ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०- श्रीराधाजीका गङ्गापर रोष, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, श्रीराधाके भयसे गङ्गाका श्रीकृष्णके चरणोंमें छिप जाना, जलाभावसे पीड़ित देवताओंका गोलोकमें जाना, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गङ्गाका प्रकट होना, देवताओंके प्रति श्रीकृष्णका आदेश तथा गङ्गाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसङ्ग
प्रकृतिखण्ड
१४१
आधारभूता और रत्नगर्भा हैं। रत्नोंकी खानें इनको
गौरवान्वित किये हुए हैं। ये विशुद्ध चिन्मय वस्त्र
धारण किये रहती हैं। इनके मुखपर मुस्कान
छायी रहती है। सभी लोग इनकी वन्दना करते हैं।
ऐसी भगवती पृथ्वीकी मैं आराधना करता हूँ।'
इसी प्रकार ध्यान करनेसे सब लोगोंद्वारा पृथ्वीकी
पूजा सम्पन्न होती है। विप्रेन्द्र ! अब कण्वशाखामें
प्रतिपादित इनकी स्तुति सुनो।
भगवान् विष्णु बोले- विजयकी प्राप्ति
करानेवाली वसुधे ! मुझे विजय दो। तुम भगवान्
यज्ञवराहकी पत्नी हो। जये ! तुम्हारी कभी पराजय
नहीं होती है। तुम विजयका आधार, विजयशील
और विजयदायिनी हो। देवि ! तुम्हीं सबकी
आधारभूमि हो। सर्वबीजस्वरूपिणी तथा सम्पूर्ण
शक्तियोंसे सम्पन्न हो। समस्त कामनाओंको देनेवाली
देवि ! तुम इस संसारमें मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तु
प्रदान करो। तुम सब प्रकारके शस्योंका घर हो।
सब तरहके शस्योंसे सम्पन्न हो। सभी शस्योंको
देनेवाली हो तथा समयविशेषमें समस्त शस्योंका
अपहरण भी कर लेती हो। इस संसारमें तुम
सर्वशस्यस्वरूपिणी हो। मङ्गलमयी देवि ! तुम
मङ्गलका आधार हो। मङ्गलके योग्य हो।
मङ्गलदायिनी हो। मङ्गलमय पदार्थ तुम्हारे स्वरूप
हैं। मङ्गलेश्वरि ! तुम जगत्में मुझे मङ्गल प्रदान
करो। भूमे ! तुम भूमिपालोंका सर्वस्व हो,
भूमिपालपरायणा हो तथा भूपालोंके अहंकारका
मूर्तरूप हो। भूमिदायिनी देवि ! मुझे भूमि दो* ।
नारद ! यह स्तोत्र परम पवित्र है। जो पुरुष
पृथ्वीका पूजन करके इसका पाठ करता है, उसे
अनेक जन्मोंतक भूपाल-सम्राट् होनेका सौभाग्य
प्राप्त होता है। इसे पढ़नेसे मनुष्य पृथ्वीके दानसे
उत्पन्न पुण्यके अधिकारी बन जाते हैं। पृथ्वी-
दानके अपहरणसे, दूसरेके कुएँको बिना उसकी
आज्ञा लिये खोदनेसे, अम्बुवाची योगमें पृथ्वीको
खोदनेसे और दूसरेकी भूमिका अपहरण करनेसे
जो पाप होते हैं, उन पापोंसे इस स्तोत्रका पाठ
करनेपर मनुष्य छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय
नहीं है। मुने ! पृथ्वीपर वीर्य त्यागने तथा दीपक
रखनेसे जो पाप होता है, उससे भी पुरुष इस
स्तोत्रका पाठ करनेसे मुक्त हो जाता है।
नारदजी बोले - भगवन् ! पृथ्वीका दान
करनेसे जो पुण्य तथा उसे छीनने, दूसरेकी
भूमिका हरण करने, अम्बुवाचीमें पृथ्वीका उपयोग
करने, भूमिपर वीर्य गिराने तथा जमीनपर दीपक
रखनेसे जो पाप बनता है, उसे मैं सुनना चाहता
हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! मेरे पूछनेके अतिरिक्त
अन्य भी जो पृथ्वीजन्य पाप हैं, उनको उनके
प्रतीकारसहित बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण बोले - मुने ! जो पुरुष
भारतवर्षमें किसी संध्यापूत ब्राह्मणको एक बित्ता
भी भूमि दान करता है, वह भगवान् विष्णुके
धाममें जाता है। फसलोंसे भरी-पूरी भूमिको
ब्राह्मणके लिये अर्पण करनेवाला सत्पुरुष उतने
ही वर्षोंतक भगवान् विष्णुके धाममें विराजता है,
जितने उस जमीनके रजःकण हों। जो गाँव,
भूमि और धान्य ब्राह्मणको देता है, उसके पुण्यसे
- विष्णुरुवाच -
यज्ञशूकरजाया त्वं जयं देहि जयावहे। जयेऽजये जयाधारे जयशीले जयप्रदे ॥
सर्वाधारे सर्वबीजे सर्वशक्तिसमन्विते । सर्वकामप्रदे देवि सर्वेष्टं देहि मे भवे ॥
सर्वशस्यालये सर्वशस्याढ्ये सर्वशस्यदे। सर्वशस्यहरे काले सर्वशस्यात्मिके भवे ॥
मङ्गले मङ्गलाधारे मङ्गल्ये मङ्गलप्रदे । मङ्गलार्थे मङ्गलेशे मङ्गलं देहि मे भवे ॥
भूमे भूमिपसर्वस्वे भूमिपालपरायणे । भूमिपाहंकाररूपे भूमिं देहि च भूमिदे ॥
(प्रकृतिखण्ड ८। ५३-५७)
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दाता और प्रतिगृहीता—दोनों व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर वैकुण्ठधाममें स्थान पाते हैं। जो साधु पुरुष भूमिदानके लिये दाताको उत्साहित करता है, उसे अपने मित्र एवं गोत्रके साथ वैकुण्ठमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है।
अपनी अथवा दूसरेकी दी हुई ब्राह्मणकी भूमि हरण करनेवाला व्यक्ति सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त 'कालसूत्र' नामक नरकमें स्थान पाता है। इतना ही नहीं, इस पापके प्रभावसे उसके पुत्र और पौत्र आदिके पास भी पृथ्वी नहीं ठहरती। वह श्रीहीन, पुत्रहीन और दरिद्र होकर घोर रौरव नरकमें गिरता है। जो गोचरभूमिको जोतकर धान्य उपार्जन करता है और वही धान्य ब्राह्मणको देता है तो इस निन्दित कर्मके प्रभावसे उसे देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें रहना पड़ता है। गौओंके रहनेके स्थान, तड़ाग तथा रास्तेको जोतकर पैदा किये हुए अन्नका दान करनेवाला मानव चौदह इन्द्रकी आयुतक 'असिपत्र' नामक नरकमें रहता है। जो कामान्ध व्यक्ति एकान्तमें पृथ्वीपर वीर्य गिराता है, उसे वहाँकी जमीनमें जितने रजःकण हैं, उतने वर्षोंतक 'रौरव' नरकमें रहना पड़ता है। अम्बुवाचीमें भूमि खोदनेवाला मानव 'कृमिदंश' नामक नरकमें जाता और उसे वहाँ चार युगोंतक रहना पड़ता है। जो दूसरेके तड़ागमें पड़ी हुई कीचड़को निकालकर शुद्ध जल होनेपर स्नान करता है, उसे ब्रह्मलोकमें स्थान मिलता है। जो मन्दबुद्धि मानव भूमिपतिके पितरोंको श्राद्धमें पिण्ड न देकर श्राद्ध करता है, उसे अवश्य ही नरकगामी होना पड़ता है।
दीपक, शिवलिङ्ग, भगवतीकी मूर्ति, शङ्ख, यन्त्र, शालग्रामका जल, फूल, तुलसीदल, जपमाला, पुष्पमाला, कपूर, गोरोचन, चन्दनकी लकड़ी, रुद्राक्षकी माला, कुशकी जड़, पुस्तक और यज्ञोपवीत—इन वस्तुओंको भूमिपर रखनेसे मानव नरकमें वास करता है। गाँठमें बँधे हुए यज्ञसूत्रकी पूजा करना सभी द्विजातिवर्णोंके लिये अत्यावश्यक है। भूकम्प एवं ग्रहणके अवसरपर पृथ्वीको खोदनेसे बड़ा पाप लगता है। इस मर्यादाका उल्लङ्घन करनेसे दूसरे जन्ममें अङ्गहीन होना पड़ता है। इसपर सबके भवन बने हैं, इसलिये यह 'भूमि' कहलाती है। कश्यपकी पुत्री होनेसे 'काश्यपी' तथा स्थिररूप होनेसे 'स्थिरा' कही जाती है। महामुने! विश्वको धारण करनेसे 'विश्वम्भरा', अनन्तरूप होनेसे 'अनन्ता' तथा पृथुकी कन्या होनेसे अथवा सर्वत्र फैली रहनेसे इसका नाम 'पृथ्वी' पड़ा है।
(अध्याय ८-९)
गङ्गाकी उत्पत्तिका विस्तृत प्रसङ्ग
नारदजीने कहा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! पृथ्वीका यह परम मनोहर उपाख्यान सुन चुका। अब आप गङ्गाका विशद प्रसङ्ग सुनानेकी कृपा कीजिये। प्रभो! सुरेश्वरी, विष्णुस्वरूपा एवं स्वयं विष्णुपदी नामसे विख्यात गङ्गा सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें किस प्रकार और किस युगमें पधारीं? किसकी प्रार्थना एवं प्रेरणासे उन्हें वहाँ जाना पड़ा? पापका उच्छेद करनेवाला यह पवित्र एवं पुण्यप्रद प्रसंग मैं सुनना चाहता हूँ।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! श्रीमान् सगर एक सूर्यवंशी सम्राट् हो चुके हैं। मनको मुग्ध करनेवाली उनकी दो रानियाँ थीं—वैदर्भी और शैब्या। उनकी पत्नी शैब्यासे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कुलको बढ़ानेवाले उस सुन्दर पुत्रका नाम असमञ्जस पड़ा। उनकी दूसरी पत्नी वैदर्भीने पुत्रकी कामनासे भगवान् शंकरकी उपासना की।
प्रकृतिखण्ड १४३
शंकरके वरदानसे उसे भी गर्भ रह गया। पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर उसके गर्भसे एक मांसपिण्डकी उत्पत्ति हुई। उसे देखकर वह बहुत ही दुःखी हुई और उसने भगवान् शिवका ध्यान किया। तब भगवान् शंकर ब्राह्मणके वेषमें उसके पास पधारे और उन्होंने उस मांसपिण्डको साठ हजार भागोंमें बाँट दिया। वे सभी टुकड़े पुत्ररूपमें परिणत हो गये। उनके बल और पराक्रमकी सीमा नहीं रही। उनके परम तेजस्वी कलेवरने ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालीन सूर्यकी प्रभाका मानो हरण कर लिया था; परंतु वे सभी तेजस्वी कुमार कपिलमुनिके शापसे जलकर भस्म हो गये। यह दुःखद समाचार सुनकर राजा सगरकी आँखें निरन्तर जल बहाने लगीं। वे बेचारे घोर जंगलमें चले गये। तब उनके पुत्र असमञ्जसने गङ्गाको ले आनेके लिये तपस्या आरम्भ कर दी। वे बहुत कालतक तपस्या करते रहे। अन्तमें कालने उन्हें अपना ग्रास बना लिया। असमञ्जसके पुत्रका नाम अंशुमान् था। गङ्गाको ले आनेके लिये लम्बे समयतक तपस्या करनेके पश्चात् वे भी कालके गालमें चले गये।
अंशुमान्के पुत्र भगीरथ थे। भगीरथ भगवान्के परम भक्त, विद्वान्, श्रीहरिमें अटूट श्रद्धा रखनेवाले, गुणवान् तथा वैष्णव पुरुष थे। गङ्गाको ले आनेका निश्चय करके उन्होंने बहुत समयतक तपस्या की। अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके उन्हें साक्षात् दर्शन हुए। उस समय भगवान्के श्रीविग्रहसे ग्रीष्मकालीन करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था। उनके दो भुजाएँ थीं। वे हाथमें मुरली लिये हुए थे। उनकी किशोर अवस्था थी। वे गोपके वेषमें पधारे थे। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये उन्होंने यह रूप धारण किया था। मुने! भगवान् श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परब्रह्म हैं। वे चाहे जैसा रूप बना सकते हैं। उस समय ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि उनकी स्तुति कर रहे थे और मुनियोंने उनके सामने अपने मस्तक झुका रखे थे। सदा निर्लिप्त, सबके साक्षी, निर्गुण, प्रकृतिसे परे तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले उन भगवान् श्रीकृष्णका मुख मुस्कानसे सुशोभित था। विशुद्ध चिन्मय वस्त्र तथा दिव्य रत्नोंसे निर्मित आभूषण उनके श्रीविग्रहको सुशोभित कर रहे थे। उनकी यह दिव्य झाँकी पाकर भगीरथने बार-बार उन्हें प्रणाम किया और स्तुति भी की। लीलापूर्वक उन्हें भगवान्से अभीष्ट वर भी मिल गया। वे चाहते थे कि मेरे पूर्वज तर जायँ। परम आनन्दके साथ उन्होंने भगवान्की दिव्य स्तुति की थी।
भगवान् श्रीहरिने गङ्गाजीसे कहा—सुरेश्वरि! तुम सरस्वतीके शापसे अभी भारतवर्षमें जाओ और मेरी आज्ञाके अनुसार सगरके सभी पुत्रोंको पवित्र करो। तुमसे स्पर्शित वायुका संयोग पाकर ही वे सभी राजकुमार मेरे धाममें चले जायँगे। उनका भी विग्रह मेरे-जैसा ही हो जायगा और वे दिव्य रथपर सवार होंगे। उन्हें मेरे पार्षद होनेका सुअवसर प्राप्त होगा। वे सर्वदा आधि-व्याधिसे मुक्त रहेंगे। उनके जन्म-जन्मान्तरके पापोंकी समस्त पूँजी समाप्त हो जायगी। श्रुतिमें
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कहा गया है कि भारतवर्षमें मनुष्योंद्वारा उपार्जित करोड़ों जन्मोंके पाप गङ्गाकी वायुके स्पर्शमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। स्पर्श और दर्शनकी अपेक्षा गङ्गादेवीमें मौसलस्नान* करनेसे दसगुना पुण्य होता है। सामान्य दिनमें भी स्नान करनेसे मनुष्योंके अनेकों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। पर्वों तथा विशेष पुण्य-तिथियोंपर स्नान करनेका विशेष फल कहा गया है। सामान्यतः गङ्गामें स्नान करनेकी अपेक्षा चन्द्रग्रहणके अवसरपर स्नान करनेसे अनन्त गुना अधिक पुण्य कहा गया है। सूर्यग्रहणमें इससे दसगुना अधिक समझना चाहिये। इससे सौगुना पुण्य अर्धोदयके समय स्नान करनेसे मिलता है।
नारद! इस प्रकार गङ्गा और भगीरथके सामने कहकर देवेश्वर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। तब गङ्गाने भक्तिसे अत्यन्त नम्र होकर उनसे कहा।
**गङ्गा बोलीं—**नाथ! सरस्वतीका शाप पहलेसे ही मेरे सिरपर सवार है, आप आज्ञा दे ही रहे हैं और इन महाराज भगीरथकी एतदर्थ तपस्या भी हो रही है, अतः मैं अभी भारतवर्षमें जा रही हूँ; परंतु प्रभो! वहाँ जानेपर अनेकों पापीजन अपने जिस-किसी प्रकारके भी पापको मुझपर लाद देंगे। ऐसी स्थितिमें मेरे ऊपर आये हुए वे पाप कैसे नष्ट होंगे—इसका उपाय तो बतला दीजिये। देवेश! मुझे भारतवर्षमें कितने वर्षोंतक रहना पड़ेगा? फिर मैं कब आप परम प्रभुके धाममें आनेकी अधिकारिणी बन सकूँगी? प्रभो! आप सर्वान्तर्यामीसे कोई भी बात छिपी नहीं है। सर्वज्ञ देव! मेरे अन्तःकरणमें अन्य भी जो-जो कामनाएँ छिपी हैं, उनके भी पूर्ण होनेका उपाय बतानेकी कृपा करें।
**श्रीभगवान् बोले—**सुरेश्वरि! गङ्गे! मैं तुम्हारे सभी अभिप्रायोंसे परिचित हूँ। तुम नदी-रूपसे भारतवर्षमें पधारोगी और मेरे ही अंश-स्वरूप समुद्र तुम्हारे पति होंगे। भारतवर्षमें सरस्वती आदि अन्य जितनी नदियाँ होंगी, उन सबमें समुद्रके लिये तुम ही सबसे अधिक सौभाग्यवती मानी जाओगी। देवेशि! कलियुगके पाँच हजार वर्षोंतक तुम्हें सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें रहना है। देवि! लक्ष्मीरूपा तुम रसिका हो और मेरे स्वरूप समुद्र रसिकराज हैं। तुम उनके साथ एकान्तमें निरन्तर प्रियसंगम करोगी। भारतवासी सम्पूर्ण मनुष्य भगीरथप्रणीत स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करेंगे और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक तुम सुपूजित भी होओगी। कण्वशाखामें बताये गये प्रकारसे तुम्हारा ध्यान करके लोग तुम्हारी पूजामें तत्पर होंगे। जो तुम्हारी स्तुति और तुम्हें प्रणाम करेगा, उसको अश्वमेध-यज्ञका फल सुलभतासे प्राप्त होगा। चाहे सैकड़ों योजनकी दूरीपर क्यों न हो; किंतु जो 'गङ्गा-गङ्गा' इस नामका उच्चारण करके स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें चला जाता है। हजारों पापी व्यक्तियोंके स्नानसे जो तुमपर पाप आ जायँगे, मेरे भक्तोंके स्पर्शमात्रसे ही उनकी सत्ता नष्ट हो जायगी। हजारों पापी प्राणियोंके शवका स्पर्श अवश्य ही पापका साधन है; किंतु मेरे मन्त्रका अनुष्ठान करनेवाले पुण्यात्मा भक्तपुरुष भी तो तुम्हारेमें स्नान करने आयेंगे। उनके स्नानसे तुम्हारा वह सारा पाप नष्ट हो जायगा। शुभे! पवित्र भारतवर्षमें ही तुम्हारा निवास होगा। उस पापमोचन स्थानपर सरस्वती आदि सभी श्रेष्ठ नदियाँ तुम्हारा साथ देंगी। जहाँ तुम्हारे गुणोंका कीर्तन होगा, वह स्थान तुरंत तीर्थ बन जायगा। तुम्हारे रजःकणका स्पर्शमात्र हो
* गङ्गाको प्रणाम करके प्रवेश करे और निश्चेष्ट होकर अर्थात् बिना हाथ-पैर हिलाये शान्तभावसे स्नान कर ले। इसे 'मौसलस्नान' कहते हैं।