ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०- गोपपत्नी कलावतीके गर्भसे एक शिशुके रूपमें उपबर्हणका जन्म, शूद्रयोनिमें उत्पन्न बालक नारदकी जीवनचर्या, नामकी व्युत्पत्ति, उसके द्वारा संतोंकी सेवा, सनत्कुमारद्वारा उसे उपदेशकी प्राप्ति, उसके द्वारा श्रीहरिके स्वरूपका ध्यान, आकाशवाणी तथा उस बालकके देह-त्यागका वर्णन
ब्रह्मखण्ड
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रानीसे समाराधित होते हैं। कभी गोप-बालकोंसे घिरे हुए गोपवेषसे सुशोभित होते हैं। कभी सैकड़ों शिखरवाले गिरिराज गोवर्धनके कारण उत्कृष्ट शोभासे युक्त रमणीय वृन्दावनमें कामधेनुओंके समुदायको चराते हुए बालगोपालके रूपमें देखे जाते हैं। कभी गोलोकमें विरजाके तटपर पारिजातवनमें मधुर-मधुर वेणु बजाकर गोपाङ्गनाओंको मोहित किया करते हैं। कभी निरामय वैकुण्ठधाममें चतुर्भुज लक्ष्मीकान्तके रूपमें रहकर चार भुजाधारी पार्षदोंसे सेवित होते हैं। कभी तीनों लोकोंके पालनके लिये अपने अंशरूपसे श्वेतद्वीपमें विष्णुरूप धारण करके रहते हैं और पद्मा उनकी सेवा करती हैं। कभी किसी ब्रह्माण्डमें अपनी अंशकलाद्वारा ब्रह्मारूपसे विराजमान होते हैं। कभी अपने ही अंशसे कल्याणदायक मङ्गलरूप शिव-विग्रह धारण करके शिवधाममें निवास करते हैं। अपने सोलहवें अंशसे स्वयं ही सर्वाधार, परात्पर एवं महान् विराट्-रूप धारण करते हैं, जिनके रोम-रोममें अनन्त ब्रह्माण्डोंका समुदाय शोभा पाता है। कभी अपनी ही अंशकलाद्वारा जगत्की रक्षाके लिये लीलापूर्वक नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं। उन अवतारोंके वे स्वयं ही सनातन बीज हैं। कभी योगियों एवं संत-महात्माओंके हृदयमें निवास करते हैं। वे ही प्राणियोंके प्राणस्वरूप परमात्मा एवं परमेश्वर हैं। मैं मूढ़ अबला उन निर्गुण एवं सर्वव्यापी भगवान्की स्तुति करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। वे अलक्ष्य, अनीह, सारभूत तथा मन और वाणीसे परे हैं। भगवान् अनन्त सहस्र मुखोंद्वारा भी उनकी स्तुति नहीं कर सकते। पञ्चमुख महादेव, चतुर्मुख ब्रह्मा, गजानन गणेश और षडानन कार्तिकेय भी जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, माया भी जिनकी मायासे मोहित रहती है, लक्ष्मी भी जिनकी स्तुति करनेमें सफल नहीं होती, सरस्वती भी जडवत् हो जाती है और वेद भी जिनका स्तवन करनेमें अपनी शक्ति खो बैठते हैं, उन परमात्माका स्तवन दूसरा कौन विद्वान् कर सकता है? मैं शोकातुर अबला उन निरीह परात्पर परमेश्वरकी स्तुति क्या कर सकती हूँ।*
*मालावत्युवाच
वन्दे तं परमात्मानं सर्वकारणकारणम् । विना येन शवाः सर्वे प्राणिनो जगतीतले ॥
निर्लिप्तं साक्षिरूपं च सर्वेषां सर्वकर्मसु । विद्यमानं न दृष्टं च सर्वैः सर्वत्र सर्वदा ॥
येन सृष्टा च प्रकृतिः सर्वाधारा परात्परा । ब्रह्मविष्णुशिवादीनां प्रसूर्या त्रिगुणात्मिका ॥
जगत्स्रष्टा स्वयं ब्रह्मा नियतो यस्य सेवया । पाता विष्णुश्च जगतां संहर्ता शंकरः स्वयम् ॥
ध्यायन्ते यं सुराः सर्वे मुनयो मनवस्तथा । सिद्धाश्च योगिनः सन्तः सन्ततं प्रकृतेः परम् ॥
साकारं च निराकारं परं स्वेच्छामयं विभुम् । वरं वरेण्यं वरदं वराहं वरकारणम् ॥
तपःफलं तपोबीजं तपसां च फलप्रदम् । स्वयं तपःस्वरूपं च सर्वरूपं च सर्वतः ॥
सर्वाधारं सर्वबीजं कर्म तत्कर्मणां फलम् । तेषां च फलदातारं तद्बीजं क्षयकारणम् ॥
स्वयं तेजःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् । सेवाध्यानं न घटते भक्तानां विग्रहं विना ॥
तत्तेजो मण्डलाकारं सूर्यकोटिसमप्रभम् । अतीव कमनीयं च रूपं तत्र मनोहरम् ॥
नवीननीरदश्यामं शरत्पङ्कजलोचनम् । शरत्पार्वणचन्द्रास्यमीषद्विकास्यसमन्वितम् ॥
कोटिकन्दर्पलावण्यं लीलाधाम मनोहरम् । चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं रत्नभूषणभूषितम् ॥
द्विभुजं मुरलीहस्तं पीतकौशेयवाससम् । किशोरवयसं शान्तं राधाकान्तमनन्तकम् ॥
गोपाङ्गनापरिवृतं कुत्रचिन्निर्जने वने । कुत्रचिद्रासमध्यस्थं राधया परिसेवितम् ॥
कुत्रचिद् गोपवेशं च वेष्टितं गोपबालकैः । शतशृङ्गाचलोत्कृष्टे रम्ये वृन्दावने वने ॥
निकरं कामधेनूनां रक्षन्तं शिशुरूपिणम् । गोलोके विरजातीरे पारिजातवने वने ॥
वेणुं क्वणन्तं मधुरं गोपीसम्मोहकारणम् । निरामये च वैकुण्ठे कुत्रचिच्च चतुर्भुजम् ॥
७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
ऐसा कहकर गन्धर्व-कुमारी मालावती चुप हो गयी और फूट-फूटकर रोने लगी। भयसे पीड़ित हुई उस सतीने कृपानिधान भगवान् श्रीकृष्णको बारंबार प्रणाम किया। तब निराकार परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपनी शक्तियोंके साथ मालावतीके पति—गन्धर्व उपबर्हणके शरीरमें अधिष्ठित हुए। उनका आवेश होते ही गन्धर्व वीणा लिये उठ बैठा और शीघ्र ही स्नानके पश्चात् दो नवीन वस्त्र धारण करके उसने देव-समूहको तथा सामने खड़े हुए उन ब्राह्मणदेवताको प्रणाम किया। फिर तो देवता दुन्दुभि बजाने और फूलोंकी वर्षा करने लगे। उन गन्धर्व-दम्पतिपर दृष्टिपात करके उन सबने उत्तम आशीर्वाद दिये। गन्धर्वने एक क्षणतक देवताओंके सामने नृत्य और गान किया। देवताओंके वरसे नया जीवन पाकर गन्धर्व उपबर्हण अपनी पत्नीके साथ पुनः गन्धर्व-नगरमें चला गया। सती मालावतीने ब्राह्मणोंको करोड़ों रत्न और नाना प्रकारके धन दिये तथा उन सबको भोजन कराया। उनसे वेदपाठ और मङ्गलकृत्य करवाये। भाँति-भाँतिके बड़े-बड़े उत्सव रचाये। उन सबमें एकमात्र हरिनामकीर्तनरूप मङ्गलकृत्यकी प्रधानता रही। देवता अपने-अपने स्थानको चले गये और ब्राह्मण-रूपधारी साक्षात् श्रीहरि भी अपने धामको पधारे। शौनक! यह सब प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। साथ ही स्तवराजका भी वर्णन किया। जो वैष्णव पुरुष पूजाकालमें इस पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह श्रीहरिकी भक्ति एवं उनके दास्यका सौभाग्य पा लेता है। जो आस्तिक पुरुष वर-प्राप्तिकी कामना रखकर उत्तम आस्था और भक्तिभावसे इस स्तोत्रको पढ़ता है, वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी फलको निश्चय ही पाता है। इस स्तोत्रके पाठसे विद्यार्थीको विद्याका, धनार्थीको धनका, भार्याकी इच्छावालेको भार्याका और पुत्रकी कामनावालेको पुत्रका लाभ होता है। धर्म चाहनेवाला धर्म और यशकी इच्छावाला यश पाता है। जिसका राज्य छिन गया है, वह राज्य और जिसकी संतान नष्ट हो गयी है, वह संतान पाता है। रोगी रोगसे और कैदी बन्धनसे मुक्त हो
लक्ष्मीकान्तं पार्षदैश्च सेवितं च चतुर्भुजैः । कुत्रचित् स्वांशरूपेण जगतां पालनाय च॥
श्वेतद्वीपे विष्णुरूपं पद्माया परिसेवितम् । कुत्रचित् स्वांशकलया ब्रह्माण्डे ब्रह्मरूपिणम्॥
शिवस्वरूपं शिवदं स्वांशेन शिवरूपिणम् । स्वात्मनः षोडशांशेन सर्वाधारं परात्परम्॥
स्वयं महद्विराड्रूपं विश्वौघं यस्य लोमसु । लीलया स्वांशकलया जगतां पालनाय च॥
नानावतारं विभ्रन्तं बीजं तेषां सनातनम् । वसन्तं कुत्रचित् सन्तं योगिनां हृदये सताम्॥
प्राणरूपं प्राणिनां च परमात्मानमीश्वरम् । तं च स्तोतुमशक्ताहमबला निर्गुणं विभुम्॥
निर्लक्ष्यं च निरीहं च सारं वाङ्मनसोः परम् । यं स्तोतुमक्षमोऽनन्तः सहस्रवदनेन च॥
पञ्चवक्त्रश्चतुर्वक्त्रो गजवक्त्रः षडाननः । यं स्तोतुं न क्षमा माया मोहिता यस्य मायया॥
यं स्तोतुं न क्षमा श्रीश्च जडीभूता सरस्वती । वेदा न शक्ता यं स्तोतुं को वा विद्वांश्च वेदवित्॥
किं स्तौमि तमनीहं च शोकार्ता स्त्री परात्परम्। (ब्रह्मखण्ड १८। ९—३४ १/२ )
ब्रह्मखण्ड
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जाता है। भयभीत पुरुष भयसे छुटकारा पा जाता है। जिसका धन नष्ट हो गया है, उसे धनकी प्राप्ति होती है। जो विशाल वनमें डाकुओं अथवा हिंसक जन्तुओंसे घिर गया है, दावानलसे दग्ध होनेकी स्थितिमें आ गया है अथवा जलके समुद्रमें डूब रहा है, वह भी इस स्तोत्रका पाठ करके विपत्तिसे छुटकारा पा जाता है।
(अध्याय १८)
ब्रह्माण्डपावन नामक कृष्णकवच, संसारपावन नामक शिवकवच और शिवस्तवराजका वर्णन तथा इन सबकी महिमा
**सौति कहते हैं—**मालावती ब्राह्मणोंको धन देकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने स्वामीकी सेवाके लिये नाना प्रकारसे अपना शृङ्गार किया। वह प्रतिदिन पतिकी सेवा-शुश्रूषा और समयोचित पूजा करने लगी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस पतिव्रताने स्वयं एकान्तमें पतिको भूले हुए महापुरुषके स्तोत्र, पूजन, कवच और मन्त्रका बोध कराया। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने पुष्करतीर्थमें गन्धर्व और मालावतीको इस श्रीहरिके स्तोत्र, पूजन आदिका तथा एक मन्त्रका उपदेश दिया था। इसी तरह शंकरजीका स्तोत्र और कवच भी गन्धर्वको भूल गया था। कृपानिधान वसिष्ठने एकान्तमें गन्धर्वराजको उसका भी बोध कराया।
इस प्रकार बोधसम्पन्न हो परमानन्दमय गन्धर्वने अपने कुबेरभवनसदृश आश्रममें रहकर बन्धु-बान्धवोंके साथ राज्य किया। उपबर्हणकी अन्य स्त्रियाँ भी जैसे-तैसे वहाँ आयीं और आकर उन्होंने बड़े आनन्दके साथ पुनः अपने स्वामीको प्राप्त किया।
**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन! पूर्वकालमें वसिष्ठजीने उन दोनों दम्पतिको भगवान् विष्णुके किस स्तोत्र, कवच, मन्त्र और पूजा-विधिका उपदेश किया था—यह आप बतानेकी कृपा करें। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने गन्धर्वराजको भगवान् शिवके जिस द्वादशाक्षर-मन्त्र और कवच आदिका उपदेश दिया था, वह भी मुझे बताइये। यह सब सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है; क्योंकि शंकरका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दुर्गतिका नाश करनेवाला है।
**सौति बोले—**शौनकजी! मालतीने जिस स्तोत्रके द्वारा परमेश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया था, वही स्तोत्र वसिष्ठजीने उन गन्धर्व-दम्पतिको दिया था। अब उनके दिये हुए मन्त्र और कवचका वर्णन सुनिये।
'ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा'
—यह षोडशाक्षर-मन्त्र उपासकोंके लिये कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसीका उपदेश वसिष्ठजीने दिया था। पूर्वकालमें श्रीहरिके पुष्करधाममें ब्रह्माजीने कुमारको यह मन्त्र दिया था तथा श्रीकृष्णने गोलोकमें भगवान् शंकरको इसका ज्ञान