ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७०- उद्धवका कथन सुनकर राधाका चैतन्य होना और अपना दुःख सुनाते हुए उद्धवको उपदेश देकर मथुरा जानेकी आज्ञा देना
| ७१८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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वे बाल-कृष्णका नाम ले-लेकर शोकवश रो रहे थे। उन्हें आश्वासन देकर उद्धव आनन्दपूर्वक नगरमें प्रवेश करके कुछ दूर आगे गये। तब उन्हें वह नन्दभवन दिखायी दिया, जिसे विश्वकर्माने बनाया था। उसका निर्माण मणियों और रत्नोंसे हुआ था। उसमें मोती, माणिक्य और हीरे जड़े हुए थे। वह अमूल्य रत्नोंके बने हुए मनोरम कलशोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारकी चित्रकारी दरवाजेकी शोभा बढ़ा रही थी। उसे देखकर उद्धव हर्षपूर्वक उसके भीतर प्रविष्ट हुए और उसके आँगनमें पहुँचकर तुरंत ही रथसे उतरकर भूतलपर खड़े हो गये। उन्हें देखकर यशोदा और रोहिणीने तुरंत ही उनका कुशल-समाचार पूछा और आनन्दमग्न हो उन्हें आसन, जल, गौ और मधुपर्क निवेदित किया। तदनन्तर वे पूछने लगीं—'उद्धव! नन्दजी कहाँ हैं? तथा बलराम और श्रीकृष्ण कहाँ हैं? वह सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बतलाओ।' तब उद्धवने क्रमशः कहना आरम्भ किया—'यशोदे! सुनो, वे सब सर्वथा सकुशल हैं; नन्दजी आनन्दपूर्वक हैं। वे श्रीकृष्ण और बलरामके साथ कुछ विलम्बसे आयेंगे; क्योंकि वहाँ श्रीकृष्णके उपनयन-संस्कारतक ठहरेंगे। मैं विधिपूर्वक तुमलोगोंका कुशल-समाचार जानकर मथुरा लौट जाऊँगा।' इस मङ्गल-समाचारको सुनकर यशोदा और रोहिणी आनन्दविभोर हो गयीं; उन्होंने ब्राह्मणको बुलाकर रत्न, सुवर्ण और उत्तम वस्त्र प्रदान किया। तत्पश्चात् उद्धवको अमृतोपम मिष्टान्न भोजन कराया तथा उन्हें उत्तम मणि, रत्न और हीरे भेंटमें दिये। फिर नाना प्रकारके माङ्गलिक बाजे बजवाये, मङ्गल-कार्य कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और वेदपाठ करवाया। फिर परमानन्दपूर्वक नाना प्रकारके उपहार, नैवेद्य, पुष्प, धूप, दीप, चन्दन, वस्त्र, ताम्बूल, मधु, गो-दुग्ध, दधि और घृत आदि सामग्रियोंसे ब्राह्मणद्वारा सर्वव्यापी भगवान् शंकरका पूजन सम्पन्न किया। मुने! तदनन्तर षोडशोपचारकी सामग्रियों और अनेक प्रकारकी बलिसे श्रीवृन्दावनकी अधिष्ठात्री देवीकी पूजा की और श्रीकृष्णके कल्याणके लिये तुरंत ही ब्राह्मणोंको सौ सूधी भैंसें, एक हजार बकरियाँ, पंद्रह हजार शुद्ध भेड़, सौ मोहरें तथा सौ गायें दक्षिणामें दीं। फिर बारंबार आदरसहित उद्धवका सेवा-सत्कार किया।
तत्पश्चात् उद्धव यशोदा, रोहिणी, ग्वालबालों, वृद्धों और सभी गोपियोंको भलीभाँति आश्वासन देकर रासमण्डल देखनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने रमणीय रासमण्डलको देखा, जो चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार और सैकड़ों केलेके खंभोंसे सुशोभित था। तदनन्तर रासमण्डलकी शोभा, असंख्य गोपी तथा श्रीकृष्ण ही आ गये—इस अनुमानसे असंख्य गोपोंको प्रतीक्षा करते देखा। फिर यमुनाकी प्रदक्षिणा करके उद्धवने चन्दन, चम्पक, यूथिका, केतकी, माधवी, मौलसिरी, अशोक, काञ्चन, कर्णिका आदि वनोंकी प्रदक्षिणा की। फिर आनन्दपूर्ण मनसे नागेश्वर, लवङ्ग, शाल, ताल, हिंताल, पनस, रसाल, मन्दार आदि काननोंको देखते हुए रमणीय कुञ्जवनके दर्शन करके अत्यन्त मधुर रमणीय मधुकाननमें प्रवेश किया। पुनः बदरीवनमें जानेके बाद कदलीवनमें जाकर अति निभृत स्थानमें श्रीराधिकाके आश्रमके दर्शन किये। वहाँकी दिव्य विलक्षण शोभाको देखनेके बाद वे अन्तिम द्वारपर पहुँचे। सखियोंने उनका स्वागत करके उन्हें राधाके पास पहुँचा दिया। उद्धवने आश्चर्यचकित कर देनेवाली राधाको सामने देखा। वे चन्द्रकलाके समान सुन्दरी थीं, उनके नेत्र पूर्णतया खिले हुए कमलके सदृश थे, उन्होंने भूषणोंका त्याग कर दिया था, केवल कानोंमें सुवर्णके रंग-बिरंगे कुण्डल झलमला रहे थे, अत्यन्त क्लेशके कारण उनका मुख लाल हो गया था, वे शोकसे मूर्च्छित हो
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१९
भूमिपर पड़ी हुई रो रही थीं, उनकी चेष्टाएँ शान्त थीं, उन्होंने आहारका त्याग कर दिया था, उनके अधर और कण्ठ सूख गये थे, केवल कुछ-कुछ साँस चल रही थी। उन्हें इस अवस्थामें देखकर भक्त उद्धवके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया। वे भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करते हुए बोले।
उद्धवने कहा—मैं श्रीराधाके उन चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जो ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा वन्दित हैं तथा जिनकी कीर्तिके कीर्तनसे ही तीनों भुवन पवित्र हो जाते हैं। गोकुलमें वास करनेवाली राधिकाको बारंबार नमस्कार। शतशृङ्गपर निवास करनेवाली चन्द्रवतीको नमस्कार-नमस्कार। तुलसीवन तथा वृन्दावनमें बसनेवालीको नमस्कार-नमस्कार। रासमण्डलवासिनी रासेश्वरीको नमस्कार-नमस्कार। विरजाके तटपर वास करनेवाली वृन्दाको नमस्कार-नमस्कार। वृन्दावनविलासिनी कृष्णाको नमस्कार-नमस्कार। कृष्णप्रियाको नमस्कार। शान्ताको पुनः-पुनः नमस्कार। कृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित रहनेवाली कृष्णप्रियाको नमस्कार-नमस्कार। वैकुण्ठवासिनीको नमस्कार। महालक्ष्मीको पुनः-पुनः नमस्कार। विद्याकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीको नमस्कार-नमस्कार। सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिदेवी कमलाको नमस्कार-नमस्कार। पद्मनाभकी प्रियतमा पद्माको बारंबार प्रणाम। जो महाविष्णुकी माता और पराद्या हैं; उन्हें पुनः-पुनः नमस्कार। सिन्धुसुताको नमस्कार। मर्त्यलक्ष्मीको नमस्कार-नमस्कार। नारायणकी प्रिया नारायणीको बारंबार नमस्कार। विष्णुमायाको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। वैष्णवीको नमस्कार-नमस्कार। महामायास्वरूपा सम्पदाको पुनः-पुनः नमस्कार। कल्याणरूपिणीको नमस्कार। शुभाको बारंबार नमस्कार। चारों वेदोंकी माता और सावित्रीको पुनः-पुनः नमस्कार। दुर्गविनाशिनी दुर्गादेवीको बारंबार नमस्कार। पहले सत्ययुगमें जो सम्पूर्ण देवताओंके तेजोंमें अधिष्ठित थीं; उन देवीको तथा प्रकृतिको नमस्कार-नमस्कार। त्रिपुरहारिणीको नमस्कार। त्रिपुराको पुनः-पुनः नमस्कार। सुन्दरियोंमें परम सुन्दरी निर्गुणाको नमस्कार-नमस्कार। निद्रास्वरूपाको नमस्कार और निर्गुणाको बारंबार नमस्कार। दक्षसुताको नमस्कार और सत्याको पुनः-पुनः नमस्कार। शैलसुताको नमस्कार और पार्वतीको बार-बार नमस्कार। तपस्विनीको नमस्कार-नमस्कार और उमाको बारंबार नमस्कार। निराहारस्वरूपा अपर्णाको पुनः-पुनः नमस्कार। गौरीलोकमें विलास करनेवाली गौरीको बारंबार नमस्कार। कैलासवासिनीको नमस्कार और माहेश्वरीको नमस्कार-नमस्कार। निद्रा, दया और श्रद्धाको पुनः-पुनः नमस्कार। धृति, क्षमा और लज्जाको बारंबार नमस्कार। तृष्णा, क्षुत्स्वरूपा और स्थितिकर्त्रीको नमस्कार-नमस्कार। संहाररूपिणीको नमस्कार और महामारीको पुनः-पुनः नमस्कार। भया, अभया और मुक्तिदाको नमस्कार-नमस्कार। स्वधा, स्वाहा, शान्ति और कान्तिको बारंबार नमस्कार। तुष्टि, पुष्टि और दयाको पुनः-पुनः नमस्कार। निद्रास्वरूपाको नमस्कार-नमस्कार। श्रद्धाको बार-बार नमस्कार। क्षुत्पिपासास्वरूपा और लज्जाको बारंबार नमस्कार।
७२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
धृति, चेतना और क्षमाको बारंबार नमस्कार। जो सबकी माता तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं; उन्हें नमस्कार-नमस्कार। अग्निमें दाहिका-शक्तिके रूपमें विद्यमान रहनेवाली देवी और भद्राको पुनः-पुनः नमस्कार। जो पूर्णिमाके चन्द्रमामें और शरत्कालीन कमलमें शोभारूपसे वर्तमान रहती हैं; उन शोभाको नमस्कार-नमस्कार। देवि! जैसे दूध और उसकी धवलतामें, गन्ध और भूमिमें, जल और शीतलतामें, शब्द और आकाशमें तथा सूर्य और प्रकाशमें कभी भेद नहीं है, वैसे ही लोक, वेद और पुराणमें—कहीं भी राधा और माधवमें भेद नहीं है; अतः कल्याणि! चेत करो। सति! मुझे उत्तर दो। यों कहकर उद्धव वहाँ उनके चरणोंमें पुनः-पुनः प्रणिपात करने लगे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस उद्धवकृत स्तोत्रका पाठ करता है; वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें वैकुण्ठमें जाता है। उसे बन्धुवियोग तथा अत्यन्त भयंकर रोग और शोक नहीं होते। जिस स्त्रीका पति परदेश गया होता है, वह अपने पतिसे मिल जाती है और भार्यावियोगी अपनी पत्नीको पा जाता है। पुत्रहीनको पुत्र मिल जाते हैं, निर्धनको धन प्राप्त हो जाता है, भूमिहीनको भूमिकी प्राप्ति हो जाती है, प्रजाहीन प्रजाको पा लेता है, रोगी रोगसे विमुक्त हो जाता है, बँधा हुआ बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत मनुष्य भयसे मुक्त हो जाता है, आपत्तिग्रस्त आपद्से छुटकारा पा जाता है और अस्पष्ट कीर्तिवाला उत्तम यशस्वी तथा मूर्ख पण्डित हो जाता है*। (अध्याय ९१-९२)
*उद्धव उवाच—
वन्दे राधापदाम्भोजं ब्रह्मादिसुरवन्दितम्। यत्कीर्तिकीर्तनेनैव पुनाति भुवनत्रयम्॥
नमो गोलोकवासिन्यै राधिकायै नमो नमः। शतशृङ्गनिवासिन्यै चन्द्रवत्यै नमो नमः॥
तुलसीवनवासिन्यै वृन्दारण्यै नमो नमः। रासमण्डलवासिन्यै रासेश्वर्यै नमो नमः॥
विरजातीरवासिन्यै वृन्दायै च नमो नमः। वृन्दावनविलासिन्यै कृष्णायै च नमो नमः॥
नमः कृष्णप्रियायै च शान्तायै च नमो नमः। कृष्णवक्षःस्थितायै च तत्प्रियायै नमो नमः॥
नमो वैकुण्ठवासिन्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः। विद्याधिष्ठातृदेव्यै च सरस्वत्यै नमो नमः॥
सर्वैश्वर्याधिदेव्यै च कमलायै नमो नमः। पद्मनाभप्रियायै च पद्मायै च नमो नमः॥
महाविष्णोश्च मात्रे च पराद्यायै नमो नमः। नमः सिन्धुसुतायै च मर्त्यलक्ष्म्यै नमो नमः॥
नारायणप्रियायै च नारायण्यै नमो नमः। नमोऽस्तु विष्णुमायायै वैष्णव्यै च नमो नमः॥
महामायास्वरूपायै सम्पदायै नमो नमः। नमः कल्याणरूपिण्यै शुभायै च नमो नमः॥
मात्रे चतुर्णां वेदानां सावित्र्यै च नमो नमः। नमो दुर्गविनाशिन्यै दुर्गादेव्यै नमो नमः॥
तेजःसु सर्वदेवानां पुरा कृतयुगे मुदा। अधिष्ठानकृतायै च प्रकृत्यै च नमो नमः॥
नमस्त्रिपुरहारिण्यै त्रिपुरायै नमो नमः। सुन्दरीषु च रम्यायै निर्गुणायै नमो नमः॥
नमो निद्रास्वरूपायै निर्गुणायै नमो नमः। नमो दक्षसुतायै च नमः सत्यै नमो नमः॥
नमः शैलसुतायै च पार्वत्यै च नमो नमः। नमो नमस्तपस्विन्यै ह्युमायै च नमो नमः॥
निराहारस्वरूपायै ह्यपर्णायै नमो नमः। गौरीलोकविलासिन्यै नमो गौर्यै नमो नमः॥
नमः कैलासवासिन्यै माहेश्वर्यै नमो नमः। निद्रायै च दयायै च श्रद्धायै च नमो नमः॥
नमो धृत्यै क्षमायै च लज्जायै च नमो नमः। तृष्णायै क्षुत्स्वरूपायै स्थितिकर्त्र्यै नमो नमः॥
नमः संहाररूपिण्यै महामायै नमो नमः। भयायै चाभयायै च मुक्तिदायै नमो नमः॥
नमः स्वधायै स्वाहायै शान्त्यै कान्त्यै नमो नमः। नमस्तुष्ट्यै च पुष्ट्यै च दयायै च नमो नमः॥
नमो निद्रास्वरूपायै श्रद्धायै च नमो नमः। क्षुत्पिपासास्वरूपायै लज्जायै च नमो नमः॥
नमो धृत्यै क्षमायै च चेतनायै नमो नमः। सर्वशक्तिस्वरूपिण्यै सर्वमात्रे नमो नमः॥