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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 73

अध्याय १२ ] सुकेशिका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, नरकोंका वर्णन ६३
देवतातिथिभूतेषु भृत्येष्वभ्यागतेषु च।
अभुक्तवत्सु ये ऽश्नन्ति बालपित्रग्रिमातृषु ॥ १२
दुष्टासृक्पूयनिर्यासं भुञ्जते त्वधमा इमे ।
सूचीमुखाश्च जायन्ते क्षुधार्त्ता गिरिविग्रहाः ॥ १३
एकपङ्क्त्युपविष्टानां विषमं भोजयन्ति ये ।
विड्भोजनं राक्षसेन्द्र नरकं ते व्रजन्ति च ॥ १४
एकसार्थप्रयातं ये पश्यन्तश्चार्थिनं नराः।
असंविभज्य भुञ्जन्ति ते यान्ति श्लेष्मभोजनम् ॥ १५
गोब्राह्मणाग्रयः स्पृष्टा पैरुच्छिष्टैः क्षपाचर ।
छिद्यन्ते हि करास्तेषां तप्तकुम्भे सुदारुणे ॥ १६
सूर्येन्दुतारका दृष्टा यैरुच्छिष्टैश्च कामतः।
तेषां नेत्रगतो वह्निर्दह्यते यमकिंकरैः ॥ १७
मित्रजायाथ जननी ज्येष्ठो भ्राता पिता स्वसा ।
जामयो गुरवो वृद्धा यैः संस्पृष्टाः पदानृभिः ॥ १८
बद्धाङ्घ्रयस्ते निगडैर्लोहैर्वह्निप्रतापितैः ।
क्षिप्यन्ते रौरवे घोरे ह्याजानुपरिदाहिनः ॥ १९
पायसं कृशरं मांसं वृथा भुक्तानि यैर्नरैः ।
तेषामयोगुडास्तप्ताः क्षिप्यन्ते वदनेऽद्भुताः ॥ २०
गुरुदेवद्विजातीनां वेदानां च नराधमैः ।
निन्दा निशामिता यैस्तु पापानामिति कुर्वताम् ॥ २१
तेषां लोहमयाः कीला वह्निवर्णाः पुनः पुनः।
श्रवणेषु निखन्यन्ते धर्मराजस्य किंकरैः ॥ २२
प्रपादेवकुलारामान् विप्रवेश्मसभासठान् ।
कूपवापीतडागांश्च भङ्क्त्वा विध्वंसयन्ति ये ॥ २३
तेषां विलपतां चर्म देहतः क्रियते पृथक् ।
कर्तिकाभिः सुतीक्ष्णाभिः सुरौद्रैर्यमकिंकरैः ॥ २४
गोब्राह्मणार्र्कमग्निं च ये वै मेहन्ति मानवाः ।
तेषां गुदेन चान्त्राणि विनिष्कृन्तन्ति वायसाः ॥ २५
स्वपोषणपरो यस्तु परित्यजति मानवः।
पुत्रभृत्यकलत्रादिबन्धुवर्गमकिंचनम् ।
दुर्भिक्षे संभ्रमे चापि स श्वभोज्ये निपात्यते ॥ २६
शरणागतं ये त्यजन्ति ये च बन्धनपालकाः ।
पतन्ति यन्त्रपीडे ते ताड्यमानास्तु किंकरैः ॥ २७
जो देवता, अतिथि, अन्य प्राणी, सेवक, बाहरसे आये व्यक्ति,
बालक, पिता, अग्नि एवं माताओंको बिना भोजन कराये
पहले ही खा लेते हैं, वे अधम पुरुष पर्वततुल्य शरीर एवं
सूची-सदृश मुखवाले होकर भूखसे व्याकुल रहते हुए दूषित
रक्त एवं पीबका सार भक्षण करते हैं। हे राक्षसराज ! एक
ही पङ्क्तिमें बैठे हुए लोगोंको जो समानरूपसे भोजन नहीं
कराते, वे विड्भोजन नामक नरकमें जाते हैं ॥ ११-१४॥
जो लोग एक साथ चलनेवाले किसी बहुत तीव्र
चाहवालेको देखते हुए भी उसे अन्न नहीं देते - अकेले
भोजन करते हैं, वे श्लेष्मभोजन नामक नरकमें जाते हैं।
हे राक्षस ! जो उच्छिष्टावस्थामें (जूठे रहते हुए) गाय,
ब्राह्मण और अग्निको स्पर्श करते हैं, उनके हाथ भयंकर
तप्तकुम्भमें डाले जाते हैं। जो उच्छिष्टावस्थामें स्वेच्छासे
सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रको देखते हैं, उनके नेत्रोंमें यमदूत अग्नि
जलाते हैं। जो मित्रकी पत्नी, माता, जेठ भाई, पिता, बहन,
पुत्री, गुरु और वृद्धोंको पैरसे छूते हैं, उन मनुष्योंके पैर
खूब जलते हुए बेड़ीसे बाँधकर उन्हें रौरव-नरकमें डाला
जाता है, जहाँ वे घुटनोंतक जलते रहते हैं ॥ १५-१९॥
जो बिना विशेष प्रयोजनके खीर, खिचड़ी एवं मांसका
भोजन करते हैं, उनके मुँहमें जलता हुआ लोहेका पिण्ड
डाला जाता है। जो पापियोंद्वारा की गयी गुरु, देवता, ब्राह्मण
और वेदोंकी निन्दाको सुनते हैं, उन नीच मनुष्योंके कानोंमें
धर्मराजके किंकर अग्निवर्ण लोहेकी कीलें बार-बार ठोंकते
रहते हैं। जो प्याऊ (पौसार), देवमन्दिर, बगीचा, ब्राह्मणगृह,
सभा, मठ, कुआँ, बावली एवं तड़ागको तोड़कर नष्ट करते
हैं, उन मनुष्योंके विलाप करते रहनेपर भी भयंकर यमकिंकर
सुतीक्ष्ण छुरिकाओंद्वारा उनकी चमड़ी उधेड़ते हैं - उनकी
देहसे चर्मको काटकर पृथक् करते रहते हैं ॥ २०-२४॥
जो गाय, ब्राह्मण, सूर्य और अग्निके सम्मुख मल-
मूत्रादिका त्याग करते हैं, उनकी गुदासे कौए उनकी
आँतोंको नोच-नोचकर काटते हैं। जो दुर्भिक्ष (अकाल)
एवं विप्लवके समय अकिंचन, पुत्र, भृत्य एवं कलत्र
(स्त्री) आदि बन्धुवर्गको छोड़कर आत्म-पोषण करता
है, वह यमदूतोंद्वारा श्वभोजन नामक नरकमें डाला जाता
है। जो रक्षाके लिये शरणमें आये व्यक्तिका परित्याग
करता है, वह मनुष्य बन्दीगृह-रक्षक यमदूतोंके
द्वारा पीटे जाते हुए यन्त्रपीड नामक नरकमें गिरते हैं।