ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३७- शिवका सतीके शवको लेकर शोकवश समस्त लोकोंमें भ्रमण, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना और प्रकृतिकी स्तुतिके लिये कहना, शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हुई प्रकृतिरूपिणी सतीका शिवको दर्शन एवं सान्त्वना देना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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शिव और पार्वतीके सम्बन्धको जोड़नेवाली थीं।
ऋषि बोले—शैलराज! हमारी बात सुनो। यह तुम्हारे लिये शुभकारक है। तुम पार्वतीका विवाह शिवके साथ कर दो और उन लोकसंहारक महादेवके श्वशुर बनो। देवेश्वर शिव तुमसे याचना नहीं करेंगे। तुम यत्नपूर्वक शीघ्र ही उन्हें समझाओ—विवाहके लिये तैयार करो। तुम्हारी शंकाका निवारण करनेके लिये ब्रह्माजी स्वयं विवाह स्थिर करानेके निमित्त प्रयत्न करें। योगियोंमें श्रेष्ठ शंकर कभी विवाहके लिये इच्छुक नहीं हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही वे तुम्हारी पुत्रीको ग्रहण करेंगे। उसे ग्रहण करनेका दूसरा कारण यह है कि तुम्हारी कन्याकी तपस्याके अन्तमें उन्होंने उसे अपनानेकी प्रतिज्ञा कर ली है। इन दो कारणोंसे ही योगिराज शिव विवाह करेंगे।
ऋषियोंकी यह बात सुनकर हिमवान् हँसे और कुछ भयभीत हो अत्यन्त विनयपूर्वक बोले।
हिमालयने कहा—मैं शिवके पास कोई राजोचित सामग्री नहीं देखता। न रहनेके लिये कोई घर है, न ऐश्वर्य। यहाँतक कि उनके कोई स्वजन-बान्धव भी नहीं हैं। जो अत्यन्त निर्लिप्त योगी हो, उसके हाथ कन्या देना उचित नहीं है। आपलोग ब्रह्माजीके पुत्र हैं। अतः अपना सत्य एवं निश्चित मत प्रकट कीजिये। यदि पिता कामना, लोभ, भय अथवा मोहके वशीभूत हो सुयोग्य पात्रके हाथमें अपनी कन्या नहीं देता है तो सौ वर्षोंतक नरकमें पड़ा रहता है;* अतः मैं स्वेच्छासे शूलपाणिको अपनी कन्या नहीं दूँगा। ऋषियो! इस विषयमें जो उचित कार्य हो; वह आप कीजिये।
हिमवान्की बात सुनकर वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान् ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ वेदोक्त मत प्रकट करनेके लिये उद्यत हुए।
वसिष्ठजीने कहा—शैलराज! लोक और वेदमें तीन प्रकारके वचन कहे गये हैं। शास्त्रज्ञ पुरुष अपनी निर्मल ज्ञानदृष्टिसे उन सभी वचनोंको जानता है। पहला वचन वह है, जो वर्तमान कालमें कानोंको सुन्दर लगे और जल्दी समझमें आ जाय; किंतु पीछे असत्य और अहितकर सिद्ध हो। ऐसी बात केवल शत्रु कहता है। उससे कदापि हित नहीं होता। दूसरे प्रकारका वचन वह है, जो आरम्भमें सहसा दुःखजनक जान पड़े; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला हो। ऐसा वचन दयालु और धर्मशील पुरुष ही अपने भाई-बन्धुओंको समझानेके लिये कहता है। तीसरी उत्कृष्ट श्रेणीका वचन वह है जो कानोंमें पड़ते ही अमृतके समान मधुर प्रतीत हो तथा सर्वदा सुखकी प्राप्ति करानेवाला हो। उसमें सारतत्त्व सत्य होता है और उसमें सबका हित होता है। ऐसा वचन सर्वश्रेष्ठ तथा सभीको अभीष्ट होता है। गिरिराज! इस प्रकार नीतिशास्त्रमें तीन प्रकारके वचनोंका निरूपण किया गया है। अब तुम्हीं कहो इन तीनोंमेंसे कौन-सा वचन तुमसे कहूँ? तुम्हें कैसी बात सुननेकी इच्छा है? देवेश्वर शंकर वास्तवमें बाह्य धन-सम्पत्तिसे रहित हैं; क्योंकि उनका मन एकमात्र तत्त्वज्ञानके समुद्रमें निमग्न रहता है। बाह्य धन-सम्पत्ति आपाततः रमणीय जान पड़ती है; परंतु वह बिजलीकी चमककी भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जानेवाली है। नित्यानन्दस्वरूप स्वात्माराम परमेश्वरको इस तरहकी सम्पत्तिके लिये क्या इच्छा होगी? गृहस्थ मनुष्य ऐसे पुरुषको अपनी पुत्री देता है, जो राज्य-वैभवसे सम्पन्न हो। जिसके मनमें स्त्रीसे द्वेष हो, ऐसे वरको कन्या देनेवाला पिता कन्याघाती होता है; परंतु कौन कह सकता है कि भगवान् शंकर दुःखी हैं? क्योंकि धनाध्यक्ष कुबेर भी उनके किङ्कर हैं।
* नानुरूपाय पात्राय पिता कन्यां ददाति चेत्। कामाल्लोभाद्भयान्मोहाच्छताब्दं नरकं व्रजेत्॥
(४१।५०)
६०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जो भगवान् भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे सृष्टिका निर्माण एवं संहार करनेमें समर्थ हैं; जो ईश प्रकृतिसे परे, निर्गुण, परमात्मा एवं सर्वेश्वर हैं; जो समस्त जन्तुओंसे निर्लिप्त और उनमें लिप्त भी हैं; जो अकेले ही समस्त सृष्टिके संहारकर्म तथा सृष्टिकर्ममें भी समर्थ हैं एवं सर्वरूप हैं; निराकार, साकार, सर्वव्यापी और स्वेच्छामय हैं; जो ईश्वर स्वयं सृष्टिकार्यका सम्पादन करनेके लिये तीन रूप धारण करते हैं तथा सृष्टिकर्ता 'ब्रह्मा', पालनकर्ता 'विष्णु' एवं संहारकर्ता 'शिव'-नामसे प्रसिद्ध होते हैं; जो 'ब्रह्मा'-रूपसे ब्रह्मलोकमें, 'विष्णु'-रूपसे क्षीरसागरमें तथा 'शिव'-रूपसे कैलासमें वास करते हैं; वे परब्रह्म परमेश्वर ही 'श्रीकृष्ण' कहे गये हैं। ब्रह्मा आदि सब रूप उन्हींकी विभूतियाँ हैं। श्रीकृष्णके दो रूप हैं— द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज-रूपसे तो वे वैकुण्ठमें निवास करते हैं और स्वयं द्विभुज-रूपसे गोलोकमें विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर उन भगवान् श्रीकृष्णके अंश हैं। कोई देवता उनकी कला है और कोई कलांश। श्रीकृष्णने सृष्टिके लिये उन्मुख होकर स्वयं अपनी प्रकृति (शक्तिस्वरूपा श्रीराधा)-को प्रकट किया और उनमें अपने तेजोमय वीर्यकी स्थापना की। उस गर्भसे एक डिम्बका प्रादुर्भाव हुआ, जिसके भीतरसे महाविराट् (नारायण) प्रकट हुए। उन्हींको महाविष्णु जानना चाहिये। वे श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। वे ही जब एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय उनके नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ। सृष्टिकर्ता ब्रह्माके भाल-देशसे चन्द्रशेखर शंकर प्रकट हुए हैं। महाविष्णुके वामपार्श्वसे विष्णु (लघु विराट्)-का प्राकट्य हुआ। शैलराज! इस प्रकार प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि प्राकृतिक कहे गये हैं।
श्रीकृष्णसे प्रकट हुई प्रकृतिने मुख्यतः चार प्रकारकी मूर्ति धारण की। इसके सिवा सृष्टि-संचालनके लिये लीलापूर्वक अपने अंश और कलाद्वारा उन्होंने और भी बहुतसे रूप धारण किये। श्रीकृष्णके वामाङ्गसे प्रकट हुई प्रकृतिदेवी स्वयं तो रासेश्वरी राधाके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। वे ही स्वयं श्रीकृष्णके मुखसे प्रकट हो वाणी सरस्वती कहलायीं, जो राग-रागिनियोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। श्रीकृष्णके वक्षःस्थलसे प्रकट हुई वे सर्वसम्पत्स्वरूपिणी लक्ष्मीके नामसे प्रसिद्ध हुईं तथा सम्पूर्ण देवताओंके तेजमें उन्होंने अपने-आपको ही शिवारूपसे अभिव्यक्त किया और समस्त दानवोंका वध करके उन्होंने देवताओंको राज्यलक्ष्मी प्रदान की। तत्पश्चात् कल्पान्तरमें दक्षपत्नीके गर्भसे जन्म ले वे ही सती नामसे प्रसिद्ध हुईं और शिवकी पत्नी बनीं। दक्षने स्वयं ही सतीको शिवके हाथमें दिया; परंतु पिताके यज्ञमें पतिकी निन्दा सुनकर सतीने योगसे अपने शरीरको त्याग दिया। पितरोंकी मानसी कन्या मेनका तुम्हारी पत्नी हैं। उनके गर्भसे उन्हीं जगदम्बिका सतीने जन्म ग्रहण किया है। शैलराज ! यह शिवा जन्म-जन्ममें और कल्प-कल्पमें शिवकी पत्नी रही हैं। यह पराशक्ति जगदम्बा ज्ञानियोंकी बुद्धिरूपा है। इसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण बना रहता है। यह सर्वज्ञा, सिद्धिदायिनी और सिद्धिरूपिणी है। इसकी अस्थि और चिताभस्मको भगवान् शिव स्वयं भक्तिपूर्वक धारण करते हैं। कल्याणस्वरूप गिरिराज ! तुम स्वेच्छासे अपनी कन्या शिवको दे दो, दे दो। नहीं तो, वह स्वयं अपने प्राणवल्लभके स्थानको चली जायगी और तुम देखते रह जाओगे। पूर्वजन्मसे जो जिसकी पत्नी है, दूसरे जन्ममें वह अपने उस प्रियतमको अवश्य पाती है। प्रजापतिके इस नियमका कोई भी खण्डन नहीं कर सकता। भगवान् शिव स्वात्माराम और तत्त्वज्ञ हैं; अतः विवाहके लिये उत्सुक नहीं हैं। तारकासुरसे
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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पीड़ित हुए समस्त देवताओंने इसके लिये उनका स्तवन किया है। देवताओंकी पीड़ा देखकर ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर कृपालु भगवान् शिवने कृपापूर्वक उनके इस अनुरोधको स्वीकार किया है। विवाहकी प्रतिज्ञा करके योगीन्द्र शिवने जब शिवाको असंख्य क्लेश उठाते देखा, तब तुम्हारी पुत्रीकी तपस्याके स्थानमें वे स्वयं ब्राह्मणका रूप धारण करके आये और उसे आश्वासन तथा वर देकर पुनः अपने स्थानको लौट गये।
गिरिराज! इस समाचारको सुनकर ही इन्द्र आदि सब देवता प्रसन्नतापूर्वक यहाँ आये थे। भगवान् नारायण, ब्रह्मा, धर्म, ऋषि-मुनि, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस सब इस समय एक स्थानपर मिले और इस विषयपर सबने अच्छी तरह विचार किया। उन्हीं लोगोंने हमें शीघ्र यहाँ भेजा है। देवी अरुन्धती अपने कर्तव्यका पालन करके उऋण हो चुकी हैं। तुम्हें समझानेमें हमें सदा ही अधिक प्रसन्नता होती है; तुम्हारे सामने शिवाके विवाहका शुभ कार्य प्राप्त है, जो सब कालमें सुख देनेवाला है। शैलेन्द्र! यदि स्वेच्छापूर्वक शिवाका विवाह शिवके साथ नहीं करोगे तो भी वह होकर ही रहेगा; क्योंकि भवितव्यता प्रबल होती है। वे महादेवजी रत्नसारनिर्मित रथपर योगीन्द्रोंमें श्रेष्ठ, ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु, आदि-मध्य और अन्तसे रहित, निर्विकार एवं अजन्मा परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको बिठाकर यहाँ विवाहके लिये पधारेंगे। नारायणको साथ ले तपस्याके स्थानमें शिवने शिवाको वर दिया है। ईश्वरकी दुर्लभ प्रतिज्ञा कभी विफल नहीं हो सकती। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् नश्वर और अस्थिर है; परंतु साधु पुरुषोंकी प्रतिज्ञा दुर्लङ्घ्य और अमिट होती है।
हिमालय! एक ही इन्द्रने लीलापूर्वक समस्त पर्वतोंके पंख काट डाले। पवनदेवने खेल-खेलमें ही मेरु पर्वतके एक शिखरको भंग कर दिया। अतः तुम्हीं बताओ पर्वतोंमें कौन-से ऐसे हैं, जो देवताओंसे युद्ध कर सकें। पवनसे प्रेरित हो समस्त पर्वत एक ही क्षणमें समुद्रोंके भीतर जा गिरेंगे। शैलेन्द्र! यदि एकके लिये सारी सम्पत्तिका विनाश हो रहा हो तो उस एकको देकर शेष सबकी रक्षा कर लेनी चाहिये; परंतु यह नियम शरणागतके लिये लागू नहीं है। शरणागतकी रक्षाके लिये तो अपने प्राणोंका परित्याग कर देना भी उचित है। फिर स्त्री, पुत्र, धन आदि अन्य सब वस्तुओंकी तो बात ही क्या है? ऐसा नीतिवेत्ताओंका मत है। महाराज अनरण्य ब्राह्मणको अपनी पुत्री देकर शापसे मुक्त हुए और अपनी समस्त सम्पदाओंकी रक्षा कर सके। अनरण्य ब्राह्मणोंके हितकारी थे; परंतु उन्हींके शापमें डूबकर अत्यन्त कातर हो गये थे। उस समय नीतिशास्त्रके विद्वानोंने उन्हें शीघ्र ही कर्तव्यका बोध कराया और उसको पालन करके वे संकटसे मुक्त हुए। शैलेन्द्र! तुम भी शिवको अपनी पुत्री देकर समस्त बन्धुजनोंकी रक्षा करो और देवताओंको भी अधीन बना लो।
वसिष्ठजीकी बात सुनकर पर्वतेश्वर हँसे; उन्होंने व्यथित हृदयसे राजा अनरण्यका वृत्तान्त पूछा।
**हिमालय बोले—**ब्रह्मन्! राजाधिराज अनरण्य किस कुलमें उत्पन्न हुए थे और उन्होंने किस प्रकार अपनी पुत्री देकर समस्त सम्पदाओंकी रक्षा की थी?
**वसिष्ठजीने कहा—**शैलराज! नृपेश्वर अनरण्य मनुवंशी राजा थे। वे चिरंजीवी, धर्मात्मा, वैष्णव तथा जितेन्द्रिय थे। पहले मनुका नाम स्वायम्भुव है, जो ब्रह्माजीके पुत्र और अत्यन्त धर्मात्मा थे। उन्होंने इकहत्तर चतुर्युगतक धर्मपूर्वक राज्य किया था। तदनन्तर वे शतरूपाके साथ वैकुण्ठधाममें चले गये और श्रीहरिका दास्य एवं सामीप्य पाकर उनके दास हो गये। तत्पश्चात् स्वारोचिष मनु हुए,