वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन [ ४९
नवाँ अध्याय
अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>नेत्रहीनः कथं राज्ये प्रह्लादेनान्धको मुने।<br>अभिषिक्तो जानताऽपि राजधर्मं सनातनम्॥ १ | **नारदजीने कहा—**मुने! प्रह्लादजी सनातन राजधर्मको भलीभाँति जानते थे। ऐसी दशामें उन्होंने नेत्रहीन अन्धकको राजगद्दीपर कैसे बैठाया ? ॥ १ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>लब्धचक्षुरसौ भूयो हिरण्याक्षेऽपि जीवति।<br>ततोऽभिषिक्तो दैत्येन प्रह्लादेन निजे पदे॥ २ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके जीवनकालमें ही अन्धकको पुनः दृष्टि प्राप्त हो गयी थी, अतः दैत्यवर्य प्रह्लादने उसे अपने पदपर अभिषिक्त किया था ॥ २ ॥ |
| नारद उवाच<br>राज्येऽन्धकोऽभिषिक्तस्तु किमाचरत सुव्रत।<br>देवादिभिः सह कथं समास्ते तद् वदस्व मे॥ ३ | **नारदजीने पूछा—**सुव्रत! मुझे यह बतलाइये कि अन्धकने राज्यपर अभिषिक्त होनेपर क्या-क्या किया तथा वह देवताओं आदिके साथ कैसा व्यवहार करता था ॥ ३ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>राज्येऽभिषिक्तो दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः।<br>तपसाराध्य देवेशं शूलपाणिं त्रिलोचनम्॥ ४<br><br>अजेयत्वमवध्यत्वं सुरसिद्धर्षिपन्नगैः।<br>अदाह्यत्वं हुताशेन अक्लेद्यत्वं जलेन च॥ ५<br><br>एवं स वरलब्धस्तु दैत्यो राज्यमपालयत्।<br>शुक्रं पुरोहितं कृत्वा समध्यास्ते ततोऽन्धकः॥ ६<br><br>ततश्चक्रे समुद्योगं देवानामान्धकोऽसुरः।<br>आक्रम्य वसुधां सर्वां मनुजेन्द्रान् पराजयत्॥ ७ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके पुत्र दैत्यराज अन्धकने राज्य प्राप्त करके तपस्याद्वारा शूलपाणि भगवान् शंकरकी आराधना की और उनसे देवता, सिद्ध, ऋषि एवं नागोंद्वारा नहीं जीते जाने और नहीं मारे जानेका वर प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार वह अग्निके द्वारा न जलने, जलसे न भीगने आदिका भी वरदान प्राप्त कर राज्यका संचालन कर रहा था। उसने शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बना लिया था। फिर अन्धकासुरने देवताओंको जीतनेका उपक्रम (आरम्भ) किया और उन्हें जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया—सभी श्रेष्ठ राजाओंको परास्त कर दिया॥ ४—७॥ |
| पराजित्य महीपालान् सहायार्थे नियोज्य च।<br>तैः समं मेरुशिखरं जगामाद्भुतदर्शनम्॥ ८<br><br>शक्रोऽपि सुरसैन्यानि समुद्योज्य महागजम्।<br>समारुह्यामरावत्यां गुप्तिं कृत्वा विनिर्ययौ॥ ९<br><br>शक्रस्यानु तथैवान्ये लोकपाला महौजसः।<br>आरुह्य वाहनं स्वं स्वं सायुधा निर्ययुर्बहिः॥ १०<br><br>देवसेनाऽपि च समं शक्रेणाद्भुतकर्मणा।<br>निर्जगामातिवेगेन गजवाजिरथादिभिः॥ ११ | उसने सभी राजाओंको पराजित कर उन्हें (सामन्त बनाकर) अपनी सहायतामें नियुक्त कर दिया। फिर उनके साथ वह सुमेरुगिरि पर्वतको देखनेके लिये उसके अद्भुत शिखरपर गया। इधर इन्द्र भी देवसेनाको तैयारकर और अमरावतीमें सुरक्षाकी व्यवस्था कर अपने ऐरावत हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये बाहर निकले। इसी प्रकार दूसरे तेजस्वी लोकपालगण भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर तथा अपने अस्त्र लेकर इन्द्रके पीछे-पीछे चल पड़े। हाथी, घोड़े, रथ आदिसे युक्त देवसेना भी बड़े अद्भुत पराक्रमी इन्द्रके साथ तेजीसे |
| ५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अग्रतो द्वादशादित्याः पृष्ठतश्च त्रिलोचनाः ।<br>मध्येऽष्टौ वसवो विश्वे साध्याश्चिमरुतां गणाः ।<br>यक्षविद्याधराद्याश्च स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ १२ | निकल पड़ी। सेनाके आगे-आगे बारहोंने आदित्य और उनके पृष्ठभागमें ग्यारह रुद्रगण थे। उसके मध्यमें आठों वसु, तेरहों विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, यक्ष, विद्याधर आदि अपने-अपने वाहनपर सवार होकर चल रहे थे॥ ८—१२॥ |
| नारद उवाच<br>रुद्रादीनां वदस्वेह वाहनानि च सर्वशः ।<br>एकैकस्यापि धर्मज्ञ परं कौतूहलं मम ॥ १३ | नारदजीने पूछा— धर्मज्ञ! रुद्र आदिके वाहनोंका एक-एक कर पूरी तरह वर्णन कीजिये। इस विषयमें मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही है॥ १३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि सर्वेषामपि नारद ।<br>वाहनानि समासेन एकैकस्यानुपूर्वशः ॥ १४<br>रुद्रहस्ततलोत्पन्नो महावीर्यो महाजवः ।<br>श्वेतवर्णो गजपतिर्देवराजस्य वाहनम् ॥ १५<br>रुद्रोरुसंभवो भीमः कृष्णवर्णो मनोजवः ।<br>पौण्ड्रको नाम महिषो धर्मराजस्य नारद ॥ १६<br>रुद्रकर्णमलोद्भूतः श्यामो जलधिसंज्ञकः ।<br>शिशुमारो दिव्यगतिः वाहनं वरुणस्य च ॥ १७<br>रौद्रः शकटचक्राक्षः शैलाकारो नरोत्तमः ।<br>अम्बिकापादसंभूतो वाहनं धनदस्य तु ॥ १८ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं एक-एक करके क्रमशः सभी देवताओंके वाहनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। रुद्रके करतलसे उत्पन्न अति पराक्रमवाला, अति तीव्रगतिवाला, श्वेतवर्णका ऐरावत हाथी देवराज (इन्द्र)-का वाहन है। हे नारद! रुद्रके ऊरुसे उत्पन्न भयंकर कृष्णवर्णवाला एवं मनके सदृश गतिमान् पौण्ड्रक नामक महिष धर्मराजका वाहन है। रुद्रके कर्ण-मलसे उत्पन्न श्यामवर्णवाला दिव्यगतिशील जलधि नामक शिशुमार (सूँस) वरुणका वाहन है। अम्बिकाके चरणोंसे उत्पन्न गाड़ीके चक्केके समान भयंकर आँखवाला, पर्वताकार नरोत्तम कुबेरका वाहन है॥ १४-१८॥ |
| एकादशानां रुद्राणां वाहनानि महामुने ।<br>गन्धर्वाश्च महावीर्या भुजगेन्द्राश्च दारुणाः ।<br>श्वेतानि सौरभेयाणि वृषाण्युग्रजवानि च ॥ १९<br>रथं चन्द्रमसश्चार्द्धसहस्रं हंसवाहनम् ।<br>हरयो रथवाहाश्च आदित्या मुनिसत्तम ॥ २०<br>कुञ्जरस्थाश्च वसवो यक्षाश्च नरवाहनाः ।<br>किन्नरा भुजगारूढा हयारूढौ तथाश्विनौ ॥ २१<br>सारङ्गाधिष्ठिता ब्रह्मन् मरुतो घोरदर्शनाः ।<br>शुकारूढाश्च कवयो गन्धर्वाश्च पदातिनः ॥ २२ | हे महामुने! एकादश रुद्रोंके वाहन महापराक्रमशाली गन्धर्वगण, भयंकर सर्पराजगण तथा सुरभिके अंशसे उत्पन्न तीव्रगतिवाले सफेद बैल हैं। मुनिश्रेष्ठ! चन्द्रमाके रथको खींचनेवाले आधे हजार (पाँच सौ) हंस हैं। आदित्योंके रथके वाहन घोड़े हैं। वसुओंके वाहन हाथी, यक्षोंके वाहन नर, किन्नरोंके वाहन सर्प एवं अश्विनीकुमारोंके वाहन घोड़े हैं। ब्रह्मन्! भयंकर दीखनेवाले मरुद्गणोंके वाहन हरिण हैं, भृगुओंके वाहन शुक हैं और गन्धर्वलोग पैदल ही चलते हैं॥ १९—२२॥ |
| आरुह्य वाहनान्येवं स्वानि स्वान्यमरोत्तमाः ।<br>संनह्य निर्ययुर्हृष्टा युद्धाय सुमहौजसः ॥ २३ | इस प्रकार बड़े तेजस्वी श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ एवं संनद्ध (तैयार) होकर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकल पड़े॥ २३॥ |
| नारद उवाच<br>गदितानि सुरादीनां वाहनानि त्वया मुने ।<br>दैत्यानां वाहनान्येवं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ २४ | नारदने कहा— मुने! आपने देवादिकोंके वाहनोंका वर्णन किया; इसी प्रकार अब असुरोंके वाहनोंका भी यथावत् वर्णन करें॥ २४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व दानवादीनां वाहनानि द्विजोत्तम ।<br>कथयिष्यामि तत्त्वेन यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥ २५ | पुलस्त्यजी बोले— द्विजोत्तम! (अब) दानवोंके वाहनको सुनो। मैं तत्त्वतः उनका ठीक-ठीक वर्णन करता हूँ। अन्धकका अलौकिक रथ कृष्णवर्णके श्रेष्ठ |
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन ५१
अन्धकस्य रथो दिव्यो युक्तः परमवाजिभिः ।
कृष्णवर्णैः सहस्रारस्त्रिनल्वपरिमाणवान् ॥ २६
प्रह्लादस्य रथो दिव्यश्चन्द्रवर्णैर्हयोत्तमैः ।
उह्यमानस्तथाष्टाभिः श्वेतरुक्ममयः शुभः ॥ २७
विरोचनस्य च गजः कुजम्भस्य तुरंगमः ।
जम्भस्य तु रथो दिव्यो हयैः काञ्चनसंनिभैः ॥ २८
शङ्कुकर्णस्य तुरगो हयग्रीवस्य कुञ्जरः ।
रथो मयस्य विख्यातो दुन्दुभेश्च महोरगः ।
शम्बरस्य विमानोऽभूदयःशङ्कोर्मृगाधिपः ॥ २९
बलवृत्रौ च बलिनौ गदामुसलधारिणौ ।
पद्भ्यां दैवतसैन्यानि अभिद्रवितुमुद्यतौ ॥ ३०
ततो रणोऽभूत् तुमुलः संकुलोऽतिभयंकरः ।
रजसा संवृतो लोको पिङ्गवर्णेन नारद ॥ ३१
नाज्ञासीच्च पिता पुत्रं न पुत्रः पितरं तथा ।
स्वानेवान्ये निजघ्नुर्वै परानन्ये च सुव्रत ॥ ३२
अभिद्रुतो महावेगो रथोपरि रथस्तदा ।
गजो मत्तगजेन्द्रं च सादी सादिनमभ्यगात् ॥ ३३
पदातिरपि संक्रुद्धः पदातिनमथोल्बणम् ।
परस्परं तु प्रत्यघ्ननन्योन्यजयकाङ्क्षिणः ॥ ३४
ततस्तु संकुले तस्मिन् युद्धे दैवासुरे मुने ।
प्रावर्तत नदी घोरा शमयन्ती रणाद्रजः ॥ ३५
शोणितोदा रथावर्त्ता योधसंघट्टवाहिनी ।
गजकुम्भमहाकूर्मा शरमीना दुरत्यया ॥ ३६
तीक्ष्णाग्रप्रासमकरा महासिग्राहवाहिनी ।
अन्त्रशैवालसंकीर्णा पताकाफेनमालिनी ॥ ३७
गृध्रकङ्कमहाहंसा श्येनचक्राह्वमण्डिता ।
वनवायसकादम्बा गोमायुश्वापदाकुला ॥ ३८
पिशाचमुनिसंकीर्णा दुस्तरा प्राकृतैर्जनैः ।
रथप्लवैः संतरन्तः शूरास्तां प्रजगाहिरे ॥ ३९
आगुल्फादवमज्जन्तः सूदयन्तः परस्परम् ।
समुत्तरन्तो वेगेन योधा जयधनेप्सवः ॥ ४०
अश्वोंसे परिचालित होता था। वह हजार अरों-
पहियेकी नाभि और नेमिके बीचकी लकड़ियोंसे युक्त
बारह सौ हाथोंका परिमाणवाला था। प्रह्लादका दिव्य रथ
सुन्दर एवं सुवर्ण-रजत-मण्डित था। उसमें चन्द्रवर्णवाले
आठ उत्तम घोड़े जुते हुए थे। विरोचनका वाहन हाथी
था एवं कुजम्भ घोड़ेपर सवार था। जम्भका दिव्य रथ
स्वर्णवर्णके घोड़ोंसे युक्त था ॥ २५-२८॥
इसी प्रकार शंकुकर्णका वाहन घोड़ा, हयग्रीवका
हाथी और मय दानवका वाहन दिव्य रथ था। दुन्दुभिका
वाहन विशाल नाग था। शम्बर विमानपर चढ़ा हुआ था
तथा अयःशंकु सिंहपर सवार था। गदा और मुसलधारी
बलवान् बल और वृत्र पैदल थे; पर देवताओंकी सेनापर
चढ़ाई करनेके लिये उद्यत थे। फिर अति भयङ्कर
घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। नारदजी! समस्त लोक
पीली धूलसे ढक गया, जिससे पिता पुत्रको और पुत्र
पिताको भी परस्पर एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे।
सुव्रत ! कुछ लोग अपने ही पक्षके लोगोंको तथा कुछ
लोग विरोधी पक्षके लोगोंको मारने लगे ॥ २९-३२॥
उस युद्धमें रथके ऊपर रथ और हाथीके ऊपर
हाथी टूट पड़े तथा घुड़सवार घुड़सवारोंकी ओर वेगसे
आक्रमण करने लगे। इसी प्रकार पादचारी (पैदल)
सैनिक क्रुद्ध होकर अन्य बलशाली पैदलोंपर चढ़ बैठे।
इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे सभी परस्पर
प्रहार करने लगे। मुने! उसके बाद देवताओं और
असुरोंके उस घोर संग्राममें युद्धसे उत्पन्न धूलिको
शान्त करती हुई रक्तरूपी जलधारावाली एवं रथरूपी
भँवरवाली और योद्धाओंके समूहको बहा ले जानेवाली
एवं गजकुम्भरूपी महान् कूर्म तथा शररूपी मीनसे युक्त
बड़ी भारी नदी बह चली ॥ ३३-३६ ॥
उस नदीमें तेज धारवाले प्रास (एक प्रकारका
अस्त्र) ही मकर थे, बड़ी-बड़ी तलवारें ही ग्राह थीं,
उसमें आँतें ही शैवाल, पताका ही फेन, गृध्र एवं कङ्क
पक्षी महाशंख, बाज ही चक्रवाक और जंगली कौवे ही
मानो कलहंस थे। वह नदी शृगालरूपी हिंस्र एवं पिशाचरूपी
मुनियोंसे संकीर्ण थी और साधारण मनुष्योंसे दुस्तर थी।
जयरूप धनकी इच्छावाले शूर योद्धा लोग घुटनोंतक
डूबते और एक-दूसरेको मारते हुए रथरूपी नौकाओंद्वारा
उस नदीको वेगसे पार कर रहे थे ॥ ३७-४० ॥
१२- सुकेशीका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन
५२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९
ततस्तु रौद्रे सुरदैत्यसादने वह युद्ध डरपोकोंके लिये भयावना, देवों एवं
महाहवे भीरुभयंकरेऽथ। दैत्योंका संहार करनेवाला तथा वस्तुतः अत्यन्त भयंकर
रक्षांसि यक्षाश्च सुसंप्रहृष्टाः था। उसमें यक्ष और राक्षस लोग अत्यन्त आनन्दित
पिशाचयूथास्त्वभिरेमिरे च॥४१ हो रहे थे। पिशाचोंका समूह भी प्रसन्न था। वे
पिबन्त्यसृग्गाढतरं भटाना- वीरोंके गाढ़े रुधिरका पान करते थे तथा (उनके
मालिङ्ग्य मांसानि च भक्षयन्ति। शवोंका) आलिंगन कर मांसका भक्षण करते थे।
वसां विल्लुम्पन्ति च विस्फुरन्ति पक्षी चर्बीको नोचते और उछलते थे एवं एक-
गर्जन्त्यथान्योन्यमथो वयांसि ॥ ४२ दूसरेके प्रति गर्जन करते थे। सियारिनें 'फेत्कार'
मुञ्चन्ति फेत्काररवाञ्शिवाश्च शब्द कर रही थीं, भूमिपर पड़े हुए वेदनासे दुःखी
क्रन्दन्ति योधा भुवि वेदनात्र्ताः। योद्धा कराह रहे थे। कुछ लोग शस्त्रसे आहत
शस्त्रप्रतप्ता निपतन्ति चान्ये होकर गिर रहे थे। युद्धभूमि मरघटके समान हो
युद्धं श्मशानप्रतिमं बभूव ॥ ४३ गयी थी। सियारिनोंके भयंकर शब्दसे युक्त देवासुर-
तस्मिञ्शिवाघोररवे प्रवृत्ते संग्राम ऐसा लगता था, मानो युद्धमें निपुण योद्धा
सुरासुराणां सुभयंकरे ह। लोग शस्त्ररूपी पाशा लेकर अपने प्राणोंकी बाजी
युद्धं बभौ प्राणपणोपविद्धं
द्वन्द्वेऽतिशस्त्राक्षगतो दुरोदरः ॥ ४४ लगाते हुए जुआ खेल रहे हैं॥ ४१-४४॥
हिरण्यचक्षुस्तनयो रणेऽन्धको हिरण्याक्षका पुत्र अन्धक हजारों घोड़ोंसे
रथे स्थितो वाजसहस्रयोजिते। युक्त रथपर आरूढ़ होकर मतवाले हाथीकी पीठपर
मत्तेभपृष्ठस्थितमुग्रतेजसं स्थित महातेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ जा भिड़ा।
समेयिवान् देवपतिं शतक्रतुम् ॥ ४५
समापतन्तं महिषाधिरूढं इधर आठ घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ अस्त्र
यमं प्रतीच्छद् बलवान् दितीशः। उठाये बलवान् दैत्यराज प्रह्लादने महिषपर सवार
प्रह्लादनामा तुरगाष्टयुक्तं यमराजका सामना किया। नारदजी! उधर विरोचन
रथं समास्थाय समुद्यतास्त्रः ॥ ४६ वरुणदेवसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा तथा
विरोचनश्चापि जलेश्वरं त्वगा- जम्भ बलशाली कुबेरकी ओर चला। शम्बर
ज्जम्भस्त्वथागाद् धनदं बलाढ्यम्। वायुदेवताके सामने जा खड़ा हुआ एवं मय अग्निके
वायुं समभ्येत्य च शम्बरोऽथ साथ युद्ध करने लगा। हयग्रीव आदि अन्यान्य
मयो हुताशं युयुधे मुनीन्द्र ॥ ४७
अन्ये हयग्रीवमुखा महाबला महाबलवान् दैत्य तथा दानव अग्नि, सूर्य, अष्ट
दितेस्तनूजा दनुपुङ्गवाश्च। वसुओं तथा शेषनाग आदि देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध
सुरान् हुताशार्कवसूरगेश्वरान् करने लगे ॥ ४५-४८ ॥
द्वन्द्वं समासाद्य महाबलान्विताः ॥ ४८
गर्जन्त्यथान्योन्यमुपेत्य युद्धे वे एक-दूसरेके साथ युद्ध करते हुए भीषण
चापानि कर्षन्त्यतिवेगिताश्च। गर्जन कर रहे थे। वे वेगपूर्वक धनुष चढ़ा करके
मुञ्चन्ति नाराचगणान् सहस्रश हजारों बाणोंकी झड़ी लगाकर कहने लगे-अरे!
आगच्छ हे तिष्ठसि किं ब्रुवन्तः ॥ ४९ आओ, आओ, रुक क्यों गये। तेज बाणोंकी वर्षा
शरैस्तु तीक्ष्णैरतितापयन्तः
शस्त्रैरमोघैरभिताडयन्तः । करते हुए तथा अमोघ शस्त्रोंसे प्रहार करते हुए
अध्याय १० ] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५३
| मन्दाकिनीवेगनिभां वहन्तीं<br>प्रवर्तयन्तो भयदां नदीं च ॥ ५०<br>त्रैलोक्यमाकांक्षिभिरुग्रवेगैः<br>सुरासुरैर्नारद संप्रयुद्धे।<br>पिशाचरक्षोगणपुष्टिवर्धनी-<br>मुत्तर्तुमिच्छद्भिरसृग्नदी बभौ ॥ ५१<br>वाद्यन्ति तूर्याणि सुरासुराणां<br>पश्यन्ति खस्था मुनिसिद्धसंघाः।<br>नयन्ति तानप्सरसां गणाग्र्या<br>हता रणे येऽभिमुखास्तु शूराः ॥ ५२ | उन लोगोंने गङ्गाके समान तीव्र वेगसे प्रवाहित होनेवाली, (किंतु) भयंकर नदीको प्रवर्तित कर दिया। नारदजी! उस युद्धमें तीनों लोकोंको चाहनेवाले उग्रवेगशाली देवता एवं असुरगण पिशाचों एवं राक्षसोंकी पुष्टि बढ़ानेवाली शोणित-सरिताको पार करनेकी इच्छा कर रहे थे। उस समय देवता और दानवोंके बाजे बज रहे थे। आकाशमें स्थित मुनियों और सिद्धोंके समूह उस युद्धको देख रहे थे। जो वीर उस युद्धमें सम्मुख मारे गये थे, उन्हें अप्सराएँ सीधे स्वर्गमें लिये चली जा रही थीं॥ ४९–५२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय
अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः प्रवृत्ते संग्रामे भीरूणां भयवर्धने।<br>सहस्त्राक्षो महाचापमादाय व्यसृजच्छरान् ॥ १<br>अन्धकोऽपि महावेगं धनुराकृष्य भास्वरम्।<br>पुरंदराय चिक्षेप शरान् बर्हिणवाससः ॥ २<br>तावन्योन्यं सुतीक्ष्णाग्रैः शरैः संनतपर्वभिः।<br>रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराजघ्नतुरुभावपि ॥ ३<br>ततः क्रुद्धः शतमखः कुलिशं भ्राम्य पाणिना।<br>चिक्षेप दैत्यराजाय तं ददर्श तथान्धकः ॥ ४<br>आजघान च बाणौघैरस्त्रैः शस्त्रैः स नारद।<br>तान् भस्मसात्तदा चक्रे नगानिव हुताशनः ॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— तत्पश्चात् भीरुओंके लिये भय बढ़ानेवाला समर आरम्भ हो गया। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अपने विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। अन्धक भी अपने दीप्तिमान् धनुषको लेकर बड़े वेगसे मयूरपंख लगे बाणोंको इन्द्रपर छोड़ने लगा। वे दोनों एक-दूसरेको झुके हुए पर्वोंवाले स्वर्णपंखयुक्त तथा महावेगवान् तीक्ष्ण बाणोंसे आहत कर दिये। फिर इन्द्रने क्रुद्ध होकर वज्रको अपने हाथसे घुमाकर उसे अन्धकके ऊपर फेंका। नारदजी! अंधकने उसे आते देखा। उसने बाणों, अस्त्रों और शस्त्रोंसे उसपर प्रहार किया; पर अग्नि जिस प्रकार वनों, पर्वतों (या वृक्षों)-को भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस वज्रने उन सभी अस्त्रोंको भस्म कर डाला॥ १–५॥ |
| ततोऽतिवेगिनं वज्रं दृष्ट्वा बलवतां वरः।<br>समाप्लुत्य रथात्तस्थौ भुवि बाहुसहायवान् ॥ ६<br>रथं सारथिना सार्धं साश्वध्वजसकूबरम्।<br>भस्म कृत्वाथ कुलिशमन्धकं समुपाययौ ॥ ७<br>तमापतन्तं वेगेन मुष्टिनाहत्य भूतले।<br>पातयामास बलवाञ्जगर्ज च तदाऽन्धकः ॥ ८ | तब बलवानोंमें श्रेष्ठ अन्धक अति वेगवान् वज्रको आते देखकर रथसे कूदकर बाहुबलका आश्रय लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया। वह वज्र, सारथि, अश्व, ध्वजा एवं कूबरके साथ रथको भस्मकर इन्द्रके पास पहुँच गया। उस (वज्र)-को वेगपूर्वक आते देख बलवान् अन्धकने मुष्टिसे मारकर उसे भूमिपर गिरा दिया और गर्जन करने लगा॥ ६–८॥ |
५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १०
तं गर्जमानं वीक्ष्याथ वासवः सायकैर्दृढम् ।
ववर्ष तान् वारयन् स समभ्यायाच्छतक्रतुम् ॥ ९
आजघान त लेनेभं कुम्भमध्ये पदा करे।
जानुना च समाहत्य विषाणं प्रभभञ्ज च ॥ १०
वाममुष्ट्या तथा पार्श्वं समाहत्यान्धकस्त्वरन् ।
गजेन्द्रं पातयामास प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ॥ ११
गजेन्द्रात् पतमानाच्च अवप्लुत्य शतक्रतुः ।
पाणिना वज्रमादाय प्रविवेशामरावतीम् ॥ १२
पराङ्मुखे सहस्त्राक्षे तद् दैवतबलं महत् ।
पातयामास दैत्येन्द्रः पादमुष्टितलादिभिः ॥ १३
ततो वैवस्वतो दण्डं परिभ्राम्य द्विजोत्तम ।
समभ्यधावत् प्रह्लादं हन्तुकामः सुरोत्तमः ॥ १४
तमापतन्तं बाणौघैर्ववर्ष रविनन्दनम् ।
हिरण्यकशिपोः पुत्रश्चापमानम्य वेगवान् ॥ १५
तां बाणवृष्टिमतुलां दण्डेनाहत्य भास्करिः।
शातयित्वा प्रचिक्षेप दण्डं लोकभयंकरम् ॥ १६
स वायुपथमास्थाय धर्मराजकरे स्थितः ।
जज्वाल कालाग्निनिभो यद्वद् दग्धुं जगत्त्रयम् ॥ १७
जाज्वल्यमानमायान्तं दण्डं दृष्ट्वा दितेः सुताः ।
प्राक्रोशन्ति हतः कष्टं प्रह्लादोऽयं यमेन हि ॥ १८
तमाक्रन्दितमाकर्ण्य हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः ।
प्रोवाच मा भैष्ट मयि स्थिते कोऽयं सुराधमः ॥ १९
इत्येवमुक्त्वा वचनं वेगेनाभिससार च।
जग्राह पाणिना दण्डं हसन् सव्येन नारद ॥ २०
तमादाय ततो वेगाद् भ्रामयामास चान्धकः।
जगर्ज च महानादं यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २१
प्रह्लादं रक्षितं दृष्ट्वा दण्डाद् दैत्येश्वरेण हि ।
साधुवादं ददुर्हष्टा दैत्यदानवयूथपाः ॥ २२
भ्रामयन्तं महादण्डं दृष्ट्वा भानुसुतो मुने।
दुःसहं दुर्धरं मत्वा अन्तर्धानमगाद् यमः ॥ २३
अन्तर्हिते धर्मराजे प्रह्लादोऽपि महामुने ।
दारयामास बलवान् देवसैन्यं समन्ततः ॥ २४
वरुणः शिशुमारस्थो बद्ध्वा पाशैर्महासुरान् ।
गदया दारयामास तमभ्यगाद् विरोचनः ॥ २५
उसे इस प्रकार गरजते देखकर इन्द्रने उसके ऊपर
जोरोंसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। अन्धक भी उनको
निवारित करते हुए इन्द्रके पास पहुँच गया। उसने अपने
हाथसे ऐरावत हाथीके सिरपर एवं अपने पैरसे सूँड़पर
प्रहार कर और घुटनोंसे दाँतोंपर प्रहार कर उन्हें तोड़
डाला। फिर अन्धकने बायीं मुट्ठीसे ऐरावतकी कमरपर
शीघ्रतापूर्वक चोट मारकर उसे जर्जर कर गिरा दिया।
इन्द्र भी हाथीसे नीचे गिरे जा रहे थे। वे झटसे कूदकर एवं
हाथमें वज्र लेकर अमरावतीमें प्रविष्ट हो गये ॥ ९-१२॥
इन्द्रके रणसे विमुख हो जानेपर अन्धकने उस विशाल
देव-सेनाको पैर, मुट्ठी एवं थप्पड़ों आदिसे मारकर गिरा
दिया। नारदजी ! इसके बाद देवश्रेष्ठ यमराज अपना दण्ड
घुमाते हुए प्रह्लादको मारनेकी इच्छासे दौड़ पड़े। यमराजको
अपनी ओर आते देख प्रह्लादने भी अपने धनुषको चढ़ाकर
फुर्तीसे बाण-समूहोंकी झड़ी लगा दी। यमराजने अपने
दण्डके प्रहारसे उस अतुलनीय बाण-वृष्टिको व्यर्थ कर
लोकभयकारी दण्ड चला दिया ॥ १३-१६॥
धर्मराजके हाथमें स्थित वह दण्ड हवामें ऊपर
घूम रहा था। वह ऐसा लगता था मानो तीनों लोकोंको
जलानेके लिये कालाग्नि प्रज्वलित हो रही हो। उस
प्रज्वलित दण्डको अपनी ओर आते देखकर दैत्यलोग
चिल्लाने लगे- हाय ! हाय ! यमराजने प्रह्लादको मार
दिया। उस आक्रन्दनको सुनकर हिरण्याक्षके पुत्र
अन्धकने कहा- डरो मत। मेरे रहते ये यमराज क्या
वस्तु हैं? नारदजी! ऐसा कहकर वह वेगसे दौड़ पड़ा
और हँसते हुए उस दण्डको बायें हाथसे पकड़
लिया ॥ १७-२० ॥
फिर अन्धक उसे लेकर घुमाने लगा और साथ
ही वर्षाकालिक मेघके तुल्य वह महानाद करते हुए
गर्जन करने लगा। अन्धकके द्वारा यम-दण्डसे प्रह्लादको
सुरक्षित देखकर दैत्यों एवं दानवोंके सेनानायक प्रसन्न
होकर उसे धन्यवाद देने लगे। मुने! अपने महादण्डको
अन्धकद्वारा घुमाते देख सूर्यनय यम दैत्यको दुःसह
और दुर्धर समझकर अन्तर्धान हो गये। महामुने!
धर्मराजके अन्तर्हित होनेपर अब बली प्रह्लाद भी सभी
ओरसे देवसेनाको नष्ट करने लगे ॥ २१-२४॥
वरुणदेव सूँसपर स्थित थे। वे प्रबल असुरोंको
अपने पाशोंसे बाँधकर गदाद्वारा विदीर्ण करने
लगे। इसपर विरोचनने उनका सामना किया।
अध्याय १०] अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय ५५
तोमरैर्वज्रसंस्पर्शैः शक्तिभिर्मार्गणैरपि। उसने वज्रतुल्य तोमर, शक्ति, बाण, मुद्गर और कणपों*
जलेशं ताडयामास मुद्गरैः कणपैरपि ॥ २६ (भल्लों)-से वरुणदेवपर प्रहार किया। इसपर वरुणने
उसके निकट जाकर गदासे मारकर उन्हें पृथ्वीपर गिरा
ततस्तं गदयाभ्येत्य पातयित्वा धरातले। दिया। फिर दौड़कर उन्होंने पाशोंसे उसके मतवाले
अभिद्रुत्य बबन्धाथ पाशैर्मत्तगजं बली ॥ २७ हाथीको बाँध लिया। पर अन्धकने तुरन्त ही उन
पाशोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। नारदजी! इतना ही
तान् पाशशतधा चक्रे वेगाच्च दनुजेश्वरः। नहीं, उसने वरुणके निकट जाकर उनकी कमर भी
वरुणं च समभ्येत्य मध्ये जग्राह नारद ॥ २८ पकड़ ली ॥ २५-२८ ॥
ततो दन्ती च शृङ्गाभ्यां प्रचिक्षेप तदाऽव्ययः। उस हाथीने भी अपने प्रबल दाँतोंसे वरुणको
ममर्द च तथा पद्भ्यां सवाहं सलिलेश्वरम् ॥ २९ उठाकर फेंक दिया। साथ ही वह वाहनसहित वरुणको
तं मर्द्यमानं वीक्ष्याथ शशाङ्कः शिशिरांशुमान्। अपने पैरोंसे कुचलने लगा। यह देख शीतकिरण
अभ्येत्य ताडयामास मार्गणैः कायदारणैः ॥ ३० चन्द्रमाने हाथीके पास पहुँचकर अपने तेज नुकीले
स ताड्यमानः शिशिरांशुबाणै- बाणोंसे उसके शरीरको विदीर्ण कर दिया। चन्द्रमाके
रवाप पीडां परमां गजेन्द्रः। बाणोंसे विद्ध होनेपर अन्धकके हाथीको अत्यधिक
दुष्टश्च वेगात् पयसामधीशं पीड़ा हुई। वह अपने पैरोंसे वरुणको तेजीसे बार-बार
मुहुर्मुहुः पादतर्लैममर्द ॥ ३१ कुचलने लगा। नारदजी! वरुणदेवने भी हाथीके दोनों
स मृद्यमानो वरुणो गजेन्द्रं पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया एवं अपने हाथों तथा
पद्भ्यां सुगाढं जगृहे महर्षे। पैरोंसे भूमिको स्पर्श करते हुए मस्तक उठाकर बलपूर्वक
पादेषु भूमिं करयोः स्पृशंश्च अङ्गुलियोंसे उस हाथीकी पूँछ पकड़ ली और सर्पराज
मूर्द्धानमुल्लाल्य बलान्महात्मा ॥ ३२ वासुकिसे विरोचनको बाँधकर उसे हाथी और पिलवानके
गृह्याङ्गुलीभिंश्च गजस्य पुच्छं सहित उठाकर आकाशमें फेंक दिया ॥ २९-३३॥
कृत्वेह बन्धं भुजगेश्वरेण। वरुणद्वारा फेंका गया विरोचन आकाशसे हाथीसहित
उत्पाट्य चिक्षेप विरोचनं हि पृथ्वीपर इस प्रकार आ गिरा, जैसे सूर्यद्वारा पहले
सकुञ्जरं खे सनियन्तृवाहम् ॥ ३३ सुकेशी दैत्यका नगर अट्टालिकाओं, यन्त्रों, अर्गलाओं
क्षिप्तो जलेशेन विरोचनस्तु एवं महलोंके सहित पृथ्वीपर गिराया गया था। उसके
सकुञ्जरो भूमितले पपात। बाद वरुण गदा और पाश लेकर दैत्यको मारनेके लिये
साट्टं सन्यन्त्रार्गलहर्म्यभूमिं दौड़े। अब दैत्यलोग मेघ-गर्जन-जैसे जोर-जोरसे रोने
पुरं सुकेशेरिव भास्करेण ॥ ३४ लगे-हाय! हाय! राक्षस-सेनाके रक्षक वीर विरोचन
ततो जलेशः सगदः सपाशः वरुणद्वारा मारे जा रहे हैं। हे प्रह्लाद! हे जम्भ! हे
समभ्यधावद् दितिजं निहन्तुम्। कुजम्भ! तुम सभी अन्धकके साथ आकर (उन्हें)
ततः समाक्रन्दमनुत्तमं हि बचाओ। हाय! बलवान् वरुण दैत्यवीर विरोचनको
मुक्तं तु दैत्यैर्घनरावतुल्यम् ॥ ३५ वाहनसहित चूर्ण करते हुए उन्हें पाशमें बाँधकर गदासे
हा हा हतोऽसौ वरुणेन वीरो इस प्रकार मार रहे हैं, जैसे अश्वमेध यज्ञमें इन्द्र पशुको
विरोचनो दानवसैन्यपालः।
प्रह्लाद हे जम्भकुजम्भकाद्या
रक्षध्वमभ्येत्य सहान्धकेन ॥ ३६
अहो महात्मा बलवाञ्जलेशः
संचूर्णयन् दैत्यभटं सवाहम्।
पाशेन बद्ध्वा गदया निहन्ति
यथा पशुं वाजिमखे महेन्द्रः ॥ ३७
*कणप अस्त्रका वर्णन महाभारत तथा दशकुमारचरितमें आया है।
द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन
५६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १०
श्रुत्वाथ शब्दं दितिजैः समीरितं
जम्भप्रधाना दितिजेश्वरास्ततः ।
समभ्यधावंस्त्वरिता जलेश्वरं
यथा पतङ्गा ज्वलितं हुताशनम् ॥ ३८
तानागतान् वै प्रसमीक्ष्य देवः
प्राह्लादिमुत्सृज्य वितत्य पाशम् ।
गदां समुद्भाव्य जलेश्वरस्तु
दुद्राव ताञ्जम्भमुखानरातीन् ॥ ३९
जम्भं च पाशेन तथा निहत्य
तारं तलेनाशनिसंनिभेन ।
पादेन वृत्रं तरसा कुजम्भं
निपातयामास बलं च मुष्ट्या ॥ ४०
तेनार्दिता देववरेण दैत्याः
संप्राद्रवन् दिक्षु विमुक्तशस्त्राः ।
ततोऽन्धकः स त्वरितोऽभ्युपेयाद्
रणाय योद्धुं जलनायकेन ॥ ४१
तमापतन्तं गदया जघान
पाशेन बद्ध्वा वरुणो सुरेशम् ।
तं पाशमाविध्य गदां प्रगृह्य
चिक्षेप दैत्यः स जलेश्वराय ॥ ४२
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाशं
गदां च दाक्षायणिनन्दनस्तु ।
विवेश वेगात् पयसां निधानं
ततोऽन्धको देवबलं ममर्द ॥ ४३
ततो हुताशः सुरशत्रुसैन्यं
ददाह रोषात् पवनावधूतः ।
तमभ्ययाद् दानवविश्वकर्मा
मयो महाबाहुरुदग्रवीर्यः ॥ ४४
तमापतन्तं सह शम्बरेण
समीक्ष्य वह्निः पवनेन सार्धम् ।
शक्त्या मयं शम्बरमेत्य कण्ठे
सन्ताड्य जग्राह बलान्महर्षे ॥ ४५
शक्त्या स कायावरणे विदारिते
संभिन्नदेहो न्यपतत् पृथिव्याम् ।
मयः प्रजज्वाल च शम्बरोऽपि
कण्ठावलग्ने ज्वलने प्रदीप्ते ॥ ४६
स दह्यमानो दितिजोऽग्निनाथ
सुविस्वरं घोरतरं रुराव ।
सिंहाभिपन्नो विपिने यथैव
मत्तो गजः क्रन्दति वेदनार्त्तः ॥ ४७
मारते हैं। दैत्योंके रुदनको सुनकर जम्भ आदि प्रमुख
दैत्यगण वरुणकी ओर शीघ्रतासे ऐसे दौड़े जैसे पतङ्ग
प्रज्वलित अग्निकी ओर दौड़ते हैं ॥ ३४-३८॥
उन दैत्योंको आया देख वरुण प्रह्लाद-पुत्र
(विरोचन)-को छोड़ करके पाश फैलाकर और गदा
घुमाकर उन जम्भप्रभृति शत्रुओंकी ओर दौड़े। उन्होंने
जम्भको पाशसे, तार-दैत्यको वज्र-तुल्य करतलके
प्रहारसे, वृत्रासुरको पैरोंसे, कुजम्भको अपने वेगसे
और बल नामक असुरको मुक्केसे मारकर गिरा
दिया। देवप्रवर ! वरुणद्वारा मर्दित दैत्य अपने अस्त्र-
शस्त्रोंको छोड़कर दसों दिशाओंमें भागने लगे। उसके
बाद अन्धक वरुणदेवके साथ युद्ध करनेके लिये बड़ी
तेजीसे उनके पास पहुँचा। अपनी ओर आते देख
वरुणने उस दैत्यनायक अन्धकको अपने पाशसे बाँधकर
गदासे मारा, किंतु दैत्यने उस पाश और गदाको
छीनकर वरुणपर ही फेंक दिया ॥ ३९-४२॥
उस पाश और गदाको अपनी ओर आते
देखकर दाक्षायणीके पुत्र वरुण शीघ्रतासे समुद्रमें पैठ
गये। तब अन्धक देवसेनाका मर्दन करने लगा।
उसके बाद पवनद्वारा प्रज्वलित अग्निदेव क्रोधपूर्वक
असुरोंकी सेनाको दग्ध करने लगे। तब दानवोंका
'विश्वकर्मा' (शिल्पिराज) प्रचण्ड प्रतापी महाबाहु
मय उनके सामने आया। नारदजी ! शम्बरके साथ
उसे आते देख अग्निदेवने वायुदेवताके साथ
शक्तिके प्रहारसे मय और शम्बरके कण्ठमें चोट
पहुँचाकर उन दोनोंको ही जोरसे पकड़ लिया।
शक्तिसे कवचके फट जानेपर छिन्न-भिन्न
शरीरवाला मय पृथ्वीपर गिर पड़ा और शम्बरासुर
कण्ठमें प्रदीप्त अग्निके लग जानेसे दग्ध होने लगा।
अग्निद्वारा जलते दैत्यने उस समय मुक्त कण्ठसे
इस प्रकार रोदन किया, जैसे वनमें सिंहसे आक्रान्त
मतवाला हाथी वेदनासे दुःखी होकर करुण
चिग्घाड़ करता है ॥ ४३-४७॥
| अध्याय १० ] | अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय | ५७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं शब्दमाकर्ण्य च शम्बरस्य<br>दैत्येश्वरः क्रोधविरक्तदृष्टिः ।<br>आः किं किमेतन्ननु केन युद्धे<br>जितो मयः शम्बरदानवश्च ॥ ४८<br><br>ततोऽब्रुवन् दैत्यभटा दितीशं<br>प्रदह्यते ह्येष हुताशनेन ।<br>रक्षस्व चाभ्येत्य न शक्यतेऽन्यै-<br>र्हुताशनो वारयितुं रणाग्रे ॥ ४९<br><br>इत्थं स दैत्यैरभिनोदितस्तु<br>हिरण्यचक्षुस्तनयो महर्षे ।<br>उद्यम्य वेगात् परिघं हुताशं<br>समाद्रवत् तिष्ठ तिष्ठ ब्रुवन् हि ॥ ५०<br><br>श्रुत्वाऽन्धकस्यापि वचो व्ययात्मा<br>संक्रुद्धचित्तस्त्वरितो हि दैत्यम् ।<br>उत्पाद्य भूम्यां च विनिष्पिपे ष<br>ततोऽन्धकः पावकमाससाद ॥ ५१ | शम्बरके उस शब्दको सुनकर क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले दैत्येश्वरने कहा—अरे! यह क्या है? युद्धमें मय और शम्बरको किसने जीता है? इसपर दैत्ययोद्धाओंने अन्धकसे कहा—अग्निदेव इनको जला रहे हैं। आप जाकर उनकी रक्षा करें। आपके अतिरिक्त दूसरा कोई भी अग्निको नहीं रोक सकता। नारदजी! दैत्योंके ऐसा कहनेपर हिरण्याक्षपुत्र शीघ्रतासे परिघ उठाकर ‘ठहरो-ठहरो’—कहता हुआ अग्निकी ओर दौड़ पड़ा। अन्धकके वचनको सुनकर अव्ययात्मा अग्निदेवने अत्यन्त क्रोधसे उस दैत्यको शीघ्र ही उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया। उसके बाद अन्धक अग्निके पास पहुँचा॥ ४८—५१॥ |
| समाजघानाथ हुताशनं हि<br>वरायुधेनाथ वराङ्गमध्ये ।<br>समाहतोऽग्निः परिमुच्य शम्बरं<br>तथाऽन्धकं स त्वरितोऽभ्यधावत् ॥ ५२<br><br>तमापतन्तं परिघेण भूयः<br>समाहनन्मूर्ध्नि तदान्धकोऽपि ।<br>स ताडितोऽग्निर्दितिजेश्वरेण<br>भयात् प्रदुद्राव रणाजिराद्धि ॥ ५३<br><br>ततोऽन्धको मारुतचन्द्रभास्करान्<br>साध्यान् सरुद्रांश्विवसून् महोरगान् ।<br>यान् या शरेण स्पृशते पराक्रमी<br>पराङ्मुखांस्तान् कृतवान् रणाजिरात् ॥ ५४<br><br>ततो विजित्यामरसैन्यमुग्रं<br>सैन्द्रं सरुद्रं सयमं ससोमम् ।<br>संपूज्यमानो दनुपुंगवैस्तु<br>तदान्धको भूमिमुपाजगाम ॥ ५५<br><br>आसाद्य भूमिं करदान् नरेन्द्रान्<br>कृत्वा वशे स्थाप्य चराचरं च ।<br>जगत्समग्रं प्रविवेश धीमान्<br>पातालमग्र्यं पुरमश्मकाह्वम् ॥ ५६<br><br>तत्र स्थितस्यापि महासुरस्य<br>गन्धर्वविद्याधरसिद्धसंघाः ।<br>सहाप्सरोभिः परिचारणाय<br>पातालमभ्येत्य समावसन्त ॥ ५७ | उसने श्रेष्ठ अस्त्रके द्वारा अग्निके सिरपर प्रहार किया। इस प्रकार आहत अग्निदेव शम्बरको छोड़कर तत्काल अन्धककी ओर दौड़े। अन्धकने आते हुए अग्निदेवके सिरपर पुनः परिघसे प्रहार किया। अन्धकद्वारा ताडित अग्निदेव भयभीत हो रणक्षेत्रसे भाग गये। उसके बाद पराक्रमी अन्धक वायु, चन्द्र, सूर्य, साध्य, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसु और महानागोंमें जिन-जिनको बाणसे स्पर्श करता था, वे सभी युद्धभूमिसे पराङ्मुख हो जाते थे। इस प्रकार इन्द्र, रुद्र, यम, सोमसहित देवताओंकी उग्र सेनाको जीतकर अन्धक श्रेष्ठ दानवोंके द्वारा पूजित होकर पृथ्वीपर आ गया। वहाँ वह बुद्धिमान् दैत्य सभी राजाओंको अपना करद (सामन्त) बना करके तथा समस्त चराचर जगत्को वशमें कर पातालमें स्थित अपने अश्मक नामक उत्तम नगरमें चला गया। वहाँ उस महासुर अन्धककी सेवा करनेके लिये अप्सराओंके साथ सभी प्रमुख गन्धर्व, विद्याधर एवं सिद्धोंके समूह पातालमें आकर निवास करने लगे॥ ५२—५७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १०॥
५८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११
ग्यारहवाँ अध्याय
सुकेशीकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश,
देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन
नारद उवाच
यदेतद् भवता प्रोक्तं सुकेशिनगरोऽम्बरात् ।
पातितो भुवि सूर्येण तत्कदा कुत्र कुत्र च ॥ १
सुकेशीति च कश्चासौ केन दत्तं पुरोऽस्य च ।
किमर्थं पातितो भूयामाकाशाद् भास्करेण हि ॥ २
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् ।
यथोक्तवान् स्वयम्भूर्मा कथ्यमानां मयाऽनघ ॥ ३
आसीन्निशाचरपतिर्विद्युत्केशीति विश्रुतः ।
तस्य पुत्रो गुणज्येष्ठः सुकेशिरभवत्ततः ॥ ४
तस्य तुष्टस्तथेशानः पुरमाकाशचारिणम् ।
प्रादादजेयत्वमपि शत्रुभिश्चाप्यवध्यताम् ॥ ५
स चापि शंकरात् प्राप्य वरं गगनगं पुरम् ।
रेमे निशाचरैः सार्द्धं सदा धर्मपथि स्थितः ॥ ६
स कदाचिद् गतोऽरण्यं मागधं राक्षसेश्वरः ।
तत्राश्रमांस्तु ददृशे ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ ७
महर्षीन् स तदा दृष्ट्वा प्रणिपत्याभिवाद्य च ।
प्रत्युवाच ऋषीन् सर्वान् कृतासनपरिग्रहः ॥ ८
सुकेशिरुवाच
प्रष्टुमिच्छामि भवतः संशयोऽयं हृदि स्थितः ।
कथयन्तु भवन्तो मे न चैवाज्ञापयाम्यहम् ॥ ९
किंस्विच्छ्रेयः परे लोके किमु चेह द्विजोत्तमाः ।
केन पूज्यस्तथा सत्सु केनासौ सुखमेधते ॥ १०
पुलस्त्य उवाच
इत्थं सुकेशिवचनं निशम्य परमर्षयः ।
प्रोचुर्विमृश्य श्रेयोऽर्थमिह लोके परत्र च ॥ ११
ऋषय ऊचुः
श्रूयतां कथयिष्यामस्तव राक्षसपुंगव ।
यद्धि श्रेयो भवेद् वीर इह चामुत्र चाव्ययम् ॥ १२
नारदजीने (पुलस्त्यजीसे) पूछा- आपने जो
यह कहा है कि सूर्यने सुकेशीके नगरको आकाशसे
पृथ्वीपर गिरा दिया था तो यह घटना कब और कहाँ
हुई थी? सुकेशी नामका वह कौन व्यक्ति था? उसे
वह नगर किसने दिया था और भगवान् सूर्यने उसे
आकाशसे पृथ्वीपर क्यों गिरा दिया ? ॥ १-२॥
पुलस्त्यजी बोले- निष्पाप नारदजी ! यह कथा
बहुत पुरानी है; आप इसे सावधानीसे सुनिये। ब्रह्माजीने
जैसे यह कथा मुझे सुनायी थी, वैसे ही इसे मैं आपको
सुना रहा हूँ। पहले विद्युत्केशी नामसे प्रसिद्ध राक्षसोंका
एक राजा था। उसका पुत्र सुकेशी गुणोंमें उससे भी
बढ़कर था। उसपर प्रसन्न होकर शिवजीने उसे एक
आकाशचारी नगर और शत्रुओंसे अजेय एवं अवध्य
होनेका वर भी दिया। वह शंकरसे आकाशचारी श्रेष्ठ
नगर पाकर राक्षसोंके साथ सदा धर्मपथपर रहते हुए
विचरने लगा। एक समय मगधारण्यमें जाकर उस
राक्षसराजने वहाँ ध्यान-परायण ऋषियोंके आश्रमोंको
देखा। उस समय महर्षियोंको देखकर अभिवादन और
प्रणाम किया। फिर एक जगह बैठकर उसने समस्त
ऋषियोंसे कहा- ॥ ३-८॥
सुकेशि बोला - मैं आपलोगोंको आदेश नहीं
दे रहा हूँ; बल्कि मेरे हृदयमें एक संदेह है, उसे मैं
आपसे पूछना चाहता हूँ। आप मुझको उसे बतलाइये।
द्विजोत्तमो! इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी
क्या है? मनुष्य सज्जनोंमें कैसे पूज्य होता है और उसे
सुखकी प्राप्ति कैसे होती है ? ॥ ९-१० ॥
पुलस्त्यजी बोले- सुकेशीके इस प्रकारके
वचनको सुनकर श्रेष्ठ ऋषियोंने विचारकर उससे इस
लोक और परलोकमें कल्याणकारी बातें कहीं ॥ ११ ॥
ऋषिगण बोले- वीर राक्षस-श्रेष्ठ ! इस लोक
और परलोकमें जो अक्षय श्रेयस्कर वस्तु है, उसे हम तुमसे
| अध्याय ११] सुकेशीकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन | ५९ |
|---|
| श्रेयो धर्मः परे लोके इह च क्षणदाचर।<br>तस्मिन् समाश्रितः सत्सु पूज्यस्तेन सुखी भवेत्॥ १३ | कहते हैं, उसे सुनो। निशाचर! इस लोक और परलोकमें धर्म ही कल्याणकारी है। उसमें स्थित रहकर व्यक्ति सज्जनोंमें आदरणीय एवं सुखी होता है॥ १२-१३॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>किं लक्षणो भवेद् धर्मः किमाचरणसत्क्रियः।<br>यमाश्रित्य न सीदन्ति देवादद्यास्तु तदुच्यताम्॥ १४ | सुकेशि बोला— धर्मका लक्षण (परिचय) क्या है? उसमें कौन-से आचरण एवं सत्कर्म होते हैं, जिनका आश्रय लेकर देवादि कभी दुःखी नहीं होते। आप उसका वर्णन करें॥ १४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>देवानां परमो धर्मः सदा यज्ञादिकाः क्रियाः।<br>स्वाध्यायवेदवेत्तृत्वं विष्णुपूजारतिः स्मृता॥ १५<br>दैत्यानां बाहुशालित्वं मात्सर्यं युद्धसत्क्रिया।<br>वेदनं नीतिशास्त्राणां हरभक्तिरुदाहृता॥ १६<br>सिद्धानामुदितो धर्मो योगयुक्तिरनुत्तमा।<br>स्वाध्यायं ब्रह्मविज्ञानं भक्तिर्द्वाभ्यामपि स्थिरा॥ १७<br>उत्कृष्टोपासनं ज्ञेयं नृत्यवाद्येषु वेदिता।<br>सरस्वत्यां स्थिरा भक्तिर्गान्धर्वो धर्म उच्यते॥ १८ | ऋषियोंने कहा— सदा यज्ञादि कार्य, स्वाध्याय, वेदज्ञान और विष्णुपूजामें रति—ये देवताओंके शाश्वत परम धर्म हैं। बाहुबल, ईर्ष्याभाव, युद्धकार्य, नीतिशास्त्रका ज्ञान और हर-भक्ति—ये दैत्योंके धर्म कहे गये हैं। श्रेष्ठ योगसाधन, वेदाध्ययन, ब्रह्मविज्ञान तथा विष्णु और शिव—इन दोनोंमें अचल भक्ति—ये सब सिद्धोंके धर्म कहे गये हैं। ऊँची उपासना, नृत्य और वाद्यका ज्ञान तथा सरस्वतीके प्रति निश्चल भक्ति—ये गन्धर्वोंके धर्म कहे जाते हैं॥ १५-१८॥ |
| विद्याधरत्वमतुलं विज्ञानं पौरुषे मतिः।<br>विद्याधराणां धर्मोऽयं भवान्यां भक्तिरेव च॥ १९<br>गन्धर्वविद्यावेदित्वं भक्तिर्भानौ तथा स्थिरा।<br>कौशल्यं सर्वशिल्पानां धर्मः किम्पुरुषः स्मृतः॥ २०<br>ब्रह्मचर्यममानित्वं योगाभ्यासरतिर्दृढा।<br>सर्वत्र कामचारित्वं धर्मोऽयं पैतृकः स्मृतः॥ २१<br>ब्रह्मचर्यं यताशित्वं जप्यं ज्ञानं च राक्षस।<br>नियमाद्धर्मवेदित्वमार्षो धर्मः प्रचक्ष्यते॥ २२<br>स्वाध्यायं ब्रह्मचर्यं च दानं यजनमेव च।<br>अकार्पण्यमनायासं दया हिंसा क्षमा दमः॥ २३<br>जितेन्द्रियत्वं शौचं च माङ्गल्यं भक्तिरच्युते।<br>शंकरे भास्करे देव्यां धर्मोऽयं मानवः स्मृतः॥ २४ | अद्भुत विद्याका धारण करना, विज्ञान, पुरुषार्थकी बुद्धि और भवानीके प्रति भक्ति—ये विद्याधरोंके धर्म हैं। गन्धर्वविद्याका ज्ञान, सूर्यके प्रति अटल भक्ति और सभी शिल्प-कलाओंमें कुशलता—ये किम्पुरुषोंके धर्म माने जाते हैं। ब्रह्मचर्य, अमानित्व (अभिमानसे बचना) योगाभ्यासमें दृढ़ प्रीति एवं सर्वत्र इच्छानुसार भ्रमण—ये पितरोंके धर्म कहलाते हैं। राक्षस! ब्रह्मचर्य, नियताहार, जप, आत्मज्ञान और नियमानुसार धर्मज्ञान—ये ऋषियोंके धर्म कहे जाते हैं। स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, उदारता, विश्रान्ति, दया, अहिंसा, क्षमा, दम, जितेन्द्रियता, शौच, माङ्गल्य तथा विष्णु, शिव, सूर्य और दुर्गादेवीमें भक्ति—ये मानवोंके (सामान्य) धर्म हैं॥ १९-२४॥ |
| धनाधिपत्यं भोगानि स्वाध्यायं शंकरार्चनम्।<br>अहंकारमशौण्डीयं धर्मोऽयं गुह्यकेष्विति॥ २५<br>परदारावमर्शित्वं पारक्येऽर्थे च लोलता।<br>स्वाध्यायं त्र्यम्बके भक्तिर्धर्मोऽयं राक्षसः स्मृतः॥ २६<br>अविवेकंमथाज्ञानं शौचहानिरसत्यता।<br>पिशाचानामयं धर्मः सदा चामिषगृध्नता॥ २७<br>योनयो द्वादशैवैतास्तासु धर्माश्च राक्षस।<br>ब्रह्मणा कथिताः पुण्या द्वादशैव गतिप्रदाः॥ २८ | धनका स्वामित्व, भोग, स्वाध्याय, शिवजीकी पूजा, अहंकार और सौम्यता—ये गुह्योंके धर्म हैं। परस्त्रीगमन, दूसरेके धनमें लोलुपता, वेदाध्ययन और शिवभक्ति—ये राक्षसोंके धर्म कहे गये हैं। अविवेक, अज्ञान, अपवित्रता, असत्यता एवं सदा मांस-भक्षणकी प्रवृत्ति—ये पिशाचोंके धर्म हैं। राक्षस! ये ही बारह योनियाँ हैं। पितामह ब्रह्माने उनके ये बारह गति देनेवाले धर्म कहे हैं॥ २५-२८॥ |
१४- दशाङ्ग-धर्म, आश्रम-धर्म और सदाचार-स्वरूपका वर्णन
६० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११
सुकेशिरुवाच
सुकेशिने कहा- आपलोगोंने जो शाश्वत एवं
भवद्भिरुक्ता ये धर्माः शाश्वता द्वादशाव्ययाः ।
अव्यय बारह धर्म बताये हैं, उनमें मनुष्योंके धर्मोंको
तत्र ये मानवा धर्मास्तान् भूयो वक्तुमर्हथ ॥ २९
एक बार पुनः कहनेकी कृपा करें ॥ २९ ॥
ऋषय ऊचुः
ऋषियोंने कहा - निशाचर ! पृथ्वीके सात द्वीपोंमें
शृणुष्व मनुजादीनां धर्मोऽस्तु क्षणदाचर ।
निवास करनेवाले मनुष्य आदिके धर्मोंको सुनो। यह
ये वसन्ति महीपृष्ठे नरा द्वीपेषु सप्तसु ॥ ३०
पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली है और यह
योजनानां प्रमाणेन पञ्चाशत्कोटिरायता ।
नदीमें नावके समान जलपर स्थित है। सज्जनश्रेष्ठ !
जलोपरि महीयं हि नौरिवास्ते सरिज्जले ॥ ३१
उसके ऊपर देवेश ब्रह्माने कर्णिकाके आकारवाले अत्यन्त
तस्योपरि च देवेशो ब्रह्मा शैलेन्द्रमुत्तमम् ।
कर्णिकाकारमत्युच्चं स्थापयामास सत्तम ॥ ३२
ऊँचे सुमेरुगिरिको स्थापित किया है। फिर उसपर ब्रह्माने
तस्येमां निर्ममे पुण्यां प्रजां देवश्चतुर्दिशम् ।
चारों दिशाओंमें पवित्र प्रजाका निर्माण किया और द्वीप-
स्थानानि द्वीपसंज्ञानि कृतवांश्च प्रजापतिः ॥ ३३
नामवाले अनेक स्थानोंकी भी रचना की है ॥ ३०-३३॥
तत्र मध्ये च कृतवाञ्जम्बूद्वीपमिति श्रुतम् ।
उनके मध्यमें उन्होंने जम्बूद्वीपकी रचना की।
तल्लक्षं योजनानां च प्रमाणेन निगद्यते ॥ ३४
इसका प्रमाण एक लक्ष योजनका कहा जाता है। उसके
ततो जलनिधी रौदो बाह्यतो द्विगुणः स्थितः ।
बाहर दुगुना परिमाणमें लवण-समुद्र है तथा उसके बाद
तस्यापि द्विगुणः प्लक्षो बाह्यतः संप्रतिष्ठितः ॥ ३५
उसका दुगुना प्लक्षद्वीप है। उसके बाहर दुगुने प्रमाणवाला
ततस्त्विक्षुरसोदश्च बाह्यतो बलयाकृतिः ।
वलयाकार इक्षुरस-सागर है। इस महोदधिका दुगुना
द्विगुणः शाल्मलिद्वीपो द्विगुणोऽस्य महोदधेः ॥ ३६
शाल्मलिद्वीप है। उसके बाहर उससे दुगुना सुरासागर है
सुरोदो द्विगुणस्तस्य तस्माच्च द्विगुणः कुशः ।
तथा उससे दुगुना कुशद्वीप है। कुशद्वीपसे दुगुना
घृतोदो द्विगुणश्चैव कुशद्वीपात् प्रकीर्तितः ॥ ३७
घृतसागर है ॥ ३४-३७ ॥
घृतोदाद् द्विगुणः प्रोक्तः क्रौञ्चद्वीपो निशाचर ।
निशाचर ! घृतसागरसे दुगुना क्रौंचद्वीप कहा गया
ततोऽपि द्विगुणः प्रोक्तः समुद्रो दधिसंज्ञितः ॥ ३८
है तथा उससे दुगुना दधिसमुद्र है। दधिसागरसे दुगुना
समुद्राद् द्विगुणः शाकः शाकाद् दुग्धाब्धिरुत्तमः ।
शाकद्वीप है और शाकद्वीपसे द्विगुण उत्तम क्षीरसागर है
द्विगुणः संस्थितो यत्र शेषपर्यङ्कगो हरिः ।
जिसमें शेषशय्यापर सोये श्रीहरि स्थित हैं। ये सभी
एते च द्विगुणाः सर्वे परस्परमपि स्थिताः ॥ ३९
परस्पर एक-दूसरेसे द्विगुण प्रमाणमें स्थित हैं। राक्षसेन्द्र !
चत्वारिंशदिमाः कोट्यो लक्षाश्च नवतिः स्मृताः ।
जम्बूद्वीपसे लेकर क्षीरसागरके अन्ततकका विस्तार
योजनानां राक्षसेन्द्र पञ्च चातिसुविस्तृताः ।
चालीस करोड़ नब्बे लाख पाँच योजन है ॥ ३८-४० ॥
जम्बूद्वीपात् समारभ्य यावत्क्षीराब्धिरन्ततः ॥ ४०
तस्माच्च पुष्करद्वीपः स्वादूदस्तदनन्तरम् ।
राक्षस ! उसके बाद पुष्करद्वीप एवं तदनन्तर
कोट्यश्चतस्रो लक्षाणां द्विपञ्चाशच्च राक्षस ॥ ४१
स्वादु जलका समुद्र है। पुष्करद्वीपका परिमाण चार
करोड़ बावन लाख योजन है। उसके चारों ओर उतने
पुष्करद्वीपमानोऽयं तावदेव तथोदधिः ।
ही परिमाणका समुद्र है। उसके चारों ओर लाख
लक्षखण्डकटाहेन समन्तादभिपूरितम् ॥ ४२
योजनका अण्डकटाह है। इस प्रकार वे सातों द्वीप
एवं द्विपास्त्विमे सप्त पृथग्धर्माः पृथक्क्रियाः ।
भिन्न धर्मों और क्रियावाले हैं। निशाचर ! हम उनका
गदिष्यामस्तव वयं शृणुष्व त्वं निशाचर ॥ ४३ ॥
वर्णन करते हैं। तुम उसे सुनो। वीर ! प्लक्षसे शाकतकके
प्लक्षदिषु नरा वीर ये वसन्ति सनातनाः ।
द्वीपोंमें जो सनातन (नित्य) पुरुष निवास करते हैं,
शाकान्तेषु न तेष्वस्ति युगावस्था कथंचन ॥ ४४
उनमें किसी प्रकारकी युग-व्यवस्था नहीं है।
अध्याय ११] सुकेशीकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन ६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मोदन्ते देववत्तेषां धर्मो दिव्य उदाहृतः ।<br>कल्पान्ते प्रलयस्तेषां निगद्येत महाभुज ॥ ४५<br><br>ये जनाः पुष्करद्वीपे वसन्ते रौद्रदर्शने ।<br>पैशाचमाश्रिता धर्मे कर्मान्ते ते विनाशितः ॥ ४६ | महाबाहो ! वे देवताओंके समान सुखभोग करते हैं। उनका धर्म दिव्य कहा जाता है। कल्पके अन्तमें उनका प्रलयमात्र होना वर्णित है। पुष्करद्वीप देखनेमें भयंकर है। वहाँके निवासी पैशाच-धर्मोंका पालन करते हैं। कर्मके अन्तमें उनका नाश होता है ॥ ४५-४६ ॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>किमर्थं पुष्करद्वीपो भवद्भिः समुदाहृतः ।<br>दुर्दर्शः शौचरहितो घोरः कर्मान्तनाशकृत् ॥ ४७ | सुकेशिने कहा—आपलोगोंने पुष्करद्वीपको भयंकर, पवित्रतारहित, घोर एवं कर्मके अन्तमें नाश करनेवाला क्यों बतलाया ? कृपाकर यह बात हमें समझायें ॥ ४७ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>तस्मिन् निशाचर द्वीपे नरकाः सन्ति दारुणाः ।<br>रौरवाद्यास्ततो रौद्रः पुष्करो घोरदर्शनः ॥ ४८ | ऋषियोंने कहा—निशाचर ! उस द्वीपमें रौरव आदि भयानक नरक हैं। इसीसे पुष्करद्वीप देखनेमें बड़ा भयंकर है ॥ ४८ ॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>कियन्त्येतानि रौद्राणि नरकाणि तपोधनाः ।<br>कियन्मात्राणि मार्गेण का च तेषु स्वरूपता ॥ ४९ | सुकेशिने पूछा—तपस्विगण ! वे रौद्र नरक कितने हैं ? उनका मार्ग कितना है ? उनका स्वरूप कैसा है ? ॥ ४९ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>शृणुष्व राक्षसश्रेष्ठ प्रमाणं लक्षणं तथा ।<br>सर्वेषां रौरवादीनां संख्या या त्वेकविंशतिः ॥ ५०<br>द्वे सहस्रे योजनानां ज्वलिताङ्गारविस्तृते ।<br>रौरवो नाम नरकः प्रथमः परिकीर्तितः ॥ ५१<br>तप्तताम्रमयी भूमिरधस्तादग्नितापिता ।<br>द्वितीयो द्विगुणस्तस्मान्महारौरव उच्यते ॥ ५२<br>ततोऽपि द्विःस्थितश्चान्यस्तामिस्रो नरकः स्मृतः ।<br>अन्धतामिस्रको नाम चतुर्थो द्विगुणः परः ॥ ५३<br>ततस्तु कालचक्रेति पञ्चमः परिगीयते ।<br>अप्रतिष्ठं च नरकं घटीयन्त्रं च सप्तमम् ॥ ५४ | ऋषियोंने कहा—राक्षसश्रेष्ठ ! उन समस्त रौरव आदि नरकोंका लक्षण और प्रमाण सुनो, जिन (मुख्य नरकों)-की संख्या इक्कीस है। उनमें प्रथम रौरव नरक कहा जाता है। वह दो हजार योजन विस्तृत एवं प्रज्वलित अङ्गारमय है। उससे द्विगुणित महारौरव नामक द्वितीय नरक है। उसकी भूमि जलते हुए ताँबेसे बनी है, जो नीचेसे अग्निद्वारा तापित होती रहती है। उससे द्विगुणित विस्तृत तीसरा तामिस्र नामक नरक कहा जाता है। उससे द्विगुणित अन्धतामिस्र नामक चतुर्थ नरक है। उसके बाद पञ्चम नरकको कालचक्र कहते हैं। अप्रतिष्ठ नामक नरक षष्ठ और घटीयन्त्र सप्तम है ॥ ५०-५४ ॥ |
| असिपत्रवनं चान्यत्सहस्त्राणि द्विसप्ततिः ।<br>योजनानां परिख्यातमष्टमं नरकोत्तमम् ॥ ५५<br>नवमं तप्तकुम्भं च दशमं कूटशाल्मलिः ।<br>करपत्रस्तथैवोक्तस्तथाऽन्यः श्वानभोजनः ॥ ५६<br>संदंशो लौहपिण्डश्च करम्भसिकता तथा ।<br>घोरा क्षारनदी चान्या तथान्यः कृमिभोजनः ।<br>तथाऽष्टादशमी प्रोक्ता घोरा वैतरणी नदी ॥ ५७<br>तथा परः शोणितपूयभोजनः<br>क्षुराग्रधारो निशितश्च चक्रकः ।<br>संशोषणो नाम तथाप्यनन्तः<br>प्रोक्तास्तवैते नरकाः सुकेशिन् ॥ ५८ | नरकोंमें श्रेष्ठ असिपत्रवन नामक आठवाँ नरक बहत्तर हजार योजन विस्तृत कहा जाता है। नवाँ तप्तकुम्भ, दसवाँ कूटशाल्मलि, ग्यारहवाँ करपत्र और बारहवाँ नरक श्वानभोजन है। उसके बाद क्रमशः संदंश, लोहपिण्ड, करम्भसिकता, भयंकर क्षार नदी, कृमिभोजन और अठारहवेंको घोर वैतरणी नदी कहा जाता है। उनके अतिरिक्त शोणित-पूयभोजन, क्षुराग्रधार, निशितचक्रक तथा संशोषण नामक अन्तरहित नरक हैं। सुकेशिन् ! हमलोगोंने तुमसे इन नरकोंका वर्णन कर दिया ॥ ५५-५८ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥
| ६२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १२ ] |
|---|
बारहवाँ अध्याय
सुकेशीका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन
| सुकेशिरुवाच | |
|---|---|
| कर्मणा नरकानेतान् केन गच्छन्ति वै कथम्।<br>एतद् वदन्तु विप्रेन्द्राः परं कौतूहलं मम॥ १ | सुकेशीने पूछा— हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इन नरकोंमें लोग किस कर्मसे और कैसे जाते हैं, यह आपलोग बतलायें। इस विषयको जाननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता है॥ १॥ |
| ऋषय ऊचुः | |
| कर्मणा येन येनेह यान्ति शालकटंकट^*।<br>स्वकर्मफलभोगार्थं नरकान् मे शृणुष्व तान्॥ २ | ऋषिगण बोले— (सुकेशिन्!) मनुष्य अपने जिन-जिन कर्मोंके फल भोग करनेके लिये इन नरकोंमें जाते हैं, उन्हें हमसे सुनो। जिन लोगोंने वेद, देवता एवं द्विजातियोंकी सदा निन्दा की है, जो पुराण एवं इतिहासके अर्थोंमें आदरबुद्धि या श्रद्धा नहीं रखते और जो गुरुओंकी निन्दा करते हैं तथा यज्ञोंमें विघ्न डालते हैं, जो दाताको दान देनेसे रोकते हैं, वे सभी उन (वर्णित हो रहे) नरकोंमें गिरते हैं। जो अधम व्यक्ति मित्र, स्त्री-पुरुष, सहोदर भाई, स्वामी-सेवक, पिता-पुत्र एवं आचार्य तथा यजमानोंमें परस्पर झगड़ा लगाते हैं तथा जो अधम व्यक्ति एकको कन्या देकर पुनः दूसरेको दे देते हैं, वे सभी यमदूतोंद्वारा नरकोंमें आरासे दो भागोंमें चीरे जाते हैं॥ २—६॥ |
| वेददेवद्विजातीनां यैर्निन्दा सततं कृता।<br>ये पुराणेतिहासार्थान् नाभिनन्दन्ति पापिनः॥ ३ | |
| गुरुनिन्दाकरा ये च मखविघ्नकराश्च ये।<br>दातुर्निवारका ये च तेषु ते निपतन्ति हि॥ ४ | |
| सुहृद्दम्पतिसौदर्यस्वामिभृत्यपितासुतान् ।<br>याज्योपाध्याययोर्यैश्च कृतो भेदोऽधमैर्मिथः॥ ५ | |
| कन्यामेकस्य दत्वा च ददत्यन्यस्य येऽधमाः।<br>करपत्रेण पाट्यन्ते ते द्विधा यमकिंकरैः॥ ६ | |
| परोपतापजनकाश्चन्दोशीरहारिणः ।<br>बालव्यजनहर्तारः करम्भसिकताश्रिताः॥ ७ | (इसी प्रकार) जो दूसरोंको संताप देते, चन्दन और खसकी चोरी करते और बालोंसे बने व्यजनों—चँवरोंको चुराते हैं, वे करम्भसिकता नामक नरकमें जाते हैं। जो देव या पितृश्राद्धमें निमन्त्रित होकर अन्यत्र भोजन करता है, उस मूर्खको नरकमें तीक्ष्ण चोंचवाले बड़े-बड़े नरकपक्षी पकड़कर दोनों ओर खींचते हैं। जो तीखे वचनोंके द्वारा चोट करते हुए साधुओंके हृदयको दुखाता है, उसके ऊपर भयंकर पक्षी अपने चोंचोंसे कठोर प्रहार करते हैं। जो दुष्टबुद्धि मनुष्य साधुओंकी चुगली-निन्दा करता है, उसकी जीभको वज्रतुल्य चोंच और नखवाले कौए खींच लेते हैं॥ ७—१०॥ |
| निमन्त्रितोऽन्यतो भुङ्क्ते श्राद्धे दैवे सपैतृके।<br>स द्विधा कृष्यते मूढस्तीक्ष्णतुण्डैः खगोत्तमैः॥ ८ | |
| मर्माणि यस्तु साधूनां तुदन् वाग्भिर्निकृन्तति।<br>तस्योपरि तुदन्तस्तु तुण्डैस्तिष्ठन्ति पतत्रिणः॥ ९ | |
| यः करोति च पैशुन्यं साधूनामन्यथामतिः।<br>वज्रतुण्डनखा जिह्वामाकर्षन्तेऽस्य वायसाः॥ १० | |
| मातापितृगुरूणां च येऽवज्ञां चक्रुरुद्धताः।<br>मज्जन्ते पूयविण्मूत्रे त्वप्रतिष्ठे ह्यधोमुखाः॥ ११ | जो उद्धत लड़के अपने माता-पिता एवं गुरुकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं, वे पीव, विष्ठा एवं मूत्रसे पूर्ण अप्रतिष्ठ नामक नरकमें नीचेकी ओर मुँह कर डुबाये जाते हैं। |
* शालकटंकट महाभारत ७।१०९।२२—३१ में अलम्बुषका तथा यहाँ सुकेशीका नामान्तर है। सुकेशि और सुकेशी भी चलते हैं।
अध्याय १२ ] सुकेशिका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, नरकोंका वर्णन ६३
देवतातिथिभूतेषु भृत्येष्वभ्यागतेषु च।
अभुक्तवत्सु ये ऽश्नन्ति बालपित्रग्रिमातृषु ॥ १२
दुष्टासृक्पूयनिर्यासं भुञ्जते त्वधमा इमे ।
सूचीमुखाश्च जायन्ते क्षुधार्त्ता गिरिविग्रहाः ॥ १३
एकपङ्क्त्युपविष्टानां विषमं भोजयन्ति ये ।
विड्भोजनं राक्षसेन्द्र नरकं ते व्रजन्ति च ॥ १४
एकसार्थप्रयातं ये पश्यन्तश्चार्थिनं नराः।
असंविभज्य भुञ्जन्ति ते यान्ति श्लेष्मभोजनम् ॥ १५
गोब्राह्मणाग्रयः स्पृष्टा पैरुच्छिष्टैः क्षपाचर ।
छिद्यन्ते हि करास्तेषां तप्तकुम्भे सुदारुणे ॥ १६
सूर्येन्दुतारका दृष्टा यैरुच्छिष्टैश्च कामतः।
तेषां नेत्रगतो वह्निर्दह्यते यमकिंकरैः ॥ १७
मित्रजायाथ जननी ज्येष्ठो भ्राता पिता स्वसा ।
जामयो गुरवो वृद्धा यैः संस्पृष्टाः पदानृभिः ॥ १८
बद्धाङ्घ्रयस्ते निगडैर्लोहैर्वह्निप्रतापितैः ।
क्षिप्यन्ते रौरवे घोरे ह्याजानुपरिदाहिनः ॥ १९
पायसं कृशरं मांसं वृथा भुक्तानि यैर्नरैः ।
तेषामयोगुडास्तप्ताः क्षिप्यन्ते वदनेऽद्भुताः ॥ २०
गुरुदेवद्विजातीनां वेदानां च नराधमैः ।
निन्दा निशामिता यैस्तु पापानामिति कुर्वताम् ॥ २१
तेषां लोहमयाः कीला वह्निवर्णाः पुनः पुनः।
श्रवणेषु निखन्यन्ते धर्मराजस्य किंकरैः ॥ २२
प्रपादेवकुलारामान् विप्रवेश्मसभासठान् ।
कूपवापीतडागांश्च भङ्क्त्वा विध्वंसयन्ति ये ॥ २३
तेषां विलपतां चर्म देहतः क्रियते पृथक् ।
कर्तिकाभिः सुतीक्ष्णाभिः सुरौद्रैर्यमकिंकरैः ॥ २४
गोब्राह्मणार्र्कमग्निं च ये वै मेहन्ति मानवाः ।
तेषां गुदेन चान्त्राणि विनिष्कृन्तन्ति वायसाः ॥ २५
स्वपोषणपरो यस्तु परित्यजति मानवः।
पुत्रभृत्यकलत्रादिबन्धुवर्गमकिंचनम् ।
दुर्भिक्षे संभ्रमे चापि स श्वभोज्ये निपात्यते ॥ २६
शरणागतं ये त्यजन्ति ये च बन्धनपालकाः ।
पतन्ति यन्त्रपीडे ते ताड्यमानास्तु किंकरैः ॥ २७
जो देवता, अतिथि, अन्य प्राणी, सेवक, बाहरसे आये व्यक्ति,
बालक, पिता, अग्नि एवं माताओंको बिना भोजन कराये
पहले ही खा लेते हैं, वे अधम पुरुष पर्वततुल्य शरीर एवं
सूची-सदृश मुखवाले होकर भूखसे व्याकुल रहते हुए दूषित
रक्त एवं पीबका सार भक्षण करते हैं। हे राक्षसराज ! एक
ही पङ्क्तिमें बैठे हुए लोगोंको जो समानरूपसे भोजन नहीं
कराते, वे विड्भोजन नामक नरकमें जाते हैं ॥ ११-१४॥
जो लोग एक साथ चलनेवाले किसी बहुत तीव्र
चाहवालेको देखते हुए भी उसे अन्न नहीं देते - अकेले
भोजन करते हैं, वे श्लेष्मभोजन नामक नरकमें जाते हैं।
हे राक्षस ! जो उच्छिष्टावस्थामें (जूठे रहते हुए) गाय,
ब्राह्मण और अग्निको स्पर्श करते हैं, उनके हाथ भयंकर
तप्तकुम्भमें डाले जाते हैं। जो उच्छिष्टावस्थामें स्वेच्छासे
सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रको देखते हैं, उनके नेत्रोंमें यमदूत अग्नि
जलाते हैं। जो मित्रकी पत्नी, माता, जेठ भाई, पिता, बहन,
पुत्री, गुरु और वृद्धोंको पैरसे छूते हैं, उन मनुष्योंके पैर
खूब जलते हुए बेड़ीसे बाँधकर उन्हें रौरव-नरकमें डाला
जाता है, जहाँ वे घुटनोंतक जलते रहते हैं ॥ १५-१९॥
जो बिना विशेष प्रयोजनके खीर, खिचड़ी एवं मांसका
भोजन करते हैं, उनके मुँहमें जलता हुआ लोहेका पिण्ड
डाला जाता है। जो पापियोंद्वारा की गयी गुरु, देवता, ब्राह्मण
और वेदोंकी निन्दाको सुनते हैं, उन नीच मनुष्योंके कानोंमें
धर्मराजके किंकर अग्निवर्ण लोहेकी कीलें बार-बार ठोंकते
रहते हैं। जो प्याऊ (पौसार), देवमन्दिर, बगीचा, ब्राह्मणगृह,
सभा, मठ, कुआँ, बावली एवं तड़ागको तोड़कर नष्ट करते
हैं, उन मनुष्योंके विलाप करते रहनेपर भी भयंकर यमकिंकर
सुतीक्ष्ण छुरिकाओंद्वारा उनकी चमड़ी उधेड़ते हैं - उनकी
देहसे चर्मको काटकर पृथक् करते रहते हैं ॥ २०-२४॥
जो गाय, ब्राह्मण, सूर्य और अग्निके सम्मुख मल-
मूत्रादिका त्याग करते हैं, उनकी गुदासे कौए उनकी
आँतोंको नोच-नोचकर काटते हैं। जो दुर्भिक्ष (अकाल)
एवं विप्लवके समय अकिंचन, पुत्र, भृत्य एवं कलत्र
(स्त्री) आदि बन्धुवर्गको छोड़कर आत्म-पोषण करता
है, वह यमदूतोंद्वारा श्वभोजन नामक नरकमें डाला जाता
है। जो रक्षाके लिये शरणमें आये व्यक्तिका परित्याग
करता है, वह मनुष्य बन्दीगृह-रक्षक यमदूतोंके
द्वारा पीटे जाते हुए यन्त्रपीड नामक नरकमें गिरते हैं।
६४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १२
क्लेशयन्ति हि विप्रादीन् ये ह्यकर्मसु पापिनः ।
ते पिष्यन्ते शिलापेषे शोष्यन्तेऽपि च शोषकैः ॥ २८
न्यासापहारिणः पापा बध्यन्ते निगडैरपि ।
क्षुत्क्षामाः शुष्कताल्वोष्ठाः पात्यन्ते वृश्चिकाशने ॥ २९
पर्वमैथुनिनः पापाः परदाररताश्च ये।
ते वह्नितप्तां कूटाग्रामालिङ्गन्ते च शाल्मलीम् ॥ ३०
उपाध्यायमधःकृत्य यैरधीतं द्विजाधमैः ।
तेषामध्यापको यश्च स शिलां शिरसा वहेत् ॥ ३१
मूत्रश्लेष्मपुरीषाणि यैरूत्सृष्टानि वारिणि।
ते पात्यन्ते च विण्मूत्रे दुर्गन्धे पूयपूरिते ॥ ३२
श्राद्धातिथ्यर्थमन्योन्यं यैरभुक्तं भुवि मानवैः ।
परस्परं भक्ष्यन्ते मांसानि स्वानि बालिशाः ॥ ३३
वेदवह्निगुरुत्यागी भार्यापित्रोस्तथैव च।
गिरिशृङ्गादधःपातं पात्यन्ते यमकिंकरैः ॥ ३४
पुनर्भूयतयो ये च कन्याविध्वंसकाश्च ये।
तद्गर्भश्राद्धभुग् यश्च कृमीन्भक्षेत्पिपीलिकाः ॥ ३५
चाण्डालादन्त्यजाद्वापि प्रतिगृह्णाति दक्षिणाम्।
याजको यजमानश्च सो श्मान्तः स्थूलकीटकः ॥ ३६
पृष्ठमांसशिनो मूढास्तथैवोत्कोचजीविनः ।
क्षिप्यन्ते वृकभक्षे ते नरके रजनीचर ॥ ३७
स्वर्णस्तेयी च ब्रह्मघ्नः सुरापी गुरुतल्पगः ।
तथा गोभूमिहर्त्तारो गोस्त्रीबालहनाश्च ये ॥ ३८
एते नरा द्विजा ये च गोषु विक्रयिणस्तथा ।
सोमविक्रयिणो ये च वेदविक्रयिणस्तथा ॥ ३९
कूटसभ्यास्त्वशौचाश्च नित्यनैमित्तनाशकाः ।
कूटसाक्ष्यप्रदा ये च ते महारौरवे स्थिताः ॥ ४०
दशवर्षसहस्राणि तावत् तामिस्रके स्थिताः ।
तावच्चैवान्धतामिस्रे असिपत्रवने ततः ॥ ४१
तावच्चैव घटीयन्त्रे तप्तकुम्भे ततः परम्।
प्रपातो भवते तेषां यैरिदं दुष्कृतं कृतम् ॥ ४२
जो लोग ब्राह्मणोंको कुकर्मोंमें लगाकर उन्हें क्लेश देते
हैं, वे पापी मनुष्य शिलाओंपर पीसे जाते हैं और अग्नि-
सूर्य आदिद्वारा शोषित भी किये जाते हैं॥ २५-२८॥
जो धरोहरको चुरा लेते हैं, उन्हें बेड़ी लगाकर भूखसे
पीड़ित एवं सूखे तालु और ओठकी अवस्थामें वृश्चिकाशन
नामक नरकमें गिराया जाता है। जो पर्वोंमें मैथुन करते तथा
परस्त्री-संग करते हैं, उन पापियोंको वह्नितप्त कीलोंवाले
शाल्मलिका (विवशतासे) आलिङ्गन करना पड़ता है। जो
द्विज उपाध्यायको स्वयंकी अपेक्षा निम्नासनपर बैठाकर
अध्ययन करता है, उन अधम द्विजों एवं उनके अध्यापकको
सिरपर शिला वहन करनी पड़ती है। जो जलमें मूत्र, कफ
एवं मलका त्याग करते हैं, उन्हें दुर्गन्धयुक्त विष्ठा और पीबसे
पूर्ण विण्मूत्र नामक नरकमें गिराया जाता है॥ २९-३२॥
जो इस संसारमें श्राद्धके अवसरपर अतिथिके निमित्त
तैयार किये गये पदार्थको परस्पर भक्षण कर लेते हैं, उन
मूर्खोंको परलोकमें एक-दूसरेका मांस खाना पड़ता है।
जो वेद, अग्नि, गुरु, भार्या, पिता एवं माताका त्याग करते
हैं, उन्हें यमदूत गिरिशिखरके ऊपरसे नीचे गिराते हैं। जो
विधवासे विवाह कराते, अविवाहित कन्याको दूषित
करते एवं उक्त प्रकारसे उत्पन्न व्यक्तियोंकी सन्तानके
यहाँ श्राद्धमें भोजन करते हैं, उन्हें कृमि तथा पिपीलिकाका
भक्षण करना पड़ता है। जो ब्राह्मण चाण्डाल और अन्त्यजोंसे
दक्षिणा लेते हैं उन्हें तथा उनके यजमानको पत्थरोंमें
रहनेवाला स्थूल कीट बनना पड़ता है॥ ३३-३६॥
राक्षस! जो पीठपीछे शिकायत करते हैं-चुगली
करते एवं घूस लेते हैं, उन्हें वृकभक्ष नामक नरकमें डाला
जाता है। इसी प्रकार सोना चुरानेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्यपी,
गुरुपत्नीगामी, गाय तथा भूमिकी चोरी करनेवाले एवं स्त्री
तथा बालकको मारनेवाले मनुष्यों तथा गो, सोम एवं
वेदका विक्रय करनेवाले, दम्भी, टेढ़ी भाषामें झूठी
गवाही देनेवाले तथा पवित्रताके आचरणको छोड़ देनेवाले
और नित्य एवं नैमित्तिक कर्मोंके नाश करनेवाले द्विजोंको
महारौरव नामक नरकमें रहना पड़ता है॥ ३७-४०॥
उपर्युक्त प्रकारके पापियोंको दस हजार वर्ष तामिस्र
नरकमें तथा उतने ही वर्षोंतक अन्धतामिस्र और असिपत्र-
वन नामक नरकमें रहनेके बादमें भी-उतने ही वर्षोंतक
घटीयन्त्र और तप्तकुम्भमें रहना पड़ता है। जिन भयंकर
| अध्याय १२ ] | सुकेशिका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, नरकोंका वर्णन | ६५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये त्वेते नरका रौद्रा रौरवाद्यास्तवोदिताः।<br>ते सर्वे क्रमशः प्रोक्ताः कृतघ्ने लोकनिन्दिते॥ ४३ | रौरव आदि नरकोंका हमने तुमसे वर्णन किया है, वे सभी लोक-निन्दित कृतघ्नोंको बारी-बारीसे प्राप्त होते रहते हैं॥ ४१-४३॥ |
| यथा सुराणां प्रवरो जनार्दनो<br>यथा गिरीणामपि शैशिराद्रिः।<br>यथायुधानां प्रवरं सुदर्शनं<br>यथा खगानां विनतानूजः।<br>महोरगाणां प्रवरोऽप्यनन्तो<br>यथा च भूतेषु मही प्रधाना॥ ४४<br>नदीषु गङ्गा जलजेषु पद्मं<br>सुरारिमुख्येषु हराङ्घ्रिभक्तः।<br>क्षेत्रेषु यद्वत्कुरुजाङ्गलं वरं<br>तीर्थेषु यद्वत् प्रवरं पृथूदकम्॥ ४५<br>सरस्सु चैवोत्तरमानसं यथा<br>वनेषु पुण्येषु हि नन्दनं यथा।<br>लोकेषु यद्वत्सदनं विरिञ्चेः<br>सत्यं यथा धर्मविधिक्रियासु॥ ४६<br>यथाश्वमेधः प्रवरः क्रतूनां<br>पुत्रो यथा स्पर्शवतां वरिष्ठः।<br>तपोधनानामपि कुम्भयोनिः<br>श्रुतिर्वरा यद्वदिहागमेषु॥ ४७<br>मुख्यः पुराणेषु यथैव<br>मात्स्यः स्वायंभुवोक्तिस्त्वपि संहितासु।<br>मनुः स्मृतीनां प्रवरो यथैव<br>तिथीषु दर्शो विषुवेषु दानम्॥ ४८ | जैसे देवताओंमें श्रीविष्णु, पर्वतोंमें हिमालय, अस्त्रोंमें सुदर्शन, पक्षियोंमें गरुड़, महान् सर्पोंमें अनन्तनाग तथा भूतोंमें पृथ्वी श्रेष्ठ है; नदियोंमें गङ्गा, जलमें उत्पन्न होनेवालोंमें कमल, देव-शत्रु-दैत्योंमें महादेवके चरणोंका भक्त और क्षेत्रोंमें जैसे कुरु-जांगल और तीर्थोंमें पृथूदक है; जलाशयोंमें उत्तर-मानस, पवित्र वनोंमें नन्दनवन, लोकोंमें ब्रह्मलोक, धर्म-कार्योंमें सत्य प्रधान है तथा जैसे यज्ञोंमें अश्वमेध, छूनेयोग्य (स्पर्शसुखवाले) पदार्थोंमें पुत्र सुखदायक है; तपस्वियोंमें अगस्त्य, आगम शास्त्रोंमें वेद श्रेष्ठ है; जैसे पुराणोंमें मत्स्यपुराण, संहिताओंमें स्वयम्भूंसंहिता, स्मृतियोंमें मनुस्मृति, तिथियोंमें अमावास्या और विषुवों अर्थात् मेष और तुला राशिमें सूर्यके संक्रमण संक्रान्तिके अवसरपर किया गया दान श्रेष्ठ होता है;॥ ४४-४८॥ |
| तेजस्विनां यद्वदिहार्क उक्तो<br>ऋक्षेषु चन्द्रो जलधिर्ह्रदेषु।<br>भवान् तथा राक्षससत्तमेषु<br>पाशेषु नागस्तिमितेषु बन्धः॥ ४९<br>धान्येषु शालिर्द्विपदेषु विप्रः<br>चतुष्पदे गोः श्वपदां मृगेन्द्रः।<br>पुष्पेषु जाती नगरेषु काञ्ची<br>नारीषु रम्भाश्रमिणां गृहस्थः॥ ५०<br>कुशस्थली श्रेष्ठतमा पुरेषु<br>देशेषु सर्वेषु च मध्यदेशः।<br>फलेषु चूतो मुकुलेष्वशोकः<br>सर्वौषधीनां प्रवरा च पथ्या॥ ५१<br>मूलेषु कन्दः प्रवरो यथोक्तो<br>व्याधिश्वजीर्णं क्षणदाचरेन्द्र।<br>श्वेतेषु दुग्धं प्रवरं यथैव<br>कार्पासिकं प्रावरणेषु यद्वत्॥ ५२ | जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, जलाशयोंमें समुद्र, अच्छे राक्षसोंमें आप और निश्चेष्ट करनेवाले पाशोंमें नागपाश श्रेष्ठ है एवं जैसे धानोंमें शालि, दो पैरवालोंमें ब्राह्मण, चौपायोंमें गाय, जंगली जानवरोंमें सिंह, फूलोंमें जाती (चमेली), नगरोंमें काञ्ची, नारियोंमें रम्भा और आश्रमियोंमें गृहस्थ श्रेष्ठ हैं; जैसे सप्तपुरियोंमें द्वारका, समस्त देशोंमें मध्यदेश, फलोंमें आम, मुकुलोंमें अशोक और जड़ी-बूटियोंमें हरीतकी सर्वश्रेष्ठ है; हे निशाचर! जैसे मूलोंमें कन्द, रोगोंमें अपच, श्वेत वस्तुओंमें दुग्ध और वस्त्रोंमें रूईके कपड़े श्रेष्ठ हैं॥ ४९-५२॥ |
| ६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १३ |
|---|
| कलासु मुख्या गणितज्ञता च विज्ञानमुख्येषु यथेन्द्रजालम्।<br>शाकेषु मुख्या त्वपि काकमाची रसेषु मुख्यं लवणं यथैव॥ ५३<br>तुङ्गेषु तालो नलिनीषु पम्पा वनौकसेष्वेव च ऋक्षराजः।<br>महीरुहेष्वेव यथा वटश्च यथा हरो ज्ञानवतां वरिष्ठः॥ ५४<br>यथा सतीनां हिमवत्सुता हि यथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा।<br>यथा वृषाणामपि नीलवर्णो यथैव सर्वेष्वपि दुःसहेषु।<br>दुर्गेषु रौद्रेषु निशाचरेश नृपातनं वैतरणी प्रधाना॥ ५५<br>पापीयसां तद्वदिह कृतघ्नः सर्वेषु पापेषु निशाचरेन्द्र।<br>ब्रह्मघ्नगोघ्नादिषु निष्कृतिर्हि विद्येत नैवास्य तु दुष्टचारिणः।<br>न निष्कृतिश्चास्ति कृतघ्नवृत्तेः सुहृत्कृतं नाशयतोऽब्दकोटिभिः॥ ५६ | निशाचर! जैसे कलाओंमें गणितका जानना, विज्ञानोंमें इन्द्रजाल, शाकोंमें मकोय, रसोंमें नमक, ऊँचे पेड़ोंमें ताड़, कमल-सरोवरोंमें पंपासर, बनैले जीवोंमें भालू, वृक्षोंमें वट, ज्ञानियोंमें महादेव वरिष्ठ हैं; जैसे सतियोंमें हिमालयकी पुत्री पार्वती, गौओंमें काली गाय, बैलोंमें नील रंगका बैल, सभी दुःसह कठिन एवं भयंकर नरकोंमें नृपातन वैतरणी प्रधान है, उसी प्रकार हे निशाचरेश! पापियोंमें कृतघ्न प्रधानतम पापी होता है। ब्रह्म-हत्या एवं गोहत्या आदि पापोंकी निष्कृति तो हो जाती है, पर दुराचारी पापी एवं मित्र-द्रोही कृतघ्नका करोड़ों वर्षोंमें भी निस्तार नहीं होता॥ ५३-५६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय
सुकेशि के प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू-द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन
| सुकेशिरुवाच | सुकेशिने कहा— |
|---|---|
| भवद्भिरुदिता घोरा पुष्करद्वीपसंस्थितिः।<br>जम्बूद्वीपस्य तु संस्थानं कथयन्तु महर्षयः॥ १ | आदरणीय ऋषियो! आपलोगोंने पुष्करद्वीपके भयंकर अवस्थानका वर्णन किया, अब आप-लोग (कृपाकर) जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन करें॥ १॥ |
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— |
| जम्बूद्वीपस्य संस्थानं कथ्यमानं निशामय।<br>नवभेदं सुविस्तीर्णं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्॥ २<br>मध्ये त्विलावृतो वर्षो भद्राश्वः पूर्वतोऽद्भुतः।<br>पूर्वं उत्तरतश्चापि हिरण्यो राक्षसेश्वर॥ ३<br>पूर्वदक्षिणतश्चापि किंनरो वर्ष उच्यते।<br>भारतो दक्षिणे प्रोक्तो हरिर्दक्षिणपश्चिमे॥ ४<br>पश्चिमे केतुमालश्च रम्यकः पश्चिमोत्तरे।<br>उत्तरे च कुरुर्वर्षः कल्पवृक्षसमावृतः॥ ५ | राक्षसेश्वर! (अब) तुम हमलोगोंसे जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन सुनो। यह द्वीप अत्यन्त विशाल है और नव भागोंमें विभक्त है। यह स्वर्ग एवं मोक्ष-फलको देनेवाला है। जम्बूद्वीपके बीचमें इलावृतवर्ष, पूर्वमें अद्भुत भद्राश्ववर्ष तथा पूर्वोत्तरमें हिरण्यवर्ष है। पूर्व-दक्षिणमें किन्नरवर्ष, दक्षिणमें भारतवर्ष तथा दक्षिण-पश्चिममें हरिवर्ष बताया गया है। इसके पश्चिममें केतुमालवर्ष, पश्चिमोत्तरमें रम्यकवर्ष और उत्तरमें कल्पवृक्षसे समादृत कुरुवर्ष है॥ २–५॥ |
अध्याय १३ ] सुकेशिके प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू-द्वीपकी और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन ६७
पुण्या रम्या नवैवैते वर्षाः शालकटंकट ।
(सुकेशि!) ये नव पवित्र और रमणीय वर्ष हैं।
इलावृताद्या ये चाष्टौ वर्षमुक्त्वैव भारतम् ॥ ६
भारतवर्षके अतिरिक्त इलावृतादि आठ वर्षोंमें युगावस्था
न तेष्वस्ति युगावस्था जरामृत्युभयं न च ।
तथा जरामृत्युका भय नहीं होता। उन वर्षोंमें बिना
तेषां स्वाभाविका सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः ।
प्रयत्नके स्वभावतः बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिलती हैं। उनमें
विपर्ययो न तेष्वस्ति नोत्तमाधममध्यमाः ॥ ७
उत्तम, मध्यम, अधम आदिका किसी प्रकारका कोई भेद
यदेतद् भारतं वर्षं नवद्वीपं निशाचर ।
नहीं है। निशाचर! इस भारतवर्षके भी नव उपद्वीप हैं।
सागरान्तरिताः सर्वे अगम्याश्च परस्परम् ॥ ८
ये सभी द्वीप समुद्रोंसे घिरे हैं और परस्पर अगम्य हैं।
इन्द्रद्वीपः कसेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ।
भारतवर्षके नव उपद्वीपोंके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रद्वीप,
नागद्वीपः कटाहश्च सिंहलो वारुणस्तथा ॥ ९
कसेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, कटाह, सिंहल
अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः ।
और वारुण। नवाँ मुख्य यह कुमारद्वीप भारत-सागरसे
कुमाराख्यः परिख्यातो द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः ॥ १०
लगा हुआ दक्षिणसे उत्तरकी ओर फैला है ॥ ६-१०॥
पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः ।
वीर ! भारतवर्षके पूर्वकी सीमापर किरात, पश्चिममें
आन्ध्रा दक्षिणतो वीर तुरुष्कास्त्वपि चोत्तरे ॥ ११
यवन, दक्षिणमें आन्ध्र तथा उत्तरमें तुरुष्क लोग निवास
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्तरवासिनः ।
करते हैं। इसके बीचमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं
इज्ज्यायुद्धवणिज्याद्यैः कर्मभिः कृतपावनाः ॥ १२
शूद्रलोग रहते हैं। यज्ञ, युद्ध एवं वाणिज्य आदि कर्मोंके
तेषां संव्यवहारश्च एभिः कर्मभिरिष्यते ।
द्वारा वे सभी पवित्र हो गये हैं। उनका व्यवहार, स्वर्ग
और अपवर्ग (मोक्ष)-की प्राप्ति तथा पाप एवं पुण्य
स्वर्गापवर्गप्राप्तिश्च पुण्यं पापं तथैव च ॥ १३
इन्हीं (यज्ञादि) कर्मोंद्वारा होते हैं। इस वर्षमें महेन्द्र,
महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमान् ऋक्षपर्वतः ।
मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य एवं पारियात्र
विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः ॥ १४
नामवाले सात मुख्य कुल पर्वत हैं ॥ ११-१४ ॥
तथान्ये शतसाहस्रा भूधरा मध्यवासिनः ।
इसके मध्यमें अन्य लाखों पर्वत हैं जो अत्यन्त
विस्तारोच्छ्रायिणो रम्या विपुलाः शुभसानवः ॥ १५
विस्तृत, उत्तुङ्ग (ऊँचे) रम्य एवं सुन्दर शिखरोंसे
कोलाहलः स वैभ्राजो मन्दरो दर्दुराचलः ।
सुशोभित हैं। यहाँ कोलाहल, वैभ्राज, मन्दरगिरि, दर्दुर,
वातंधमो वैद्युतश्च मैनाकः सरसस्तथा ॥ १६
वातंधम, वैद्युत, मैनाक, सरस, तुङ्गप्रस्थ, नागगिरि,
तुङ्गप्रस्थो नागगिरिस्तथा गोवर्धनाचलः ।
गोवर्धन, उज्जायन (गिरिनार), पुष्पगिरि, अर्बुद (आबू),
उज्जायनः पुष्यगिरिरर्बुदो रैवतस्तथा ॥ १७
रैवत, ऋष्यमूक, गोमन्त (गोवाका पर्वत), चित्रकूट,
ऋष्यमूकः सगोमन्तश्चित्रकूटः कृतस्मरः ।
कृतस्मर, श्रीपर्वत, कोङ्कण तथा अन्य सैकड़ों पर्वत भी
श्रीपर्वतः कोङ्कणश्च शतशोऽन्येऽपि पर्वताः ॥ १८
विराज रहे हैं ॥ १५-१८॥
तैर्विमिश्रा जनपदा म्लेच्छा आर्याश्च भागशः ।
उनसे संयुक्त आर्यों और म्लेच्छोंके विभागोंके
तैः पीयन्ते सरिच्छ्रेष्ठा यास्ताः सम्यङ्गिशामय ॥ १९
अनुसार जनपद हैं। यहाँके निवासी जिन उत्तम नदियोंके
सरस्वती पञ्चरूपा कालिन्दी सहिरण्वती ।
जल पीते हैं उनका वर्णन भलीभाँति सुनो। पाँच रूपकी
शतद्रुश्चन्द्रिका नीला वितस्तैरावती कुहूः ॥ २०
सरस्वती, कालिन्दी (यमुना), हिरण्वती, सतलज, चन्द्रिका,
मधुरा देविका चैव उशीरा धातकी रसा ।
नीला, वितस्ता, ऐरावती, कुहू, मधुरा, देविका, उशीरा,
गोमती धूतपापा च बाहुदा सदृषद्वती ॥ २१
धातकी, रसा, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, निश्चीरा,
निश्चीरा गण्डकी चित्रा कौशिकी च वधूसरा ।
गण्डकी, चित्रा, कौशिकी, वधूसरा, सरयू तथा लौहित्या —
सरयूश्च सलौहित्या हिमवत्पादनिःसृताः ॥ २२
ये नदियाँ हिमालयकी तलहटीसे निकली हैं ॥ १९-२२ ॥
वेदस्मृतिर्वेदवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च ।
पर्णाशा नन्दिनी चैव पावनी च मही तथा ॥ २३
वेदस्मृति, वेदवती, वृत्रघ्नी, सिन्धु, पर्णाशा, नन्दिनी,
६८
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय १३
पारा चर्मण्वती लूपी विदिशा वेणुमत्यपि ।
सिप्रा ह्यवन्ती च तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः ॥ २४
शोणो महानदश्चैव नर्मदा सुरसा कृपा ।
मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटोपवाहिका ॥ २५
चित्रोत्पला वै तमसा करमोदा पिशाचिका ।
तथान्या पिप्पलश्रोणी विपाशा वञ्जुलावती ॥ २६
सत्सन्तजा शुक्तिमती मञ्जिष्ठा कृत्तिमा वसुः ।
ऋक्षपादप्रसूता च तथान्या बालुवाहिनी ॥ २७
शिवा पयोष्णी निर्विन्ध्या तापी सनिषधावती ।
वेणा वैतरणी चैव सिनीबाहुः कुमुद्वती ॥ २८
तोया चैव महागौरी दुर्गन्धा वाशिला तथा ।
विन्ध्यपादप्रसूताश्च नद्यः पुण्यजलाः शुभाः ॥ २९
गोदावरी भीमरथी कृष्णा वेणा सरस्वती ।
तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा बाह्या कावेरिरेव च ॥ ३०
दुग्धोदा नलिनी रेवा वारिसेना कलस्वना ।
एतास्त्वपि महानद्यः सह्यपादविनिर्गताः ॥ ३१
कृतमाला ताम्रपर्णी वञ्जुला चोत्पलावती ।
सिनी चैव सुदामा च शुक्तिमत्प्रभवास्त्विमाः ॥ ३२
सर्वाः पुण्याः सरस्वत्यः पापप्रशमनास्तथा ।
जगतो मातरः सर्वाः सर्वाः सागरयोषितः ॥ ३३
अन्याः सहस्रशश्चात्र क्षुद्रनद्यो हि राक्षस ।
सदाकालवहाश्चान्याः प्रावृट्कालवहास्तथा ।
उद्ङ्मध्योद्भवा देशाः पिबन्ति स्वेच्छया शुभाः ॥ ३४
मत्स्याः कुसृष्टाः कुणिकुण्डलाश्च ।
पाञ्चालकाश्याः सह कोसलाभिः ॥ ३५
वृकाः शबरकौवीराः सधूलिङ्गा जनास्त्विमे ।
शकाश्चैव समशका मध्यदेश्या जनास्त्विमे ॥ ३६
वाहीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः ।
अपरान्तास्तथा शूद्राः पह्लवाश्च सखेटकाः ॥ ३७
गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः ।
शातद्रवा लित्थाश्च पारावतसमूषकाः ॥ ३८
माठरोदकधाराश्च कैकेया दशमास्तथा ।
क्षत्रियाः प्रातिवैश्याश्च वैश्यशूद्रकुलानि च ॥ ३९
काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा ह्यङ्गलौकिकाः ।
चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुधा बाह्यतोदराः ॥ ४०
आत्रेयाः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः ।
लम्पकास्तावका रामाः शूलिकास्तङ्गणैः सह ॥ ४१
पावनी, मही, पारा, चर्मण्वती, लूपी, विदिशा, वेणुमती,
सिप्रा तथा अवन्ती - ये नदियाँ पारियात्र पर्वतसे निकली
हुई हैं। महानद, शोण, नर्मदा, सुरसा, कृपा, मन्दाकिनी,
दशार्णा, चित्रकूटा, अपवाहिका, चित्रोत्पला, तमसा,
करमोदा, पिशाचिका, पिप्पलश्रोणी, विपाशा, वञ्जुलावती,
सत्सन्तजा, शुक्तिमती, मञ्जिष्ठा, कृत्तिमा, वसु और
बालुवाहिनी - ये नदियाँ तथा दूसरी जो बालुका बहानेवाली
हैं, ऋक्षपर्वतकी तलहटीसे निकली हुई हैं ॥ २३-२७ ॥
शिवा, पयोष्णी (पैनगंगा), निर्विन्ध्या (कालीसिंध),
तापी, निषधावती, वेणा, वैतरणी, सिनीबाहु, कुमुद्वती,
तोया, महागौरी, दुर्गन्धा तथा वाशिला - ये पवित्र
जलवाली कल्याणकारिणी नदियाँ विन्ध्यपर्वतसे निकली
हुई हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, वेणा, सरस्वती,
तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा, बाह्या, कावेरी, दुग्धोदा, नलिनी,
रेवा (नर्मदा), वारिसेना तथा कलस्वना - ये महानदियाँ
सह्यपर्वतके पाद (नीचे) - से निकलती हैं ॥ २८-३१ ॥
कृतमाला, ताम्रपर्णी, वञ्जुला, उत्पलावती, सिनी
तथा सुदामा - ये नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतसे निकली हुई
हैं। ये सभी नदियाँ पवित्र, पापोंका प्रशमन करनेवाली,
जगत्की माताएँ तथा सागरकी पत्नियाँ हैं। राक्षस !
इनके अतिरिक्त भारतमें अन्य हजारों छोटी नदियाँ भी
बहती हैं। इनमें कुछ तो सदैव प्रवाहित होनेवाली हैं।
उत्तर एवं मध्यके देशोंके निवासी इन पवित्र नदियोंके
जलको स्वेच्छाया पान करते हैं। मत्स्य, कुसृष्ट, कुणि,
कुण्डल, पाञ्चाल, काशी, कोसल, वृक, शबर, कौवीर,
धूलिङ्ग, शक तथा मशक जातियोंके मनुष्य मध्यदेशमें
रहते हैं ॥ ३२-३६ ॥
वाहीक, वाटधान, आभीर, कालतोयक, अपरान्त,
शूद्र, पह्लव, खेटक, गान्धार, यवन, सिन्धु, सौवीर,
मद्रक, शातद्रव, ललित्थ, पारावत, मूषक, माठर,
उदकधार, कैकेय, दशम, क्षत्रिय, प्रातिवैश्य तथा वैश्य
एवं शूद्रोंके कुल, काम्बोज, दरद, बर्बर, अङ्गलौकिक,
चीन, तुषार, बहुधा, बाह्यतोदर, आत्रेय, भरद्वाज,
प्रस्थल, दशेरक, लम्पक, तावक, राम, शूलिक, तङ्गण,