ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
उनका सत्कार और गणेशका अग्र पूजन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२५
शोक छोड़ दो और यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करो; क्योंकि अपने आत्मासे बढ़कर प्रिय दूसरा कुछ भी नहीं है।
इसपर पद्मावतीने, फिर चन्द्रमुखीने श्रीराधाके कृष्णप्रेमकी प्रशंसा करते हुए कहा—देखो, मेरी सखीने आहारका त्याग कर दिया है; अतः केवल साँस चलनेसे ये जीवित प्रतीत होती हैं। इसलिये अब तुम अपने मुखसे श्रीकृष्णकी प्रशंसा करो; क्योंकि श्रीकृष्णके नाम-स्मरणसे, उनकी गुणगाथाके श्रवणसे और उनके शुभ समाचारके सुननेसे इनमें सहसा चेतना लौट आती है।
तदनन्तर शशिकलाने कहा—माधवि ! ब्रह्मा आदि देवता तथा चारों वेद जिनके ध्यानमें मग्न रहते हैं, जिनके देवताओंद्वारा अभीप्सित चरणकमलका संतलोग सदा ध्यान करते हैं; पद्मा, सरस्वती, दुर्गा, अनन्त, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र, मनुगण और महेश्वर भी जिन्हें नहीं जान पाते; उन परमात्मा श्रीकृष्णको तुम क्या जानती हो? जो सर्वात्मा हैं, उनका कैसा रूप ? और जो निर्गुण हैं, उनके कैसे गुण ? सत्यस्वरूप भगवान्के जिस सत्य स्वरूपका वर्णन किया गया है, जो सुखदायक, आह्लादजनक, रमणीय, भक्तानुग्रह-मूर्ति, लीलाधाम और मङ्गलोंका आश्रयस्थान है, जिसकी लावण्यता करोड़ों कामदेवोंसे बढ़कर है, जिस जनमनोहर रूपसे बढ़कर अनिर्वचनीय कोई भी रूप नहीं है; उसी मनोहर रूपको श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारनेके समय धारण करते हैं। मन्दाकिनीका मीठा जल जिनके मधुर पादपद्मोंका धोवन है, जिसे परात्पर सर्वेश्वर शंकर भक्तिपूर्वक अपने सिरपर धारण करते हैं, विरक्त होकर सदा उन तीर्थकीर्ति श्रीकृष्णका कीर्तन करते रहते हैं तथा आहार, भूषण और वस्त्रका परित्याग करके दिगम्बर हो भक्तिके आवेशमें क्षणभरमें नाचने लगते हैं और क्षणभरमें गाने लगते हैं। ब्रह्मा,
शेष, सनत्कुमार और योगवेत्ता सिद्धोंके समुदाय उनके परम निर्मल शुभ्र ब्रह्मज्योतिःस्वरूपका ध्यान करके तपस्या एवं सेवाद्वारा जीवन-यापन करते हैं; उन श्रीकृष्णकी महिमा कौन जान सकता है?
फिर सुशीलाने श्रीकृष्णकी प्रशंसा करते हुए कहा—सखि ! ब्रह्मा, जो वेदोंके उत्पादक एवं ईश्वर हैं; जिन श्रीकृष्णकी स्तोत्रद्वारा स्तुति करते हैं, यह माधवी उन्हीं सत्य नित्य परमेश्वरकी निन्दा कर रही है; अतः यह सभा अपावन हो गयी और गोपियोंका जीवन तो व्यर्थ ही हो गया। इन गोपियोंमें केवल राधा ही पुण्यवती हैं; क्योंकि ये रात-दिन उन श्रीकृष्णका ध्यान करती रहती हैं; जिनके नामस्मरणमात्रसे करोड़ों जन्मोंमें एकत्र किये हुए पापका भय और शोक पूर्णतया नष्ट हो जाता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
तदनन्तर रत्नमाला और पारिजाता श्रीकृष्णकी महिमा बखानती हुई बोलीं—प्रिये ! ब्रह्माने जिस विश्वब्रह्माण्डकी रचना की है, वह महाविष्णुके रोमकूपमें अणुके सदृश स्थित है; क्योंकि उन विष्णुके शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने ही विश्व उनमें वर्तमान हैं और वे महाविष्णु इन परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। तब भला, श्रीकृष्णके यश, शौर्य और अनुपम महिमाका क्या बखान किया जा सकता है? अथवा यह गोपकन्या माधवी उसे क्या जान सकती है?
इसपर माधवीने अपने कथनका तात्पर्य समझाया। उनके उस वचनको सुनकर उद्धवके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे भक्तिविह्वल हो रुदन करते हुए मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। तत्पश्चात् परमेश्वर श्रीकृष्णका ध्यान करके वे अपनेको तुच्छ मानने लगे और भक्तिपूर्वक उस गोपीसे बोले।
उद्धवने कहा—सातों द्वीपोंमें मनोहर जम्बूद्वीप धन्य एवं प्रशंसनीय है। उसमें श्रेष्ठ भारतवर्ष—जो
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पुण्य और मङ्गलोंका दाता है—गोपियोंके चरणकमलोंकी रजसे पावन और परम निर्मल होकर और भी धन्यवादका पात्र हो गया है। इस भारतवर्षमें नारियोंके मध्य गोपिकाएँ सबसे बढ़कर धन्या और मान्या हैं; क्योंकि वे उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाले श्रीराधाके चरणकमलोंका नित्य दर्शन करती रहती हैं¹। इन्हीं राधिकाके चरणकमलोंकी रजको प्राप्त करनेके लिये ब्रह्माने साठ हजार वर्षोंतक तप किया था। ये पराशक्ति राधा गोलोकमें निवास करनेवाली और श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया हैं। जो-जो श्रीकृष्णके भक्त हैं, वे राधाके भी भक्त हैं। ब्रह्मा आदि देवता गोपियोंकी सोलहवीं कलाकी भी समानता नहीं कर सकते। श्रीकृष्णकी भक्तिका मर्म पूर्णरूपसे तो योगिराज महेश्वर, राधा तथा गोलोकवासी गोप और गोपियाँ ही जानती हैं। ब्रह्मा और सनत्कुमारको कुछ-कुछ ज्ञात है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं। इस गोकुलमें आनेसे मैं धन्य हो गया। यहाँ गुरुस्वरूपा गोपिकाओंसे मुझे अचल हरिभक्ति प्राप्त हुई, जिससे मैं कृतार्थ हो गया। अब मैं मथुरा नहीं जाऊँगा और प्रत्येक जन्ममें यहीं गोपियोंका किंकर होकर तीर्थश्रवा श्रीकृष्णका कीर्तन सुनता रहूँगा; क्योंकि गोपियोंसे बढ़कर परमात्मा श्रीहरिका कोई अन्य भक्त नहीं है। गोपियोंने जैसी भक्ति प्राप्त की है, वैसी भक्ति दूसरोंको नहीं नसीब हुई²।
तदनन्तर कलावती और तुलसीके द्वारा श्रीकृष्णकी महिमा कही जानेके बाद कालिकाने कहा—बुद्धिमान् उद्धव! बाल, युवा और वृद्ध—तीनों प्रकारके मनुष्य तथा जो देवता आदि और सिद्धगण हैं; वे सभी उन परमेश्वर श्रीकृष्णको जानते हैं। इस समय इन मूर्च्छित हुई राधाको जगाना ही युक्त है; अतः इसके लिये जो प्रधान युक्ति हो उसके द्वारा इन्हें चैतन्य करो।
तब उद्धव बोले—कल्याणि! चेत करो। जगन्मातः! मेरी ओर ध्यान दो। मैं कृष्णभक्तके किंकरका भी किंकर उद्धव हूँ। माँ! मुझपर कृपा करो। मैं पुनः मथुरा जाऊँगा; क्योंकि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ; बल्कि कठपुतलीकी भाँति पराधीन हूँ तथा जैसे बैल सदा हलवाहेके वशमें रहता है; उसी तरह मैं श्रीकृष्णके अधीन हूँ।
(अध्याय ९४)
उद्धवका कथन सुनकर राधाका चैतन्य होना और अपना दुःख सुनाते हुए उद्धवको उपदेश देकर मथुरा जानेकी आज्ञा देना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! उद्धवके वचन सुनकर राधिकाकी चेतना लौट आयी। वे उठकर उत्तम रत्नसिंहासनपर जा विराजीं। उस समय सात गोपियाँ भक्तिपूर्वक श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रही थीं। तब देवी राधिका दुःखित हृदयसे उद्धवसे मधुर वचन बोलीं।
श्रीराधिकाने कहा—वत्स! तुम मथुरा जाओ, परंतु वहाँ सुखमें पड़कर मुझे भूल मत जाना। (यदि भूल जाओगे तो) इस भवसागरमें तुम्हारे लिये इससे बढ़कर दूसरा अधर्म नहीं है। इस
१-धन्यं भारतवर्षं च पुण्यदं शुभदं वरम्। गोपीपादाब्जरजसा पूतं परमनिर्मलम्॥
ततोऽपि गोपिका धन्या मान्या योषित्सु भारते। नित्यं पश्यन्ति राधायाः पादपद्मं सुपुण्यदम्॥
(९४। ७७-७८)
२-न गोपीभ्यः परो भक्तो हरेश्च परमात्मनः। यादृशीं लेभिरे गोप्यो भक्तिं नान्ये च तादृशीम्॥
(९४। ८६)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२७
समय तुम जाकर परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णसे मेरी सारी बात कह सुनाओ और शीघ्र ही मेरे स्वामीको यहाँ ले आओ। भला, जगत्की युवतियोंमें किसको ऐसा दुःख है? श्रीकृष्णके वियोगजन्य दुःखको मेरे अतिरिक्त और कौन जानती है? सीताको भी वियोग-दुःख कुछ-कुछ ज्ञात है। त्रिलोकीमें नारियोंमें मुझसे बढ़कर दुःखिया कोई नहीं है। बेटा उद्धव! किस युवतीको मेरे समान दुःख है? भला, कौन नारी मेरी मानसिक व्यथाको सुनकर विश्वास करेगी? स्त्रियोंमें राधाके समान दुःखिया, विरह-संतप्त और सुख-सौभाग्यसे हीन नारी न हुई है और न आगे होगी। वत्स! जिनके नाम-श्रवणमात्रसे पाँचों प्राण प्रहृष्ट हो जाते हैं तथा जिनके स्मरणमात्रसे वे प्रफुल्ल हो उठते हैं और आत्मा परम स्निग्ध हो जाता है; जिन्होंने मेरा स्पर्श किया, इतने मात्रसे ही जिससे तीनों भुवनोंमें मुझे यशकी प्राप्ति हुई, उन परमेश्वरका किस समृद्धिको पाकर मैं विस्मरण कर सकती हूँ? तात! जो तीनों लोकोंपर विजय पानेवाला रूप और गुण धारण करते हैं; जिन्हें ब्रह्माने नहीं रचा है बल्कि जो स्वयं ही ब्रह्माके रचयिता हैं; जो कल्पवृक्षसे भी बढ़कर सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, शान्त, लक्ष्मीपति, मनको हरण करनेवाले, सर्वेश्वर, सबके कारणस्वरूप, ऐश्वर्यशाली परमात्मा हैं; उन ब्रह्माके भी विधाता अपने स्वामी श्रीकृष्णको किस समृद्धिके प्रलोभनमें पड़कर मैं भूल सकती हूँ? तात! ब्रह्मा, शिव और शेष आदि जिनके चरणकमलका ध्यान करते रहते हैं; उन प्रभुको मैं किस सुखके लोभसे विस्मृत कर सकती हूँ। पुत्र! जिन्हें स्वप्नमें भी उनके अनुपम मनोहर रूपका दर्शन हो जाता है; वे सब कुछ त्यागकर रात-दिन उन्हींके ध्यानमें मग्न हो जाते हैं। जिनके गुणसे पर्वत पिघलकर पानी-पानी हो जाता है, शुष्क काष्ठ गीला हो जाता है, सूखे वृक्षमें नयी कोंपलें निकल आती हैं, वायुका वेग रुक जाता है तथा सूर्य और सागर स्थगित हो जाते हैं; उन प्रियतमको मैं किस समृद्धिकी प्राप्तिसे भुला सकती हूँ? भक्तवर! जो कालके काल हैं; प्रलयकालीन मेघ, संहारकर्ता शिव और सृष्टिकर्ता ब्रह्माके स्वामी हैं; जो स्वाधीन, स्वतन्त्र और स्वयं ही आत्मा नामवाले हैं; उन प्रभुको मैं कौन-सी सम्पत्ति पाकर भूल सकती हूँ? उन श्रीकृष्णसे वियुक्त होनेपर (उस वियोगजन्य दुःखकी शान्तिके लिये) कोई यथार्थ ज्ञान है ही नहीं; जिसके द्वारा कोई विद्वान् मुझे सान्त्वना दे सके। सावित्री और सरस्वती भी मुझे समझानेमें समर्थ नहीं हैं। वेद और वेदाङ्ग भी मुझे ढाढ़स नहीं बँधा सकते; फिर संतों और देवताओंकी तो बात ही क्या है? सहस्र मुखवाले शेषनाग, वेदोंके उत्पादक ब्रह्मा, योगीन्द्रोंके गुरुके गुरु शम्भु और गणेश भी मुझे प्रबुद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि जिसकी स्थिति है उसीकी गतिका विचार किया जा सकता है। जिसका कोई मार्ग ही नहीं है, उसकी गति कहाँ? सुख-दुःख, शुभ-अशुभ सभी कालद्वारा साध्य है, यहाँतक कि जगत्में सभी पदार्थ कालके वशीभूत हैं और वह काल दुर्निवार है। वत्स! यदि तुम ब्रजवासका परित्याग करके जानेके लिये उत्सुक ही हो तो उठो और सुखपूर्वक उस रमणीय मथुरापुरीको जाओ; क्योंकि चिरकालतक श्रीकृष्णसे विलग रहना दुःखका ही कारण होता है; उससे सुख नहीं मिलता। वहाँ जाकर तुम उनके जन्म, मृत्यु और बुढ़ापेका विनाश करनेवाले चन्द्रमुखके दर्शन करो। राधिकाके ऐसे वचन सुनकर तथा बन्धु-वियोगसे कातर हुई राधिकाको रोती देखकर उद्धव फूट-फूटकर रोने लगे।
तदनन्तर माधवीकी प्रेरणासे उद्धवके पूछनेपर श्रीराधाने उनको उपदेश दिया—'वत्स! जो लोकोंके स्वामी, कालके काल, जगद्गुरु, निर्गुण, इच्छारहित और ईश्वर हैं; उन परमात्माका पण्डितलोग भजन करते हैं। बेटा! सूर्य सभी प्राणियोंकी