वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३६- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन
| १५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३२ |
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| त्रयो गुणास्त्रयो वर्णास्त्रयो देवास्तथा क्रमात्।<br>त्रैधातवस्तथावस्थाः पितरश्चैवमादयः॥ ११<br><br>एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति।<br>विभिन्नदर्शनामाद्यां ब्रह्मणो हि सनातनीम्॥ १२ | वर्ग; सत्त्व, रज, तम —ये तीनों गुण; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—ये तीनों वर्ण; तीनों देव; वात, पित्त, कफ—ये तीनों धातुएँ तथा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ एवं पिता, पितामह, प्रपितामह—ये तीनों पितर इत्यादि—ये सभी ओंकारके मात्रात्रयस्वरूप आपके रूप हैं। आपको ब्रह्मकी विभिन्न रूपोंवाली आद्या एवं सनातनी मूर्ति कहा जाता है॥ ८—१२॥ |
| सोमसंस्था हविःसंस्था पाकसंस्था सनातनी।<br>तास्त्वदुच्चारणाद् देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः॥ १३<br><br>अनिर्देश्यपदं त्वेतदर्द्धमात्राश्रितं परम्।<br>अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम्॥ १४<br><br>तवैतत् परमं रूपं यन्न शक्यं मयोदितुम्।<br>न चास्येन न वा जिह्वाताल्वोष्ठादिभिरुच्यते॥ १५<br><br>स विष्णुः स वृषो ब्रह्मा चन्द्रार्कज्योतिरेव च।<br>विश्वावासं विश्वरूपं विश्वात्मानमनीश्वरम्॥ १६ | देवि! ब्रह्मवादी लोग आपकी शक्तिसे ही उच्चारण करके सोमसंस्था, हविःसंस्था एवं सनातनी पाकसंस्थाको सम्पन्न करते हैं। अर्धमात्रामें आश्रित आपका यह अनिर्देश्य पद अविकारी, अक्षय, दिव्य तथा अपरिणामी है। यह आपका अनिर्देश्य पद परम रूप है, जिसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। न तो मुखसे ही इसका वर्णन हो सकता है और न जिह्वा, तालु, ओष्ठ आदिसे ही। तुम्हारा वह रूप ही विष्णु, वृष (धर्म), ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य एवं ज्योति है। उसीको विश्वावास, विश्वरूप, विश्वात्मा एवं अनीश्वर (स्वतन्त्र) कहते हैं॥ १३—१६॥ |
| सांख्यसिद्धान्तवेदोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम्।<br>अनादिमध्यनिधनं सदसच्च सदैव तु॥ १७<br><br>एकं त्वनेकधाप्येकभाववेदसमाश्रितम्।<br>अनाख्यं षड्गुणाख्यं च बह्वाख्यं त्रिगुणाश्रयम्॥ १८<br><br>नानाशक्तिविभावज्ञं नानाशक्तिविभावकम्।<br>सुखात् सुखं महत्सौख्यं रूपं तत्त्वगुणात्मकम्॥ १९<br><br>एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलं च यत्।<br>अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम्॥ २० | आपका यह रूप सांख्य-सिद्धान्त तथा वेदद्वारा वर्णित, (वेदोंकी) बहुत-सी शाखाओंद्धारा स्थिर किया हुआ, आदि-मध्य-अन्तसे रहित, सत्-असत् अथवा एकमात्र सत् (ही) है। यह एक तथा अनेक प्रकारका, वेदोंद्वारा एकाग्र भक्तिसे अवलम्बित, आख्या (नाम)-विहीन, ऐश्वर्य आदि षड्गुणोंसे युक्त, बहुत नामोंवाला तथा त्रिगुणाश्रय है। आपका यह तत्त्वगुणात्मक रूप सुखसे भी परम सुख, महान् सुखरूप नाना शक्तियोंके विभावको जाननेवाला है। हे देवि! वह अद्वैत तथा द्वैतमें आश्रित ‘निष्कलं’ तथा ‘सकल ब्रह्म’ आपके द्वारा व्याप्त है॥ १७—२०॥ |
| येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये<br>येऽर्थाः स्थूला ये तथा सन्ति सूक्ष्माः।<br>ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा<br>तेषां देवि त्वत्त एवोपलब्धिः॥ २१<br><br>यद्वा मूर्तं यदमूर्तं समस्तं<br>यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किंचित्।<br>यच्च द्वैते व्यस्तभूतं च लक्ष्यं<br>तत्सम्बद्धं त्वत्स्वरैर्व्यञ्जनैश्च॥ २२ | (सरस्वती) देवि! जो पदार्थ नित्य हैं तथा जो विनष्ट हो जानेवाले हैं, जो पदार्थ स्थूल हैं तथा जो सूक्ष्म हैं, जो भूमिपर हैं तथा जो अन्तरिक्षमें हैं या जो इनसे भिन्न स्थानोंमें हैं, उन समस्त पदार्थोंकी प्राप्ति आपसे ही होती है। जो मूर्त या अमूर्त है वह सब कुछ और जो सब भूतोंमें एक रूपसे स्थित है एवं केवल एकमात्र है और जो द्वैतमें अलग-अलग रूपसे दिखलायी पड़ता है, वह सब कुछ आपके स्वर-व्यञ्जनोंसे सम्बद्ध है। |
| अध्याय ३३ ] | सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करनेका महत्त्व | १५१ |
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| एवं स्तुता तदा देवी विष्णोर्जिह्वा सरस्वती।<br>प्रत्युवाच महात्मानं मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>यत्र त्वं नेष्यसे विप्र तत्र यास्याम्यतन्द्रिता॥ २३ | इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विष्णुकी जीभरूपिणी सरस्वतीने महामुनि महात्मा मार्कण्डेयसे कहा—हे विप्र! तुम मुझे जहाँ ले जाओगे, मैं वहीं आलस्य छोड़कर चली जाऊँगी॥ २१—२३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं ततो रामह्रदः स्मृतः।<br>कुरुणा ऋषिणा कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम्।<br>तस्य मध्येन वै गाढं पुण्या पुण्यजलावहा॥ २४ | मार्कण्डेयने कहा—आरम्भमें (इसका) पवित्र नाम ब्रह्मसर था, फिर रामह्रद प्रसिद्ध हुआ एवं उसके बाद कुरु ऋषिद्वारा कृष्ट होनेसे कुरुक्षेत्र कहा जाने लगा। (अब) उसके मध्यमें अत्यन्त पवित्र जलवाली गहरी सरस्वती प्रवाहित हों॥ २४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३२ ॥
तैंतीसवाँ अध्याय
सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करने तथा तीर्थमें स्नान करनेका महत्त्व
</div>| लोमहर्षण उवाच<br>इत्युषेर्वचनं श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः।<br>नदी प्रवाहसंयुक्ता कुरुक्षेत्रं विवेश ह॥ १<br><br>तत्र सा रन्तुकं प्राप्य पुण्यतोया सरस्वती।<br>कुरुक्षेत्रं समाप्लाव्य प्रयाता पश्चिमां दिशम्॥ २<br><br>तत्र तीर्थसहस्राणि ऋषिभिः सेवितानि च।<br>तान्यहं कीर्तयिष्यामि प्रसादात् परमेष्ठिनः॥ ३<br><br>तीर्थानां स्मरणं पुण्यं दर्शनं पापनाशनम्।<br>स्नानं मुक्तिकरं प्रोक्तमपि दुष्कृतकर्मणः॥ ४ | लोमहर्षणने कहा— बुद्धिमान् मार्कण्डेय ऋषिके इस उपर्युक्त वचनको सुनकर प्रवाहसे भरी हुई सरस्वती नदी कुरुक्षेत्रमें प्रविष्ट हुई। वह पवित्रसलिला सरस्वती नदी वहाँ रन्तुकमें जाकर कुरुक्षेत्रको जलसे प्लावित करती हुई, जो पश्चिम दिशाकी ओर चली गयी, वहाँ (कुरुक्षेत्रमें) हजारों तीर्थ ऋषियोंसे सेवित हैं। परमेष्ठी (ब्रह्मा)-के प्रसादसे मैं उनका वर्णन करूँगा। पापियोंके लिये भी तीर्थोंका स्मरण पुण्यदायक, उनका दर्शन पापनाशक और स्नान मुक्तिदायक कहा गया है (पुण्यशालियोंके लिये तो कहना ही क्या है) ॥ १—४॥ |
| ये स्मरन्ति च तीर्थानि देवताः प्रीणयन्ति च।<br>स्नान्ति च श्रद्दधानाश्च ते यान्ति परमां गतिम्॥ ५ | जो श्रद्धापूर्वक तीर्थोंका स्मरण करते हैं और उनमें स्नान करते हैं तथा देवताओंको प्रसन्न करते हैं, वे परम गति (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। |
| अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।<br>यः स्मरेत कुरुक्षेत्रं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ६ | (मनुष्य) अपवित्र हो या पवित्र अथवा किसी भी अवस्थामें पड़ा हुआ हो, यदि कुरुक्षेत्रका स्मरण करे तो वह बाहर तथा भीतरसे (हर प्रकारसे) पवित्र हो जाता है। |
| कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्।<br>इत्येवं वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७ | 'मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा और मैं कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा'—इस प्रकारका वचन कहनेसे (भी) मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
| १५२ | श्रीवामनपुराण | [अध्याय ३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोग्रहे मरणं तथा।<br>वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरुक्ता चतुर्विधा॥ ८ | मानवोंके लिये ब्रह्मज्ञान, गयामें श्राद्ध, गौओंकी रक्षामें मृत्यु और कुरुक्षेत्रमें निवास — यह चार प्रकारकी मुक्ति कही गयी है॥ ५-८॥ |
| सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।<br>तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते॥ ९<br><br>दूरस्थोऽपि कुरुक्षेत्रे गच्छामि च वसाम्यहम्।<br>एवं यः सततं ब्रूयात् सोऽपि पापैः प्रमुच्यते॥ १०<br><br>तत्र चैव सरःस्नायी सरस्वत्यास्तटे स्थितः।<br>तस्य ज्ञानं ब्रह्ममयमत्पत्स्यति न संशयः॥ ११<br><br>देवता ऋषयः सिद्धाः सेवन्ते कुरुजाङ्गलम्।<br>तस्य संसेवनान्नित्यं ब्रह्म चात्मनि पश्यति॥ १२ | सरस्वती और दृषद्वती — इन दो देव-नदियोंके बीच देव-निर्मित देशको ब्रह्मावर्त कहते हैं। दूर देशमें स्थित रहकर भी जो मनुष्य 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, वहाँ निवास करूँगा'— इस प्रकार निरन्तर (मनमें संकल्प करता या) कहता है, वह भी सभी पापोंसे छूट जाता है। वहाँ सरस्वतीके तटपर रहते हुए सरोवरमें स्नान करनेवाले मनुष्यको निश्चित ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो जाता है। देवता, ऋषि और सिद्धलोग सदा कुरुजाङ्गल (तीर्थ)-का सेवन करते हैं। उस तीर्थका नित्य सेवन करनेसे, (वहाँ नित्य निवास करनेसे), मनुष्य अपने भीतर ब्रह्मका दर्शन करता है॥ ९—१२॥ |
| चञ्चलं हि मनुष्यत्वं प्राप्य ये मोक्षकाङ्क्षिणः।<br>सेवन्ति नियतात्मानो अपि दुष्कृतकारिणः॥ १३<br><br>ते विमुक्ताश्च कलुषैरनेकजन्मसंभवैः।<br>पश्यन्ति निर्मलं देवं हृदयस्थं सनातनम्॥ १४<br><br>ब्रह्मवेदिः कुरुक्षेत्रं पुण्यं संनिहितं सरः।<br>सेवमाना नरा नित्यं प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥ १५<br><br>ग्रहनक्षत्रताराणां कालेन पतनाद् भयम्।<br>कुरुक्षेत्रे मृतानां च पतनं नैव विद्यते॥ १६ | जो भी पापी चञ्चल मानव-जीवन पाकर जितेन्द्रिय होकर मोक्ष प्राप्त करनेकी कामनासे वहाँ निवास करते हैं, वे अनेक जन्मोंके पापोंसे छूट जाते हैं तथा अपने हृदयमें रहनेवाले निर्मल देव—सनातन (ब्रह्म)-का दर्शन करते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मवेदी, कुरुक्षेत्र एवं पवित्र 'संनिहित सरोवर' का सदा सेवन करते हैं, वे परम पदको प्राप्त करते हैं। समयपर ग्रह, नक्षत्र एवं ताराओंके भी पतनका भय होता है, किंतु कुरुक्षेत्रमें मरनेवालोंका कभी पतन नहीं होता॥ १३—१६॥ |
| यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः सेवन्ति स्थानकाङ्क्षिणः॥ १७<br><br>गत्वा तु श्रद्धया युक्तः स्नात्वा स्थाणुमहाह्रदे।<br>मनसा चिन्तितं कामं लभते नात्र संशयः॥ १८<br><br>नियमं च ततः कृत्वा गत्वा सरः प्रदक्षिणम्।<br>रन्तुकं च समासाद्य क्षामयित्वा पुनः पुनः॥ १९<br><br>सरस्वत्यां नरः स्नात्वा यक्षं दृष्ट्वा प्रणम्य च।<br>पुष्पं धूपं च नैवेद्यं दत्त्वा वाचमुदीरयेत्॥ २०<br><br>तव प्रसादाद् यक्षेन्द्र वनानि सरितश्च याः।<br>भ्रमिष्यामि च तीर्थानि अविघ्नं कुरु मे सदा॥ २१ | ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सराएँ और यक्ष उत्तम स्थानकी प्राप्तिके लिये जहाँ (कुरुक्षेत्रमें) निवास करते हैं, वहाँ जाकर स्थाणु नामक महासरोवरमें श्रद्धापूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य निःसंदेह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है। नियम-परायण होनेके पश्चात् सरोवरकी प्रदक्षिणा करके रन्तुकमें जाकर बार-बार क्षमा-प्रार्थना करनेके बाद सरस्वती नदीमें स्नान कर यक्षका दर्शन करे और उन्हें प्रणाम करे तथा पुष्प, धूप एवं नैवेद्य देकर इस प्रकार वचन कहे— हे यक्षेन्द्र! आपकी कृपासे मैं वनों, नदियों और तीर्थोंमें भ्रमण करूँगा; उसे आप सदा विघ्नरहित करें (मेरी यात्रामें किसी प्रकारका विघ्न न हो)॥ १७—२१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३३॥
अध्याय ३४ ] कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य १५३
चौंतीसवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य
ऋषय ऊचुः
वनानि सप्त नो ब्रूहि नव नद्यश्च याः स्मृताः।
तीर्थानि च समग्राणि तीर्थस्नानफलं तथा॥ १
येन येन विधानेन यस्य तीर्थस्य यत् फलम्।
तत् सर्वं विस्तरेणेह ब्रूहि पौराणिकोत्तम॥ २
लोमहर्षण उवाच
शृणु सप्त वनानीह कुरुक्षेत्रस्य मध्यतः।
येषां नामानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च॥ ३
काम्यकं च वनं पुण्यं तथाऽदितिवनं महत्।
व्यासस्य च वनं पुण्यं फलकीवनमेव च॥ ४
तत्र सूर्यवनस्थानं तथा मधुवनं महत्।
पुण्यं शीतवनं नाम सर्वकल्मषनाशनम्॥ ५
वनान्येतानि वै सप्त नदीः शृणुत मे द्विजाः।
सरस्वती नदी पुण्या तथा वैतरणी नदी॥ ६
आपगा च महापुण्या गङ्गा मन्दाकिनी नदी।
मधुस्रवा वासुनदी कौशिकी पापनाशिनी॥ ७
दृषद्वती महापुण्या तथा हिरण्वती नदी।
वर्षाकालवहाः सर्वा वर्जयित्वा सरस्वतीम्॥ ८
एतासामुदकं पुण्यं प्रावृट्काले प्रकीर्तितम्।
रजस्वलात्वमेतासां विद्यते न कदाचन।
तीर्थस्य च प्रभावेण पुण्या ह्येताः सरिद्वराः॥ ९
शृण्वन्तु मुनयः प्रीतास्तीर्थस्नानफलं महत्।
गमनं स्मरणं चैव सर्वकल्मषनाशनम्॥ १०
रन्तुकं च नरो दृष्ट्वा द्वारपालं महाबलम्।
यक्षं समभिवाद्यैव तीर्थयात्रां समाचरेत्॥ ११
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नाम्नाऽदितिवनं महत्।
अदित्या यत्र पुत्रार्थं कृतं घोरं महत्तपः॥ १२
तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च अदितिं देवमातरम्।
पुत्रं जनयते शूरं सर्वदोषविवर्जितम्।
आदित्यशतसंकाशं विमानं चाधिरोहति॥ १३
ऋषियोंने [ लोमहर्षणजीसे ] कहा - (मुने!
आप) हमसे उन सात वनों, नौ नदियों, समग्र तीर्थों एवं
तीर्थ-स्नानके फलका वर्णन करें। पुराणवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ
मुने! जिस-जिस विधानसे जिस तीर्थका जो फल होता
है, उन सबको आप विस्तारपूर्वक बतलावें॥ १-२॥
लोमहर्षणने कहा- (ऋषियो!) कुरुक्षेत्रके मध्यमें
जो सात वन हैं, उनका मैं वर्णन करता हूँ, आपलोग
उसे सुनें। उन वनोंके नाम सभी पापोंको नष्ट करनेवाले
तथा पवित्र हैं। (उन वनोंके नाम हैं-) पवित्र
काम्यकवन, महान् अदितिवन, पुण्यप्रद व्यासवन,
फलकीवन, सूर्यवन, महान् मधुवन तथा सर्वकल्मष-
नाशक पवित्र शीतवन - ये ही सात वन हैं। हे द्विजो!
(अब) नदियों (-के नाम)-को मुझसे सुनो। (उनके
नाम हैं-) पवित्र सरस्वती नदी, वैतरणी नदी,
महापवित्र आपगा, मन्दाकिनी गङ्गा, मधुस्रवा, वासु
नदी, पापनाशिनी कौशिकी, महापवित्र दृषद्वती (कग्गर)
तथा हिरण्वती नदी। इनमें सरस्वतीके अतिरिक्त सभी
नदियाँ वर्षाकालमें (ही) बहनेवाली हैं॥ ३-८॥
वर्षाकालमें इनका जल पवित्र माना जाता है।
इनमें कभी भी रजस्वलात्व दोष नहीं होता। तीर्थके
प्रभावसे ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पवित्र हैं। हे मुनियो!
आपलोग (अब) प्रसन्न होकर तीर्थस्नानका महान् फल
सुनें। वहाँ जाना एवं उनका स्मरण करना समस्त
पापोंका नाश करनेवाला होता है। महाबलवान् रन्तुक
नामक द्वारपालका दर्शन करनेके बाद यक्षको प्रणाम
कर तीर्थयात्रा प्रारम्भ करनी चाहिये। विप्रेन्द्रो ! उसके
बाद महान् अदितिवनमें जाना चाहिये, जहाँ अदितिने
पुत्रके लिये अत्यन्त कठोर तप किया था॥ ९-१२॥
वहाँ स्नानकर तथा देवमाता अदितिका दर्शनकर
मनुष्य समस्त दोषोंसे रहित (निर्मल) वीर पुत्र उत्पन्न
करता है और सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान विमानपर
१५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३४
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ।
सवनं नाम विख्यातं यत्र संनिहितो हरिः ॥ १४
विमले च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा च विमलेश्वरम् ।
निर्मलं स्वर्गमायाति रुद्रलोकं च गच्छति ॥ १५
हरिं च बलदेवं च एकत्राससमन्वितौ ।
दृष्ट्वा मोक्षमवाप्नोति कलिकल्मषसम्भवैः ॥ १६
ततः पारिप्लवं गच्छेत् तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
तत्र स्नात्वा च दृष्ट्वा च ब्रह्माणं वेदसंयुतम् ॥ १७
ब्रह्मवेदफलं प्राप्य निर्मलं स्वर्गमाप्नुयात् ।
तत्रापि संगमं प्राप्य कौशिक्स्यां तीर्थसम्भवम् ।
संगमे च नरः स्नात्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १८
धरण्यास्तीर्थमासाद्य सर्वपापविमोचनम् ।
क्षान्तियुक्तो नरः स्नात्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १९
धरण्यामपराधानि कृतानि पुरुषेण वै।
सर्वाणि क्षमते तस्य स्नानमात्रस्य देहिनः ॥ २०
ततो दक्षाश्रमं गत्वा दृष्ट्वा दक्षेश्वरं शिवम् ।
अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ २१
ततः शालूकिनीं गत्वा स्नात्वा तीर्थे द्विजोत्तमाः ।
हरिं हरेण संयुक्तं पूज्य भक्तिसमन्वितः ।
प्राप्नोत्यभिमताँल्लोकान् सर्वपापविवर्जितान् ॥ २२
सर्पिर्दधि समासाद्य नागानां तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र स्नानं नरः कृत्वा मुक्तो नागभयाद् भवेत् ॥ २३
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा द्वारपालं तु रन्तुकम् ।
तत्रोष्य रजनीमेकां स्नात्वा तीर्थवरे शुभे ॥ २४
द्वितीयं पूजयेद् यत्र द्वारपालं प्रयत्नतः ।
ब्राह्मणान् भोजयित्वा च प्रणिपत्य क्षमापयेत् ॥ २५
तव प्रसादाद् यक्षेन्द्र मुक्तो भवति किल्बिषैः ।
सिद्धिर्मयाभिलषिता तया सार्द्धं भवाम्यहम् ।
एवं प्रसाद्य यक्षेन्द्रं ततः पञ्चनदं व्रजेत् ॥ २६
पञ्चनदाश्च रुद्रेण कृता दानवभीषणाः ।
तत्र सर्वेषु लोकेषु तीर्थं पञ्चनदं स्मृतम् ॥ २७
कोटितीर्थानि रुद्रेण समाहृत्य यतः स्थितम् ।
तेन त्रैलोक्यविख्यातं कोटितीर्थं प्रचक्षते ॥ २८
आरूढ़ होता है। विप्रेन्द्रो ! इसके बाद 'सवन' नामसे
विख्यात सर्वोत्तम विष्णु-स्थानको जाना चाहिये, जहाँ
भगवान् हरि सदा संनिहित रहते हैं। विमल तीर्थमें
स्नानकर विमलेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्य निर्मल हो
जाता है तथा रुद्रलोकमें जाता है। एक आसनपर स्थित
कृष्ण और बलदेवका दर्शन करनेसे मनुष्य कलिके
दुष्कर्मोंसे उत्पन्न पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३-१६ ॥
उसके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात पारिप्लव
नामक तीर्थमें जाय । वहाँ स्नान करनेके पश्चात् वेदों-
सहित ब्रह्माका दर्शन करनेसे अथर्ववेदका ज्ञान प्राप्त कर
निर्मल स्वर्गको प्राप्त करता है। कौशिकी-संगम तीर्थमें
जाकर स्नान कर मनुष्य परम पदको प्राप्त करता है।
समस्त पापोंसे मुक्त करनेवाले धरणीके तीर्थमें जाकर
स्नान करनेसे क्षमाशील मनुष्य परम पदकी प्राप्ति करता
है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे पृथ्वीपर मनुष्यद्वारा किये गये
समस्त अपराध क्षमा कर दिये जाते हैं ॥ १७-२० ॥
उसके बाद दक्षाश्रममें जाकर दक्षेश्वर शिवका
दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता
है। द्विजोत्तमो ! तदनन्तर शालूकिनी तीर्थमें जाकर स्नान
करनेके उपरान्त भक्तिपूर्वक हरसे संयुक्त हरिका पूजन
कर मनुष्य समस्त पापोंसे रहित इच्छाके अनुकूल
लोकोंको प्राप्त करता है। सर्पिर्दधि नामवाले नागोंके
उत्तम तीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य नाग-भयसे मुक्त
हो जाता है। विप्रश्रेष्ठो ! तदनन्तर रन्तुक नामक द्वारपालके
पास जाय। वहाँ एक रात्रि निवास करे तथा कल्याणकारी
(उस) श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेके बाद दूसरे दिन
प्रयत्नपूर्वक (निष्ठाके साथ मन लगाकर) द्वारपालका
पूजन करे एवं ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर उन्हें
प्रणाम कर इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे-'हे यक्षेन्द्र !
तुम्हारी कृपासे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है। मैं
अपनी अभीष्ट सिद्धिको प्राप्त करूँ (मेरी मनःकामना
पूर्ण हो)।' इस प्रकार यक्षेन्द्रको प्रसन्न करनेके पश्चात्
पञ्चनद तीर्थमें जाना चाहिये। जहाँ भगवान् रुद्रने दानवोंके
लिये भयंकर पाँच नदोंका निर्माण किया है, उस स्थानपर
समस्त संसारमें प्रसिद्ध पञ्चनद तीर्थ है; ॥ २१-२७ ॥
क्योंकि करोड़ों तीर्थोंको एकत्र (स्थापित) कर
भगवान् वहाँ स्थित हैं, अतः उसे त्रैलोक्य-प्रसिद्ध
अध्याय ३४]
कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य
१५५
तस्मिन् तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कोटीश्वरं हरम् ।
कोटितीर्थ कहा जाता है। मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस तीर्थमें
पञ्चयज्ञानवाप्नोति नित्यं श्रद्धासमन्वितः ॥ २९
स्नान कर तथा कोटीश्वर हरका दर्शन कर पाँच प्रकारके
(महा) यज्ञोंके अनुष्ठानका फल प्राप्त करता है। उसी
तत्रैव वामनो देवः सर्वदेवैः प्रतिष्ठितः ।
स्थानपर सब देवताओंने भगवान् वामनदेवकी स्थापना
तत्रापि च नरः स्नात्वा ह्यग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ३०
की है। वहाँ भी स्नान करनेसे मनुष्यको अग्निष्टोम
यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रद्धावान् जितेन्द्रिय मनुष्य
अश्विनोस्तीर्थमासाद्य श्रद्धावान् यो जितेन्द्रियः ।
अश्विनीकुमारोंके तीर्थमें जाकर रूपवान् और यशस्वी
रूपस्य भागी भवति यशस्वी च भवेन्नरः ॥ ३१
होता है॥ २८-३१॥
वाराहं तीर्थमाख्यातं विष्णुना परिकीर्तितम् ।
विष्णुद्वारा वर्णित वाराह नामक विख्यात तीर्थ है।
तस्मिन् स्नात्वा श्रद्धधानः प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ३२
श्रद्धालु पुरुष उसमें स्नान कर परमपदको प्राप्त करता
ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः सोमतीर्थमनुत्तमम् ।
है। विप्रेन्द्रो ! उसके बाद श्रेष्ठ सोमतीर्थमें जाना चाहिये,
जहाँ चन्द्रमा पूर्वकालमें तपस्या कर व्याधिसे मुक्त हुए
यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा व्याधिमुक्तोऽभवत् पुरा ॥ ३३
थे। उस शुभ तीर्थमें स्नान कर सोमेश्वर भगवान्का दर्शन
तत्र सोमेश्वरं दृष्ट्वा स्नात्वा तीर्थवरे शुभे ।
करनेसे मनुष्य राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा
राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३४
व्याधियों और सभी दोषोंसे मुक्त होकर सोमलोकमें
व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तः सर्वदोषविवर्जितः ।
जाता एवं चिरकालतक वहाँ सानन्द विहार करता
सोमलोकमवाप्नोति तत्रैव रमते चिरम् ॥ ३५
है॥ ३२-३५॥
भूतेश्वरं च तत्रैव ज्वालामालेश्वरं तथा।
वहींपर भूतेश्वर एवं ज्वालामालेश्वर नामक
तावुभौ लिङ्गावभ्यर्च्य न भूयो जन्म चाप्नुयात् ॥ ३६
लिङ्ग है। उन दोनों लिङ्गोंकी पूजा करनेसे (मनुष्य)
पुनर्जन्म नहीं पाता। एकहंस (सरोवर)-में स्नान कर
एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।
मनुष्य हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है।
कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥ ३७
'कृतशौच' नामक तीर्थमें जाकर मनोयोगपूर्वक तीर्थकी
सेवा करनेवाला द्विजोत्तम 'पुण्डरीक' यज्ञविशेषके फलको
पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेन्नरः ।
प्राप्त करता है तथा उसकी शुद्धि हो जाती है (-वह
ततो मुञ्जवटं नाम महादेवस्य धीमतः ॥ ३८
पवित्र हो जाता है)। उसके बाद बुद्धिमान् महादेवके
उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् ।
मुञ्जवट नामक तीर्थमें एक रात्रि निवास करके मनुष्य
तत्रैव च महाग्राही यक्षिणी लोकविश्रुता ॥ ३९
गाणपत्य (गणनायके पदको) प्राप्त करता है। वहीं
विश्वप्रसिद्ध महाग्राही यक्षिणी है। वहाँ जाकर स्नान
स्नात्वाऽभिगत्वा तत्रैव प्रसाद्य यक्षिणीं ततः ।
करनेके बाद यक्षिणीको प्रसन्न कर उपवास करनेसे
उपवासं च तत्रैव महापातकनाशनम् ॥ ४०
महान् पातकोंका नाश होता है॥ ३६-४०॥
कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं पुण्यवर्धनम् ।
पुण्यकी वृद्धि करनेवाले कुरुक्षेत्रके उस विख्यात
प्रदक्षिणमुपावर्त्य ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः ।
द्वारकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर
पुष्करं च ततो गत्वा अभ्यर्च्य पितृदेवताः ॥ ४१
पुष्करमें जाकर पितृदेवोंकी अर्चना करे। उस तीर्थका
महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजीने निर्माण किया था।
जामदग्न्येन रामेण आहृतं तन्महात्मना ।
वहाँ (जाकर) मनुष्य सफल-मनोरथ हो जाता है और
कृतकृत्यो भवेद् राजा अश्वमेधं च विन्दति ॥ ४२
राजाको अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। कार्तिकी
कन्यादानं च यस्तत्र कार्तिकायां वै करिष्यति ।
पूर्णिमाको जो मनुष्य वहाँ कन्यादान करेगा, उसके ऊपर
प्रसन्ना देवतास्तस्य दास्यन्त्यभिमतं फलम् ॥ ४३
देवता प्रसन्न होकर उसे मनोवाञ्छित फल देंगे। वहाँ