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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३८- पार्वतीकी शिवसे प्रार्थना, परशुरामको देखकर उन्हें मारनेके लिये उद्यत होना, परशुरामद्वारा इष्टदेवका ध्यान, भगवान्‌का वामनरूपसे पधारना, शिव-पार्वतीको समझाना और गणेशस्तोत्रको प्रकट करना

४००संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वत्स! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवच बतला दिया। यह परम अद्भुत तथा सम्पूर्ण मन्त्र-समुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। समस्त तीर्थोंमें भलीभाँति गोता लगानेसे, सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे तथा सभी प्रकारके व्रतोपवास करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल मनुष्य इस कवचके धारण करनेसे पा लेता है। जो विधिपूर्वक वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे गुरुकी पूजा करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह सम्पूर्ण शत्रुओंका मर्दन करनेवाला तथा त्रिलोकविजयी होता है। जो इस कवचको न जानकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। नारद! यह काण्वशाखोक्त सुन्दर कवच, जिसका मैंने वर्णन किया है, परम गोपनीय तथा अत्यन्त दुर्लभ है। इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये।* (अध्याय ३९)


* नारायण उवाच —

श्रृणु नारद वक्ष्यामि दुर्गायाः कवचं शुभम्। श्रीकृष्णैनैव यद्दत्तं गोलोके ब्रह्मणे पुरा॥
ब्रह्मा त्रिपुरसंग्रामे शङ्कराय ददौ पुरा। जघान त्रिपुरं रुद्रो यद् धृत्वा भक्तिपूर्वकम्॥
हरो ददौ गौतमाय पद्माक्षाय च गौतमः। यतो बभूव पद्माक्षः सप्तद्वीपेश्वरो जयी॥
यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मा ज्ञानवान् शक्तिमान् भुवि। शिवो बभूव सर्वज्ञो योगिनां च गुरुर्यतः।
शिवतुल्यो गौतमश्च बभूव मुनिसत्तमः॥
ब्रह्माण्डविजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्चन्दश्च गायत्री देवी दुर्गतिनाशिनी॥
ब्रह्माण्डविजये चैव विनियोगः प्रकीर्तितः। पुण्यतीर्थं च महतां कवचं परमाद्भुतम्॥
ॐ ह्रीं दुर्गतिनाशिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्। ॐ ह्रीं मे पातु कपालं च ॐ ह्रीं श्रीमिति लोचने॥
पातु मे कर्णयुग्मं च ॐ दुर्गायै नमः सदा। ॐ ह्रीं श्रीमिति नासां मे सदा पातु च सर्वतः॥
ह्रीं श्रीं ह्रीमिति दन्तानि पातु क्लीमोष्ठयुग्मकम्। क्रीं क्रीं क्रीं पातु कण्ठं च दुर्गे रक्षतु गण्डकम्॥
स्कन्धं दुर्गविनाशिन्यै स्वाहा पातु निरन्तरम्। वक्षो विपद्विनाशिन्यै स्वाहा मे पातु सर्वतः॥
दुर्गे दुर्गे रक्षणीति स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। दुर्गे दुर्गे रक्ष रक्ष पृष्ठं मे पातु सर्वतः॥
ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा च हस्तौ पादौ सदाऽवतु। ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा च सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥
प्राच्यां पातु महामाया आग्नेय्यां पातु कालिका। दक्षिणे दक्षकन्या च नैर्ऋत्यां शिवसुन्दरी॥
पश्चिमे पार्वती पातु वाराही वारुणे सदा। कुबेरमाता कौबेर्यामैशान्यामीश्वरी सदा॥
ऊर्ध्वे नारायणी पातु अम्बिकाधः सदाऽवतु। ज्ञाने ज्ञानप्रदा पातु स्वप्ने निद्रा सदाऽवतु॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। ब्रह्माण्डविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
सुस्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत् फलम्। सर्वव्रतोपवासे च तत् फलं लभते नरः॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद् वस्त्रालंकारचन्दनैः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ कवचं धारयेत्तु यः॥
स च त्रैलोक्यविजयी सर्वशत्रुप्रमर्दकः। इदं कवचमज्ञात्वा भजेद् दुर्गतिनाशिनीम्॥
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
कवचं काण्वशाखोक्तमुक्तं नारद सुन्दरम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं सुदुर्लभम्॥
(गणपतिखण्ड ३९। ३—२३)

गणपतिखण्ड ४०१

परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्राक्षकका वध, कार्तवीर्य-परशुराम-युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवन दान, कार्तवीर्य-परशुराम-संवाद, आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! जब भगवान् विष्णु महालक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको लेकर वैकुण्ठको चले गये, तब भृगुनन्दन परशुरामने पुत्रसहित राजा *सहस्राक्षपर प्रहार किया। यद्यपि राजा कवचहीन था तथापि वह प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा एक सप्ताहतक युद्ध करता रहा। अन्ततोगत्वा पुत्रसहित धराशायी हो गया। सहस्राक्षके गिर जानेपर महाबली कार्तवीर्यार्जुन दो लाख अक्षौहिणी सेनाके साथ स्वयं युद्ध करनेके लिये आया। वह रत्ननिर्मित खोलसे आच्छादित स्वर्णमय रथपर सवार हो अपने चारों ओर नाना प्रकारके अस्त्रोंको सुसज्जित करके रणके मुहानेपर डटकर खड़ा हो गया। परशुरामने राजराजेश्वर कार्तवीर्यको समरभूमिमें उपस्थित देखा। वह रत्ननिर्मित आभूषणोंसे सुशोभित करोड़ों राजाओंसे घिरा हुआ था। रत्ननिर्मित छत्र उसकी शोभा बढ़ा रहा था। वह रत्नोंके गहनोंसे विभूषित था। उसके सर्वाङ्गमें चन्दनकी खौर लगी हुई थी। उसका रूप अत्यन्त मनोहर था और वह मन्द-मन्द मुस्करा रहा था। राजा मुनिवर परशुरामको देखकर रथसे उतर पड़ा और उन्हें प्रणाम करके पुनः रथपर सवार हो राज-समुदायके साथ सामने खड़ा हुआ। तब परशुरामने राजाको समयोचित शुभाशीर्वाद दिया और पुनः यों कहा—'अनुयायियोंसहित तुम स्वर्गमें जाओ।' नारद! इसके बाद वहाँ दोनों सेनाओंमें युद्ध होने लगा। तब परशुरामके शिष्य तथा उनके महाबली भाई कार्तवीर्यसे पीड़ित होकर भाग खड़े हुए। उस समय उनके सारे अङ्ग घायल हो गये थे। राजाके बाणसमूहसे आच्छादित होनेके कारण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामको अपनी तथा राजाकी सेना ही नहीं दीख रही थी। फिर तो परस्पर घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग होने लगा। अन्तमें राजाने दत्तात्रेयके दिये हुए अमोघ शूलको यथाविधि मन्त्रोंका पाठ करके परशुरामपर छोड़ दिया। उस सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली एवं प्रलयाग्निकी शिखाके सदृश शूलके लगते ही परशुराम धराशायी हो गये। तदनन्तर भगवान् शिवने वहाँ आकर परशुरामको पुनर्जीवन दान दिया। इसी समय वहाँ युद्धस्थलमें भक्तवत्सल कृपालु भगवान् दत्तात्रेय शिष्यकी रक्षा करनेके लिये आ पहुँचे। फिर परशुरामने क्रुद्ध होकर पाशुपतास्त्र हाथमें लिया; परंतु दत्तात्रेयकी दृष्टि पड़नेसे वे रणभूमिमें स्तम्भित हो गये। तब रणके मुहानेपर स्तम्भित हुए परशुरामने देखा कि जिनके शरीरकी कान्ति नूतन जलधरके सदृश है; जो हाथमें वंशी लिये बजा रहे हैं; सैकड़ों गोप जिनके साथ हैं; जो मुस्कराते हुए प्रज्वलित सुदर्शन चक्रको निरन्तर घुमा रहे हैं और अनेकों पार्षदोंसे घिरे हुए हैं एवं ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिनका स्तवन कर रहे हैं; वे गोपवेषधारी श्रीकृष्ण युद्धक्षेत्रमें राजाकी रक्षा कर रहे हैं। इसी समय वहाँ यों आकाशवाणी हुई—'दत्तात्रेयद्वारा दिया हुआ परमात्मा श्रीकृष्णका कवच उत्तम


* पुष्कराक्षका दूसरा नाम प्रतीत होता है।

४०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
रत्नकी गुटिकाके साथ राजाकी दाहिनी भुजापर
बँधा हुआ है, अतः योगियोंके गुरु शंकर
भिक्षारूपसे जब उस कवचको माँग लेंगे, तभी
परशुराम राजाका वध करनेमें समर्थ हो
सकेंगे।' नारद ! उस आकाशवाणीको सुनकर
शंकर ब्राह्मणका रूप धारण करके गये और
राजासे याचना करके उसका कवच माँग लाये।
फिर शम्भुने श्रीकृष्णका वह कवच परशुरामको
दे दिया। इसके बाद देवगण अपने-अपने उत्तम
स्थानको चले गये। तब परशुरामने राजाको
युद्धके लिये प्रेरित करते हुए कहा।
परशुरामजी बोले- राजेन्द्र ! उठो और
साहसपूर्वक युद्ध करो; क्योंकि मनुष्योंकी जय-
पराजयमें काल ही कारण है। तुमने विधिपूर्वक
शास्त्रोंका अध्ययन किया है, दान दिया है, सारी
पृथ्वीपर उत्तम रीतिसे शासन किया है, संग्राममें
यशोधर्वक कार्य किया है, इस समय मुझे मूर्च्छित
कर दिया है, सभी राजाओंको जीत लिया है,
लीलापूर्वक रावणको काबूमें कर लिया है और
दत्तात्रेयद्वारा दिये गये त्रिशूलसे मुझे पराजित कर
दिया है; परंतु शंकरजीने मुझे पुनः जीवित कर
दिया है। परशुरामकी बात सुनकर परम धर्मात्मा
राजा कार्तवीर्यने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया
और यथार्थ बात कहना आरम्भ किया।
राजाने कहा- प्रभो! मैंने क्या अध्ययन
किया, क्या दान दिया अथवा पृथ्वीका क्या
उत्तम शासन किया? भूतलपर मेरे समान कितने
भूपाल इस लोकसे चले गये। मेरी बुद्धि, तेज,
पराक्रम, विविध प्रकारकी युद्ध-निपुणता, लक्ष्मी,
ऐश्वर्य, ज्ञान, दानशक्ति, लौकिक गुण, आचार,
विनय, विद्या, प्रतिष्ठा, परम तप-ये सभी मनोरमाके
साथ ही नष्ट हो गये। समय आनेपर इन्द्र मानव
हो जायेंगे। समय आनेपर ब्रह्मा भी मरेंगे। समय
आनेपर प्रकृति श्रीकृष्णके शरीरमें तिरोहित हो
जायगी। समय आनेपर सभी देवता मर जायँगे
और समय आनेपर त्रिलोकीमें स्थित समस्त चर-
अचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं। कालका अतिक्रमण
करना दुष्कर है। परात्पर श्रीकृष्ण उस काल-
के-काल हैं और स्वेच्छानुसार सृष्टिरचयिताके
स्रष्टा, संहारकर्ताके संहारक और पालन करनेवालेके
पालक हैं। जो महान्, स्थूलसे स्थूलतम, सूक्ष्मसे
सूक्ष्मतम, कृश, परमाणुपरक काल, कालभेदक
काल है। सारे विश्व जिसके रोयें हैं; वह
महाविराट् पुरुष तेजमें परमात्मा श्रीकृष्णके
सोलहवें अंशके बराबर है, जिससे क्षुद्र विराट्
उत्पन्न हुआ है, जो सबका उत्कृष्ट कारण है।
जो स्वयं स्रष्टा है और ब्रह्मा जिसके नाभिकमलसे
उत्पन्न हुए हैं। उस समय ब्रह्मा यत्नपूर्वक लाखों
वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी जब नाभिकमलके
दण्डका अन्त न पा सके, तब अपने स्थानपर
स्थित हो गये। वहाँ उन्होंने वायुका आहार करके
एक लाख वर्षतक तप किया। तदनन्तर उन्हें
गोलोक तथा पार्षदसहित श्रीकृष्णके दर्शन हुए।
उस समय श्रीकृष्ण गोप और गोपियोंसे घिरे
हुए थे, उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली लिये
हुए थे, रत्न-सिंहासनपर आसीन थे और राधाको
वक्षःस्थलसे लगाये हुए थे। उन्हें देखकर ब्रह्माने
बारंबार प्रणाम किया और ईश्वरेच्छा जानकर
उनकी आज्ञा ले सृष्टिकी रचना करनेमें मन
लगाया। शिव, जो सृष्टिके संहारक हैं, वे सृष्टि-
कर्ताके ललाटसे उत्पन्न हुए हैं। श्वेतद्वीपनिवासी
क्षुद्र विराट् विष्णु पालनकर्ता हैं। सृष्टिके कारणभूत
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर सभी विश्वोंमें श्रीकृष्णकी
कलासे उत्पन्न हुए हैं। प्रकृति सबको जन्म
देनेवाली है और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे हैं।
मायापति परमेश्वर भी उस प्रकृतिरूपिणी शक्तिके
बिना सृष्टिका विधान करनेमें समर्थ नहीं हैं;
क्योंकि माया बिना सृष्टिकी रचना नहीं हो
सकती। वह महेश्वरी माया नित्य है। वह सृष्टि,
संहार और पालनकर्ता श्रीकृष्णमें छिपी रहती है

गणपतिखण्ड
४०३
और सृष्टि-रचनाके समय प्रकट हो जाती है। जैसे
मिट्टीके बिना कुम्हार घड़ा नहीं बना सकता और
स्वर्णके बिना सोनार कुण्डलका निर्माण करनेमें
असमर्थ है (उसी तरह स्रष्टा मायाके बिना सृष्टि-
रचना नहीं कर सकते)। वह शक्ति ईश्वरकी
इच्छासे सृष्टिकालमें राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गादेवी
और सरस्वती नामसे पाँच प्रकारकी हो जाती हैं।
परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री देवी हैं,
वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा 'राधा' कही
जाती हैं। जो सम्पूर्ण मङ्गलोंको सम्पन्न करनेवाली,
परमानन्दरूपा तथा ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी हैं;
वे 'पद्मा' नामसे पुकारी जाती हैं। जो वेद,
शास्त्र और योगकी जननी, परम दुर्लभ और
परमेश्वरकी विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं; उनका
नाम 'सावित्री' है। जो सर्वशक्तिस्वरूपिणी,
सर्वज्ञानात्मिका, सर्वस्वरूपा और बुद्धिकी अधिष्ठात्री
देवी हैं; वे दुर्गनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती हैं। जो
वाणीकी अधिष्ठात्री देवी और सदा शास्त्र-ज्ञान
प्रदान करनेवाली हैं तथा जो श्रीकृष्णके कण्ठसे
उत्पन्न हुई हैं; वे देवी 'सरस्वती' कही जाती हैं।
आदिमें स्वयं मूलप्रकृति परमेश्वरीदेवी पाँच प्रकारकी
थीं। परंतु वे ही पीछे सृष्टि-क्रमसे बहुत-सी
कलाओंवाली हो गयीं। सृष्टि-कालमें मायाद्वारा
स्त्रियाँ प्रकृतिके और पुरुषगण पुरुषके अंशसे
उत्पन्न हुए; क्योंकि माया-शक्ति बिना सृष्टि नहीं
हो सकती। ब्रह्मन् ! प्रत्येक विश्वमें सृष्टि सदा
ब्रह्मासे ही प्रकट होती है। विष्णु उसके पालक
और निरन्तर मङ्गल प्रदान करनेवाले शिव
संहारक हैं। परशुराम ! यह ज्ञान दत्तात्रेयजीका
दिया हुआ है, उन्होंने पुष्करतीर्थमें माघी पूर्णिमाके
दिन दीक्षाके अवसरपर मुनिवरोंके संनिकट मुझे
दिया था। इतना कहकर कार्तवीर्यने मुस्कराते हुए
परशुरामको नमस्कार किया और शीघ्र ही बाणसहित
धनुष हाथमें लेकर वह रथपर जा बैठा।
तत्पश्चात् परशुरामने श्रीहरिका स्मरण करते
हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा राजाकी सेनाका सफाया कर
दिया। फिर लीलापूर्वक पाशुपतास्त्रका प्रयोग
करके राजाकी जीवनलीला समाप्त कर दी। इसी
प्रकार परशुरामने शिवजीका स्मरण करते हुए
खेल-ही-खेलमें क्रमशः इक्कीस बार पृथ्वीको
राजाओंसे शून्य कर दिया। परशुरामने अपनी
प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेके लिये क्षत्रियोंके गर्भमें
स्थित तथा माताकी गोदमें खेलनेवाले शिशुओंका,
नौजवानोंका तथा वृद्धोंका संहार कर डाला। इस
प्रकार कार्तवीर्य गोलोकमें श्रीकृष्णके संनिकट
चला गया और परशुराम श्रीहरिका स्मरण करते
हुए अपने आश्रमको लौट गये। महेश्वरने इक्कीस
बार पृथ्वीको भूपालोंसे हीन देख और रामको
फरसेद्वारा क्रीडा करते देखकर उनका नाम
परशुराम रख दिया। नारद! तब देवता, मुनि,
देवियाँ, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर - ये सभी लोग
परशुरामके मस्तकपर पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे।
स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और हरिनाम-
संकीर्तन होने लगा। इस प्रकार परशुरामके
उज्ज्वल यशसे सारा जगत् व्याप्त हो गया। फिर
ब्रह्मा, भृगु, शुक्र, च्यवन, वाल्मीकि तथा परम
प्रसन्न हुए जमदग्नि ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। उनके
सारे अङ्ग पुलकायमान थे और नेत्रोंमें आनन्दके
आँसू छलक आये थे। वे सभी हाथमें दूब और
पुष्प लेकर मङ्गलाशासन कर रहे थे। तब
परशुरामने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन
सबको प्रणाम किया। तब क्रमशः 'तात' यों
कहते हुए पहले ब्रह्माने उन्हें अपनी गोदमें बैठा
लिया। फिर जगद्गुरु स्वयं ब्रह्मा परशुरामसे
हितकारक, नीतियुक्त, वेदका सारतत्त्व और
परिणाममें सुखदायक वचन बोले।
ब्रह्माने कहा - राम ! जो सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको
देनेवाला परमोत्कृष्ट, सर्वसम्मत और सत्य है,
वह काण्वशाखोक्त वचन कहता हूँ, सुनो। जो
सभी पूजनीयोंमें इष्ट, पूज्यतम और प्रधान है, वह
जन्म देनेके कारण जनक और पालन करनेके
कारण पिता कहा जाता है। किंतु मुने! जो