ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३- परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्रीराधासे प्रकट विराट्स्वरूप बालकका वर्णन
प्रकृतिखण्ड १०९
पत्नी हैं। मुनिवर आस्तीक, जो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं, ये देवी उनकी माता हैं।
नारद! प्रकृतिदेवीके एक प्रधान अंशको 'देवसेना' कहते हैं। मातृकाओंमें ये परम श्रेष्ठ मानी जाती हैं। इन्हें लोग भगवती 'षष्ठी' के नामसे कहते हैं। प्रत्येक लोकमें शिशुओंका पालन एवं संरक्षण करना इनका प्रधान कार्य है। ये तपस्विनी, विष्णुभक्ता तथा कार्तिकेयजीकी पत्नी हैं। ये साध्वी भगवती प्रकृतिका छठा अंश हैं। अतएव इन्हें 'षष्ठी' देवी कहा जाता है। संतानोत्पत्तिके अवसरपर अभ्युदयके लिये इन षष्ठी योगिनीकी पूजा होती है। अखिल जगत्में बारहों महीने लोग इनकी निरन्तर पूजा करते हैं। पुत्र उत्पन्न होनेपर छठे दिन सूतिकागृहमें इनकी पूजा हुआ करती है—यह प्राचीन नियम है। कल्याण चाहनेवाले कुछ व्यक्ति इक्कीसवें दिन इनकी पूजा करते हैं। इनकी मातृका संज्ञा है। ये दयास्वरूपिणी हैं। निरन्तर रक्षा करनेमें तत्पर रहती हैं। जल, थल, आकाश, गृह—जहाँ कहीं भी बच्चोंको सुरक्षित रखना इनका प्रधान उद्देश्य है।
प्रकृतिदेवीका एक प्रधान अंश 'मङ्गलचण्डी' के नामसे विख्यात है। ये मङ्गलचण्डी प्रकृतिदेवीके मुखसे प्रकट हुई हैं। इनकी कृपासे समस्त मङ्गल सुलभ हो जाते हैं। सृष्टिके समय इनका विग्रह मङ्गलमय रहता है। संहारके अवसरपर ये क्रोधमयी बन जाती हैं। इसीलिये इन देवीको पण्डितजन 'मङ्गलचण्डी' कहते हैं। प्रत्येक मङ्गलवारको विश्वभरमें इनकी पूजा होती है। इनके अनुग्रहसे साधक पुरुष पुत्र, पौत्र, धन, सम्पत्ति, यश और कल्याण प्राप्त कर लेते हैं। प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण स्त्रियोंके समस्त मनोरथ पूर्ण कर देना इनका स्वभाव ही है। ये भगवती महेश्वरी कुपित होनेपर क्षणमात्रमें विश्वको नष्ट कर सकती हैं।
देवी 'काली' को प्रकृतिदेवीका प्रधान अंश मानते हैं। इन देवीके नेत्र ऐसे हैं, मानो कमल हों। संग्राममें जब भगवती दुर्गाके सामने प्रबल राक्षस-बन्धु शुम्भ और निशुम्भ डटे थे, उस समय ये काली भगवती दुर्गाके ललाटसे प्रकट हुई थीं। इन्हें दुर्गाका आधा अंश माना जाता है। गुण और तेजमें ये दुर्गाके समान ही हैं। इनका परम पुष्ट विग्रह करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान है। सम्पूर्ण शक्तियोंमें ये प्रमुख हैं। इनसे बढ़कर बलवान् कोई है ही नहीं। ये परम योगस्वरूपिणी देवी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति इनमें अटूट श्रद्धा है। तेज, पराक्रम और गुणमें ये श्रीकृष्णके समान ही हैं। इनका सारा समय भगवान् श्रीकृष्णके चिन्तनमें ही व्यतीत होता है। इन सनातनी देवीके शरीरका रंग भी कृष्ण ही है। ये चाहें तो एक श्वासमें समस्त ब्रह्माण्डको नष्ट कर सकती हैं। अपने मनोरञ्जनके लिये अथवा जगत्को शिक्षा देनेके विचारसे ही ये संग्राममें दैत्योंके साथ युद्ध करती हैं। सुपूजित होनेपर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सब कुछ देनेमें ये पूर्ण समर्थ हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण, मनु प्रभृति और मानवसमाज सब-के-सब इनकी उपासना करते हैं।
भगवती 'वसुन्धरा' भी प्रकृतिदेवीके प्रधान अंशसे प्रकट हैं। अखिल जगत् इन्हींपर ठहरा है। ये सर्व-शस्य-प्रसूतिका (सम्पूर्ण खेतीको उत्पन्न करनेवाली) कही जाती हैं। इन्हें लोग 'रत्नाकरा' और 'रत्नगर्भा' भी कहते हैं। सम्पूर्ण रत्नोंकी खान इन्हींके अंदर विराजमान है। राजा और प्रजा—सभी लोग इनकी पूजा एवं स्तुति करते हैं। सबको जीविका प्रदान करनेके लिये ही इन्होंने यह रूप धारण कर रखा है। ये सम्पूर्ण सम्पत्तिका विधान करती हैं। ये न रहें तो सारा चराचर जगत् कहीं भी ठहर नहीं सकता।
मुनिवर! प्रकृतिदेवीकी जो-जो कलाएँ हैं, उन्हें सुनो और ये जिन-जिनकी पत्नियाँ हैं, वह सब भी मैं तुम्हें बताता हूँ। देवी 'स्वाहा' अग्निकी
११० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पत्नी हैं। सम्पूर्ण जगत्में इनकी पूजा होती है। इनके बिना देवता अर्पित की हुई हवि पानेमें असमर्थ हैं। यज्ञकी पत्नीको 'दक्षिणा' कहते हैं। इनका सर्वत्र सम्मान होता है। इनके न रहनेपर विश्वभरके सम्पूर्ण कर्म निष्फल समझे जाते हैं। 'स्वधा' पितरोंकी पत्नी हैं। मुनि, मनु और मानव—सभी इनकी पूजा करते हैं। इनका उच्चारण न करके पितरोंको वस्तु अर्पण की जाय तो वह निष्फल हो जाती है। वायुकी पत्नीका नाम देवी 'स्वस्ति' है। प्रत्येक विश्वमें इनका सत्कार होता है। इनके बिना आदान-प्रदान सभी निष्फल हो जाते हैं। 'पुष्टि' गणेशकी पत्नी हैं। धरातलपर सभी इनको पूजते हैं। इनके बिना पुरुष और स्त्री—सभी क्षीणशक्ति-हीन हो जाते हैं। अनन्तकी पत्नीका नाम 'तुष्टि' है। सब लोग इनकी पूजा एवं वन्दना करते हैं। इनके बिना सम्पूर्ण संसार सम्यक् प्रकारसे कभी संतुष्ट हो ही नहीं सकता। ईशानकी पत्नीका नाम 'सम्पत्ति' है। देवता और मनुष्य—सभी इनका सम्मान करते हैं। इनके न रहनेपर विश्वभरकी जनता दरिद्र कहलाती है। 'धृति' कपिलमुनिकी पत्नी हैं। सब लोग सर्वत्र इनका स्वागत करते हैं। ये न रहें तो जगत्में सम्पूर्ण प्राणी धैर्यसे हाथ धो बैठें। 'क्षमा' यमकी पत्नी हैं; ये साध्वी और सुशीला हैं, सभी इनका सम्मान करते हैं; ये न हों तो सब लोग रुष्ट एवं उन्मत्त हो जायँ। सती-साध्वी 'रति' कामदेवकी पत्नी हैं, ये क्रीड़ाकी अधिष्ठात्री देवी हैं। ये न रहें तो जगत्के सब प्राणी केलि-कौतुकसे शून्य हो जायँ। सती 'मुक्ति' को सत्यकी भार्या कहा गया है। सबसे आदर पानेवाली ये देवी परम लोकप्रिय हैं। इनके बिना जगत् सर्वथा बन्धुता-शून्य हो जाता है। परम साध्वी 'दया' मोहकी पत्नी हैं। ये पूज्य एवं जगत्प्रिय हैं। इनके अभावमें सम्पूर्ण प्राणी सर्वत्र निष्ठुर माने जाते हैं। पुण्यकी सहधर्मिणी 'प्रतिष्ठा' हैं। ये पुण्यरूपा देवी सदा सुपूजित होती हैं। मुने! इनके बिना सारा संसार जीते हुए ही मृतकके समान समझा जाता है। सुकर्मकी पत्नी 'कीर्ति' हैं, जो धन्या और माननीया हैं। सबके द्वारा इनका सम्मान होता है। इनके अभावमें अखिल जगत् यशोहीन होकर मृतकके समान हो जाता है। 'क्रिया' उद्योगकी पत्नी हैं। इन आदरणीया देवीसे सब लोग सहमत हैं। नारद! इनके बिना सारा संसार उच्छिन्न-सा हो जाता है। अधर्मकी पत्नीको 'मिथ्या' कहते हैं। सभी धूर्त इनका सत्कार करते हैं। सत्ययुगमें ये बिलकुल अदृश्य थीं। त्रेतायुगमें सूक्ष्म रूप धारण करके प्रकट हो गयीं। द्वापरमें अपने आधे शरीरसे शोभा पाने लगीं और कलियुगमें तो इन 'मिथ्या' देवीका शरीर पूरा हृष्ट-पुष्ट हो गया है। सब जगह इनकी पहुँच होनेके कारण ये बड़ी प्रगल्भता (धृष्टता)-के साथ सर्वत्र अपना आधिपत्य जमाये रहती हैं। इनके भाईका नाम 'कपट' है। उसके साथ ये प्रत्येक घरमें चक्कर लगाती हैं। 'शान्ति' और 'लज्जा'—ये सुशीलकी दो आदरणीया पत्नियाँ हैं। नारद! इनके न रहनेपर सारा जगत् उन्मत्तकी भाँति जीवन व्यतीत करने लगता है। ज्ञानकी तीन पत्नियाँ हैं—'बुद्धि', 'मेधा' और 'स्मृति'। ये साथ छोड़ दें तो समस्त संसार मूर्ख और मरेके समान हो जाय।
धर्मकी सहधर्मिणीका नाम 'मूर्ति' है। कमनीय कान्तिवाली ये देवी सबके मनको मुग्ध किये रहती हैं। इनका सहयोग न मिले तो परमात्मा निराकार ही रह जायँ और सम्पूर्ण विश्व भी निराधार हो जाय। इनके स्वरूपको अपनाकर ही साध्वी लक्ष्मी सर्वत्र शोभा पाती हैं। 'श्री' और 'मूर्ति'—दोनों इनके स्वरूप हैं। ये परम मान्य, धन्य एवं सुपूज्य हैं। 'कालाग्नि' रुद्रकी पत्नीका नाम है। इनको 'योगनिद्रा' भी कहते हैं। रात्रिमें इनका सहयोग पाकर सम्पूर्ण प्राणी