ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५४- श्रीकृष्णका नन्दको अपना स्वरूप और प्रभाव बताना; गोलोक, रासमण्डल और राधा-सदनका वर्णन; श्रीराधाके महत्त्वका प्रतिपादन तथा उनके साथ अपने नित्य सम्बन्धका कथन और दिव्य विभूतियोंका वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६६१
नन्दजीने तत्काल ही उन्हें हृदयसे लगा लिया। सब गोपोंने मस्तक झुकाकर अक्रूरको प्रणाम किया और आशीर्वाद लिये। मुने! उन सबका परस्पर संयोग बड़ा ही गुणवान् हुआ। अक्रूरने बारी-बारीसे श्रीकृष्ण और बलरामको गोदमें उठा लिया तथा उनके गाल चूमे। उस समय उनका सारा अङ्ग पुलकित था। नेत्रोंसे अश्रुधारा झर रही थी। हृदयमें आह्लाद उमड़ा आ रहा था। अक्रूर कृतार्थ हो गये। उनका मनोरथ सिद्ध हो गया। उन्होंने दो भुजाओंसे सुशोभित श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी ओर एक क्षणतक देखा, जो पीताम्बर धारण किये मालतीकी मालासे विभूषित थे। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। उन्होंने हाथमें वंशी ले रखी थी। ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा सनकादि मुनीन्द्र जिनकी स्तुति करते हैं और गोप-कन्याएँ जिनकी ओर सदा निहारती रहती हैं; उन परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णको अक्रूरने एक क्षणतक अपनी गोदमें देखा। वे मुस्करा रहे थे। तत्पश्चात् उन्होंने चतुर्भुज विष्णुके रूपमें उनको सामने खड़े देखा। लक्ष्मी और सरस्वती—ये दो देवियाँ उनके अगल-बगलमें खड़ी थीं। वे वनमालासे विभूषित थे। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्धोंके समुदाय भक्तिभावसे नम्र हो उन परात्पर प्रभुकी सेवा कर रहे थे।
फिर, दूसरे ही क्षण अक्रूरने श्रीकृष्णको महादेवजीके रूपमें देखा। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिक-मणिके समान उज्ज्वल थी। नागराजके आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते थे। दिशाएँ ही उनके लिये वस्त्रका काम देती थीं। योगियोंमें श्रेष्ठ वे परब्रह्म शिव अपने अङ्गोंमें भस्म रमाये, सिरपर जटा धारण किये और हाथमें जप-माला लिये ध्यानमें स्थित थे।
तदनन्तर एक ही क्षणमें श्रीकृष्ण उन्हें ध्यानपरायण एवं मनीषियोंमें श्रेष्ठ चतुर्भुज ब्रह्माके रूपमें दृष्टिगोचर हुए। फिर कभी धर्म, कभी शेष, कभी सूर्य, कभी सनातन ज्योतिःस्वरूप और कभी कोटि-कोटि कन्दर्पनिन्दक, परम शोभासम्पन्न एवं कामिनियोंके लिये कमनीय प्रेमास्पदके रूपमें दिखायी दिये। इस रूपमें नन्दनन्दनका दर्शन करके अक्रूरने उन्हें छातीसे लगा लिया। नारद! नन्दजीके दिये हुए रमणीय रत्नसिंहासनपर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको बिठाकर भक्तिभावसे उनकी परिक्रमा करके पुलकित-शरीर हो अक्रूरने पृथ्वीपर माथा टेक उन्हें प्रणाम किया और स्तुति प्रारम्भ की।
अक्रूर बोले—जो सबके कारण, परमात्मस्वरूप तथा सम्पूर्ण विश्वके ईश्वर हैं, उन श्रीकृष्णको बारंबार नमस्कार है। सर्वेश्वर! आप प्रकृतिसे परे, परात्पर, निर्गुण, निरीह, निराकार, साकार, सर्वदेवस्वरूप, सर्वदेवेश्वर, सम्पूर्ण देवताओंके भी अधिदेवता तथा विश्वके आदिकारण हैं; आपको नमस्कार है। असंख्य ब्रह्माण्डोंमें आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपमें निवास करते हैं। आप ही सबके आदिकारण हैं। विश्वेश्वर और विश्व दोनों आपके ही स्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। गोपाङ्गनाओंके प्राणवल्लभ! आपको नमस्कार है। गणेश और ईश्वर आपके ही रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप देवगणोंके स्वामी तथा श्रीराधाके प्राणवल्लभ हैं; आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही राधारमण तथा राधाका रूप धारण करते हैं। राधाके आराध्य देवता तथा राधिकाके प्राणाधिक प्रियतम भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है। राधाके वशमें रहनेवाले, राधाके अधिदेवता और राधाके प्रियतम! आपको नमस्कार है। आप राधाके प्राणोंके अधिष्ठाता देवता हैं तथा सम्पूर्ण विश्व आपका ही रूप है; आपको नमस्कार है। वेदोंने जिनकी स्तुति की है, वे परमात्मा तथा वेदज्ञ विद्वान् भी आप ही हैं। वेदोंके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण आप
६६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
वेदी कहे गये हैं; आपको नमस्कार है। वेदोंके अधिष्ठाता देवता और बीज भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है। जिनके रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड नित्य निवास करते हैं, उन महाविष्णुके ईश्वर आप विश्वेश्वरको बारंबार नमस्कार है। आप स्वयं ही प्रकृतिरूप और प्राकृत पदार्थ हैं। प्रकृतिके ईश्वर तथा प्रधान पुरुष भी आप ही हैं। आपको बारंबार नमस्कार है*।
इस प्रकार स्तुति करके अक्रूरजी नन्दरायजीके सभाभवनमें मूर्च्छित हो गये और सहसा भूमिपर गिर पड़े। उसी अवस्थामें पुनः उन्होंने अपने हृदयमें और बाहर भी सब ओर उन श्यामसुन्दर सर्वेश्वर परमात्माको देखा। वे ही विश्वमें व्यास थे और वे ही विश्वरूपमें प्रकट हुए थे। नारद! अक्रूरजीको मूर्च्छित हुआ देख नन्दजीने आदरपूर्वक उठाया और रमणीय रत्नसिंहासनपर बिठा दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अक्रूरसे सारा वृत्तान्त पूछा और बारंबार कुशलप्रश्न करते हुए उन्हें मिष्टान्न भोजन कराया। अक्रूरने कंसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया और यह भी कहा कि अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ानेके लिये बलराम और श्रीकृष्णको वहाँ अवश्य चलना चाहिये।
जो अक्रूरद्वारा किये गये इस स्तोत्रका एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह पुत्रहीन हो तो पुत्र पाता है और भार्याहीन हो तो उसे प्रिय भार्याकी उपलब्धि होती है। निर्धनको धन, भूमिहीनको उर्वरा भूमि, संतानहीनको संतान और प्रतिष्ठाहीनको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होती है और जो यशस्वी नहीं है, वह भी अनायास ही महान् यश प्राप्त कर लेता है।
तदनन्तर अक्रूरजी रातके समय अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो रमणीय चम्पाकी शय्यापर श्रीकृष्णको छातीसे लगाकर सोये। प्रातःकाल सहसा उठकर परम उत्तम आह्निक कृत्यका सम्पादन करके उन्होंने जगदीश्वर श्रीकृष्ण तथा बलरामको अपने रथपर बिठाया। पाँच प्रकारके गव्य (दूध, दही, माखन, घी और छाँछ) तथा नाना प्रकारके परम दुर्लभ द्रव्य रखवाये। वृषभानु, नन्द, सुनन्द तथा चन्द्रभानु गोपको भी साथ ले लिया। उस समय व्रजराज नन्द गोपने आनन्दमग्न हो नाना प्रकारके वाद्य—मृदङ्ग, मुरज (ढोल), पटह, पणव, ढक्का, दुन्दुभि, आनक, सज्जा, संनहनी, कांस्य-पट्ट (झाँझ), मर्दल और मण्डवी आदि बजवाये। बाजोंकी ध्वनि और बलराम तथा श्रीकृष्णके जानेका समाचार सुन श्रीकृष्णको रथपर बैठे देख गोपियाँ प्रणय-कोपसे पीड़ित हो उनके पास आ पहुँचीं। ब्रह्मन्! श्रीकृष्णके मना करनेपर भी श्रीराधाकी प्रेरणासे उन गोपकिशोरियोंने पैरोंके आघातसे राजा कंसके उस रथको अनायास ही तोड़ डाला। उसपर बैठे हुए सब गोप हाहाकार
*नमः कारणरूपाय परमात्मस्वरूपिणे। सर्वेषामपि विश्वानामीश्वराय नमो नमः॥
पराय प्रकृतेरीश परात्परतराय च। निर्गुणाय निरीहाय नीरूपाय स्वरूपिणे॥
सर्वदेवस्वरूपाय सर्वदेवेश्वराय च। सर्वदेवाधिदेवाय विश्वादिभूतरूपिणे॥
असंख्येषु च विश्वेषु ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः। स्वरूपायादिबीजाय तदीशविश्वरूपिणे॥
नमो गोपाङ्गनेशाय गणेशेश्वररूपिणे। नमः सुरगणेशाय राधेशाय नमो नमः॥
राधारमणरूपाय राधारूपधराय च। राधाराध्याय राधायाः प्राणाधिकतराय च॥
राधासाध्याय राधाधिदेवप्रियतमाय च। राधाप्राणाधिदेवाय विश्वरूपाय ते नमः॥
वेदस्तुतात्मवेदङ्गरूपिणे वेदिने नमः। वेदाधिष्ठातृदेवाय वेदबीजाय ते नमः॥
यस्य लोमसु विश्वानि चासंख्यानि च नित्यशः। महद्विष्णोरीश्वराय विश्वेशाय नमो नमः॥
स्वयं प्रकृतिरूपाय प्राकृताय नमो नमः। प्रकृतीश्वररूपाय प्रधानपुरुषाय च॥
(७०। ५६—६५)
६६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
बाहर निकाल दिया। तत्पश्चात् नन्दनन्दन नन्दके श्रेष्ठ प्राङ्गणमें सानन्द आये। वे परमानन्दमय, नित्यानन्दस्वरूप तथा सनातन हैं। नित्य-अनित्य सब उन्हींके रूप हैं। वे नित्यबीजस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्याङ्गभूत, नित्येश तथा नित्यकृत्यविशारद हैं। उनके रूप, यौवन, वेश-भूषा तथा किशोर-अवस्था—सभी नित्य नूतन हैं। उनके सम्भाषण, प्रेम-प्राप्ति, सौभाग्य, सुधा-रससे सराबोर मीठे वचन, भोजन तथा पद भी नित्य नवीन हैं। इस अत्यन्त रमणीय प्राङ्गणमें खड़े-खड़े मायायुक्त मायेश्वर अत्यन्त स्नेहमें डूब गये। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। केलेके सुन्दर खम्भों और रेशमी डोरेमें गूँथे हुए आम्र-पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे उस आँगनको सजाया गया था। विश्वकर्माने उसकी फर्शमें पद्मराग मणि जड़ दी थी। कस्तूरी, केसर और चन्दनसे उसका संस्कार किया गया था। अक्रूर तथा बान्धवजनोंसहित श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ थोड़ी देर खड़े रहे। यशोदाने बायीं ओरसे और आनन्दयुक्त नन्दने दाहिनी ओरसे आकर अपने लालाको हृदयसे लगा लिया। बन्धु-बान्धवोंने उनसे प्रेमभरी बातें कीं तथा मैया और बाबाने लालाका मुँह चूमा।
मुने! तदनन्तर श्रीकृष्ण गुरुजनोंको नमस्कार करके आँगनसे बाहर निकले और स्वर्गीय रथपर आरूढ़ हो सुन्दर मथुरापुरीकी ओर चल दिये। मथुरा अपनी शोभासे इन्द्रकी अमरावतीपुरीको परास्त करके अत्यन्त मनोहर दिखायी देती थी। श्रीकृष्णने अक्रूर तथा सखाओंके साथ उस रमणीय नगरीमें प्रवेश किया। श्रेष्ठ रत्नोंसे खचित और विश्वकर्माद्वारा रचित मथुरापुरी सुन्दर बहुमूल्य रत्ननिर्मित कलशोंसे सुशोभित थी। सैकड़ों सुन्दर, श्रेष्ठ और अभीष्ट राजमार्गोंसे वह नगरी घिरी हुई थी। वे राजमार्ग चन्द्रकान्त मणियोंके सारभागसे जटिल होनेके कारण चन्द्रमाके समान ही प्रकाशित होते थे। वहाँ विचित्र मणियोंके सारतत्त्वसे शत-शत वीथियोंका निर्माण किया गया था। पुण्य वस्तुओंके संचयसे सम्पन्न श्रेष्ठ व्यवसायी अपनी दूकानोंसे उन राजमार्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। पुरीके चारों ओर सहस्रों सरोवर शोभा दे रहे थे, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल तथा पद्मरागमणियोंकी दीप्तिसे देदीप्यमान थे। रत्नमय अलंकारों एवं आभूषणोंसे विभूषित पद्मिनी जातिकी श्रेष्ठ सुन्दरियोंसे वह नगरी शोभायमान थी। वे सब सुन्दरियाँ सुस्थिर यौवनसे युक्त थीं और श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे मुँह ऊपर उठाये अपलक नेत्रोंसे राजमार्गकी ओर देख रही थीं। उनके हाथोंमें अक्षतपुञ्ज थे। असंख्य रत्ननिर्मित रथ पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। अनेक प्रकारके विचित्र भूषणोंसे उन रथोंको विभूषित एवं चित्रित किया गया था। बहुत-से पुष्पोद्यान, जो भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे भरे थे और जिनमें भ्रमर रसास्वादन करते थे, मथुरापुरीकी श्रेयोवृद्धि कर रहे थे। माधुर्य मधुसे युक्त, मधुलोभी तथा मधुमत्त मधुकर मधुकरीयोंके समूहसे संयुक्त हो उन उद्यानोंमें आनन्दका अनुभव कर रहे थे। नगरके चारों ओर अनेक प्रकारके दुर्ग थे, जिनके कारण शत्रुओंका वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था। रक्षाशास्त्र-विशारद रक्षकोंसे वह पुरी सदा सुरक्षित थी। विश्वकर्माद्वारा श्रेष्ठ एवं विचित्र रत्नोंसे रचित अगणित अट्टालिकाओंसे संयुक्त मथुरानगरी बड़ी मनोहर जान पड़ती थी।
इस प्रकार मथुरापुरीकी शोभा देख आगे बढ़ते हुए कमलनयन श्रीकृष्णने मार्गमें कुब्जाको देखा, जो अत्यन्त जराजीर्ण एवं वृद्धा-सी थी। डंडेके सहारे चलती थी। अत्यन्त झुकी हुई थी और झुर्रियाँ लटक रही थीं। उसकी आकृति रूखी और विकृत थी। वह कस्तूरी और केसर मिला हुआ चन्दनका अनुलेपन लिये आ रही थी, जिसके स्पर्शमात्रसे शरीर सुगन्धित, सुस्निग्ध तथा अत्यन्त मनोहर हो जाता था। उस वृद्धाने शान्त,