ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५७- परशुरामका राजराजेश्वर कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतयुक्त वचन कहना
गणपतिखण्ड ३८१
श्रीकृष्णभक्त, सदा नीरोग, गुणवान्, विद्वान्, पुत्रवान् और धनी हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। वह निश्चय ही छहों विषयोंका जानकार, दसों बलोंसे सम्पन्न, मनके सदृश वेगशाली, सर्वज्ञ, सर्वस्व दान करनेवाला और सम्पूर्ण सम्पदाओंका दाता हो जाता है तथा श्रीकृष्णकी कृपासे वह निरन्तर कल्पवृक्षके समान बना रहता है। वत्स! इस प्रकार मैंने इस स्तोत्रका वर्णन कर दिया। अब तुम पुष्करमें जाओ और वहाँ मन्त्र सिद्ध करो। तत्पश्चात् तुम्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति होगी। मुनिश्रेष्ठ! यों श्रीकृष्णकी कृपासे तथा मेरे आशीर्वादसे तुम सुखपूर्वक पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे शून्य करो*।
(अध्याय ३२)
* महादेव उवाच—
परं ब्रह्म परं धाम परं ज्योतिः सनातनम्। निर्लिप्तं परमात्मानं नमामि सर्वकारणम्॥
स्थूलात् स्थूलतमं देवं सूक्ष्मात् सूक्ष्मतमं परम्। सर्वदृश्यमदृश्यं च स्वेच्छाचारं नमाम्यहम्॥
साकारं च निराकारं सगुणं निर्गुणं प्रभुम्। सर्वाधारं च सर्वं च स्वेच्छारूपं नमाम्यहम्॥
अतीवकमनीयं च रूपं निरुपमं विभुम्। करालरूपमत्यन्तं बिभ्रतं प्रणमाम्यहम्॥
कर्मणः कर्मरूपं तं साक्षिणं सर्वकर्मणाम्। फलं च फलदातारं सर्वरूपं नमाम्यहम्॥
स्रष्टा पाता च संहर्ता कलया मूर्तिभेदतः। नानामूर्तिः कलांशेन यः पुमांस्तं नमाम्यहम्॥
स्वयं प्रकृतिरूपश्च मायया च स्वयं पुमान्। तयोः परं स्वयं शश्वत् तं नमामि परात्परम्॥
स्त्रीपुंनपुंसकं रूपं यो बिभर्ति स्वमायया। स्वयं माया स्वयं मायी यो देवस्तं नमाम्यहम्॥
तारणं सर्वदुःखानां सर्वकारणकारणम्। धारणं सर्वविश्वानां सर्वबीजं नमाम्यहम्॥
तेजस्विनां रवियों हि सर्वजातिषु ब्राह्मणः। नक्षत्राणां च यश्चन्द्रस्तं नमामि जगत्प्रभुम्॥
रुद्राणां वैष्णवानां च ज्ञानिनां यो हि शंकरः। नागानां यो हि शेषश्च तं नमामि जगत्पतिम्॥
प्रजापतीनां यो ब्रह्मा सिद्धानां कपिलः स्वयम्। सनत्कुमारो मुनिषु तं नमामि जगद्गुरुम्॥
देवानां यो हि विष्णुश्च देवीनां प्रकृतिः स्वयम्।
स्वायम्भुवो मनूनां यो मानवेषु च वैष्णवः। नारीणां शतरूपा च बहुरूपं नमाम्यहम्॥
ऋतूनां यो वसन्तश्च मासानां मार्गशीर्षकः। एकादशी तिथीनां च नमामि सर्वरूपिणम्॥
सागरः सरितां यश्च पर्वतानां हिमालयः। वसुन्धरा सहिष्णूनां तं सर्वं प्रणमाम्यहम्॥
पत्राणां तुलसीपत्रं दारुरूपेषु चन्दनम्। वृक्षाणां कल्पवृक्षो यस्तं नमामि जगत्पतिम्॥
पुष्पाणां पारिजातश्च शस्यानां धान्यमेव च। अमृतं भक्ष्यवस्तूनां नानारूपं नमाम्यहम्॥
ऐरावतो गजेन्द्राणां वैनतेयश्च पक्षिणाम्। कामधेनुश्च धेनूनां सर्वरूपं नमाम्यहम्॥
तेजसानां सुवर्णं च धान्यानां यव एव च। यः केशरी पशूनां च वररूपं नमाम्यहम्॥
यक्षाणां च कुबेरो यो ग्रहाणां च बृहस्पतिः। दिक्पालानां महेन्द्रश्च तं नमामि परं वरम्॥
वेदसंघश्च शास्त्राणां पण्डितानां सरस्वती। अक्षराणामकारो यस्तं प्रधानं नमाम्यहम्॥
मन्त्राणां विष्णुमन्त्रश्च तीर्थानां जाह्नवी स्वयम्। इन्द्रियाणां मनो यो हि सर्वश्रेष्ठं नमाम्यहम्॥
सुदर्शनं च शस्त्राणां व्याधीनां वैष्णवो ज्वरः। तेजसां ब्रह्मतेजश्च वरेण्यं तं नमाम्यहम्॥
निषेकश्च बलवतां मनश्च शीघ्रगामिनाम्। कालः कलयतां यो हि तं नमामि विलक्षणम्॥
ज्ञानदाता गुरूणां च मातृरूपश्च बन्धुषु। मित्रेषु जन्मदाता यस्तं सारं प्रणमाम्यहम्॥
शिल्पीनां विश्वकर्मा यः कामदेवश्च रूपिणाम्। पतिव्रता च पत्नीनां नमस्यं तं नमाम्यहम्॥
प्रियेषु पुत्ररूपो यो नृपरूपो नरेषु च। शालग्रामश्च यन्त्राणां तं विशिष्टं नमाम्यहम्॥
धर्मः कल्याणबीजानां वेदानां सामवेदकः। धर्मीणां सत्यरूपो यो विशिष्टं तं नमाम्यहम्॥
जले शैत्यस्वरूपो यो गन्धरूपश्च भूमिषु। शब्दरूपश्च गगने तं प्रणम्यं नमाम्यहम्॥
३८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पुष्करमें जाकर परशुरामका तपस्या करना, श्रीकृष्णद्वारा वर-प्राप्ति, आश्रमपर
मित्रोंके साथ उनका विजय-यात्रा करना और शुभ शकुनोंका प्रकट होना,
नर्मदातटपर रात्रिमें परशुरामको स्वप्नमें शुभ शकुनोंका दिखलायी देना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर
भृगुवंशी परशुराम हर्षपूर्वक शिव, दुर्गा तथा
भद्रकालीको प्रणाम करके पुष्करतीर्थमें गये और
वहाँ मन्त्र सिद्ध करने लगे। उन्होंने एक महीनेतक
अन्न-जलका परित्याग कर दिया और भक्तिपूर्वक
श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान करते हुए वायुको
अवरुद्ध कर दिया। फिर आँखें खोलकर देखा
तो उनको आकाश एक अद्भुत तेजसे व्याप्त
दिखायी पड़ा। उस तेजसे दसों दिशाएँ उदीप्त
हो रही थीं और सूर्यका तेज प्रतिहत हो गया
था। उस तेजोमण्डलके मध्य उन्हें एक रत्ननिर्मित
विमान दीख पड़ा, जिसपर एक अत्यन्त सुन्दर
श्रेष्ठ पुरुष दृष्टिगोचर हो रहे थे। वे भक्तोंपर
अनुग्रह करनेवाले थे तथा उनका मुख मन्द
मुसकानसे खिल रहा था। परशुरामने उन ईश्वरको
दण्डकी भाँति लेटकर सिरसे प्रणाम किया और
वर माँगा—'भगवन् ! मैं इक्कीस बार पृथ्वीको
भूपालोंसे रहित कर दूँ, आपके चरणकमलोंमें
मेरी अनपायिनी सुदृढ़ भक्ति हो और मैं निरन्तर
आपके पादारविन्दका दास बना रहूँ—यह वर
मुझे प्रदान कीजिये।' तब श्रीकृष्ण उन्हें वह वर
देकर वहीं अन्तर्धान हो गये और परशुराम उन
क्रतूनां राजसूयो यो गायत्री छन्दसां च यः। गन्धर्वाणां चित्ररथस्तं गरिष्ठं नमाम्यहम्॥
क्षीरस्वरूपो गव्यानां पवित्राणां च पावकः। पुण्यदानां च यः स्तोत्रं तं नमामि शुभप्रदम्॥
तृणानां कुशरूपो यो व्याधिरूपश्च वैरिणाम्। गुणानां शान्तरूपो यश्चित्ररूपं नमाम्यहम्॥
तेजोरूपो ज्ञानरूपः सर्वरूपश्च यो महान्। सर्वानिर्वचनीयं च तं नमामि स्वयं विभुम्॥
सर्वाधारेषु यो वायुर्यथात्मा नित्यरूपिणाम्। आकाशो व्यापकानां यो व्यापकं तं नमाम्यहम्॥
वेदानिर्वचनीयं यन्न स्तोतुं पण्डितः क्षमः। यदनिर्वचनीयं च को वा तत्स्तोतुमीश्वरः॥
वेदा न शक्ता यं स्तोतुं जडीभूता सरस्वती। तं च वाङ्मनसोः पारं को विद्वान् स्तोतुमीश्वरः॥
शुद्धतेजःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम्। अतीवकमनीयं च श्यामरूपं नमाम्यहम्॥
द्विभुजं मुरलीवक्त्रं किशोरं सस्मितं मुदा। शश्वद् गोपाङ्गनाभिश्च वीक्ष्यमाणं नमाम्यहम्॥
राधया दत्तताम्बूलं भुक्तवन्तं मनोहरम्। रत्नसिंहासनस्थं च तमीशं प्रणमाम्यहम्॥
रत्नभूषणभूषाढ्यं सेवितं श्वेतचामरैः। पार्षदप्रवरैर्गोपकुमारैस्तं नमाम्यहम्॥
वृन्दावनान्तरे रम्ये रासोल्लाससमुत्सुकम्। रासमण्डलमध्यस्थं नमामि रसिकेश्वरम्॥
शतशृङ्गे महाशैले गोलोके रत्नपर्वते। विरजापुलिने रम्ये प्रणमामि विहारिणम्॥
परिपूर्णतमं शान्तं राधाकान्तं मनोहरम्। सत्यं ब्रह्मस्वरूपं च नित्यं कृष्णं नमाम्यहम्॥
श्रीकृष्णस्य स्तोत्रमिदं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। धर्मार्थकाममोक्षाणां स दाता भारते भवेत्॥
हरिदास्यं हरौ भक्तिं लभेत् स्तोत्रप्रसादतः। इह लोके जगत्पूज्यो विष्णुतुल्यो भवेद् ध्रुवम्॥
सर्वसिद्धेश्वरः शान्तोऽप्यन्ते याति हरेः पदम्। तेजसा यशसा भाति यथा सूर्यो महीतले॥
जीवन्मुक्तः कृष्णभक्तः स भवेन्नात्र संशयः। अरोगी गुणवान् विद्वान् पुत्रवान् धनवान् सदा॥
षड्विज्ञो दशबलो मनोयायी भवेद् ध्रुवम्। सर्वज्ञः सर्वदर्शैव स दाता सर्वसम्पदाम्।
कल्पवृक्षसमः शश्वद् भवेत् कृष्णप्रसादतः ॥
इत्येवं कथितं स्तोत्रं त्वं वत्स गच्छ पुष्करम्। तत्र कृत्वा मन्त्रसिद्धिं पश्चात् प्राप्स्यसि वाञ्छितम्॥
त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां कुरु पृथ्वीं यथासुखम्। ममाशिषा मुनिश्रेष्ठ श्रीकृष्णस्य प्रसादतः॥
(३२। २७—७६)
गणपतिखण्ड
३८३
शब्द और विजयसूचक बादलोंकी गड़गड़ाहट
सुनायी पड़ी। उसी समय आकाशवाणी भी हुई
कि 'तुम्हारी विजय होगी।' इस तरह अनेक
प्रकारके शुभ शब्दोंको सुनते हुए भगवान् परशुरामने
यात्रा आरम्भ की। चलते ही उन्होंने अपने आगे
ब्राह्मण, वन्दी, ज्योतिषी और भिक्षुकको देखा।
फिर नाना प्रकारके आभूषणोंसे सजी हुई एक
पति-पुत्रसम्पन्ना सती नारी हाथमें प्रज्वलित दीपक
लिये हुए मुस्कराती हुई सामने आयी। चलते-
चलते परशुरामने अपने दाहिनी ओर यात्राके
समय मङ्गलकी सूचना देनेवाले शव, शृगाली,
जलसे पूर्ण घट, नीलकण्ठ, नेवला, कृष्णसार
मृग, हाथी, सिंह, घोड़ा, गैंडा, द्विप, चमरी गाय,
परात्परको नमस्कार करके अपने आश्रमको
राजहंस, चक्रवाक, शुक, कोयल, मोर, खंजन,
लौट आये। उस समय उनका दाहिना अङ्ग
सफेद चील, चकोर, कबूतर, बगुलोंकी पंक्ति,
फड़कने लगा, जो शुभ मङ्गलोंका सूचक था।
बत्तख, चातक, गौरैया, बिजली, इन्द्रधनुष, सूर्य,
रातमें उन्हें वाञ्छासिद्धिको प्रकट करनेवाला
सूर्यकी प्रभा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित
उत्तम स्वप्न भी दीख पड़ा। इससे उनका मन
मछली, शङ्ख, सुवर्ण, माणिक्य, चाँदी, मोती,
रात-दिन प्रसन्न और संतुष्ट रहने लगा। वे
हीरा, मूँगा, दही, लावा, सफेद धान, सफेद
स्वजनोंसे सारा वृत्तान्त पूर्णतया बतलाकर
फूल, कुंकुम, पानका पत्ता, पताका, छत्र, दर्पण,
आनन्दपूर्वक आश्रममें निवास करने लगे।
श्वेत चँवर, सवत्सा गौ, रथारूढ़ भूपाल, दूध,
तदनन्तर महाबली परशुरामने अपने शिष्योंको,
घी, राशि-राशि अमृत, खीर, शालग्राम, पका
पिताके शिष्योंको, भाइयोंको तथा बन्धु-बान्धवोंको
हुआ फल, स्वस्तिक, शक्कर, मधु, बिलाव,
बुला-बुलाकर उनके साथ तरह-तरहकी
साँड़, भेड़ा, पर्वतीय चूहा, मेघाच्छन्न सूर्यका
सलाह की और उनसे अपना पूर्वापरका वृत्तान्त
उदय, चन्द्रमण्डल, कस्तूरी, पंखा, जल, हल्दी,
कहकर शुभ मुहूर्तमें वे उन्हींके साथ विजययात्राके
तीर्थकी मिट्टी, पीली या सफेद सरसों, दूब,
लिये उद्यत हुए।
ब्राह्मणका बालक और कन्या, मृग, वेश्या, भौंरा,
उस समय परशुरामको मङ्गल शकुन दिखायी
कपूर, पीला वस्त्र, गोमूत्र, गोबर, गौके खुरकी
पड़ने लगे और जयकी सूचना देनेवाले शब्द
धूलि, गोपदसे चिह्नित गोष्ठ, गौओंका मार्ग
सुनायी दिये। तब उन्होंने मन-ही-मन सबका
(डहर), रमणीय गोशाला, सुन्दर गोगति, भूषण,
विचार करके निश्चय कर लिया कि मेरी विजय
देवप्रतिमा, प्रज्वलित अग्नि, महोत्सव, ताँबा,
होगी और शत्रुओंका संहार होगा। यात्राके
स्फटिक, वैद्य, सिंदूर, माला, चन्दन, सुगन्ध, हीरा
अवसरपर सहसा मुनिको अपने सामने मयूरकी
और रत्न देखा। उन्हें सुगन्धित वायुका आघ्राण
बोली, सिंहकी गर्जना, घण्टा और दुन्दुभीकी
और ब्राह्मणोंका शुभाशीर्वाद प्राप्त हुआ। इस
ध्वनि, संगीत, कल्याणकारी नवीन सांकेतिक
प्रकार माङ्गलिक अवसर जानकर वे हर्षपूर्वक आगे
३८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
बढ़े और सूर्यास्त होते-होते नर्मदाके तटपर पहुँच गये।
वहाँ उन्हें एक अत्यन्त मनोहर दिव्य अक्षयवट दिखायी दिया। वह अत्यन्त ऊँचा, विस्तारवाला और उत्तम एवं पावन आश्रम-स्थान था। वहाँ सुगन्धित वायु बह रही थी। वहीं पुलस्त्य-नन्दनने तपस्या की थी। वहीं कार्तवीर्यार्जुनके आश्रमके निकट परशुराम अपने गणोंके साथ ठहर गये। वहाँ उन्होंने रातमें पुष्प-शय्यापर शयन किया। थके तो वे थे ही, अतः किंकरोंद्वारा भलीभाँति सेवा किये जानेपर परमानन्दमें निमग्न हो निद्राके वशीभूत हो गये। रात व्यतीत होते-होते भार्गव परशुरामको एक सुन्दर स्वप्न दिखायी दिया, जो वायु, पित्त और कफके प्रकोपसे रहित था और जिसका पहले मनमें विचार भी नहीं किया गया था।
उन्होंने देखा कि मैं हाथी, घोड़ा, पर्वत, अट्टालिका, गौ और फलयुक्त वृक्षपर चढ़ा हुआ हूँ। मुझे कीड़े काट रहे हैं जिससे मैं रो रहा हूँ। मेरे शरीरमें चन्दन लगा है। मैं पीले वस्त्रसे शोभित तथा पुष्पमाला धारण किये हुए हूँ। मेरा सारा शरीर मल-मूत्रसे सराबोर है और उसमें मज्जा और पीब चुपड़ा हुआ है, ऐसी दशामें मैं नौकापर सवार हूँ और उत्तम वीणा बजा रहा हूँ। फिर देखा कि मैं नदीतटपर बड़े-बड़े कमल-पत्रोंपर रखकर दही, घी और मधु-मिश्रित खीर खा रहा हूँ। पुनः देखा कि मैं पान चबा रहा हूँ। मेरे सामने फल, पुष्प और दीपक रखे हुए हैं तथा ब्राह्मण मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। फिर अपनेको बारंबार पके हुए फल, दूध, शक्करमिश्रित गरमा-गरम अन्न, स्वस्तिकके आकारकी बनी हुई मिठाई खाते देखा। पुनः उन्होंने देखा कि मुझे जल-जन्तु, बिच्छू, मछली तथा सर्प काट रहे हैं और मैं भयभीत होकर भाग रहा हूँ। फिर देखा कि मैं चन्द्रमा और सूर्यका मण्डल, पति और पुत्रसे सम्पन्न नारी और मुस्कराते हुए ब्राह्मणको देख रहा हूँ। पुनः अपनेको सुन्दर वेषवाली परम संतुष्ट कन्या तथा संतुष्ट एवं मुस्कानयुक्त ब्राह्मणद्वारा आलिङ्गित होते हुए देखा। फिर देखा कि मैं फल-पुष्पसमन्वित वृक्ष, देवताकी मूर्ति तथा हाथीपर एवं रथपर सवार हुए राजाको देख रहा हूँ। पुनः उन्होंने देखा कि मैं एक ऐसी ब्राह्मणीको देख रहा हूँ, जो पीला वस्त्र धारण किये हुए है, रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित है और घरमें प्रवेश कर रही है। फिर अपनेको शङ्ख, स्फटिक, श्वेत माला, मोती, चन्दन, सोना, चाँदी और रत्न देखते हुए पाया। पुनः भार्गवको हाथी, बैल, श्वेत सर्प, श्वेत चँवर, नीला कमल और दर्पण दिखायी पड़ा। परशुरामने स्वप्नमें अपनेको रथारूढ़, नये रत्नोंसे संयुक्त, मालतीकी मालाओंसे शोभित और रत्नसिंहासनपर स्थित देखा। परशुरामने स्वप्नमें कमलोंकी पंक्ति, भरा हुआ घट, दही, लावा, घी, मधु, पत्तेका छत्र और नाई देखा। भृगुनन्दनने स्वप्नमें बगुलोंकी कतार, हंसोंकी पाँति और मङ्गल-कलशकी पूजा करती हुई व्रती कन्याओंकी पंक्ति देखी। परशुरामने स्वप्नमें उन ब्राह्मणोंको देखा, जो मण्डपमें स्थित होकर शिव और विष्णुकी पूजा कर रहे थे तथा 'जय हो' ऐसा उच्चारण कर रहे थे। फिर परशुरामने स्वप्नमें सुधावृष्टि, पत्तोंकी वर्षा, फलोंकी वृष्टि, लगातार होती हुई पुष्प और चन्दनकी वर्षा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित मछली, मोर, श्वेत खंजन, सरोवर, तीर्थ, कबूतर, शुक, नीलकण्ठ, सफेद चील, चातक, बाघ, सिंह, सुरभी, गोरोचन, हल्दी, सफेद धानका विशाल पर्वत, प्रज्वलित अग्नि, दूब, समूह-के-समूह देव-मन्दिर, पूजित शिवलिङ्ग और पूजा की हुई शिवकी मृण्मयी मूर्तिको देखा। परशुरामने स्वप्नमें जौ और गेहूँके आटेकी पूड़ी और लड्डू देखा और उन्हें बारंबार खाया। फिर अकस्मात्