैं, उसको तीनों लोकोंमें
कौन मार सकता है? भक्तवत्सल श्रीहरिने छोटे-
बड़े सभी भक्तोंकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्रको
सदा नियुक्त कर रखा है। जो मूढ़ श्रीविष्णुके
लिये प्राणोंके समान प्रिय वैष्णव भक्तसे द्वेष
रखता है, उसका संहार भगवान् विष्णु स्वयं
करते हैं। वे श्रीहरि संहारकर्ताका भी संहार
करनेमें समर्थ हैं। अतः बेटा! तुम शीघ्र किसी
दूसरे स्थानमें जाओ। अब यहाँ तुम्हारी रक्षा नहीं
हो सकती। यदि नहीं हटे तो सुदर्शनचक्र मेरे
साथ ही तुम्हारा वध कर डालेगा।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर ब्राह्मणदेवता दुर्वासा
वहाँसे भयभीत होकर भागे। अब वे डरकर
कैलास पर्वतपर भगवान् शंकरकी शरणमें
गये और बोले - 'कृपानिधान! हमारी रक्षा
कीजिये।' भगवान् शिव सर्वज्ञ हैं। उन्होंने
ब्राह्मण दुर्वासाका कुशल-समाचारतक नहीं
पूछा। जो क्षणभरमें जगत्का संहार करनेमें
समर्थ तथा दीन-दुःखियोंके स्वामी हैं, वे
महादेवजी मुनिसे बोले।
शंकरजीने कहा - द्विजश्रेष्ठ! सुस्थिर होकर
मेरी बात सुनो। मुने! तुम महर्षि अत्रिके पुत्र तथा
जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीके पौत्र हो। वेदोंके विद्वान् तथा
सर्वज्ञ हो, परंतु तुम्हारा कर्म मूर्खोंके समान है।
वेदों, पुराणों और इतिहासोंमें सर्वत्र जिन सर्वेश्वरका
निरूपण हुआ है; उन्हींको तुम मूढ़ मनुष्यकी
भाँति नहीं जानते हो। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे
मैं, ब्रह्मा, रुद्र, आदित्य, वसु, धर्म, इन्द्र, सम्पूर्ण
देवता, मुनीन्द्र और मनु उत्पन्न और विलीन होते
रहते हैं; उन्हीं श्रीहरिके प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय
भक्तको तुम किसकी शक्तिसे मारने चले थे?
उनका चक्र उन्हींके तुल्य तेजस्वी है। उसे रोकना
सर्वथा कठिन है। उस चक्रको यद्यपि उन्होंने
भक्तोंकी रक्षामें लगा रखा है, तथापि उन्हें उसपर
पूरा भरोसा नहीं होता। इसलिये वे स्वयं उनकी
रक्षा करनेके लिये जाते हैं। उनके मुँहसे अपने
गुणों और नामोंका श्रवण करके उन्हें बड़ा
आनन्द मिलता है। इसलिये भगवान् भक्तके साथ
सदा छायाकी तरह घूमते रहते हैं। अतः ब्राह्मणदेव!
गोविन्दका भजन करो। उनके चरणकमलोंका
चिन्तन करो। श्रीहरिके स्मरणमात्रसे भी सारी
आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। अब शीघ्र ही
वैकुण्ठधाममें जाओ। उस धामके अधिपति श्रीहरि
ही तुम्हारे शरणदाता हैं। वे प्रभु दयाके सागर
हैं; अतः तुम्हें अवश्य ही अभयदान देंगे।
ये बातें हो ही रही थीं कि सारा कैलास
चक्रके तेजसे व्याप्त हो उठा, जैसे समस्त
·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४९
भूमण्डल सूर्यकी किरणोंसे उद्दीप्त हो उठा हो।
उस समय सम्पूर्ण कैलासवासी उस चक्रकी
विकराल ज्वालासे संतप्त हो 'त्राहि-त्राहि' पुकारते
हुए भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उस दुःसह
चक्रको देख पार्वतीसहित करुणानिधान भगवान्
शंकरने ब्राह्मणको प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देते हुए
कहा- 'यदि तेज सत्य है और चिरकालसे
संचित तप सत्य है तो अपराध करके भयभीत
हुआ यह ब्राह्मण संतापसे मुक्त हो जाय।'
पार्वती बोलीं- यह ब्राह्मण मेरे स्वामीके
पुण्यकर्मोंके अवसरपर शरणमें आया है; अतः
मेरे आशीर्वादसे इसका महान् भय दूर हो जाय
और यह शीघ्र ही संतापसे छूट जाय।
कृपापूर्वक ऐसा कहकर पार्वती और शिव
चुप हो गये। मुनिने उन्हें प्रणाम करके देवेश्वर
वैकुण्ठनाथकी शरण ली। मनके समान तीव्र
गतिसे चलनेवाले मुनीश्वर दुर्वासा वैकुण्ठभवनमें
जाकर सुदर्शनको अपने पीछे-पीछे आते देख
श्रीहरिके अन्तःपुरमें घुस गये। वहाँ ब्राह्मणने
श्रीनारायणदेवके दर्शन किये। वे रत्नमय सिंहासनपर
विराजमान थे। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा
और पद्म शोभा पाते थे। उन परम प्रभुने पीताम्बर
धारण कर रखा था। उनके चार भुजाएँ थीं।
अङ्गकान्ति श्याम थी। वे शान्त-स्वरूप लक्ष्मी-
कान्त अपने दिव्य सौन्दर्यसे मनको मोह लेते थे।
रत्नमय अलंकारोंकी शोभा उन्हें और भी श्री-
सम्पन्न बना रही थी। गलेमें रत्नमयी मालासे वे
विभूषित थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी
छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके
लिये कातर दिखायी देते थे। उत्तम रत्नोंके सार-
तत्त्वसे निर्मित मुकुट धारण करके उनका मस्तक
अनुपम ज्योतिसे जगमगा रहा था। श्रेष्ठ पार्षदगण
हाथोंमें श्वेत चँवर लिये प्रभुकी सेवा कर रहे थे।
कमला उनके चरणकमलोंकी सेवामें लगी थीं।
सरस्वती सामने खड़ी हो स्तुति करती थीं।
सुनन्द, नन्द, कुमुद और प्रचण्ड आदि पार्षद
उन्हें घेरकर खड़े थे। ऐसे प्रभुको देख दुर्वासाने
दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर प्रणाम किया
और सामवेदवर्णित स्तुतिके द्वारा उन परमेश्वरका
स्तवन किया।
दुर्वासा बोले- कमलाकान्त ! मेरी रक्षा
कीजिये। करुणानिधे ! मुझे बचाइये। प्रभो ! आप
दीनोंके बन्धु और अत्यन्त दुः खियोंके स्वामी हैं।
दयाके सागर हैं। वेद-वेदाङ्गोंके स्रष्टा विधाताके
भी विधाता हैं। मृत्युकी भी मृत्यु और कालके भी
काल हैं। मैं संकटके समुद्रमें पड़ा हूँ। मेरी रक्षा
कीजिये। आप संहारकर्ताके भी संहारक, सर्वेश्वर
और सर्वकारण हैं। महाविष्णुरूपी वृक्षके बीज
हैं। प्रभो ! इस भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये।
शरणागत एवं शोकाकुल जनोंका भय दूर करके
उनकी रक्षामें लगे रहनेवाले भगवन् ! मुझ भयभीतका
उद्धार कीजिये। नारायण ! आपको नमस्कार है।
वेदोंमें जिन्हें आदिसत्ता कहा गया है, वेद भी
जिनकी स्तुति नहीं कर सकते और सरस्वती भी
जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाती हैं; उन्हीं
प्रभुकी दूसरे विद्वान् क्या स्तुति कर सकते हैं ?
शेष सहस्र मुखोंसे जिनकी स्तुति करनेमें जडभावको
प्राप्त होते हैं, पञ्चमुख महादेव और चतुर्मुख ब्रह्मा
भी जडीभूत हो जाते हैं, श्रुतियाँ, स्मृतिकार और
वाणी भी जिनकी स्तुतिमें अपनेको असमर्थ पाती
हैं; उन्हींका स्तवन मुझ-जैसा ब्राह्मण कैसे कर
सकता है ? मानद ! मैं वेदोंका ज्ञाता क्या हूँ,
वेदवेत्ता विद्वानोंका शिष्य हूँ। मुझमें आपकी स्तुति
करनेकी क्या योग्यता है ? अट्ठाईसवें मनु और
महेन्द्रके समाप्त हो जानेपर जिनका एक दिन-
रातका समय पूरा होता है, वे विधाता अपने वर्षसे
एक सौ आठ वर्षतक जीवित रहते हैं। परंतु जब
उनका भी पतन होता है, तब आपके नेत्रोंकी
एक पलक गिरती है; ऐसे अनिर्वचनीय परमेश्वरकी
मैं क्या स्तुति कर सकूँगा ? प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये।
५५०
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इस प्रकार स्तुति करके भयसे विह्वल हुए दुर्वासा श्रीहरिके चरणकमलोंमें गिर पड़े और अपने अश्रुजलसे उन्हें सींचने लगे। दुर्वासाद्वारा किये गये परमात्मा श्रीहरिके इस सामवेदोक्त जगन्मङ्गल नामक पुण्यदायक स्तोत्रका जो संकटमें पड़ा हुआ मनुष्य भक्तिभावसे पाठ करता है, नारायणदेव कृपया शीघ्र आकर उसकी रक्षा करते हैं।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! मुनिकी की हुई स्तुति सुनकर भक्तवत्सल भगवान् वैकुण्ठनाथ हँसकर अमृतकी वर्षा-सी करती हुई मधुर वाणीमें बोले।
श्रीभगवान्ने कहा—मुने! उठो, उठो। मेरे वरसे तुम्हारा कल्याण होगा; परंतु मेरा नित्य सत्य एवं सुखदायक वचन सुनो। ब्राह्मणदेव! वेदों, पुराणों और इतिहासोंमें वैष्णवोंकी जो महिमा गायी गयी है, उसे सबने और सर्वत्र सुना है। मैं वैष्णवोंके प्राण हूँ और वैष्णव मेरे प्राण हैं। जो मूढ़ उन्हींसे द्वेष करता है, वह मेरे प्राणोंका हिंसक है। जो अपने पुत्रों, पौत्रों और पत्नियों तथा राज्य और लक्ष्मीको भी त्यागकर सदा मेरा ही ध्यान करते हैं, उनसे बढ़कर मेरा प्रिय और कौन हो सकता है? भक्तसे बढ़कर न मेरे प्राण हैं, न लक्ष्मी हैं, न शिव हैं, न सरस्वती हैं, न ब्रह्मा हैं, न पार्वती हैं और न गणेश ही हैं। ब्राह्मण, वेद और वेदमाता सरस्वती भी मेरी दृष्टिमें भक्तोंसे बढ़कर नहीं हैं। इस प्रकार मैंने सब सच्ची बात कही है। यह वास्तविक सार तत्त्व है। मैंने भक्तोंकी प्रशंसाके लिये कोई बात बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कही है। वे वास्तवमें मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। जो मेरे प्राणाधिक प्रिय भक्तोंसे द्वेष करते हैं, उनको मैं शीघ्र ही दण्ड देता हूँ और परलोकमें भी चिरकालतक उन्हें नरकयातना भोगनी पड़ती है। मैं सबकी उत्पत्तिका कारण तथा सबका ईश्वर और परिपालक हूँ। सर्वव्यापी एवं स्वतन्त्र हूँ, तथापि दिन-रात भक्तोंके अधीन रहता हूँ। गोलोकमें मेरा द्विभुज रूप है और वैकुण्ठमें चतुर्भुज। यह रूपमात्र ही उन-उन लोकोंमें रहता है; किंतु मेरे प्राण तो सदा भक्तोंके समीप ही रहते हैं। भक्तका दिया हुआ अन्न साधारण हो तो भी मेरे लिये सादर भक्षण करनेयोग्य है; परंतु अभक्तका दिया हुआ अमृतके समान मधुर द्रव्य भी मेरे लिये अभक्ष्य है। ब्रह्मन्! राजाओंमें श्रेष्ठ अम्बरीष निरीह हैं—सब प्रकारकी इच्छाएँ छोड़ चुके हैं। कभी किसीकी हिंसा नहीं करते हैं। स्वभावसे दयालु हैं और समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते हैं। ऐसे महात्मा पुरुषका वध तुम क्यों करना चाहते हो? जो संत महापुरुष सदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं; उनसे द्वेष रखनेवाले मूढ़जनोंका वध मैं स्वयं करता हूँ। जो भक्तोंका हिंसक है, शत्रु है, उसकी रक्षा करनेमें मैं असमर्थ हूँ। अतः तुम अम्बरीषके घर जाओ। वे ही तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! भगवान् श्रीहरिका वह वचन सुनकर ब्राह्मण दुर्वासा भयसे व्याकुल हो गये। उनके मनमें बड़ा खेद हुआ और वे श्रीकृष्णचरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए वहीं खड़े रहे। इसी समय वहाँ ब्रह्मा, शिव,
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५५१
पार्वती, धर्म, इन्द्र, रुद्र, दिक्पाल, ग्रह, मुनिगण, अत्रि, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्षद तथा नर्तकगण आये और सबने दुर्वासाके अपराधको क्षमा करके उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुसे करुण-प्रार्थना की।
[ तब ] श्रीभगवान् बोले—आप सब लोग मेरा नीतियुक्त और सुखदायक वचन सुनें। मैं आपकी आज्ञासे ब्राह्मणकी रक्षा अवश्य करूँगा; किंतु ये मुनि वैकुण्ठलोकसे पुनः राजा अम्बरीषके घर जायँ और उनकी प्रसन्नताके लिये वहीं पारणा करें। ये ब्रह्मर्षि अम्बरीषके अतिथि होकर भी बिना किसी अपराधके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये। इसलिये अपने रक्षणीय राजाकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्र इन ब्राह्मणदेवताको ही मार डालनेके लिये उद्यत हो गया। इन्हें भयभीत होकर भागते हुए आज पूरा एक वर्ष हो गया। तभीसे इनके लिये शोकग्रस्त हुए महाराज अम्बरीष अपनी पत्नीसहित उपवास कर रहे हैं। भक्तके उपवास करनेके कारण मैं भी उपवास करता हूँ। जैसे माता दूध-पीते बच्चेको उपवास करते देख स्वयं भी भोजन नहीं करती, वही दशा मेरी है। मेरे आशीर्वादसे मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा शीघ्र ही संतापमुक्त हो जायँगे। मार्गमें मेरा चक्र इनकी हिंसा नहीं करेगा। इनके भोजन करनेसे मेरा भक्त भोजन करेगा और तभी मैं भी आज निश्चिन्त होकर सुखसे भोजन करूँगा; यह निश्चित बात है। भक्तके द्वारा प्रीतिपूर्वक जो वस्तु मुझे दी जाती है, उसे मैं अमृतके समान मधुर मानकर ग्रहण करता हूँ। लक्ष्मीके हाथसे परोसे गये पदार्थको भी भक्तके दिये बिना मैं नहीं खा सकता। जिस पदार्थको भक्तने नहीं दिया, वह मुझे तृप्ति नहीं दे सकता। वत्स! महाप्राज्ञ मुनीन्द्र! तुम राजा अम्बरीषके घर जाओ तथा ये सब देवता, देवियाँ और मुनि अपने-अपने घरको पधारें।
ऐसा कहकर श्रीहरि तुरंत ही अपने अन्तःपुरमें चले गये तथा अन्य सब लोग उन जगदीश्वरको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट गये। मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले ब्राह्मण दुर्वासा राजा अम्बरीषके घरको गये। साथ ही करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान सुदर्शनचक्र भी गया। एक वर्षतक उपवास करनेके बाद राजाके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। वे सिंहासनपर बैठे हुए थे। उसी समय उन्होंने मुनिवर दुर्वासाको सामने देखा। देखते ही वे बड़े वेगसे उठे और तत्काल उनके चरणोंमें प्रणाम करके सादर भोजनके लिये ले गये। राजाने मुनिको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराकर फिर स्वयं भी अन्न ग्रहण किया। भोजन करके संतुष्ट हुए द्विजश्रेष्ठ दुर्वासाने उन्हें उत्तम आशीर्वाद दिया। बारंबार उनकी प्रशंसा की। तदनन्तर उन्होंने शीघ्र ही अपने आश्रमको प्रस्थान किया। मार्गमें वे विप्रवर आश्चर्यचकित हो मन-ही-मन कहने लगे—'अहो! वैष्णवोंका माहात्म्य दुर्लभ है।'
(अध्याय २५)
५५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
एकादशीव्रतका माहात्म्य, इसे न करनेसे हानि, व्रतके सम्बन्धमें आवश्यक निर्णय,
व्रतका विधान—छः देवताओंका पूजन, श्रीकृष्णका ध्यान और षोडशोपचार-
पूजन तथा कर्ममें न्यूनताकी पूर्तिके लिये भगवान्से प्रार्थना
तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर एकादशीका
माहात्म्य बताते हुए श्रीनारायणने कहा-मुने !
यह एकादशीव्रत देवताओंके लिये भी दुर्लभ है।
यह श्रीकृष्णप्रीतिका जनक तथा तपस्वियोंका
श्रेष्ठ तप है। जैसे देवताओंमें श्रीकृष्ण, देवियोंमें
प्रकृति, वर्णोंमें ब्राह्मण तथा वैष्णवोंमें भगवान्
शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार व्रतोंमें यह एकादशीव्रत
श्रेष्ठ है। यह चारों वर्णोंके लिये सदा ही पालनीय
व्रत है। यतियों, वैष्णवों तथा विशेषतः ब्राह्मणोंको
तो इस व्रतका पालन अवश्य करना चाहिये।
सचमुच ही ब्रह्महत्या आदि सारे पाप एकादशीके
दिन चावल (भात)-का आश्रय लेकर रहते हैं।
जो मन्द-बुद्धि मानव इतने पापोंका भक्षण करते
हुए चावल खाता है, वह इस लोकमें अत्यन्त
पातकी है और अन्तमें निश्चय ही नरकगामी होता
है। दशमीके लङ्घनमें जो दोष है, उसे बताता हूँ;
सुनो। पूर्वकालमें धर्मके मुखसे मैंने इसका श्रवण
किया था। जो मूढ़ जान-बूझकर कलामात्र
दशमीका लङ्घन करता है, उसे तुरंत ही दारुण
शाप देकर लक्ष्मी उसके घरसे निकल जाती हैं।
इस लोकमें निश्चय ही उसके वंशकी और यशकी
भी हानि होती है। जिस दिन दशमी, एकादशी
और द्वादशी तीनों तिथियाँ हों, उस दिन भोजन
करके दूसरे दिन उपवास-व्रत करना चाहिये।
द्वादशीको व्रत करके त्रयोदशीको पारण करना
चाहिये। उस दशामें व्रतधारियोंको द्वादशी-लङ्घनसे
दोष नहीं होता। जब पूरे दिन और रातमें एकादशी
हो तथा उसका कुछ भाग दूसरे दिन प्रातःकालतक
चला गया हो, तब दूसरे दिन ही उपवास करना
चाहिये। यदि परा तिथि बढ़कर साठ दण्डकी हो
गयी हो और प्रातःकाल तीन तिथियोंका स्पर्श हो
तो गृहस्थ पूर्व दिनमें ही व्रत करते हैं; यति आदि
नहीं। उन्हें दूसरे दिन उपवास करके नित्य-कृत्य
करना चाहिये। दो दिन एकादशी हो तो भी व्रतमें
सारा जागरण-सम्बन्धी कार्य पहली ही रातमें
करे। पहले दिनमें व्रत करके दूसरे दिन एकादशी
बीतनेपर पारण करे। वैष्णवों, यतियों, विधवाओं,
भिक्षुओं एवं ब्रह्मचारियोंको सभी एकादशियोंमें
उपवास करना चाहिये। वैष्णवेतर गृहस्थ शुक्लपक्षकी
एकादशीको ही उपवास-व्रत करते हैं। अतः
नारद! उनके लिये कृष्णा एकादशीका लङ्घन
करनेपर भी वेदोंमें दोष नहीं बताया गया है।
हरिशयनी और हरिबोधिनी-इन दो एकादशियोंके
बीचमें जो कृष्णा एकादशियाँ आती हैं, उन्हींमें
गृहस्थ पुरुषको उपवास करना चाहिये। इनके
सिवा दूसरी किसी कृष्णपक्षकी एकादशीमें गृहस्थ
पुरुषको उपवास नहीं करना चाहिये। ब्रह्मन् !
इस प्रकार एकादशीके विषयमें निर्णय कहा गया,
जो श्रुतिमें प्रसिद्ध है। अब इस व्रतका विधान
बताता हूँ, सुनो।
दशमीके दिन पूर्वाह्नमें एक बार हविष्यान्न
भोजन करे। उसके बाद उस दिन फिर जल
भी न ले। रातमें कुशकी चटाईपर अकेला शयन
करे और एकादशीके दिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर
प्रातःकालिक कार्य करके नित्य-कृत्य पूर्ण
करनेके पश्चात् स्नान करे। फिर श्रीकृष्णकी
प्रसन्नताके उद्देश्यसे व्रतोपवासका संकल्प लेकर
संध्या-तर्पण करनेके अनन्तर नैत्यिक पूजन आदि
करे। दिनमें नैत्यिक पूजन करके व्रतसम्बन्धी
आवश्यक सामग्रीका संग्रह करे। षोडशोपचार-
सामग्रीका सानन्द संग्रह करके शास्त्रीय विधिसे
प्रेरित हो आवश्यक कार्य करे। षोडश उपचारोंके
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५५३
नाम ये हैं—आसन, वस्त्र, पाद्य, अर्घ्य, पुष्प, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, स्नानीय पदार्थ, ताम्बूल, मधुपर्क और पुनराचमनीय जल—इन सब सामानोंको दिनमें जुटाकर रातमें व्रत-सम्बन्धी पूजनादि कार्य करे।
स्नान आदिसे पवित्र हो धुले हुए धौत और उत्तरीय वस्त्र धारण करके आसनपर बैठे। फिर आचमन-प्राणायामके पश्चात् श्रीहरिको नमस्कार करके स्वस्तिवाचन करे। तदनन्तर शुभ बेलामें सप्तधान्यके ऊपर मङ्गल-कलशकी स्थापना करके उसके ऊपर फल-शाखासहित आम्रपल्लव रखे। कलशमें चन्दनका अनुलेप करे और मुनियोंने वेदोंमें कलशके स्थापन और पूजनकी जो विधि बतायी है, उसका प्रसन्नतापूर्वक सम्पादन करे। फिर अलग-अलग धान्यपुञ्जपर छः देवताओंका आवाहन करके विद्वान् पुरुष उत्कृष्ट पञ्चोपचार-सामग्रीद्वारा उनका पूजन करे। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती। इन सबकी पूजा और वन्दना करके श्रीहरिका स्मरण करते हुए व्रत करे। व्रती पुरुष यदि इन छः देवताओंकी आराधना किये बिना नित्य और नैमित्तिक कर्मका अनुष्ठान करता है तो उसका वह सारा कर्म निष्फल हो जाता है। इस प्रकार व्रतकी अङ्गभूत सारी आवश्यक विधि बतायी गयी। इसका काण्वशाखामें वर्णन है। महामुने! अब तुम अभीष्ट व्रतके विषयमें सुनो।
सामवेदमें बताये हुए ध्यानके अनुसार परात्पर भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करके मस्तकपर फूल रखकर फिर ध्यान करे। नारद! मैं गूढ़ ध्यान बता रहा हूँ, जो सबके लिये वाञ्छनीय है। इसे अभक्त पुरुषके सामने नहीं प्रकाशित करना चाहिये। भक्तोंके लिये तो यह ध्यान प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है। भगवान् श्रीकृष्णका शरीर-विग्रह नवीन मेघमालाके समान श्याम तथा सुन्दर है। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको तिरस्कृत करता है। वे सर्वश्रेष्ठ एवं परम मनोहर हैं। उनके नेत्र शरत्कालके सूर्योदयकी बेलामें विकसित होनेवाले कमलोंकी प्रभाको छीन लेते हैं। विभिन्न अङ्गोंमें धारित रत्नमय आभूषण उनके अपने ही अङ्गोंकी सौन्दर्य-शोभासे विभूषित होते हैं। गोपियोंके प्रसन्नतापूर्ण एवं अनुरागसूचक नेत्रकोण उन्हें सतत निहारते रहते हैं, मानो भगवान्का शरीर-विग्रह उनके प्राणोंसे ही निर्मित हुआ है। वे रासमण्डलके मध्यभागमें विराजमान तथा रासोल्लासके लिये अत्यन्त उत्सुक हैं। राधाके मुखरूपी शरच्चन्द्रकी सुधाका पान करनेके लिये चकोररूप हो रहे हैं। मणिराज कौस्तुभकी प्रभासे उनका वक्षःस्थल अत्यन्त उद्भासित हो रहा है और पारिजात-पुष्पोंकी विविध मालाओंसे वे अत्यन्त शोभायमान हैं। उनका मस्तक उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित दिव्य मुकुटकी ज्योतिसे जगमगा रहा है। मनोविनोदकी साधनभूता मुरलीको उन्होंने अपने हाथमें ले रखा है। देवता और असुर सभी उनकी पूजा करते हैं। वे ध्यानके द्वारा भी किसीके वशमें आनेवाले नहीं हैं। उन्हें आराधनाद्वारा रिझा लेना भी बहुत कठिन है। ब्रह्मा आदि देवता भी उनकी वन्दना करते हैं और वे समस्त कारणोंके भी कारण हैं; उन परमेश्वर श्रीकृष्णका मैं भजन करता हूँ।
इस विधिसे ध्यान और आवाहन करके पूर्वोक्त सोलह प्रकारकी उपहार-सामग्री अर्पित करते हुए भक्तिभावसे उनका पूजन करे। नारद! निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे उन्हें पूजनोपचार अर्पित करने चाहिये।
आसन
परमेश्वर! यह रत्नसारजटित सुवर्णनिर्मित सिंहासन भाँति-भाँतिके विचित्र चित्रोंसे अलंकृत है। इसे ग्रहण कीजिये।
वस्त्र
‘राधावल्लभ! विश्वकर्माद्वारा निर्मित इस दिव्य वस्त्रको प्रज्वलित आगमें धोकर शुद्ध किया गया
५५४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
है। इसका मूल्य वर्णनातीत है। इसे धारण कीजिये।
पाद्य
करुणानिधान! आपके चरणोंको पखारनेके लिये सुवर्णमय पात्रमें रखा हुआ यह सुवासित शीतल जल स्वीकार कीजिये।
अर्घ्य
भक्तवत्सल! शङ्ख-पात्रमें रखे गये जल, पुष्प, दूर्वा तथा चन्दनसे युक्त यह पवित्र अर्घ्य आपकी सेवामें प्रस्तुत है। इसे ग्रहण कीजिये।
पुष्प
सर्वकारण! चन्दन और अगुरुसे युक्त यह सुवासित श्वेत पुष्प शीघ्र ही आपके मनमें आनन्दका संचार करनेवाला है। इसे स्वीकार कीजिये।
अनुलेपन
श्रीकृष्ण! चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम और खससे तैयार किया गया यह उत्तम अनुलेपन सबको प्रिय है। इसे ग्रहण कीजिये।
धूप
भगवन्! नाना द्रव्योंसे मिश्रित यह सुगन्धयुक्त सुखद धूप वृक्षविशेषका रस है। इसे स्वीकार कीजिये।
दीप
प्रभो! रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित तथा दिन-रात भलीभाँति प्रकाशित होनेवाला यह दिव्य दीप अन्धकार-नाशका हेतु है। इसे ग्रहण कीजिये।
नैवेद्य
स्वात्माराम! ये नाना प्रकारके स्वादिष्ट, सुगन्धित और पवित्र भक्ष्य, भोज्य तथा चोष्य आदि द्रव्य आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। इन्हें अङ्गीकार कीजिये।
यज्ञोपवीत
देवदेवेश्वर! गायत्री-मन्त्रसे दी गयी ग्रन्थिसे युक्त तथा सुवर्णमय तन्तुओंसे निर्मित यह चतुर शिल्पीद्वारा रचित यज्ञोपवीत ग्रहण कीजिये।
भूषण
नन्दनन्दन! बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित दिव्य प्रभासे प्रकाशमान तथा समस्त अवयवोंको विभूषित करनेवाला यह भूषण स्वीकार कीजिये।
गन्ध
दीनबन्धो! समस्त मङ्गल-कर्ममें वर्णनीय तथा मङ्गलदायक यह प्रमुख गन्ध सेवामें समर्पित है। इसे स्वीकार कीजिये।
स्नानीय
भगवन्! आँवला तथा बिल्वपत्रसे तैयार किया गया यह मनोहर विष्णु-तैल समस्त लोकोंको अभीष्ट है। इसे ग्रहण कीजिये।
ताम्बूल
नाथ! जिसे सब चाहते हैं, वह कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल मैंने आपकी सेवामें अर्पित किया है। इसे अङ्गीकार कीजिये।
मधुपर्क
गोपीकान्त! उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित पात्रमें रखा हुआ यह मधुर मधु बहुत ही मीठा और स्वादिष्ट है। इसके सेवनसे सबको प्रसन्नता होती है। अतः कृपापूर्वक इसे ग्रहण कीजिये।
पुनराचमनीय जल
मधुसूदन! यह परम पवित्र, सुवासित और निर्मल गङ्गा-जल पुनः आचमनके लिये अङ्गीकार कीजिये।
इस प्रकार भक्तपुरुष प्रसन्नतापूर्वक सोलह उपचार अर्पित करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे यत्नपूर्वक फूल और माला चढ़ावे।
प्रभो! श्वेत डोरेमें नाना प्रकारके फूलोंसे गुँथा हुआ यह पुष्पहार समस्त आभूषणोंमें श्रेष्ठ है। इसे स्वीकार कीजिये।
इस प्रकार पुष्पमाला अर्पित करके व्रती पुरुष मूल-मन्त्रसे पुष्पाञ्जलि दे और भक्तिभावसे दोनों हाथ जोड़कर भगवान्की स्तुति करे।